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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार मनोज भल्ला जी को मृत्यु का देवता असमय ले गया!

मुकेश सैनी-

विनम्र श्रद्धांजलि!…. वरिष्ठ पत्रकार कलमवीर जिंदादिल इंसान प्रिय भाई मनोज भल्ला आज हमारे बीच नहीं रहे सदैव खुद भी खुश रहने वाले और जिनसे भी उनका सम्पर्क रहा सभी को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाले भाई का इस तरह हम सबके बीच से चले जाना बहुत ही असहनीय है जिसकी कोई भरपाई नहीं है हम सावित्रीबाई फुले सौशल वेलफ़ेयर सोसाईटी की समस्त कार्यकारिणी की तरफ़ से भल्ला जी को श्रद्धासुमन अर्पित करते है ओम् शांति ओम्


सुधीर राघव-

Manoj Bhalla को याद किया जाना चाहिए!!! इसलिए भी…क्योंकि वह जनपक्षधर पत्रकारों की उस पीढ़ी के आखिरी लोगों में से एक थे, जो पत्रकारिता में तेजी से लुप्त हो रहे हैं। जो बचे हैं, वे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं।

यह पूरा दौर सत्ता पक्षीय पत्रकारिता का है। इसमें मनोज भल्ला जैसे जनपक्षधर पत्रकारों की असमय मौत पर नेताओं के शोक संदेश नहीं हैं। भल्ला की मौत जनता का unsung शोकगीत है।

यह अपनी रूह, पेशा और पत्रकारिता की पूरी साख बेचकर सत्ता की चापलूसी करने का दौर है। इस दौर में मनोज भल्ला जैसे जनपक्षीय पत्रकारों को मुफलिसी में धकेला जाता है, क्योंकि बड़े बड़े सरकारी निर्माण में घटिया सामग्री के इस्तेमाल की खबरें, मुनाफाखोरी और जमाखोरी से बढ़ाई जाने वाली महंगाई की खबरें, कैग रिपोर्ट्स में घंटों खपा कर निकाली गईं सरकारी घोटालों की खबरें, सरकारी बाबुओं और मंत्रालयों की जवाबदेही तय करने वाली खबरें अब मीडिया को नहीं चाहिए। ऐसी खबरें चलने पर सरकार चला रहे लोगों के सिर में दर्द होता है। इसलिए जनपक्ष में ऐसी खबरें निकलवाने की बात करने वाले इस दौर में हिकारत से देखे जाने लगे हैं।

यह पत्रकारिता के नाम पर कुछ प्रशंसा गीतों के साथ नेताओं के साक्षात्सत्कार (साक्षात्कार नहीं साक्षात सत्कार) करने का दौर है। यह बहसों में सत्ता का पक्ष लेने का दौर है। यह सत्ता के फटे में टांग अड़ाने का नहीं, बल्कि उसे झूठ से रफू करने की पत्रकारिता का दौर है।

यही वजह है कि आज पुल बनते बनते गिर रहे हैं, क्योंकि अब किसी पत्रकार को यह देखने जाने की अनुमति नहीं है कि निर्माण किस सामग्री से हो रहा। अगर रिपोर्टर से रिपोर्ट तैयार करवा भी ली तो भी उसका चलना आसान नहीं है। अब जनता को घटिया निर्माण का पता तभी चलता है, जब पुल लोगों के सिर पर गिरते हैं या पहली ही बरसात में हाइवे की चमकदार पुताई गड्ढों में बदल जाती है। कैग रिपोर्ट अब ठंडे बस्ते में पड़ी रहती है। उसे हाथ लगाना भी पाप है। पत्रकारों का काम ऐसे हर हादसे में जनता की ग़लती निकालना हैं ताकि सरकार पर कोई जिम्मेदारी आयद न हो, ताकि मंत्री का इस्तीफा मांगने की नौबत न आए।

यह पत्रकारिता के नाम पर रूबिका, अर्णव, रजत, अंजना, सुधीर चौधरी, नविका और ऐसे अनगिनत सत्ता का झुनझुना बजाने वाले लिपे पुते लोगों का दौर है। इसमें मनोज भल्ला जैसे जनपक्षधर पत्रकारों के लिए नेताओं के शोक संदेश नहीं हैं। भल्ला की मौत जनता का unsung शोकगीत है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब रातभर पाकिस्तान को जीत लेने की खबरें चलीं तो सुबह-सुबह ही मेरे फ़ोन की घंटी बजी। मनोज भल्ला का फोन था – सुधीर भाई! यह मीडिया पूरा बर्बाद हो गया है! इन खबरों का सोर्स क्या है! सब मनघड़ंत चलाया जा रहा है!

