Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

पार्ट-5 : कानपुर में मंडराया साख का संकट, कुंद हुई कलम कुल्हाड़ों की धार!

महेश शर्मा-

थोड़ा विलंब हुआ। मेरे पत्रकारीय जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा स्वनामधन्य संपादक एसपी त्रिपाठी (सत्यप्रकाश त्रिपाठी) के साथ जुड़ने से शुरू हुआ। लेकिन इसका जिक्र अगले पार्ट में करूंगा। नये पत्रकारों के लिए पठनीय होगा। पार्ट-5 शुरू करने का मन बना ही रहा था कि कानपुर की गौरवमयी पत्रकारिता संकट में आ गयी। भूमाफिया, वसूली बंदर, ब्लैकमेलर जैसी उपाधियों से पत्रकार नवाजे जाने लगे।

घर बाहर निकलों तो पत्रकारिता ही टॉक ऑफ दि टाउन वही चर्चा, अल्यो एक मुकदमा और ठोक दिया गया। इन पत्रकारन की बड़ी दुर्दशा है। शिकायत करने वाले भी दनादन बाहर आने लगे। लोगों के बीच खड़े होने में शर्म महसूस होने लगी। खुद को पत्रकार कहलाने वालों के सामने साख बचाने का जबर्दस्त संकट आ गया। बड़े अखबार या चैनल तो नहीं पर जैसे तैसे जीविका चलाने वाले या रोजगार के लिए फील्ड में उतरे वो पत्रकार जिन्हें हालात जीने नहीं देते और जिम्मादारियां मरने नहीं देती, काफी संकट में हैं। राष्ट्रीय या धार्मिक पर्व या चुनाव के मौके पर थोड़ा बहुत विज्ञापन बटोरकर काम चलाने वालों के सामने अस्तित्व का संकट आन पड़ा।

मैं सोचने लगा कि क्या यह वही शहर कानपुर है जहां पत्रकारों के कलम कुल्हाड़ों से फिरंगी हुकूमत भी हिल जाया करती थी। जनहित के बड़े-बड़े मुद्दे उठाते रहे। हां, हम लोगों पर हमले करने की चेष्टा की गयी पर बच गए। कलई खोलते थे पर प्रशासन और जनता के अलंबरदार हमारे पाले में खड़े दिखते थे। हम लोगों ने भूमाफियाओं और अवैध कब्जेदारों के विरोध में मुहिम चला डाली। नतीजे भी निकले। समाज को घुन की तरह चाट जाने वाले भ्रष्टाचार के कीड़े तब भी बिलबिलाते थे और आज भी। उन पर पत्रकारिता के माध्यम से हमले तब भी होते थे। पर तब पत्रकारों का तेवर कुछ और था।

कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाटी हाथ, जो घर फूंके आपनो चले हमारे साथ। इसी मानसिकता वाले पत्रकार हो जाया करते थे। कुछ शब्द ऐसे हैं जो पत्रकारिता को धार देते हैं पर उनका उच्चारण आपको को वामपंथी विचारधारा वालों के पाले में खड़ा कर देता है। जैसे जनवादी सोच की पत्रकारिता। तब संगठित मजदूरें का एक बड़ा वर्ग कानपुर में हुआ करता था। उसका रहन-सहन, कार्य की दशाएं, ट्रेडयूनियन आंदोलन, कारखानों पर लटकती बंदी की तलवार को हटाना, उस वर्ग के चिकित्सा एवं स्वास्थ, आवास, मलिन बस्तियां आदि तमाम विषय थे जो पत्रकारिता के विषय हुआ करते थे। जिन पर कलम भांजने में लुत्फ आता था। सरमाएदार, प्रबंधन ये सब हमारे वर्ग शत्रु नहीं हुआ करते थे। पर हम मजलूमों की बात उठाकर गौरवान्वित हुआ करते थे। सुधार की दिशा में यदि किसी ने कदम बढ़ाया तो हम पत्रकार उसके साथ कदमताल करने लगते थे। ये हो जाया करता था।

पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, पूर्व सांसद जगतवीर सिंह द्रोण, सत्यदेव पचौरी ने पत्रकारों की रचनात्मक सोच, दूरदर्शिता, शहर के विकास की दिशा में सोच का लाभ उठाया। वह हम लोगों से बुलाकर बातचीत करते थे। मुद्दे पूछते थे। चर्चा करते थे। पिर चाहे वह नेशनल स्लम डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट हो या फिर सड़क, पानी, बिजली, प्रदूषण, औद्योगिक विकास या कुछ भी। हम लोगों को राजीव गांधी, वीपी सिंह, अटलजी, एचडी देवगौड़ा, एनडी तिवारी, मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह जैसे दिग्गजों से मिलने का मौका मिलता था। हमेशा ही प्रेस को सम्मान दिया। पीटीआई, यूएनआई के रिपोर्टरों को ढूंढ़-ढूंढ़कर बुलाया जाता था। संक्रमणकाल की शुरुआत तो इंटरनेट पत्रकारिता के शुभागमन के साथ शुरू हो गयी। पत्रकारों का झुण्ड का झुण्ड निकल पड़ता था। निर्माण कार्यों में मीनमेख निकालकर हुउंक देना और फिर शांत हो जाना, आम बात हो चुकी थी। किसी न किसी पर गाज तो गिरनी ही थी।

भइया पत्रकारिता का पेशा रस्सी पर संतुलन साधकर चलने वाले नट या नटिनी जैसा ही है। यह जोखिम भरा तमाशा देखने वालों से फिर जो मिल गया उसी में संतोष। एसके त्रिपाठी, केसी आर्य, विष्णु त्रिपाठी, एसएच नकवी जैसे प्रेस क्लब के अध्यक्ष रहे दिग्गज पत्रकारों के बाद की पीढ़ी में धीरे-धीरे गिरावट क्यों आयी? यह संख्या बढ़ती गयी और अच्छे लोग साइट लाइन होते गए। यह विचारणीय प्रश्न है। कमियों को ईमानदारी से तलाशिए और उन्हें दूर करते हुए पत्रकारिता के पेशे को आजके परिप्रेक्ष्य में जनता की कसौटी पर खरा उतारने का प्रयास कीजिए। यह हम आप जैसे पत्रकारों की जिम्मेदारी है। परिवर्तन के दौर में ऊंचनीच हो जाया करता है पर सुधाने की पूरी गुंजाइश रहती है। हम अराजक समाजा का हिस्सा नहीं हैं। समाज के पहरुए है। चौकीदार हैं।

यह लिखते समय जावेद अख्तर, मेराज फैजाबादी, अनवर जलालपुरी, निदा फाजली, राहत इंदौरी के तमाम शेर जेहन में ताजा हो उठे हैं पर लेख लंबा न हो जाए, इसलिए उन्हें लिखने से गुरेज कर रहा हूं। फिलहाल अनवर जलालपुरी के दो-एक शेर लिखना चाहूंगा कि ‘कोई रुसवा तो कोई मोतबर होता ही रहता है, यहां ये खेल प्यारे उम्रभर होता ही रहता है/ये दुनिया है यहां तुम हादसों से दोस्ती कर लो, के हर लम्हा यहां जेरोजबर होता ही रहता है/अगर गैरत सलामत है तो गुरबत के भी आलम में बड़ी इज्जत से मुफलिस का गुजर होता ही रहता है।‘ वहीं जावेद अख्तर साहब फरमाते हैं कि ‘जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता, बहुत पामाल रस्तों का सफर अच्छा नहीं लगता/गलत बातों को सुनना सुनकर हामी भर लेना, बहुत हैं फायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता, हमें दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है, किसी का सर हो सर कदमों में मगर अच्छा नहीं लगता।‘

