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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-1) : अथटर्न मिल में स्पोर्ट्स कोटे से बाबूगिरी की शुरुआत

रीब चौकी से अफीम कोठी चौराहा की तरफ जाते ही स्कूटी पहले ही मोड़ पर तेजाब मिल के रास्ते पर बरबस मुड़ जाती है। अनवर गंज की इसी सड़क पर रेलवे क्रॉसिंग पार करते ही तेजाब मिल (कानपुर केमिकल्स) और उसी की बाउंड्री से लगी एनटीसी द्वारा संचालित अथर्टन मिल्स है जो कभी आबाद रहती थी। अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इसके बंगलें भुतहे लगते हैं।

हैं प्रोडक्शन साइट जहां बिंता (वीविंग), तिरासल (स्पिनिंग), हवाघर (ब्लो-रूम), वाइंडिंग, डाईहॉउस, वेयर हाउस, गांठ गोदाम, स्टोर डिपार्टमेंट थे जिन्हें ध्वस्त करके केंद्र सरकार ने टूल-रूम बनाया है।चमकता- दमकता टूल रूम लगता है कि उसकी भ्रूण हत्या हो गयी। मैंने भुबनेश्वर का भी टूल रूम देखा है। कौन से कलपुर्जे नहीं बनते हैं वहां। खैर, इस मिल में कोई ढाई से तीन हजार मजदूर काम करते थे। अफसर और बाबुओं का स्टाफ अलग से।

मैंने वहां बाबूगीरी की थी। कम पैसे मिलते थे। क्रिकेटर होने के कारण काम नहीं करना पड़ता था। टीम बनाओ, प्रैक्टिस करो। वहां का माहौल अच्छा था। लोगों के बीच एक रिश्ता था। चाचा, भैया, मामा, जीजा, साले आदि। दिशा के मुताबिक रिश्ते स्थापित हो जाते थे। जैसे किसी की ससुराल जिस दिशा या क्षेत्र की तरफ है तो उसी के अनुसार वह जीजा, साला, मामा आदि बन जाता था। ये रिश्ते शहरी घर से लेकर गांव-गिरांव तक निर्बाध यात्रा किया करते थे। घर-भीतर। बाबू हैं तो बबुआइन, मिस्त्री हैं तो मिस्त्राइन। बाकी जो संबोधन हो।

खैर, लगता भटक रहा हूँ पर तब रिश्तों का ताना-बाना ठीक वैसे मजबूत डैमेजरहित हुआ करता था जैसे सूत यानी धागा का ताना-बाना, अर्थात वार्प-वेफ्ट। कलर दे दो बस। कपड़ा तैयार। रिश्तों को मील की कसौटी पर परखने पर खरे होते थे। मिलें बन्द होने के साथ ही ताना-बाना ढीला पड़ता गया और अंत में टूट जाता है। रह जाते हैं मेट्रोपोलिटन रिश्ते जो कैक्टस के पौधे की तरह हो जाते हैं। रेत में उग जाते हैं। फूल है तो खुशबू नहीं। कांटे अलग से…। बहरहाल माहौल में मजदूर रहे आबाद अथर्टन जिंदाबाद। गूंजता था। यूनियन और प्रबंधन की लड़ाई अपनी जगह, पर रिश्ते अपनी जगह।

यूनियन और मजदूरों का दर्द ऐसा झकझोर देता था कि अथर्टन मिल्स (पूर्व का नाम अथर्टन वेस्ट एंड कम्पनी लिमिटेड) के जीएम रहे केसी गुप्ता भी ट्रेड यूनियन फील्ड में उतर आए थे। यहां तीन शिफ्टें चलती थीं। बगल में जेके जूट, जेके कॉटन मिल्स। चौबीस घण्टे शोरगुल, चिल्ल-पौं। काम पर चलने का निर्देश देती गगनचुम्बी चिमनियों की कान फोड़ू सीटियां। इस मिल से मेरी यादें जुड़ी हैं। भले अल्पकाल रहा हो पर कार्य करता था। पत्रकारिता का चस्का भी यहीं से लगा। बाबू के दोस्त डॉ निसार अहमद, आर के नायर, अंशुमान सिंह, भैया इंद्रकुमार सरीखे तमाम लोगों को मेरा खेल और पढ़ने-लिखने की आदत पसंद थी। मैं ताज़ी सूचनाओं से वाबस्ता रहता था।

यूनियन वाले चाचा श्याम स्वरूप मिश्रा, सुरेंद्र मिश्रा, किशोर, राजेन्द्र सिंह, शमशुद्दीन, अवधबिहारी सिंह, राम सजीवन, भाई जयमूर्ति शर्मा आदि उत्साहित करते थे तो अफसरों में अरुण कपूर, अनुपम भटनागर, बेनीमाधव, जीएम के के भाटिया, जेसी जोशी, देवराज अग्रवाल, बाबूलाल खांगर, गोविंद प्रसाद सिन्हा आदि का सपोर्ट था ऐसे रामविलास शर्मा की दाल नहीं गलती थी। समय का चक्का ऐसा घूमा की बिंता के लूमों की घड़घड़ाहट खट खट खट खट की आवाज के साथ शांत होती गयी। चिमनियों का धुआं और सीटी का काम खत्म हो चुका था। वीआरएस लेकर मजदूर कम कम होते होते नगण्य जो गए। आर्थिक अभाव में आत्म हत्याओं की खबरें आने लगीं।

यही चाचा मामा कभी कभार ठेला लगाए या रिक्शा खींचते मिल जाते थे। उनके बच्चे शिक्षा के अभाव में जैसे तैसे गुजर-बसर कर रहे थे। अब कोई नहीं मिलता। अथर्टन वेस्ट मिल का थका थका सा बोर्ड प्रबंधकीय कारणों से अपनी बर्बादी के अक्षरों को बिना कपड़े के छिपाने की कोशिश में झुरमुट में सिख जाता है। मिल का उत्पादित सूती कपड़े का धारदार स्लोगन ‘वेस्ट इज बेस्ट’ टेरीकॉट की चकाचौंध कहीं लुप्त हो चुकी है। मजदूरों की पीढ़ी की पीढ़ी जैसे कहीं गुम हो गयी।

कथा लंबी है पर आप बोर न हो जाना इसलिए यहीं से इसे जारी रखूंगा। और इसके प्रेरणा स्रोत हमारे आरके नायर अंकल हैं जो केरल शिफ्ट हो गये हैं। बुजुर्ग हैं। पर फोन करना नहीं भूलते। तुसी ग्रेट हो नायर चाचा। लव यू। उन गलियों की तरफ फिर ले आये जिन्हें हम छोड़कर गए थे।

गुलज़ार की ये लाइन आज भी जुबान पर हैं, दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन, बैठे रहें…..। खंडहर हो चुकी अथर्टन मिल्स का जंग लगा लोहे का गेट कानपुर में उद्योगों की अनकही बर्बादी की कहानी बयान करती दिख जाती है वो भी तब जब हवा चलती है और बोर्ड के आगे लगे पेड़ थोड़ा हट जाते हैं। हां, गेट के सामने चंद्रशेखर आज़ाद की जीर्णशीर्ण काली सी मैली-कुचैली मूर्ति अभी भी है। आज़ाद जी आज भी मूछों पर ताव दे रहे हैं। ट्रेड यूनियन आन्दोलन से जुड़े इस मिल के बहादुर मजदूरों में क्रांति के उद्घोष का सन्देश दे रहे हैं।

दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।

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