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सियासत

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कॉलेजियम के निर्णय पर असहमति जताकर साहस का काम किया है!

मुकेश कुमार-

मेरे खयाल से सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना इस समय सबसे साहसी और बेबाक जज हैं। वे बार-बार अपने फ़ैसलों और दो टूक राय से ये बात साबित करती रही हैं। यक़ीन के साथ तो नहीं कह सकता लेकिन ऐसा दिखता है कि अभी तक उन्हें कोई लोभ या दबाव डिगा नहीं पाया है।

कॉलेजियम द्वारा एक जज के बारे में लिए गए निर्णय पर असहमति जताकर उन्होंने साहस का काम किया है। उन्होंने पटना हाईकोर्ट के जस्टिस विपुल पंचोली को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाने का विरोध किया है।

न केवल विरोध किया बल्कि ये भी कहा कि उनकी असहमति को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट में भी डाला जाए ताकि दुनिया को पता चले। सुप्रीम कोर्ट को ऐसा करना पड़ा।

पांच सदस्यीय कॉलिजियम में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बी आर. गवई, जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस नागरत्ना शामिल हैं।

कॉलिजियम जस्टिस पंचोली और बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस आलोक अराधे की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति की सिफारिश की थी। हालांकि, फैसला 4-1 से है। लेकिन जस्टिस नागरत्ना की असहमति बहुत महत्वपूर्ण है। उसे जानने की ज़रूरत है।

जस्टिस नागरत्ना ने अपने असहमति नोट में कहा कि जस्टिस पंचोली की नियुक्ति न केवल “न्याय प्रशासन के लिए उल्टा असर डालेगी” बल्कि कॉलिजियम सिस्टम की विश्वसनीयता को भी खतरे में डालेगी। उन्होंने जस्टिस पंचोली के गुजरात हाईकोर्ट से पटना हाईकोर्ट में जुलाई 2023 में हुए ट्रांसफर के हालात का हवाला देते हुए इस नियुक्ति पर सवाल उठाए। सूत्रों के अनुसार, जस्टिस नागरत्ना ने मई में ही जस्टिस पंचोली की नियुक्ति के विचार पर अपनी आपत्ति जताई थी।

तब कॉलिजियम ने उनकी जगह गुजरात हाईकोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस एन.वी. अंजारिया को सुप्रीम कोर्ट के लिए चुना था।

जस्टिस नागरत्ना ने अपने नोट में इस बात पर हैरानी जताई कि तीन महीने के भीतर ही जस्टिस पंचोली का नाम फिर से सामने आ गया। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी नियुक्ति से कॉलिजियम की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।

उनके नोट में यह भी उल्लेख किया गया कि यदि जस्टिस पंचोली की नियुक्ति होती है, तो वे अक्टूबर 2031 से मई 2033 तक चीफ जस्टिस के रूप में कार्यरत हो सकते हैं, जो उनके अनुसार संस्थान के हित में नहीं होगा।

सवाल उठना लाज़िमी है कि कॉलेजियम ने जस्टिस नागरत्ना की गंभीरआपत्तियों को क्यों नज़रअंदाज़ किया। क्या कॉलेजियम पर कोई राजनीतिक दबाव काम कर रहा था….चीफ़ जस्टिस गवई को इसका जवाब देना चाहिए।

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1 Comment

1 Comment

  1. Krishna G Misra

    March 4, 2026 at 8:09 pm

    जिस तरह पत्रकारिता के माध्यम को सरकार या किसी व्यावसायिक संस्थान के धन या अन्य संसाधन से लाभ नहीं लेना चाहिए और पाठक से मिले दान से चलना चाहिए उसी तरह न्यायपालिका के खर्च भी न्याय के लिए जनता से मिले फीस पर निर्भर होना चाहिए। उसे किसी व्यावसायिक संस्थान या सरकार के द्वारा पोषित नहीं होना चाहिए।

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