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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-7) : अमर उजाला का प्रवेशांक लिखने के लिए मुझे नकल गैंग मिल गया

महेश शर्मा-

हते हैं कि आपका पेशा कुछ भी हो पर अगर आप उसे एंज्वॉय करना सीख गए हैं तो फिर आपको पेशा कभी बोझ नहीं लगेगा। आपके पास तरक्की के जो भी संसाधन हों, गॉड फादर कोई हो या न हो। बस पेशेगत दक्षता आपको खुद पैदा करनी पड़ेगी। सीढ़ी चढ़ पाओ या न चढ़ पाओ, पर जीवन बिना किसी तंगी के स्वाभिमान जिंदा रहते बीत जाएगा। कोई माई का लाल आपको हिला नहीं पाएगा। पेशेगत बिजनेस टाईकून भी आप पर नजर रखे मिलेंगे।

खैर, स्वतंत्र भारत में अपन की पारी लगभग पूरी होते दिखने लगी थी। भनक थी कि कुछ लोग जा रहे हैं। त्रिपाठी जी ने मुझे कनविंस करने की कोशिश की कि मैं भी अमर उजाला चला जाऊं। अच्छा अखबार है। प्रोफेशनल्स के हाथों में है। पत्रकारिता का मजा आ जाएगा। मैंने दो टूक कहा कि नहीं भाई साहब। मैं आपके साथ हूं। हालांकि वह मेहनत इतनी कराते थे कि नींबू की तरह निचोड़ देते थे। गुस्सा भी आ जाता था पर अंतरात्मा की आवाज आ जाती थी कंट्रोल महेश कंट्रोल। ये नेक बंदा है।

अतिक्रमण हटाओ अभियान के कारण सर्कुलेशन विभाग की एक गाड़ी हमें और त्रिपाठी जी को घर छोड़ने को भेजी जाती थी। उस दिन गाड़ी न होने के कारण दोनों जन पैदल ही चल दिए। रास्ते भर वह परिवर्तन ही जीवन जैसे जुमले छोड़-छोड़कर प्रोफेशनलिज्म का ज्ञान छौंकते रहे। और मुझे अमर उजाला जाने को प्रेरित करते रहे। मैं भी अंगद पांव अड़ाए खड़ा था। नहीं भाई साहब, अब आपके साथ ही काम करना है। संकेत मैं समझ नहीं पा रहा है।

जैसे ही अशोक नगर उनके घर के पास आया तो मुझे स्थान भी याद है, अस्सी फुट रोड। वह बोले, मैं भी ज्वाइन कर रहा हूं। तो खुशी से उछल पड़ा। बोला, तब ठीक। अगले दिन इस्तीफों का दौर शुरू हो गया। लखनऊ से घनश्याम पंकज, नवीन जोशी, प्रमोद जोशी, धीरेंद्र श्रीवास्तव आदि आ गए थे। उधर अमित कुमार सिंह (जनसत्ता से आए थे), उथल-पुथल की भनक उन्हें हो गयी थी, वह पहले ही निकल लिए। अमर उजाला कानपुर संस्करण के पहले स्वनामधन्य संपादक अच्युतानंद मिश्रा एक बार स्वतंत्र भारत आए थे तभी लग गया था कुछ बड़ा फेरबदल होने वाला था।

किसी कारपोरेट घराने के सीईओ वाले लुक में प्रधान संपादक घनश्याम पंकज सुनहरा ब्रीफकेस, सोने और कीमती पत्थर वाली अंगूठियां पहने ऑफिस में बैठे थे। पूर्व संपादक राजनाथ सिंह को राजनीति रास आ गयी थी। स्वतंत्र भारत और अमर उजाला में आवाजाही को लेकर पत्रकार जगत में हलचल थी। एक के बाद एक इस्तीफे। सत्यप्रकाश त्रिपाठी, ओमशरण त्रिपाठी, अजीत तिवारी, महेश शर्मा, सुरेंद्र त्रिवेदी आदि कई नाम। मैंने पहली बार किसी बड़े संपादक के सामने इस्तीफा सौंपा था। घनश्याम पंकज जी मुझसे बोले, ’आप सोच लीजिए। अच्छे रिपोर्टर हैं। एक कारपोरेट जगत के अखबार से टाउन लेवल के अखबार में आज ज्वाइन करेंगे। यह बेहतरीन मौका है। आपका भविष्य यहीं पर है। वहां नहीं।

