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अचूक निशानेबाज और शिकारी जिम कॉर्बेट का आज 150वां जन्मदिन है! देखें कुछ दुर्लभ तस्वीरें

लंगूर, सियार, साँभर, बंदर, काकड़, गीदड़, चीतल, जंगली सूअर और यहाँ तक कि पालतू भैंसों को जिम ने अपना मुखबिर बना लिया था। साँभर की पुकार और चीतलों की लयपूर्ण बोली जिम को लक्षित जानवर का पता दे देती थी। मैना, बुलबुल, कौए, नीलकंठ, हँसियाचोंच, गरूड़, बाज, गिद्ध और जंगली मुर्गी आदि अनेक परिंदों से जिम मुखबिर का काम लेते थे…

प्रयाग पाण्डे-

प्रकृतिविद, दक्ष शिकारी, रोमांचक शिकार कथाओं के लेखक एवं महान मानवतावादी जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट यानी जिम कॉर्बेट का आज 150वां अवतरण दिवस है। जिम कॉर्बेट का जन्म 25 जुलाई, 1875 को झील नगरी नैनीताल में हुआ था। जिम कॉर्बेट के पुरखे मूलतः आयरिश नागरिक थे। कॉर्बेट परिवार तीन पीढ़ियों तक भारत में रहा।

जिम कॉर्बेट अचूक निशानेबाज तो थे ही। इसके इतर वे गरीबों के प्रति अत्यधिक उदार, मानवतावादी और साधु प्रवृति के सह्रदय इंसान थे। उन्होंने स्वयं के जीवन को गंभीर खतरे में डालकर अमूल्य मानव जीवन की रक्षा की थी। जिम कॉर्बेट ने अत्यंत साहस और बहादुरी के साथ करीब डेढ़ हजार मानव हत्याओं के लिए जिम्मेदार एक दर्जन से अधिक खूंखार नरभक्षियों का अंत किया था। जिम का निजी जीवन कभी नहीं पढ़ी जाने वाली कुदरत की किताब की तरह था। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे। जिम प्रकृति विज्ञानी, वन्यजीव विशेषज्ञ और नामचीन शिकारी थे और वन्यजीव रक्षक भी। वे सरकारी मुलाजिम और सैनिक भी थे और लोकप्रिय जनप्रतिनिधि भी। जिम ठेकेदार और संपत्ति एजेंट भी थे और सिद्धहस्त लेखक एवं ख्यातिलब्ध वन्यजीव फोटोग्राफर भी। जिम तत्कालीन उच्च प्रशासकों के निकट भी थे और भारत के गरीबों के अजीज दोस्त भी। जिम के व्यक्तित्व के विविध आयामों का सबसे प्रबल पक्ष था- उनका भारत भूमि एवं भारत के गरीबों के प्रति अथाह प्रेम और ऊँचे दर्जे की दानशीलता।

पारिवारिक परिस्थितियों ने जिम कॉर्बेट को अचूक निशानेबाज और प्रसिद्ध शिकारी बनाया था। छुटपन में जिम के पारिवारिक हालात अच्छे न थे। शाम को हांडी चूल्हे पर चढ़ सके इस विवशता ने जिम कॉर्बेट को बाल्यावस्था में ही जंगल को अपनी पाठशाला बनाना पड़ा था। उन्होंने बालपन में अनगिनत दिन और रातें जंगल में बिताईं। जंगल के जीवन को अपनी आँखों से नजदीक से देखा। कानों से सुना। ह्रदय से अनुभव किया। मस्तिष्क से मीमांसा की। जिम ने दीर्घ संयम ,सावधानी और सतर्कता से अर्जित जंगल के व्यवहारिक ज्ञान को अपने भीतर सोखा। उन्होंने जंगल में जंगली जानवरों के बीच इंसानों के जीवित रहने की तरक़ीब ईजाद की। किशोरावस्था में कदम रखने तक जिम वन और वन्य जीवन के सूक्ष्मतम रहस्यों से सुपरिचित हो गए थे। उन्होंने वर्षों के व्यावहारिक अभ्यास से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात कर लिया था। जंगल और जंगलवासियों को लेकर उनमें विलक्षण प्रतिभा विकसित हो गई थी।

