
संजय कुमार सिंह
अमेरिकी टैरिफ के कारण जब हर ओर आर्थिक संकट है, भारत सरकार की ओर से किसी क्रिया-प्रतिक्रिया की खबर नहीं है, बाइट और प्रतिक्रिया लेने के लिए किसी के मुंह में माइक घुसेड़े जाने के दृश्य नहीं हैं तब आज ‘ट्रम्प के टैरिफ से 90 दिन की राहत’, देश के लिए बड़ी खबर है। अमर उजाला की लीड, “रेपो दर में दूसरी बार 0.25% कटौती कर्ज होगा सस्ता, आर्थिकी भरेगी रफ्तार” है। उस पर आने से पहले बता दूं कि टैरिफ से 90 दिन की राहत और चीन पर अब 125% (शुल्क) की खबर ज्यादातर अखबारों में लीड है। नवोदय टाइम्स ने भारत को राहत और चीन पर 125 प्रतिशत टैरिफ को शीर्षक बनाकर यह अहसास कराया है कि भारत को मुंह बंद रखने का ‘लाभ’ मिला है। उपशीर्षक है, ट्रम्प ड्रैगन पर सख्त, बाकी देशों को 90 दिन की छूट। अखबार ने हाईलाइट कर बताया है, “अब पड़ोसियों से संबंध सुधारेगा चीन : जिनपिंग”। कहने की जरूरत नहीं है कि ट्रम्प की मनमानी का अमेरिका में भरपूर विरोध हो रहा है। भारत में, ‘क्रिया की प्रतिक्रिया होगी ही’ कहने वालों की सरकार है पर प्रतिक्रिया की खबर नहीं है और आम तौर पर अखबार वाले नेताओं-अधिकारियों से पूछ-पूछ कर परेशान कर देते हैं लेकिन इस मामले में और इन दिनों ऐसा नहीं होता है। आज अमर उजाला में विदेश मंत्री की फोटो के साथ तीन कॉलम का एक शीर्षक है, “व्यापार समझौते पर अमेरिका से कर रहे बात : जयशंकर”।
यही नहीं, रेपो रेट कम किया जाना कीमत या टैक्स कम किया जाना नहीं है। एक मजबूरी है और इस कारण भले ईएमआई कम हो जाती है लेकिन वह कमाई और काम बढ़ने का विकल्प नहीं है। नरेन्द्र मोदी के काम और प्रचार के तरीके बेवकूफ बनाने वाले हैं और इसीलिए 12 लाख तक की आय पर टैक्स नहीं लगने का प्रचार किया गया और उसका फायदा भी मिला पर सच यही है कि दिल्ली जैसे शहर में लाख रुपये की तनख्वाह पर्याप्त ही है और यह भी बहुत कम लोगों को मिलती है तब इसके प्रचार का कोई मतलब नहीं था लेकिन राजनीति में वोट और कुर्सी के लिए नियम भी अलग होते हैं। मीडिया का काम है कि वह जनता को तथ्य बताये पर वह अपना काम नहीं करता है उल्टे सरकारी प्रचार को हवा देता है। भाजपा का बचाव और प्रचार करने वाली इन खबरों के बीच अहमदाबाद में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा है और यह घर में घुसकर अधिवेशन कर लेने जैसा मामला है। आम तौर पर ऐसे आयोजन वहां किये जाते हैं जहां पार्टी की सरकार हो (अगर केंद्र में नहीं है तो)। अहमदाबाद में कांग्रेस का यह आयोजन अपने आप में बड़ी खबर है। इसके लिए तारीफ (या आलोचना) करने की बजाय चर्चा भी नहीं है। सरकार समर्थक लोग सोशल मीडिया पर फोटो में हांधी के देश में गांधी टोपी न होने की बात जरूर कर रहे हैं। जो भी हो, नवोदय टाइम्स में आज खबर है, भाजपा से तंग आ चुकी है देश की जनता राहुल। पर यह किसी और अखबार में नहीं दिखी। यह अखबारों की निष्पक्षता का मामला है पर अब मुद्दा ही नहीं रहा।

इसलिए आज की बड़ी खबर रेपो रेट कम होना है। आप जानते हैं कि किसी भी चीज की कीमत में मांग और पूर्ति का भी मतलब होता है। अगर ब्याज दर कम हो रही है मतलब कर्ज की मांग कम है और कर्ज की मांग कम है का मतलब काम और कमाई के साथ खर्च भी कम है और यह इतना कम है कि रेपो रेट दूसरी बार कम करनी पड़ी है। निश्चित रूप से यह चिन्ता की बात है और आर्थिक स्थिति पर नियंत्रण नहीं होने के कारण है। इसे ठीक करने के लिए सरकार जो न्यूनतम कर सकती है वही दूसरी बार किया है। जाहिर है सरकार के