कानपुर के दोनों अखबारों के प्रसार युद्ध पर एक पेज की रिपोर्ट इंडिया टुडे ने भी छापी थी। शीर्षक था ‘आज जागरण युद्ध’ दोनों तरफ से करीब तीन दर्जन से भी ज्यादा शिकायतें थानों में दर्ज हुईं थी। मालिकों ने प्रसार युद्ध को पत्रकारों की मूंछ की लड़ाई कह लो या नाक की लड़ाई, बना दिया….

महेश शर्मा-
हल्लाबोल पत्रकारिता के दबंग पत्रकार : हल्लबोल वाला युग ‘आज’ हिंदी दैनिक के कानपुर से मुद्रण एवं प्रकाशन के साथ ही शुरू हो गया था। हालांकि शहर में तीखे तेवर वाले ज्ञानी पत्रकारों की कभी कमी नहीं रही। किसी भी नेता को विचलित कर देने वाले सवाल पूछने से पहले भी कोई गुरेज नहीं करता था। टाइम्स ऑफ इंडिया के ज्ञानस्वरूप भटनागर, रवि पांडे, नीरज वाजपेयी जैसे पत्रकारों के कलम कुल्हाडों की परंपरा बढ़ाने काम तमाम ज्ञानी पत्रकार करते रहे जो हमारे जैसे नौसिखुए पत्रकारों को निष्पक्ष, निर्भीक, सवाल पूछने को प्रेरित करता था।
बहरहाल, मीडिया पुरोधा विनोद शुक्ला के आज अखबार के साथ कानपुर में आगमन के साथ ही हनक वाली पत्रकारिता का दौर शुरू हुआ। इसे हिंदी पत्रकारिता का शुक्ला युग कहा जा सकता है। इस युग के झंडाबरदार रहे दिलीप शुक्ला, शैलेन्द्र दीक्षित, अरुण अग्रवाल, अमर सिंह, मनजीत सिंह, दिनेश शर्मा आदि। उस वक्त दैनिक जागरण सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार था पर जो खोज खबर, खास खबर, मुद्दा आधारित पत्रकारिता आज ने की तो कनपुरियों को रास आ गयी। प्रसार बढ़ता रहा। हालांकि विनोद जी प्रबंधन क्षेत्र के थे पर खबरों पर उनकी पैनी नजर के संपादकीय विभाग सभी लोग कायल थे। उनके कार्यकाल में रिपोर्टरों को खासा एक्सपोज़र मिला।
विशेष रिपोर्ट करने वालों में दिलीप जी, शैलेन्द्र जी, कवींद्र जी सरीखे पत्रकार थे। इस धारा से अलग पत्रकार भी विनोद जी की टीम में थे। वह थे नरेंद्र भदौरिया। सौम्य शांत रहने वाले भदौरिया जी की विषय पर महीन पकड़ हुआ करती थी। इस दौर की पत्रकारिता को हल्ला बोल पत्रकारिता भी कहा जा सकता है। दूसरे थे ज्ञानेंद्र जी। बताते हैं कि दोनों से कहा गया कि सीएसए (चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि) पर सिरीज लिख मारिए। तो सीएसए-1, सीएसए-2 लिखते हुए 35 किस्तें तक लिख मारी। फिर उन्हें रोका गया। तब माने। कहने का मतलब है कि एक से एक धाकड़ पत्रकार। लेखमाला की इस सिरीज में पार्ट-1, पार्ट-2 करते हुए मेरी भी 35 किस्ते हो पाएंगी या नहीं, पता नहीं। पर प्रयास जारी रहेगा।
विनोद जी ने कानपुर में ऐसी टीम खड़ी कर दी थी जिसका सभी लोहा मानते थे। पत्रकारों की यह एक ऐसी टीम थी जिसे वह किसी भी मोर्चे पर लगा देते थे, टीम फतह करके वापसी करती थी। इनकी मस्ती काम समाप्त करने बाद शुरू होती थी और सुबह तीन या चार बजे तक चलती थी। प्रायः खुद विनोद जी साथ दिखते थे। वह दौर था जब आज अखबार के सभी कर्मचारियों को खुद के पत्रकार होने का भाव हुआ करता था। फिर गेट पर ड्यूटी देने वाला तोताराम (सही नाम नहीं पता, पर नोकदार नाक के कारण उसे तोताराम कहते थे) हो या नंदू हल्लाबोल टीम के प्रवेश करते ही इनकी बांछे खिल उठती थी। सेवा में जुट जाते थे।