जिम कॉर्बेट ने कालाढुंगी के अपने घर ‘अरुंडेल’ के समीप स्थित झरने/ नहर में पानी पीने को आने वाले जंगली जानवरों की गंध से उनकी पहचान करना सीखा। वे गंध से वन्य जीव की पहचान कर सकते थे। अपने आसपास उसकी उपस्थित का अनुभव कर सकते थे। फिर जिम ने हवा की दिशा में अपनी गंध को छिपाना सीखा। कई साल जंगल में गुजारने के दौरान जिम ने जंगली प्राणियों की भाषा, आदतें तथा व्यवहार को जाना और समझा। उन्होंने जंगली जानवरों और पक्षियों की आदतों, स्वभाव, उनके प्राकृतिक व्यवहार और प्रवृत्तियों के आधार पर उनका वर्गीकरण किया। वन्य जीवों, पक्षियों और रेंगने वाले प्राणियों को अलग-अलग समूहों में विभक्त किया। जिम ने जंगली जानवरों और परिंदों की बोलियों के अर्थ को समझा। विभिन्न अवसरों और परिस्थितियों के अनुसार उनकी बदलती आवाजों और सुरों के गूढ़ अर्थों को जाना। कौन -सा जानवर या परिंदा किस अवसर पर किस अंदाज में बोलता या चीखता है, इसका गहन अध्ययन किया। फिर जिम ने जंगली जानवरों और पक्षियों की आवाजों की नकल करना सीखा। तब जिम बच्चे थे, उनके होंठ और गले में लचीलापन था, इसलिए वे विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीवों और परिंदों की समयानुकूल आवाजों की हू-ब-हू नकल करना आसानी से सीख गए थे। जिम ने जंगल में मिलने वाले कंद-मूल फलों से भोजन प्राप्त करने के गुर सीख लिए थे। जंगल में पाए जाने पर औषधीय गुणों वाली जड़ी – बूटियों एवं वनस्पतियों की बखूबी पहचान कर ली थी।

जिम कॉर्बेट के कालाढुंगी के घर के पास बौर नदी थी। नदी में जंगली जानवर पानी पीने आते थे। जिम ने नदी के किनारे रेत में वन्य जीवों के पाँवों के निशानों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने स्वअध्ययन से विभिन्न प्रजाति के जानवरों के पदचिह्नों को पहचानने में महारत हासिल कर ली थी। वे पाँवों के निशान से एक नज़र में जानवर की पहचान कर सकते थे। पदचिह्न देखकर जानवर की प्रजाति, लिंग, उम्र, उसकी शारीरिक बनावट, आकार, पाँवों की दशा, आने- जाने की दिशा और जानवरों की संख्या जान जाते थे।

जिम ने अपनी सुविधा के लिए जंगली जानवरों को अलग- अलग समूहों में बांट दिया था। वे विडाल वंशी जानवरों द्वारा पेड़ों में लगाए गए पंजों के निशानों से जानवर की आयु, लिंग, उसके आने-जाने की दिशा, पेड़ में निशान लगाए जाने का समय, उसके नरभक्षी होने अथवा नहीं होने और उस जानवर द्वारा पिछले 48 घंटों में अपना निवाला बनाए गए जानवर की प्रजाति का सटीक अनुमान लगाने में समर्थ थे।

जंगल के व्यावहारिक अध्ययन से जिम ने जंगल के सभी प्रजातियों के परिंदों की परिस्थितियों के अनुसार आवाजें निकालना सीख लिया था। वे जंगल में जानवरों और पक्षियों की आ रही आवाजों की दिशा, दूरी और आवाज लगाने के उद्देश्य को समझने में समर्थ हो गए थे। जिम ने जंगल के शाकाहारी जानवरों के जरिए मांसाहारी जानवरों की गुप्त जानकारियां प्राप्त करने की अद्भुत प्रतिभा विकसित कर ली थी। जंगल में निरंतर गूँजते रहने वाली ध्वनियों का अर्थ समझने और उन ध्वनियों को शब्दों में बदलने में जिम ने दक्षता प्राप्त कर ली थी। वे मक्खियों की भिनभिनाने की आवाजों और मांसभक्षी पक्षियों का पीछा कर घायल अथवा मृत जानवरों को खोज निकालते थे।