पास कोई विकल्प या नुस्खा भी नहीं है। अखबार यह सब बताने की बजाय यह बता रहे हैं कि ब्याज दर और ईएमआई कम हो जायेगी। यह ठीक है कि ईएमआई कम होने से राहत मिलती है पर कमाई बढ़ जाये तो ज्यादा ईएमआई देने में किसे दिक्कत होगी? और खबर सिर्फ रेपो रेट कम करने की नहीं है। खबर यह भी है कि विकास दर अनुमान भी कम किया गया है। पहले यह 6.7 फीसदी था जिसे अब 6.5 प्रतिशत कर दिया गया। विकास के प्रचार के बीच विकास दर कम होने का मतलब बताने की जरूरत नहीं है। असल में कर्ज लेकर विकास के नाम पर चमक-दमक एक चीज है और लोगों की कमाई बढ़ने, अच्छी शिक्षा तथा इलाज की व्यवस्था का अलग मतलब है। कर्ज लेकर सड़क बनाना और उस पर चलने का खर्च (टोल) दूसरी सड़कों पर कार से चलने के खर्च से ज्यादा होना भविष्य की जरूरत हो सकती है। अभी विकास कहकर प्रचारित किया जा सकता है पर वह असल में विकास नहीं है। यहां तो विकास के अनुमान को ही कम करना पड़ रहा है तो समझा जा सकता है कि अनुमान कितना हवा-हवाई है। और विकास का क्या हाल है।
भारतीय-अमेरिकी उद्यमी और तकनीकी नवप्रवर्तक, हॉटमेल के संस्थापक सबीर भाटिया ने हाल में कहा है कि भारत अपने आर्थिक विकास (जीडीपी) के बारे में झूठ बोल रहा है। सरकार ने इसका खंडन नहीं किया है और आज विकास दर अनुमान को कम किये जाने की खबर का सच नहीं बताकर अखबार ईएमआई कम होने का झुनझुना बजा रहे हैं। यह कौन सी देशभक्ति है, राम जानें। समस्या यह है कि पहले प्रधानमंत्री झूठ बोलते थे अब सरकार पर भी ऐसे आरोप लग रहे हैं। हालांकि वह मेरी चिन्ता नहीं है। मेरी चिन्ता तो प्रचारक मीडिया है जो अपने स्वार्थ या विज्ञापनों के लिए एक ऐसी सरकार का समर्थन कर रहा है जो काम कम करती है और प्रचार बहुत ज्यादा। ऐसे में मीडिया ने न सिर्फ ईएमआई कम होने का प्रचार किया है महंगाई घटने और चार फीसदी ही रह जाने को राहत भी बताया है। ऊपर मैंने कहा है कि कीमत मांग और पूर्ति से तय होती है। इस कारण महंगाई ज्यादा होने का मतलब मांग ज्यादा होना है। नरेन्द्र मोदी जब महंगाई का विरोध करते थे तो मांग ज्यादा होने के कारण था और अभी महंगाई ज्यादा है तो सरकारी सबसिडी कम होने और जीएसटी का दायरा न सिर्फ बहुत बड़ा होने के कारण है बल्कि लगभग हरेक उत्पाद और सेवा को इसके तहत ले आये जाने तथा ऐसी स्थितियां बना देने के कारण है जिसमें छोटे व्यावसायी हैं ही नहीं और उपभोक्ता को कोई भी माल बिना टैक्स मिल ही नहीं सकता है।
पहले आप मोहल्ले के राशन दुकानदार से राशन लेते थे तो उसपर टैक्स नहीं लगता था क्योंकि उसकी बिक्री कम होती थी और कम बिक्री करने वाले विक्रेता के लिए टैक्स पंजीकृत होना जरूरी नहीं था। ऐसे में बिना रसीद की बिक्री भी तकनीकी तौर पर भले गलत हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था और वह कालाधान तो बिल्कुल भी नहीं पैदा करता था। अब जो स्थितियां हैं उसमें छोटे दुकानदार रहे नहीं, बड़े वाले सब जीएसटी पंजीकृत हैं और पंजीकृत हुए बिना धंधा करना मुश्किल बना दिया गया है। इसलिए महंगाई बढ़ गई है। जीएसटी की दर बहुत ज्यादा है वह अपनी जगह। इस कारण चोरी और वसूली होती है। वह भी एक समस्या है। इसके अलावा, पेट्रोल डीजल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार से तय होती है। जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तो कीमत बढ़ने का विरोध किया जाता था। पुराने मामले याद दिलाने की जरूरत नहीं है। मोदी सरकार के राज में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कम