शोक संदेश
यह बताते हुए अत्यंत दुःख हो रहा है कि मेरे पूज्य पिताजी, डॉ. के. विक्रम राव, वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, का आज प्रातः लखनऊ के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे सांस संबंधी समस्या से पीड़ित थे और उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम साँस ली।
उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए 703, पैलेस कोर्ट अपार्टमेंट, निकट कांग्रेस कार्यालय, मॉल एवेन्यू, लखनऊ में रखा गया है।
मेरे बड़े भाई सुदेव राव मुंबई से लखनऊ के रास्ते में है। उनके लखनऊ पहुँचने के बाद राव साहब के अंतिम संस्कार संबंधी सूचना पृथक रूप से प्रेषित की जाएगी।
के.विश्वदेव राव
(पत्रकार)
9415010300
लखनऊ | भारतीय पत्रकारिता जगत ने आज अपना एक स्तंभ खो दिया। देश के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार एवं इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. के.विक्रम राव का आज प्रातः लखनऊ के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे साँस संबंधी तकलीफ़ के कारण आज सुबह अस्पताल में भर्ती कराए गए थे, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली।
डॉ. राव पत्रकारिता के क्षेत्र में दशकों से सक्रिय थे और उन्होंने श्रमजीवी पत्रकारों की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाया। उनका जीवन संघर्षशील पत्रकारिता, सिद्धांतनिष्ठ विचारों और निर्भीक लेखनी का पर्याय रहा।
उनका पार्थिव शरीर 703, पैलेस कोर्ट अपार्टमेंट, निकट कांग्रेस कार्यालय, मॉल एवेन्यू, लखनऊ में अंतिम दर्शनार्थ रखा गया है। पत्रकारिता जगत के लिए यह अपूरणीय क्षति है।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोक संतप्त परिवार को यह वज्राघात सहने की शक्ति दे। ॐ शांति।
एक दिन पहले ही अपने पुत्र के साथ सीएम से मिले थे-