लंगूर, सियार, साँभर, बंदर, काकड़, गीदड़, चीतल, जंगली सूअर और यहाँ तक कि पालतू भैंसों को जिम ने अपना मुखबिर बना लिया था। साँभर की पुकार और चीतलों की लयपूर्ण बोली जिम को लक्षित जानवर का पता दे देती थी। मैना, बुलबुल, कौए, नीलकंठ, हँसियाचोंच, गरूड़, बाज, गिद्ध और जंगली मुर्गी आदि अनेक परिंदों से जिम मुखबिर का काम लेते थे।

जिम जंगल के जानवरों और परिंदों की आदतों, स्वभाव और आवाजों का इतना गहन अध्ययन कर चुके थे कि वे किसी भी जंगली जानवर के साथ उसी की आवाज में वार्तालाप कर सकते थे। जिम बखूबी जानते थे कि किस जानवर अथवा पक्षी से किस मौसम और समय पर किस अंदाज में आवाज लगानी है। वे जंगल में किसी भी पक्षी या जानवर को अपनी मनपसंद जगह बुला सकते थे। वन्य जीवों और पंछियों को अपने पीछे चला सकते थे। उसे लक्षित स्थान पर भी भेज सकते थे। जिम ने नरभक्षियों को मारने के दौरान अपनी इस विलक्षण प्रतिभा का खूब इस्तेमाल किया था। वे हवा में उड़ते पँछी की बनावट और पंख हिलाने के ढंग को देखकर पँछी की पहचान कर लेते थे।

जंगली जानवरों और परिंदों की आवाज पहचानने और उनकी ठीक वैसी ही नकल कर लेने की दक्षता हासिल कर लेने के बाद जंगल को देखने और समझने का जिम कॉर्बेट का दायरा और विस्तृत हो गया था। पहले जिम जंगल को उतना ही देख पाते थे, जितनी उनकी आँखें देख सकती थीं। जंगलवासियों की आदतें, व्यवहार और बोली आदि हुनर सीख लेने के बाद जिम आँखों के अतिरिक्त उतना जंगल देख सकते थे, जितना उनके कान सुन सकते थे।

प्रकृति ने जिम कॉर्बेट को तीक्ष्ण दृष्टि और अद्भुत श्रवण शक्ति प्रदान की थी। वे 180 डिग्री के दायरे की प्रत्येक वस्तु और गतिविधियों को देख सकते थे। दिन हो या फिर रात, जिम जंगल में विचरण कर रहे प्रत्येक जंगलवासी की पल-पल की गतिविधियों को अपने कानों से सुनकर वस्तुस्थिति का सटीक अनुमान लगा लेते थे। जिम कालाढुंगी में घर में अपने बिस्तर में लेटे हुए जंगल से आने वाली आवाजों से जंगल में घटित हो रही प्रत्येक छोटी – बड़ी घटनाओं का अंदाजा लगा लेते थे। अपने मानस पटल पर घटनास्थल का मानसिक चित्र उकेर लेते थे। जिम की नजरें इतनी तेज थीं कि वे रात में भी दिन की तरह देख सकते थे। जिम का जंगल दिशा बोध रात के अंधेरे में भी उतना ही सटीक था,जितना कि दिन के उजाले में। वे अंधेरीरात में घने जंगल में रास्ता ढूंढ सकते थे। जिम का जंगल बोध इतना सुदृढ़ था कि वे आँखों में पट्टी बांध कर भी कालाढुंगी के घने जंगलों में अपना रास्ता खोज सकते थे।

जिम भारत में पाए जाने वाले सांपों के विशेषज्ञ थे। वे जमीन पर सापों के रेंगने के निशानों को देखकर सांप के बारे में संपूर्ण जानकारी दे सकते थे। जिम निशानों के आधार पर सांप की लंबाई, गोलाई, आने -जाने की दिशाएं और सांप के विषधर या विषहीन होने के संबंध में जान जाते थे।