उन दिनों चंबल और यमुना बीहड़ों में डकैतों का बोलबाला था। फूलन गैंग हो या लालाराम श्रीराम गैंग, छविराम का गैंग हो या बाबा मुस्तकीम का या फिर घंसाबाबा (घनश्याम) हों अथवा बलवान गड़रिया हों, ये जहां पर भी वारदात करते थे, कवरेज का नेतृत्व खुद विनोद जी किया करते थे। फोटोग्राफर कभी दिनेश शर्मा स्वामी तो कभी अभय शर्मा साथ जाते थे। आज के पत्रकारों के संपर्क सूत्र जबरदस्त हुआ करते थे। राजीव शुक्ला (दिलीप शुक्ला के छोटे भाई) दैनिक जागरण से कवर किया करते थे।
डकैतों के कवरेज के सिलसिले में देश के प्रमुख हिंदी अंग्रेजी पत्रकारों का कानपुर आना होता था। फिर चाहें एम जे अकबर हों या एस पी सिंह। संतोष भारतीय, सुशील सिल्वानों, प्रदीप सौरभ आदि। ये सब आज वालों के संपर्क में रहा करते थे, क्योंकि रियल फीडबैक और एंगल तो इन्हीं पत्रकारों से मिला करते थे। नामचीन पत्रकारों का ब्रेकफास्ट, लंच भले ही तत्कालीन मेघदूत होटल हुआ करता हो पर डिनर कन्हैया होटल (शास्त्रीनगर) में होता था। खुद ही भगौना चढ़ाकर तहरी आदि बना लेते थे। यह काम प्रायः पत्रकारों के कनपुरिया मित्र अशोक यादव किया करते थे।
फूलन देवी गैंग का आत्मसमर्पण का कवरेज बेहद रोमांचक था। आज, दैनिक जागरण में संपादक रहे शैलेंद्र दीक्षित (दिवंगत) किस्से शेयर किया करते थे। फूलन देवी से बातचीत तक में ये लोग सफल हो गए थे। विनोद जी का विजन आज को आगे ले जाता रहा। पत्रकारिता की नयी परिभाषा गढ़ना शुरू हो चुका था। हां, एक बात और, इतना सब होते हुए भी आज की डेस्क इतनी मजबूत हुआ करती थी कि हमारे जैसे नौसिखुओं से कहा जाता था कि हिंदी सीखनी है तो आज अखबार पढ़ा करो। आज अखबार के ज्ञान मंडल प्रकाशन का हिंदी शब्दकोश के चार मोटे-मोटे वॉल्यूम हिंदी में, विश्व में हिंदी का जबरदस्त शब्दकोश बताया जाता है। आज में बहुत कम समय (करीब नौ माह) नौकरी के दौरान शब्दकोश (डिक्शनरी) देखने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ। ज्ञान और साहित्य की नगरी वाराणसी की छाप आज में साफ दिखती थी। यही वजह थी कि सर्कुलेशन बढ़ता गया जो प्रतिस्पर्धी अखबार को खटकने लगा।
पत्रकारों की यह टीम संपादकीय कंटेंट की लड़ाई तो लड़ती ही थी, प्रसार युद्ध में भी टीम आगे-आगे हुआ करती थी। नौवें दशक में दैनिक जागरण और आज के बीच प्रसार युद्ध लोगों को याद होगा। कानपुर संस्करण के सर्वेसर्वा विनोद शुक्ला जी का कानपुर में होना पप्पू भइया (शार्दूल विक्रम गुप्त) की देन थी। लगता था वह पत्रकारिता को नयी धार देने के लिए भेजे गए थे। पूरी यूनिट उन्हीं के भरोसे कानपुर में स्थापित हुई थी। टीम ऐसी बना डाली कि बड़े अखबारों में यह चर्चा का विषय हुआ करता था। आज और दैनिक जागरण के बीच प्रसार युद्ध में आज की तरफ से शैलेंद्र दीक्षित, दिलीप शुक्ला, प्रसार के दिनेश पांडे आदि हुआ करते थे तो दैनिक जागरण से मोर्चे पर प्रमोद तिवारी, सुनील दुबे, अजय मिश्रा आदि थे। कानपुर के दोनों अखबारों के प्रसार युद्ध पर एक पेज की रिपोर्ट इंडिया टुडे ने भी छापी थी। शीर्षक था ‘आज जागरण युद्ध दोनों तरफ से करीब तीन दर्जन से भी ज्यादा शिकायतें थानों में दर्ज हुईं थी। मालिकों ने प्रसार युद्ध को पत्रकारों की मूंछ की लड़ाई कह लो या नाक की लड़ाई, बना दिया।