मौत से कुछ घंटे पहले फेसबुक पर आर्टकिल लिखा था-

रामभक्त सुन्नी ने पाकिस्तान को हराया!
के. विक्रम राव
इस्लामी पाकिस्तान की जबरदस्त शिकस्त के प्रमुख कारणों में भारतीय सेना से कहीं अधिक प्रभावशाली भूमिका एक तमिलभाषी, गीतापाठी, रामभक्त और वीणावादक अब्दुल कलाम की रही। भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति (2002) के निर्वाचन में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, विपक्ष की कांग्रेस, समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी ने आपसी मतभेदों को भुलाकर सुदूर दक्षिण के इस गैर-राजनीतिक विज्ञानशास्त्री डॉ. अबुल पाकिर जैनुलआबिदीन अब्दुल कलाम को अपना साझा उम्मीदवार बनाया था।
गणतंत्रीय भारत के तीसरे मुस्लिम राष्ट्रपति के रूप में कलाम का नाम आगे आते ही दोनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों ने उनका जमकर विरोध किया और कानपुर निवासी 90 वर्षीय कैप्टन लक्ष्मी सहगल को अपना प्रत्याशी घोषित किया। मतदान का परिणाम एकतरफा था, पर वामपंथियों ने अपनी द्वंद्वात्मक शैली में कलाम के विरुद्ध कई तर्क प्रस्तुत किए। यद्यपि वामपंथी क्रांति के हरावल दस्ते माने जाते हैं, इस बार वे आत्मघाती रास्ते पर चल पड़े।
“मिसाइल मैन” के नाम से प्रसिद्ध अब्दुल कलाम द्वारा विकसित प्रक्षेपास्त्रों ने शायद ही पाकिस्तान का कोई बड़ा शहर छोड़ा हो, जिस पर हमला न किया गया हो। पाकिस्तान को यह घमंड था कि मिसाइल क्षमता में वह भारत से अधिक शक्तिशाली है, इसी कारण उसने अपने मिसाइलों के नाम भारत पर आक्रमण करने वाले लुटेरों — मोहम्मद गौरी, जहीरुद्दीन बाबर, मोहम्मद अब्दाली — के नाम पर रखे थे। लेकिन इन सबके सामने दक्षिण भारत के इस मुसलमान वैज्ञानिक द्वारा निर्मित भारतीय मिसाइलें कहीं अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुईं।
इस युद्ध में कौन जीता और कौन हारा — इस पर बहस हो सकती है, लेकिन नेक, आस्तिक और सच्चे मुसलमान डॉ. अब्दुल कलाम पर शक या संदेह नहीं किया जा सकता। आश्चर्य की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और किसी अन्य प्रमुख नेता ने इस युद्ध में भारत की सफलता के लिए अब्दुल कलाम का आभार नहीं जताया।
यदि कम्युनिस्टों को 2002 में कलाम का विरोध करना ही था, तो वे यह दलील दे सकते थे कि 77 वर्षीय अब्दुल कलाम मुसलमान नहीं हैं क्योंकि उन्हें उर्दू नहीं आती — जबकि यह एक सामान्य बात है कि अधिकांश तमिल मुसलमानों ने कभी उर्दू नहीं सीखी। वामपंथी यह प्रचार कर सकते थे कि कलाम केवल दही-चावल और अचार खाते हैं, मांसाहार से दूर रहते हैं। रक्षा मंत्रालय में अपनी पहली नियुक्ति से पूर्व वे ऋषिकेश जाकर स्वामी शिवानंद से आशीर्वाद ले चुके थे। उनके पिता जैनुल आबिदीन के परम मित्र और रामेश्वरम शिवमंदिर के प्रधान पुजारी पंडित पक्षी लक्ष्मण शास्त्री से धर्म के गूढ़ रहस्यों में तरुण अब्दुल ने रुचि ली थी।
डॉ. कलाम संत कवि त्यागराज के रामभक्त पदों को गुनगुनाते थे, नमाज़ के साथ-साथ रुद्रवीणा भी बजाते थे, और एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी के भजनों को बड़े चाव से सुनते थे — जबकि उनके मज़हब में संगीत वर्जित माना जाता है।
कुल मिलाकर, वामपंथी यह प्रचार कर सकते थे कि अब्दुल कलाम “बिना जनेऊ वाले ब्राह्मण” हैं। उत्तर भारत के मुसलमानों को वे भड़काकर यह कह सकते थे कि अब्दुल कलाम के पूर्वजों ने इस्लाम को उन अरब व्यापारियों के माध्यम से अपनाया था जो दक्षिण भारत के समुद्री तटों पर शांति के साथ आए थे — न कि उत्तर भारत के उन मुसलमानों की तरह जो गाजी मोहम्मद बिन कासिम की सेना द्वारा तलवार के बल पर धर्मांतरण के बाद बने।
यह स्थिति वैसी ही हो सकती थी जैसी मौलाना भाशानी ने ढाका में कही थी — “ये पश्चिम पाकिस्तानी मुसलमान हम पूर्वी पाकिस्तानी (बांग्लादेशी) मुसलमानों को इस्लामी मानते ही नहीं। तो क्या मुसलमान होने का प्रमाण देने के लिए हमें लुंगी उठानी पड़ेगी?”
कलाम के विरोधी इसी तरह हिन्दुओं को भी यह कहकर भटका सकते थे कि कलाम की माँ ने उन्हें बाल्यावस्था से ही नमाज़ पढ़ने की शिक्षा दी थी, मगरीब में मक्का की ओर मुंह करके प्रार्थना करने को कहा था — यानी पूर्व की ओर, अपने देश की ओर, न देखने की हिदायत दी थी। उनके पिता ने सिखाया था कि हर कार्य की शुरुआत “बिस्मिल्लाह” से होनी चाहिए।
परंतु सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा सकता था कि हिन्दू बहुल भारत का राष्ट्रपति एक सुन्नी मुसलमान कैसे हो सकता है? एक ऐसा युवक, जिसने 250 रुपये मासिक वेतन से अपनी सरकारी नौकरी शुरू की थी, आज उसे 50,000 रुपये मासिक करमुक्त वेतन और राष्ट्रपति पद क्यों मिले? सत्तालोलुप दलाल यह कह सकते थे कि राजनीति की दुनिया इस अंतरिक्ष वैज्ञानिक के लिए उपयुक्त नहीं है।
इस पूरे संघर्ष में यह स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान के प्रक्षेपास्त्र — महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी और अहमदशाह अब्दाली — भारतीय मिसाइलों (अग्नि, त्रिशूल, नाग) से तो टकराए ही, पर सबसे प्रभावशाली व्यक्ति सिद्ध हुए मिसाइल मैन अब्दुल कलाम। पोखरण-II परीक्षण के इस शिल्पी ने राष्ट्रपति बनकर अपने तीसरे विस्फोट का प्रभाव डाला। हरिद्वार के स्वामी शिवानंद के इस शिष्य को भारत सदैव आभारी रहेगा — शरीफ़ के पाकिस्तान को शिकस्त देने में।
K. Vikram Rao
मोबाइल: 9415000909
ईमेल: [email protected]



Sudhan Chandola
May 12, 2025 at 1:05 pm
Mr.KVikram Rao was an adorable pressman. He is known for his impartial and fair journalism.