हो गई तो यहां कम करने की बजाय उसपर टैक्स बढ़ा दिया गया। और वह सामान्य से बहुत ज्यादा है। इस कारण तेल की कीमत कम होने की बजाय बढ़ती रही और इससे भी महंगाई बढ़ती है। पर अब यह सब मुद्दा नहीं है, झूठा प्रचार है। अब लोग गाड़ी में आग लगाने के लिए सौ रुपये का पेट्रोल छिड़कने जैसी बात नहीं करते हैं और वैसे सभी लोग डरा धमका कर या संतुष्ट करके भिन्न पर्दों से ढंक दिये गये हैं। सरकार दावा कर सकती है कि गाड़ियां बिक रही हैं इसलिए सब ठीक है। पर वास्तविकता कुछ और है।
अमर उजाला की खबर इस प्रकार है, अमेरिका के जवाबी टैरिफ और व्यापार युद्ध गहराने की चिन्ता के बीच अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने दो महीने में लगातार दूसरी बार रेपो दर में 0.25 फीसदी की कटौती की है। रेपो दर 6.25 फीसदी से घटकर अब 6 फीसदी हो गई है। केंद्रीय बैंक के फैसले से होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन समेत भिन्न तरह के कर्ज सस्ते होंगे। लोगों की मासिक किस्त (ईएमआई) घट जायेगी हालांकि इससे लोगों को जमा पर भी कम ब्याज मिलेगा। मुद्दा यह है कि बाजार में काम नहीं है इसलिए पैसे नहीं हैं और दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब काम और कमाई होती है तभी कोई कर्ज लेकर फ्लैट या कार खरीदता है। उदाहरण के लिए जब मेरे पास काम था तो मैंने कर्ज लेकर 2002 में फ्लैट खरीदा था। अब भले ही फ्लैट की कीमत बढ़ गई है लेकिन उसमें रहते रहने के लिए मरम्मत और सुधार की आवश्यकता है। इसके लिए लगभग उतने ही पैसे चाहिये जितने में मैंने फ्लैट खरीदा था। पर मैं यह काम नहीं करवा सकता क्योंकि कमाई नहीं है, बचत नहीं है। मजबूरी में मैं फ्लैट बेच दूं तो सरकार मूल्य वृद्धि पर टैक्स लेगी और छोटा फ्लैट खरीदूं तो उसपर भी टैक्स लगेगा। उस टैक्स के कारण बेचकर दूसरा छोटा फ्लैट लेना भी घाटे का सौदा है। ऐसे में कर्ज सस्ता होने से मुझे या किसी को क्या फायदा होगा? लेकिन अखबार सरकार का प्रचार कर रहे हैं और ताली-थाली बजाने वाली जनता वोट दिये जा रही है। बेहतर होता कि सरकार मुझे कुछ काम करने देती और मैं अपनी कमाई से अपनी जरूरत पूरी कर पाता। कर्ज भी कमाई निश्चित होने पर ही लिया जा सकता है।
इंडियन एक्सप्रेस की लीड ट्रम्प के टैरिफ से राहत है और शीर्षक वही है जो अमर उजाला का है। रेपो रेट कम होने वाली खबर के शीर्षक या उपशीर्षक में ईएमआई कम होने का झुनझुना नहीं है। एनडीटीवी डॉट इन ने रेपो रेट कम होने की सकारात्मकता को इन बिन्दुओं से बताया है। आपके लिए बैंक से लोन लेना सस्ता होगा, आपको नए बैंक डिपोजिट पर कम ब्याज मिलेगा। हालांकि पहले से जमा पैसे, फिक्सड डिपोजिट पर पहले की रेट से ही ब्याज मिलता रहेगा। लेकिन एक बार टर्म पूरा होने के बाद अगर उसे रिन्यू कराएं तो ब्याज दर फिर कम हो जाएगा। कहने की जरूरत नहीं है कि बहुत सारे रिटायर लोग ब्याज से अपना खर्च चलाते हैं। बैंक की ब्याजदर कम होने से उन्हें परेशानी है और मजबूरी में ज्यादा ब्याज के लिए अपेक्षाकृत असुरक्षित निवेश करना पड़ता है और यह सब जीडीपी कम होने से है जो काला धन खत्म करने के लिए की गई नोटबंदी से बुरी तरह प्रभावित हुई और उसे वापस वहां पहुंचाने के लिए नोटबंदी जैसा कुछ क्रांतिकारी नहीं किया जा सका। यह स्विस बैंक में रखा काला धन वापस लाना हो सकता था पर यह भी संभवतः एक झूठ था। लिहाजा सरकारी कमाई के लिए जीएसटी लाना पड़ा जिससे महंगाई बढ़ी। दूसरी ओर, शेल कंपनियां, एनजीओ आदि बंद कराने से काम तो कम हुए ही, बाजार में पैसे भी कम हुए।