‘मैं भी थोड़ा कॉरपोटिया गया था। मैंने कहा, ‘नो सर, थैंक यू वेरी मच फॉर सजेशन। ‘ओके बेस्ट ऑफ लक, कहकर इस्तीफे पर स्वीकृत लिखकर पंकज जी ने दस्तखत कर दिए। तीन फरवरी 1992 को अमर उजाला में आ गए। झकास कुर्ता-पाजामा और चप्पल पहने गोरे-चिट्टे अच्युतानंद जी ने बतौर संपादक हम लोगों के साथ मीटिंग की। आलोक भदौरिया वहां पर पहले से थे। अशोक अग्रवाल, अजय अग्रवाल, अतुल माहेश्वरी, राजुल महेश्वरी से रूबरू होने का अवसर मिला।

रिपोर्टिंग टीम में अनिल श्रीवास्तव, उमेश शुक्ला, आशुतोष मिश्रा, प्रशांत मिश्रा, प्रदीप पंसारी, गिरीश पांडे, संजीव त्रिपाठी, गिरीशचंद झा, प्रतीक मिश्रा, केवल शर्मा आदि लोगों की लोकल टीम थी। सबसे कहा गया कि वार्ड सर्वे करके रिपोर्ट एकत्र करो श्रृंखला छापी जाएगी। दौड़भाग शुरू हो गयी। बिना स्कूटर वाले रिपोर्टरों को ढोते रहे। प्रादेशिक में रामेश्वर पांडे, अर्थ में प्रणतेश वाजपेयी, अंशुमान तिवारी। प्रादेशिक की बागडोर रामेश्वर पांडेय उर्फ काका के हाथों में आयी थी। धीरे-धीरे अपने-अपने ठीहे पर जमने लगे। घर परिवार के बाद भी मैं उन्हीं लोगों की तरह जिंदगी जीने लगा। पत्नी प्रतिभा जब भी मायके जाती थी तो लोकल के लोग घर आ जाते थे। प्रदीप और उमेश शुक्ला से खाना बनवाते थे। घर-गृहस्थी तितर-बितर हो जाती थी। प्रतिभा की खरी-खोटी सुनने का आदी हो चुका था।

प्रवेशांक वाले दिन मालिकान, मालिकनें और मैनेजर फफक-फफककर रोये। आगरा, बरेली फिर मेरठ के बाद कानपुर यूनिट खुली थी। विस्तार के सपने पूरे होते देख भला कौन भावुक व्यक्ति खारा पानी बाहर नहीं आने देगा। लांचिंग स्टोरी मुझे ही करनी थी। कानपुर पर। सुरेंद्र त्रिवेदी ने मेरे कान में फूंका। लांचिंग स्टोरी का अवसर आपको ही मिल रहा है। त्रिपाठी जी ने अच्युता जी को आपके विषय में कुछ बताया भी है।

खैर, संपादक जी ने बुलवाया और कहा कि कानपुर पर एक पेज की कलर स्टोरी जाएगी। आपको लिखना है। कंटेंट अच्छा होना चाहिए। मैं खुश हुआ। जोश-ए-जवानी हाय रे हाय, निकले जिधर से धूम मचाए…। गुनगुनाते हुए फील्ड पर निकल लिया। सीधे जेके वालों की कमलानगर टाउनशिप गया जहां पर जेके ग्रुप के अधिकारी रहते हैं। वहीं पर बीआईसी की चेयरमैनी से रिटायर होने के बाद गौर बाबू (डॉ गौरहरि सिंहानिया) ने डीएन दीक्षित (देवकीनंदन दीक्षित) को बंगला एलॉट कर दिया था। वहीं जा धमका। देखा तो नगर महापालिका से रिटायर हुए रमारतन शुक्ला, अपने बगल में गोलमेज दबाए पत्रकार विष्णु त्रिपाठी वहीं पर विराजमान थे। मैंने उन्हें बताया कि लांचिंग स्टोरी कानपुर पर हमें ही लिखनी है। समय कम है। यह मेरी परीक्षा है।