मीडिया के पतन पर भल्ला की इस बेचैनी का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैंने यही कहा- अक्सर जंग के दौरान जनता का मनोबल ऊंचा रखने के लिए ऐसी खबरें चलती हैं। इनका सोर्स सेना का जनसंपर्क विभाग या सरकार होती है।

भल्ला का जवाब था कि मैं नहीं मान सकता कि सेना इतना झूठ बोल सकती है। इन खबरों को चलवाने के पीछे सरकार में बैठे नेता तो हो सकते हैं। काफी देर तक हमारी बात हुई और भल्ला इस बात पर अड़े रहे कि सभी पत्रकारों को इस तरह मनगढ़ंत खबरें चलाने की आलोचना करनी चाहिए।

यह 1996 की बात है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से तीन लड़के अखबार में आए थे। ये थे Manoj Bhalla , Surender Yadav और Rajesh Dobriyall . तीनों में तीन तरह का स्पार्क था। मनोज भल्ला अपने सवालों का पक्का था। वह इन्हीं से हर खबर को मांजता था। ऐसा ही एक ओर युवा V. K. Narotia Narotia , जो बाद में पत्रकारिता छोड़कर अध्यापन में चला गया। वह दलित चेतना की पत्रकारिता की बात करता था और अब उसी राजनीति में थोड़ा-बहुत दखल रखता है।

हम पांचों युवा अलग-अलग मिजाज के थे, इसलिए सुबह चाय एकसाथ ही होती। पांच छह प्रमुख अखबार फैलाकर बैठ जाते थे और बहस करने के लिए दो तीन खबरें मिल जाती थीं। वामपंथ, दक्षिणपंथ और जाति-धर्म या किसी पंथ का हममें से कोई पक्षधर नहीं था। इसलिए ठेठ पत्रकारिता से जुड़े प्रश्नों पर बात होती। कोई चर्चित फिल्म आती मिलकर देखने भी चले जाते। हमने ‘हे!राम’ जैसी पिटी हुई विवादित फिल्म भी देखी, क्योंकि उसका एक ऐतिहासिक मूल्य था।

कुछ साल बाद ही हम अलग-अलग संस्थानों में अलग-अलग शहरों में चले गये मगर संपर्क बना रहा। भल्ला मुख्यधारा की पत्रकारिता छोड़कर कुछ समय के लिए धर्म और आध्यात्म की पत्रकारिता में भी गये। उन्होंने एक बड़े बाबा के लिए लेखन किया। उनके लिए उनके मत की कई किताबें लिखीं। एक प्रोफेशनल की तरह व्यक्तिगत विचारधारा से इतर।

भल्ला का फोन तब भी आता था – सुधीर भाई! यह सिर्फ बिजनेस है। अध्यात्म वध्यात्म कुछ नहीं है। प्योर बिजनेस है। इस देश में पब्लिक की आस्था सच के प्रति नहीं है, उसकी आस्था भवूत में है। यह भवूत बाबाओं और नेताओं के हाथ लग गई है, जनता को चटा रहे हैं और माल कमा रहे हैं।

46 साल की उम्र में वह फिर पत्रकारिता की मुख्यधारा में लौटे। मगर यह धार पूरी तरह से बदली हुई थी। अपनी मृत्यु से चार दिन पहले भल्ला ने मृत्यु दर्शन शीर्षक से फेसबुक पोस्ट लिखी थी…

भल्ला का जब भी फोन आता तो मेरा पहला वाक्य यही होता – कर भला, हो भल्ला! आज जरूर मैंने कोई भला काम किया होगा, जो तुमने फोन किया। … अब भल्ला का फोन कभी नहीं आएगा! मित्र को अश्रुपूर्ण विदाई!!!

इस उम्मीद के साथ कि अगर स्वर्ग है तो उसके आका को भल्ला के बेचैन करने वाले सवालों का जवाब देना पड़ेगा! अब उसकी भी जवाबदेही तय होगी, क्योंकि भल्ला वहां पहुंच गया है!

मृत्यु का देवता असमय उसे ले गया है! शायद स्वर्ग में भी व्यवस्था संबंधी प्रश्न गंभीर हो गये हैं!

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