कानपुर की पत्रकारिता में संक्रमणकाल का दृश्य न उपस्थित होता तो शायद यह पीस न भी लिखता। पर मेरी पत्रकारिता के मजबूत चरण की शुरुआत करने से पहले यह दौर मन को बेध गया तो सोचा चार बातें लिखकर भड़ास निकाल लूं। प्रख्यात स्क्रिप्ट राइटर सलीम खान (सलीम-जावेद) एक इंटरव्यू में बड़ी खुद्दारी की बात कह जाते हैं जो श्रमजीवी खुद्दार पत्रकारों के लिए मूलमंत्र भी हो सकती है। वह फरमाते हैं कि ‘किसी को अपने आंसू न पोछने देना, लोग सौदा कर लेंगे।‘ जाहि विधि राखै राम ताहि विधि रहिए। आजकल तो यूट्यूबर्स की पीछे कर्रा हांका लगा है। हमारे अनुजवत पत्रकार चंद्र गौरव ने श्याम सिंह पंवार की एक पोस्ट शेयर की है जिस पर मैने टिप्पणी की है। उसे हूबहू आपके लिए प्रस्तुत करता हूं।

सवालः क्या यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों का खात्मा जरूरी है?

कानपुर जनपद में यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों की एक बड़ी ‘जमात’ तैयार हो चुकी है और इस ‘जमात’ में इनकी संख्या में दिनोंदिन इजाफा हो रहा है, जो कि ‘सफेदपोशों’ के लिये बड़ी परेशानी का कारण बनती जा रही है। वहीं इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि मुख्यधारा के रूप में माने जाने वाले मीडिया संस्थानों में कार्य करने वाले ‘कठपुतली पत्रकारों’ को मैनेज करना आसान होता है किन्तु यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों को मैनेज करने का तात्पर्य है, ‘मेढकों को तराजू पर तोलना’। इसके कतई दो राय नहीं कि यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों की यह ‘जमात’ उन सफेदपोशों के लिये एक जटिल समस्या का रूप ले चुकी है, ‘‘जो रसूखदारों में गिने जाने के साथ-साथ, ईमानदारी का चोला पहने रहते हैं। ‘वो’ पर्दा के पीछे कुछ और होते हैं किन्तु पर्दा के सामने कुछ और दिखते हैं!’’अपने निजी नजरिये से मैं अपनी लेखनी से निकले शब्दों को संकलित करते हुए निजी विचारों के रूप आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं और ‘सहमत’ अथवा ‘असहमत’ के रूप के रूप में आप सबकी राय की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

इसके अलावा आपसे सवाल यह भी कि, ‘‘क्या यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों का खात्मा जरूरी है ?’’

कानपुर नगर की गिनती अब स्मार्ट सिटी में की जा रही है। लगभग हर प्रमुख सड़क व चौराहे पर कैमरे लगे हुए हैं। उन कैमरों की मदद से आम आदमी की बाइक एवं कार आदि के सम्बन्ध में यातायात नियमों का उल्लंघन करने के बावत ‘चालान’ होने के मामले तो प्रकाश में आ जाते हैं लेकिन वो नजारे कभी कैद होते नहीं पकड़े गये, जिनमें आटो/लोडर/ओवरलोड वाहनों आदि से ‘नजराना’ की वसूली की जाती है। वहीं ‘वसूली’ के नजारे जिनके कैमरों में कैद होते हैं वो होते हैं- यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों के कैमरे ! कटु किन्तु सत्य है कि, ‘‘वसूलीबाज पत्रकार की संज्ञा पा चुके यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों की ‘मंशा’ पूरी ना होने पर, देखते ही देखते उनके कैमरों में कैद नजारे, सोशल/डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से हजारों ही नहीं करोड़ों लोगों तक पहुंच जाते हैं जिसके चलते ‘तंत्र’ के जिम्मेदारों की छवि पर बट्टा लग जाता है।’’

स्मार्ट सिटी के सीमान्तीय थाना क्षेत्रों की बात करें तो मिट्टी का अवैध खनन, बालू का अवैध खनन में रात्रिकालीन प्रयुक्त किये जाने वाले टैक्टरों, डम्फरों, जेसीबी आदि के नजारे, दूसरे जिलों से आने वाले ट्रक, जिनके द्वारा पशुओं आदि की तस्करी की जाती है, के नजारे एवं हाई-वे पर भारी वाहनों से की जाने वाली वसूली के नजारे भी यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों के कैमरे ही कैद कर पाते हैं। किन्तु इस सच्चाई को कतई नकारा नहीं जा सकता है कि, ‘‘वसूलीबाजों की संज्ञा पा चुके यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों की ‘मंशा’ ना पूरी होने पर, देखते ही देखते वो नजारे सोशल/डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से हजारों ही नहीं करोड़ों लोगों तक पहुंच जाते हैं और ‘तंत्र’ के लिये किरकिरी बन जाते हैं।’’

