हेमंत शर्मा-
कल्याण सिंह होते तो आज तिरानवे साल के होते। कल्याण सिंह भाजपा में मंडल और कमंडल के गठजोड़ थे। उन्होंने भाजपा को नया आधार दिया था। उनके इस प्रयोग से भाजपा सत्ता के राजपथ पर आई।
कल्याण सिंह भाजपा के अकेले नेता थे जिन्हें बाबरी ढाँचा ढहाए जाने की सजा अदालत ने दी। जबकि पार्टी के बाक़ी सब नेता बरी हो गए। मंडल कमंडल के इस रसायन से ही कल्याण सिंह हिन्दुत्व के पहले, प्रबल और प्रमुख चेहरा बने। राममंदिर पर क़ुर्बान होने वाले वे पहले मुख्यमंत्री थे। वे पहले नेता थे जिसने भाजपा को ब्राह्मण बनिया पार्टी के खोल से बाहर निकाल पिछड़ी राजनीति में व्यापक आधार दिया।
दरअसल राममंदिर आन्दोलन के कल्याण सिंह ‘पोस्टर ब्वाय’ थे।
अति पिछडी जातियों की पहचान और उनमें पार्टी की पैठ बनवाने के वे शिल्पकार थे। कभी अगड़ों की राजनीति पर टिकी भाजपा की आरक्षण नीति कैसी हो? उसके वे रणनीतिकार थे। भोपाल अधिवेशन में कल्याण सिंह ने ही पार्टी की आरक्षण नीति रखी और संगठन में भी पिछडों को हिस्सेदारी की हिमायत की। राजनीति में धैर्य ज़रूरी होता है।
कल्याण सिंह अधीर न होते तो आडवाणी के बाद भाजपा के कप्तान होते। पर कल्याण सिंह का अहं भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल जी टकराया। इस अधीरता ने उनसे दो बार पार्टी छुड़वाई। और इस ताकतवर नेता की गाड़ी बेपटरी हुई। उनके मुख्यमंत्रित्व काल के दूसरे हिस्से को छोड़ दिया जाय तो कल्याण सिंह जनता की नब्ज पकड़ने वाले, ईमानदार, सिद्धांतवादी और मुद्दों पर अड़ने वाले मुख्यमंत्री थे।
पहली बार मुख्यमंत्री का पद सम्भालने से पहले कल्याण सिंह अपने साथियों के साथ अयोध्या गए और राममंदिर बनाने की शपथ ली, जिसे उन्होंने राम मंदिर के सवाल पर अपनी सरकार की बर्ख़ास्तगी तक निभाया।
पर कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व का दूसरा दौर उनकी सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के अवसान की शुरूआत थी। उन्हें अपने ही बनाए शिखर सिद्धांतों से समझौते करने पड़े। पहले कार्यकाल में कल्याण सिंह ने जिस माफिया राजनीति के अंत की शुरूआत की थी, दूसरे कार्यकाल में वही सारे माफिया उनके मंत्रिमंडल में थे। उनके विश्वास और भरोसे की डोर संघ और अटल बिहारी बाजपेयी दोनों से कमजोर हुई। वे इस भ्रम में रहे कि संघ और अटल जी ने उनके ख़िलाफ़ कोई साज़िश रची, जो सही नहीं था। संघ से वे इस बात पर हमेशा नाराज़ रहे कि उन्हें धोखे में रख ढाँचा गिराया गया और अटल जी से वे हमेशा असुरक्षित महसूस करते रहे।
कल्याण सिंह की पिछड़ी राजनीति उन्हें बार-बार मुलायम सिंह की तरफ़ ले जाती और उनके व्यक्तित्व में हिन्दुत्व का कोर तत्व उन्हें भाजपा में खींचता। उनका उतरार्द्ध इसी दुविधा में बीता। ये दुविधा उनकी ज़िंदगी के सबसे बड़े और चर्चित घटनाक्रम में भी दिखाई दी।

6 दिसंबर 92 को जिस वक्त बाबरी ढाँचे पर कारसेवकों ने हल्ला बोला, दिल्ली से लेकर लखनऊ तक राजनीति बेहद सरगर्म थी। अयोध्या के कंट्रोलरूम से जब उन्हे ढांचे पर चढ़े कारसेवकों द्वारा तोड़-फोड़ की सूचना दी गई, तो मुख्यमंत्री अचंभित थे। वे विवादित परिसर की सुरक्षा और कारसेवकों को कोई खरोंच न आने के दो अलग-अलग छोरों के बीच उलझे थे। कल्याण सिंह ने बिना गोली चलाए परिसर को खाली कराने को कहा।
हालाँकि वे इस बात से नाराज थे कि अगर विहिप की ऐसी कोई योजना थी तो उन्हें भी बताना चाहिए था। उन्हें भरोसे में लिया जाना चाहिए थी। दिल्ली से गृहमंत्री एस बी चौहान का उनके पास फ़ोन आ रहा था। प्रधानमंत्री के निजी सचिव पी.वी.आर.के. प्रसाद ने भी फोन कर फैजाबाद के कमिश्नर से स्थिति नियंत्रित करने और केंद्रीय बलों का इस्तेमाल करने को कहा। पर कल्याण सिंह दृढ़ थे। उन्होंने दो टूक कह दिया, “कोशिश कर रहा हूँ की कारसेवक वापस आएं, पर गोली नही चलाऊंगा।”