तीनों बोले, चिंता न करो महेश अभी हो जाएगी। मैंने कहा कि पुरानी फोटो भी चाहिए। वे बोले मिल जाएगी। मेरी दशा तो उस परीक्षार्थी सी थी कि जिसे नकल कराने वाला गैंग मिल गया हो। दीक्षित जी ने कहा कि कागज पेन उठा लो और बोलना शुरू किया। बीच-बीच में विष्णु जी और रमारतन जी भी टोकाटाकी करते थे। कुल मिलाकर कानपुर का इतिहास, कला संस्कृति, औद्योगिक परिदृश्य और भविष्य। एक पेज में उतारने का मसाला मिल गया था। तब तक कोई बहुत पुरानी मुड़ी-तुड़ी फोटो ले आया। मैने स्टोरी बनाकर फोटो सहित संपादकीय को सौंप दी।

उधर 1992-93 का बजट प्रवेशांक में छपना था तो आलोक पुराणिक, राजेश रपरिया जैसे दिग्गज विराजमान हो गए थे। प्रवेशांक निकालने वाले दिन कोई झाम-ताम नहीं। नरेंद्र मोहन जी, डॉ आरएन त्रिवेदी (आईएएस), श्रमिक नेता दौलतराम और अरविंद कुमार ही उस दिन मुझे दिखे। बिना किसी तिड़िक-झाम के अखबार निकला। सर्कुलेशन के लिए बुलाए गए विशिष्ट अतिथि के रूप में चंद्रप्रकाश त्रिपाठी तो पहले ही दिन बिना बताए निकल लिए। कमलेश दीक्षित जी ने मोर्चा संभाला। यूनिट स्थापित करने में दीक्षित का बड़ा योगदान था। वह मालिकों के विश्वासपात्र भी थे।

मैं पुरानी बीटों पर काम करने लगा। पॉलिटिकल बीट से मुझे दूर ही रखा गया। दिल्ली कल्चर के पत्रकार प्रशांत मिश्रा स्थान संभाल चुके थे। सूत्र मेरे भी बहुत कर्रे थे। उन्हीं दिनों मुस्लिम लीग का विभाजन हुआ था। दिल्ली में बैठकों का दौर था। जीएम बनातवाला और इब्राहिम सुलेमान सेत के बीच बैर का बयार डोल रहा था। कानपुर के मोहम्मद सुलेमान मुस्लिम लीग के प्रदेश अध्यक्ष थे। वह दिल्ली में डटे थे। खबरें दिल्ली मीडिया या न्यूज एजेंसी में आने से पहले मेरे पास आ जाती थी। त्रिपाठी जी संपादकीय इंचार्ज थे। मैं उन्हें लिखकर दे देता था। मुस्लिम लीग का एक धड़ा इंडियन नेशनल लीग के रूप में अलग हुआ था तो यह स्टोरी कानपुर अमर उजाला ने ब्रेक की थी। थैंक्यू मोहम्मद सुलेमान।

ऐसे ही एक मामला बड़ा रोचक आया था जिसने अमर उजाला की साख में इजाफा किया था। हुआ यूं कि कानपुर विकास प्राधिकरण के तत्कालीन उपाध्यक्ष गिरिराज वर्मा और निर्माणाधीन रीजेंसी अस्पताल के मालिक डॉ अतुल कपूर के बीच किसी बात को लेकर खटक गयी।

वर्माजी के श्वसुर जेएल वर्मा आईजी कानपुर जोन थे। प्राधिकरण के प्रवर्तन विभाग ने रीजेंसी को अस्पताल का अवैध निर्माण गिराने का नोटिस थमा दिया था। एक स्ट्रक्चर गिराने की कार्रवाई कर डाली। यह खबर रुकवाने के प्रयास हुए। अच्युता जी ने निर्णय मुझपर ही छोड़ दिया था। डॉ अतुल कपूर खुद विज्ञापन मैनेजर के साथ मेरे पास दफ्तर आए। लालच दिए गए। पर खबर दूसरे दिन सिर्फ अमर उजाला में छपी। बाकी कानपुर व लखनऊ के अखबारों से गायब थी। मैं कॉलर खड़े करके मोतीझील विकास प्राधिकरण व नगर महापालिका के दफ्तर में घूमा।

