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पंजाब

कवियों की विदाई ऐसे ही होनी चाहिए जैसी सुरजीत पातर की हुई!

कृष्ण कल्पित-

कवि की विदाई!

किसी कवि की विदाई इसी तरह होनी चाहिए जैसी पंजाबी में लिखने वाले एक महत्वपूर्ण भारतीय कवि सुरजीत पातर की हुई। राजकीय सम्मान से उन्हें विदाई दी गई। पंजाब के मुख्यमंत्री ने उनकी अर्थी को कंधा दिया। उनकी कविताओं का पाठ किया और सुरजीत पातर के नाम से युवा कवियों के लिए एक पुरस्कार की घोषणा की।

राजकीय सम्मान के अलावा सुरजीत पातर के निधन पर पूरा पंजाब शोकाकुल था। अख़बारों ने पातर पर विशेष अंक और परिशिष्ट निकाले। सोशल मीडिया भी सुरजीत पातर की कविताओं और ग़ज़लों से रंगा हुआ था। सुरजीत पातर की लोकप्रियता पूरे देश में थी।

क्या किसी हिन्दी कवि की ऐसी विदाई पिछले दशकों में देखी गई? शायद नहीं। हिन्दी कवि और कविता से हिन्दी समाज का जैसे कोई रिश्ता ही नहीं है। राजनीति और राजनीतिज्ञों को तो छोड़िए। ऐसा क्यों है, इस बात की जांच होनी चाहिए।

सुरजीत पातर पंजाबी के बुद्धिजीवियों के साथ सामान्य पाठकों में भी लोकप्रिय थे। उनकी कविता पंजाब की मिट्टी, जनजीवन से गहरे से जुड़ी हुई थी। उनकी कविताओं में पंजाबी मुहावरे गुंथे हुए थे। जैसे यह पंक्ति : मेहनत से थकान नहीं होती साहेब, बेक़दरी से होती है।

सुरजीत पातर मुक्तछंद और छंद दोनों में लिखते थे। उनकी पंजाबी ग़ज़लें भी बहुत लोकप्रिय थी। उनकी पंजाबी ग़ज़लों का एच एम वी ने एक रिकॉर्ड भी निकाला था। सुरजीत पातर को साहित्य अकादमी, सरस्वती सम्मान, पद्मश्री सहित कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों से नवाज़ा गया।

हिंदी के एक साहित्य अकादमी पुरस्कृत प्रतिष्ठित कवि सुरजीत पातर को तुक्कड़ कहते थे। जब मैंने उन्हें बताया कि पुणे के ब्राह्मणों ने सबसे पहले तुकाराम को तुक्कड़ कहा था तो वे मुझे भी तुक्कड़ कहने लगे। यह अलग बात कि तुकाराम को तुक्कड़ कहने वाले बिरहमन मर गए, लेकिन तुकाराम अमर हैं।

यह समकालीन हिंदी कविता की एक विडम्बना है कि उनकी कविताओं के पाठक नहीं हैं। समकालीन हिंदी कविता ने हिंदी की परम्परा को, उसके छंद विधान को पिछड़ा हुआ मानकर दशकों पहले छोड़ दिया था।

यदि समकालीन हिंदी कविता को पाठक प्रिय बनना है तो उसे अपनी कविता के कथित अंतरराष्ट्रीय शिल्प को बदलना होगा। उसे फिर से भारतीय समाज और मनुष्य से जुड़ना होगा।

किसी कवि की विदाई इसी तरह होनी चाहिए जैसी पंजाबी कवि सुरजीत पातर की हुई। स्मृति नमन!

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