बाबरी ध्वंस से जितने आहत नरसिंह राव थे, उतने ही आहत और धोखा खाए कल्याण सिंह भी लग रहे थे। मुझसे उन्होंने कहा कि उन्हें भ्रम में रखा गया। कल्याण सिंह को कुछ-कुछ अंदेशा था। 5 दिसम्बर की रात जिला प्रशासन ने गृह सचिव को जो रिपोर्ट भेजी, उसमें कहा गया था कि कारसेवकों का एक वर्ग है, जो कारसेवा का स्वरूप बदलने से नाराज है। यानी प्रतीकात्मक कारसेवा उनके गले नहीं उतर रही है।
मौके की नजाकत भाँप कल्याण सिंह ने बीजेपी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी को उसी रात अयोध्या भेज दिया था। पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक इन दोनों को 6 दिसंबर की सुबह अयोध्या जाना था। ध्वंस के बाद शाम तक कल्याण सिंह सदमे में थे। उन्होंने लखनऊ में अपने आवास पर मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक के साथ बड़े अफसरों की मीटिंग बुलाई। फाइल मँगा उस पर गोली न चलाने के लिखित आदेश दिए, ताकि बाद में किसी अफसर की जवाबदेही न तय हो।
समय बीतने के साथ कल्याण सिंह ने लाईन बदली। वे पहले तो अचंभित थे। अपने को छला गया बता रहे थे। पर जनता की नब्ज भांप ढाँचा गिरने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। इस्तीफे के बाद उनका दो टूक ऐलान था कि यह प्रबल हिंदू भावनाओं का विस्फोट था क्योंकि मामले को लटकाए रखने में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों बराबर की जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि यह सही है कि ढाँचे की सुरक्षा की जिम्मेदारी मैंने ली थी, पर साथ-साथ मैंने यह भी कहा था कि मेरी सरकार संतों और कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएगी।
कल्याण सिंह ने स्टैंड लिया कि “ढाँचे से कारसेवकों को हटाने के लिए गोली न चलाने के लिए कोई अफसर जिम्मेदार नहीं है। फाइलों पर मेरे दस्तखत हैं। जब मैंने रास्ता निकाला था, तब किसी ने मेरी सुनी नहीं। मैं विवादित इमारत और कारसेवा की जगह को अलग करना चाहता था। मेरी योजना थी कि 2.77 एकड़ से विवादित ढाँचे को अलग करा उस हिस्से में कारसेवा कराई जाए। यह ‘सेफ्टी वॉल्व’ था। उससे 6 दिसंबर की घटना टाली जा सकती थी। पर मेरी बात नहीं सुनी गई। गैर-बीजेपी दलों ने इसमें रुकावट डाली। अदालत के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई गई।”
ढाँचा गिरने के तीसरे रोज मैं भी कल्याण सिंह से मिला था। उनका इन्टरव्यू किया था जिसमें उन्होंने मुझसे कहा, “मुझे धोखे में रखा गया। मेरे साथ छल हुआ। अगर कोई योजना थी तो मुझे भी बताना चाहिए था। “शायद ये कसक कल्याण सिंह में आखिरी वक्त तक रही। कल्याण सिंह अपने पीछे एक ऐसा इतिहास छोड़ गए हैं जो उन्हें राजनीति और समाज की नज़रों में हमेशा जीवित रखेगा। वे उन दुर्लभ राजनेताओं में एक हैं जिनकी छाप राजनीति, समाज, धर्म, आस्था और लोकाचार समेत जीवन के तमाम पहलुओं पर समान रूप से अंकित है।
वक्त ने बड़ी निर्ममता के साथ उनका मूल्यांकन किया है। वे जिन फैसलों से आहत थे, दुखी थे, स्तब्ध थे, उन फैसलों की चार्जशीट भी उनके ही माथे मढ़ दी गई। उनका मूल्यांकन अधूरा है। शायद इतिहास ही एक रोज उनका सही मूल्यांकन करे। उनकी स्मृतियों को प्रणाम।
आज अपनी पीढ़ी के सबसे विद्वान नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी जी का भी जन्मदिन है। उन्हें भी प्रणाम।