इस बीच बड़े अखबार में परिवर्तन हुआ। नवभारत टाइम्स की कमान विद्यानिवास मिश्र को सौंप दी गयी थी। एक दिन अमर उजाला कानपुर में श्रीकांत त्रिपाठी (दिल्ली) मंडराते दिखाई दिए। मैं उन्हें जानता था। पांव छुए। पूछा भइया कैसे? वह बोले, अच्युता जी को लेने आए हैं। अब वह नवभारत टाइम्म में वरिष्ठ संपादक पद पर काम संभालेंगे। दूसरे दिन वह चले गए। सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने प्रभार संभाला। संपादकीय में त्रिपाठी ब्राह्मणों की अधिकता होने के कारण प्रधान संपादक अशोक अग्रवाल अक्सर कानपुर आने पर चुटकी लेते हुए कहते थे कि टी सिरीज के क्या हाल हैं। त्रिपाठीजी भी जनसत्ता लौट गए। दिनेश जुयाल संपादक होकर आए। यह भी परिवर्तन का दौर था।

डॉ वीरेन डंगवाल को बरेली से बतौर संपादक बनाकर भेजा गया। अलमस्त तबीयत के विद्वान आदमी। रिपोर्टरों और डेस्क को नये-नये प्रयोग करने को प्रेरित किया करते थे। उन्होंने अखबार को जनता का अमर उजाला बना दिया था। हर वर्ग के लिए अखबार में स्थान। पूर्ण सूर्य ग्रहण कवर करने मुझे कालपी भेजा। मेरी रिपोर्ट पर हैडिंग लगी, जब चांद से हार गया सूरज, बहुत पसंद की गयी। सभी संस्करणों में पेड वन मेरे नाम से छपी। आईआईटी से हेलीबॉप पर खबर दी तो उन्होंने हैडिंग लगा दी, अंतरिक्ष का बूढ़ा सैलानी उत्तर-पश्चिम क्षितिज पर। सभी संस्करणों में छपी।

उन्हीं के कार्यकाल में अनेहस शाश्वत, पंकज श्रीवास्तव, यशवंत सिंह, रजा शास्त्री आदि लोग संपादकीय में आए। अखबार को नयी धार दी गयी। 90 हजार से एक लाख के बीच सर्कुलेशन पहुंच गया। बड़ी घटनाओं पर हम लोग बुलेटिन निकालकर दोपहर में ही खबरें लूट लेते थे। खुद ही थैले में भरकर अखबार बेच आते थे। पैसे भी रख लेते थे। इतनी आजादी थी। प्रतिस्पर्धियों के हाथों तोते उड़ रहे थे। एक दिन उनकी विदाई हुई वह बरेली लौट गए। गैंजेज क्लब में फेयरवेल दिया गया। सबकी आंखें नम थी। कुछ बात तो थी बंदे में। टीम बना दी थी।

संपादक बनकर फिर आए प्रदीप कुमार। न जाने किस मिजाजा का आदमी था। उसकी लोगों से कम ही पटरी बैठती थी। इसलिए उन्हें तीन लाइन में निपटा देता हूं। मुझे औरैया डेस्क पर बैठाकर एक दिन मुझसे बोले, महेश शर्मा तुम्हे निकाल दूंगा तो इसी कानपुर में चप्पलें चटकाते घूमोगे। कोई नौकरी नहीं देगा। मैंने जवाब दिया, जो मेहनकश होते हैं उन्हें नौकरी मिल जाती है। इतना कहते हुए कमरे से बाहर आया और रिसेप्शन में संदीप जी (दैनिक जागरण के मालिक संदीप गुप्ता) को फोन लगाया और ज्वाइन करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने सीनियर स्टाफ रिपोर्टर पर उसी दिन ज्वाइन करने की बात कही। मैं तो तैयार था ही। इस्तीफा लिखकर प्रदीप कुमार को भेज दिया। उसी शाम से जागरण में बैठ गया। यह वाकया सन 2000 का था।

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