ऊँचे -ऊँचे दरख्तों में चढ़ना-उतरना, जंगल में बिना आवाज किए चलना और आने वाली आवाजों का निश्चित जगह का अंदाज लगाना जिम कॉर्बेट ने बचपन में ही सीख लिया था। जिम बंदरों की तरह पेड़ों में चढ़ जाते थे। पहाड़ों में स्थानीय लोगों के मुकाबले कई गुना तेज गति से चल सकते थे। वे पहाड़ी बकरी की तरह तीव्र ढलान वाली पहाड़ियों और चट्टानों में आसानी से चढ़ -उतर सकते थे।

जिम ने जंगली जानवरों के भय को अपने अंतर्मन से निकाल दिया था। उन्हें जंगल और खूंखार जंगली जानवरों से डर नहीं लगता था। उन्हें जंगल में घने अंधेरे में भी घबराहट नहीं होती थी। जिम घनघोर जंगल में कहीं भी लेटकर नींद ले सकते थे। पेड़ में सो कर रात गुजार सकते थे। नरभक्षियों को मारने के अभियानों के दौरान जिम ने अपने जीवन की अधिकांश रातें पेड़ों में सो कर बिताईं थीं। निरंतर अभ्यास से जिम निशानेबाजी में पारंगत हो गए थे। जिम निशाना साधते समय अपनी दोनों आँखें खुली रखते थे। वे एक आँख से अपने लक्ष्य को देखते थे और दूसरी आँख से राइफल की दृष्टिका को। जिम चाँदनी रात में सौ गज दूरी से लक्ष्य पर सटीक निशाना लगा सकते थे। वे दागी गई गोली को मनचाही दिशा और लक्ष्य की ओर भेजने में समर्थ हो गए थे। जिम आवाज को लक्ष्य बना कर भी अपना निशाना साध सकते थे।

अनजानी और असाधारण चीजों की सच्चाई जानना जिम की फितरत थी। जंगल और जंगलवासियों के बारे में अधिक से अधिक जानने, समझने और सीखने की इस जिज्ञासु प्रवृत्ति ने जिम कॉर्बेट को प्रकृति का ज्ञाता बना दिया था। जिम ने जंगल के प्राकृतिक वातावरण से तादात्म्य स्थापित कर लिया था। जिम की इसी ‘जंगल संवेदना’ और व्यावहारिक ज्ञान ने उन्हें अचूक निशानेबाज और प्रकृति का ज्ञाता बनाया। इन्हीं विशेषताओं के कारण कालांतर में उत्तराखंड में जिम कॉर्बेट को ‘एक वरदान प्राप्त’ भलमानुष के रूप में प्रसिद्धि मिली। अथाह सम्मान भी।

जिम कॉर्बेट का पूरा जीवन भारत के गरीबों के लिए समर्पित रहा। कालाढूंगी का छोटी हल्द्वानी गाँव जिम की दानशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जिम को इस दुनिया से रुखसत हुए सत्तर बरस बीत गए हैं, अपनी भलमनसाहत के चलते वे आज भी लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं और रहेंगे।


नाम: प्रयाग पाण्डे

शिक्षा:

  • पर्यटन अध्ययन में स्नातक
  • हिंदी में सृजनात्मक लेखन में डिप्लोमा
  • पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

पत्रकारिता एवं लेखकीय विवरण:

  • 1984 से पत्रकारिता एवं लेखन में सक्रिय।
  • वर्ष 1984 से 1991 तक साप्ताहिक ‘उत्तराखंड नवनीति’ का प्रकाशन एवं संपादन।
  • वर्ष 1987 से 2022 तक दैनिक जनसत्ता में अंशकालिक संवाददाता के रूप में सेवाएं।
  • वर्ष 2003 से 2010 के दौरान ‘सहारा समय’ न्यूज चैनल में रिपोर्टर।
  • देश के विभिन्न समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं में पेड़, पहाड़, जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण, एवं शिक्षा-स्वास्थ्य सहित समाज के अभावग्रस्त, शोषित और पीड़ित आम जन के मुद्दों पर विश्लेषणात्मक आलेख, फीचर एवं रिपोतार्ज प्रकाशित।

अब तक छह पुस्तकें प्रकाशित।

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