बात यहीं पर नहीं रुकी। दैनिक जागरण के मालिक एवं संपादक नरेंद्र मोहन जी ने विनोद जी को लखनऊ यूनिट सौंपकर छुट्टी पा ली। दैनिक जागरण को राजधानी में जमने में दिक्कतें आ रही थी। विनोद जी टीम के साथ गए। कुछ पत्रकार आगे-पीछे गए। तो कुछ फिर आज में लौट भी आए। बहरहाल, आज और जागरण का प्रसार युद्ध की याद ताजा होते ही मेरे मस्तिस्क पटल पर गुलजार की फिल्म मेरे अपने घूम गयी। जो श्याम और छेनू के गिरोह के टकराव की कथा पर आधारित थी। दो नेता, बुलाकी प्रसाद (असित सेन) और अनोखेलाल (महमूद) कैसे इन्हें उपयोग करते थे। नानी मां के प्रति दोनों का आदर भाव…..। ‘श्याम आए तो कह देना छेनू आया था।’ यह़ डायलॉग…(छोड़ो, लगता है भटक रहा हूं)।
विनोद जी के जाने के बाद आज की आवारगी को बचाने के लिए फरुखाबाद से यदुनंदन गोस्वामी बुलाए गए। विजय सिंह विद्याव्रत आदि आए। बात नहीं बनीं। आज अखबार का प्रकाशन कुछ दिनों तक बंद रहा। दिनेश चंद्र श्रीवास्तव के महाप्रबंधक के रूप में आने के बाद संपादकीय कमान शैलेंद्र दीक्षित ने संभाल ली। बहुत प्लानिंग के साथ अखबार छपने लगा। फिर तो मगरासा का नरसंहार हो या विधायक विलायतीराम कत्याल हत्याकांड। जबरदस्त रिपोर्टिंग हुई। दिलीप शुक्ला जी खुद कॉपी लिखते थे।
बताते हैं कि मगरासा सामूहिक हत्याकांड जिसमें कोई नौ मर्डर एक साथ किए गए थे, इस मुकदमे में अदालत ने आज अखबार की रिपोर्टिंग को भी संज्ञान में लिया था। कत्याल हत्याकांड की रिपोर्टिंग में मुझे दिलीप जी का सहयोगी होने का अवसर मिला था। काम इतना था कि उनके दोस्तों को उनके पास फटकने न दिया जाए और कॉपी मैं खुद पढ़कर संपादक जी (शैलेंद्र दीक्षित जी) के पास लेकर जाऊंगा।
आज के पत्रकारों को रात्रिचर प्राणी कहा जाने लगा था। कालपी रोड में रंगीलाल का ढाबा, शास्त्रीनगर कालीमठिया के आगे कन्हैया होटल, ये लोग मिल जाते थे। फिर वह पत्रकार ही क्या जो दो-एक पेग न मारे। बड़े पत्रकारों के पेग में बरफ कूटकर लाकर डालने वाले कुछेक शिष्य तो पत्रकारिता की बुलंदी तक पहुंचे। सेवा के बाद स्ट्रिंगर फिर स्टाफर हो जाए तो बुलंदी ही कही जाएगी। कई भटक भी गए। दैनिक जागरण के सुनील दुबे जागरण व हिंदुस्तान में संपादक हुए तो शैलेंद्र जी दैनिक जागरण के बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल के संपादक बनकर रिटायर हुए। बाद में उन्हों ने पहले सिटी लाइव फिर बिफोर प्रिटं स्थापित करके डिजिटल पत्रकारिता की…
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-3) : पत्रकारिता के हिटलर
दिग्गज पत्रकार विनोद शुक्ला जी का भड़ास के फाउंडर एडिटर यशवंत सिंह द्वारा लिया गया खास इंटरव्यू नीचे है..
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