शहर के अनेक होटलों में होने वाले अनैतिक कृत्यों, अनेक थाना क्षेत्रों में होने वाले सट्टा-जुआ, नियत किये गये समय से पहले और बाद में शराब ठेकों पर होने वाली शराब की बिक्री व उनके पास चलने वाली अवैध कैण्टीनों के नजारे, अधिकतर, यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों के कैमरे ही कैद कर पाते हैं। इसके बाद सौदेबाजी भी शुरू होती है। लेकिन, ‘‘वसूलीबाजों की संज्ञा पा चुके यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों की ‘मंशा’ ना पूरी होने पर, देखते ही देखते ये नजारे सोशल/डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित होते देखे जा सकते हैं। जिसके चलते स्थानीय स्तर पर ‘नजराना’ लेने वालों के लिये सिरदर्द बन जाते हैं।’’

अवैध हास्पिटलों व नर्सिंग होम्स, अवैध निर्माणों, अवैध स्कूलों, अतिक्रमण, अनेक विकास कार्यों में किया जाने वाला ‘भ्रष्टाचार’, इनसे सम्बन्धित समस्त अधिकारियों से छुपा नहीं है। न्योछावर के चक्कर में सब कुछ जानते व देखते हुये धृतराष्ट्र की भूमिका में रहते हैं जबकि यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकार, उपरोक्त विषयक खबरों की खोज में रत रहते हैं। परिणाम यह होता है कि भ्रष्टाचार की पुष्टि करने वाले नजारे उनके कैमरों की जद में आ ही जाते हैं। विचारणीय पहलू यह है कि जिनको ‘वेतन’ मिल रहा है वो भी अलग से ‘कुछ’ पाने की चाहत हमेशा रखते हैं फिर तो बिना वेतन के अपना समय खर्च करने वाले यू-ट्यूबर व तथाकथित पत्रकारों के मन में ‘कुछ’ मिलने की चाहत पनपना स्वाभाविक है! किन्तु देखने को यह मिल रहा है कि उनकी मंशा पूरी न होने पर वो ‘तंत्र’ की पोलखोलने में जुट जाते हैं। परिणाम यह होता है कि, ‘न्योछावरखोरी’ करने वालों की परेशानी बढ़ जाती है। ऐसे अनेक विचारणीय बिन्दु हैं जिन पर ‘बहुत कुछ’ लिखा जा सकता है। फिर भी अब ज्यादा कुछ न लिखते हुए अपनी कलम को आराम दे रहा हूं।

-श्याम सिंह ‘पंवार’
(लेखकः लघु श्रेणी का पत्रकार है।)

यह मैने पोस्ट किया था। केंद्र सरकार ने नया ‘ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज (रेगुलेशन) बिल’ 2023 का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस बिल में इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर और यूट्यूबर्स को भी रेगुलेटरी निगरानी में लाने का प्रावधान है। यूट्यूबर्स अब डिजिटल न्यूज़ ब्रॉडकास्टर कहलायेंगे। इस वक्त यह मामला सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा में है। यानी नियमानुसार यूटूबर्स को संबंधित विभाग में रजिस्टर्ड कराना होगा। कंटेंट पर पैनी निगरानी रखी जा सकती है। अब उतना आसान नहीं होगा यू-ट्यूबर बनना जितना आप समझ रहे हैं। हां सिटीजन जर्नलिस्म को प्रमोट करने का स्कोप रहेगा। पहले की तरह। बस कंटेंट की जिम्मेदारी उठानी होगी जो आप पहले भी उठाते थे। हो सकता है कि शीतकालीन सत्र में केंद्र सरकर यह विधेयक सदन पटल पर बहस के लिए प्रस्तुत करे।

इसके ठीक पहले वाला पार्ट पढ़ें-

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन