निवेदिता झा-
पटना। बिहार महिला समाज ने साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवास राव पर लगे यौन हिंसा के गंभीर आरोपों को लेकर उन्हें तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है। संगठन की अध्यक्ष निवेदिता झा ने कहा कि इतने जघन्य आरोपों के बावजूद श्रीनिवास राव का पद पर बने रहना न केवल न्याय के साथ खिलवाड़ है बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा को भी बढ़ावा देता है।
क्या है मामला?
- श्रीनिवास राव साल 2013 में साहित्य अकादेमी के सचिव नियुक्त हुए थे।
- उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला कर्मचारी को अकादेमी प्रशासन ने नौकरी से निकाल दिया था।
- दिल्ली हाईकोर्ट ने इस बर्खास्तगी को अवैध और बदले की कार्रवाई माना तथा महिला को पुनः पद पर बहाल करने का आदेश दिया।
- कोर्ट ने साथ ही निर्देश दिया कि मामले की जांच लोकल कंप्लेंट्स कमेटी करेगी।
महिला समाज की आपत्ति
निवेदिता झा ने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि जिस अधिकारी पर गंभीर आरोप हैं, वह आज भी पद पर बना हुआ है और सत्ता संरक्षण का लाभ उठा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि –
- बीजेपी सरकार ने श्रीनिवास राव को सम्मानित किया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका दिया।
- इससे यह संदेश गया कि सरकार यौन हिंसा के आरोपियों को संरक्षण देती है।
- आरोपी के पद पर बने रहने से जांच प्रभावित हो सकती है और पीड़िता की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
पटना साहित्य उत्सव का बहिष्कार
बिहार महिला समाज ने राज्य के सभी लेखकों और साहित्यकारों से अपील की है कि वे पटना में होने वाले अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष 2025’ का बहिष्कार करें। संगठन का कहना है कि जब तक अकादमी यौन हिंसा के खिलाफ ठोस कदम नहीं उठाती और आरोपी सचिव को पद से नहीं हटाती, तब तक इस तरह के आयोजनों में भाग लेना महिलाओं के साथ अन्याय होगा।
संगठन की मांगें
- आरोपी सचिव के. श्रीनिवास राव को तत्काल पद से बर्खास्त किया जाए।
- पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
- मामले की जांच विशाखा गाइडलाइन के तहत निष्पक्ष तरीके से कराई जाए।
निवेदिता झा ने कहा कि अदालत से पीड़िता की बहाली तो हुई, लेकिन आरोपी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न होना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह स्थिति दर्शाती है कि बीजेपी की सरकार में बलात्कारियों और यौन उत्पीड़न के आरोपियों को संरक्षण मिलता है, सजा नहीं।
निवेदिता झा बिहार महिला समाज की अध्यक्ष हैं।
साहित्य अकादमी के सचिव पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों पर वायर की रिपोर्ट इतनी भयावह है कि पूरा पढ़ना मुश्किल है।
यह सीरियल अपराधी अभी तक अपने पद पर बना हुआ है। यह गंभीर चिंता की बात है।
कोर्ट द्वारा यह भी स्थापित हो चुका है कि वह अपने पद का दुरुपयोग करते हुए जांच में बाधा डालने और उत्पीड़न जारी रखने में जुटा हुआ है।
जब तक इसे बर्खास्त नहीं किया जाता, लेखकों को साहित्य अकादमी के साथ पूरा असहयोग करना चाहिए। उनके हर कार्यक्रम का बहिष्कार करना चाहिए।
यौन उत्पीड़न आरोपी के पद पर रहते साहित्य अकादमी के किसी भी कार्यकम में शरीक होना उसके कलंक में शरीक होने के बराबर है।
यौन उत्पीड़न/ जाति उत्पीड़न के मामलों में शून्य
सहनशीलता ही एकमात्र नीति है।एक प्रकाशक भी उत्पीड़न के आरोपी को स्टार लेखक की तरह सेलिब्रेट करने में लगे हुए हैं। ऐसे प्रकाशकों तक भी आक्रोश की आग पहुंचनी चाहिए।
-आशुतोष कुमार