इसे जानना समझना कोई राकेट साइंस नहीं है। स्थिति ठीक करने के लिए उपाय भले मुश्किल हो पर जरूरी है लेकिन उससे पहले जरूरी है कि स्थिति खराब होना स्वीकार किया जाये। पर वह भी नहीं हो रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू की आज की लीड का शीर्षक वही है जो इंडियन एक्सप्रेस का है और अमर उजाला में सेकेंड लीड है। द टेलीग्राफ और दि एशियन एज छोड़कर आज सभी अखबारों में यही दो खबरें लीड और सेकेंड लीड हैं। द टेलीग्राफ ने बताया है कि पश्चिम बंगाल सरकार की शिक्षकों की चयन प्रक्रिया से चुने गये शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बेरोजगार किये जाने के बाद राज्य की पुलिस लात मार रही है। दूसरी खबर दिल्ली की है और इसके अनुसार दिल्ली में बंगालियों के मोहल्ले में मछली बेचने वालों को भगवा ब्रिगेड ने दुकानें बंद करने के लिए कहा है क्योंकि ये दुकानें मंदिर के पास हैं। विडंबना यह है कि इन मंदिरों को इन्हीं दुकानदारों ने बनवाया था। देश भर में भगवा ब्रिगेड की मनमानी दादरी से शुरू हुई थी और लगातार बढ़ रही है। इस लिहाज से चित्तरंजन पार्क पहुंचने में देर लगी और शायद इसके लिए भाजपा की सरकार का इंतजार रहा होगा। इसलिए यह खबर महत्वपूर्ण है फिर भी, दिल्ली की यह खबर दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज ने अपनी लीड से बताया है कि कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्यूरिटी (सीसीएस) ने नौसेना के लिए 26 राफेल जेट खरीदने के लिए 64 हजार करोड़ रुपये के सौदे को मंजूरी दे दी है। यह खबर दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर है। देश की खराब आर्थिक स्थिति वाली खबरों के बीच ईएमआई कम होने का झुनझुना 64 हजार करोड़ रुपये के सौदे की खबरों के साथ अच्छा लगेगा। ट्रम्प के टैरिफ और रेपो रेट की खबरें यहां भी पहले पन्ने पर लगभग वैसे ही शीर्षक के साथ हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया में ट्रम्प के टैरिफ की खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लगभग उसी शीर्षक के साथ है। शीर्षक में खास बात सिर्फ ईयू की जवाबी कार्रवाई है। रेपो रेट कम होने की खबर को अखबार ने कर्ज सस्ता होने की खबर के रूप में छापा है। इसका कारण रेपो रेट में कटौती है। अखबार की सेकेंड (या थर्ड) लीड पहले पन्ने पर लीड के बराबर छपी खबर है जो कुछ और अखबारों में पहले पन्ने पर है लेकिन टाइम्स ने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। खबर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा से संबंधित है। खबर के अनुसार दीपक मिश्र ने एक पंचाट के प्रमुख के रूप में जो फैसला दिया था उसे सिंगापुर के सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है और इसका कारण यह बताया गया कि फैसले में इन्हीं दो पक्षों से संबंधित पुराने दो फैसलों के 212 पैरे कॉपी पेस्ट किये गये हैं। देश को बदनाम करने वाली ऐसी खबरें न छापने और उसका उल्लेख नहीं करने का कानून बनने से पहले ही यह खबर हेडलाइन मैनजमेंट का शिकार हो गई लगती है। ऐसे में यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि शहर की एक अदालत ने दिल्ली के कानून मंत्री कपिल मिश्रा के खिलाफ जांच 21 अप्रैल तक रोक दी है। यह जांच उत्तर पूर्व दिल्ली में 2020 में हुए दंगे में इनकी भूमिका के संबंध में थी। यह खबर सिंगल कॉलम में छपी है।



