योगेंद्र-प्रशांत निष्कासन प्रकरण के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है

‘आप’ की ‘पीएसी’ से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को निकलाने व इसके पहले चले पूरे विवाद के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है. सोशल मीडिया पर जो चिंतक, पत्रकार और एक्टिविस्ट किस्म के लोग केजरीवाल की तारीफ करते न अघाते थे, अब वे इस घटनाक्रम के बाद से केजरीवाल पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं. साथ ही, पूरे प्रकरण के बाद से योगेंद्र यादव की लोकप्रियता और कद में इजाफा हुआ है. यहां फेसबुक से उन कुछ स्टेटस को दिया जा रहा है जिससे पता चलता है कि अब तक ‘आप’ को सपोर्ट करते रहे लोग पूरे प्रकरण से दुखी हैं और केजरीवाल को कोस रहे हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

Om Thanvi : केजरीवाल की चुप्पी इसका संकेत देती थी, पर अब यही जाहिर है कि योगेंद्र यादव को पीएसी से बाहर करवाकर अरविंद उन युवतर ‘नेताओं’ के अभियान का हिस्सा बन गए जो खुद अहंकार और बड़बोलेपन से ग्रस्त हैं। इससे आप पार्टी का नुकसान होगा, शायद केजरीवाल की अपनी छवि को ठेस पहुंचे जिनका कद – पारंपरिक राजनीति से जुदा होने के कारण – लोग बहुत ऊँचा मानते आए हैं। अगर (पार्टी के मोरचे पर) यह आगाज है तो अंजाम की खुदा से दुआ ही कर सकते हैं। प्रशांत भूषण को भी पीएसी से निकाला। कहीं केजरीवाल छुट्टी से यह ट्वीट न करें कि वे इस पर भी दुखी और आहत हैं। कहते थे, हम दूसरों को राजनीति सिखा देंगे। भाईजान, ये राजनीति तो दूसरे पता नहीं कब से कर रहे हैं!

Mukesh Yadav : केजरीवाल की जो तानाशाह टाइप इमेज बनती जा रही थी अब उस पर मुहर लग गई!…लेकिन बात अभी ख़त्म नहीं होगी !..आठ लोगों ने योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के समर्थन में वोट किया है। हालांकि अब इस पार्टी में वो बात नहीं रह जाएगी। दिल्ली को तो विकल्प मिल गया लेकिन बाकी देश के लोग दशकों तक इन्तजार क्यों करें? अच्छा तो यही हो कि सभी साथ बनें रहें! लेकिन अगर सहमति नहीं बनती तो ठीक है केजरीवाल दिल्ली संभालें और आप को भी संभालें! योगेन्द्र यादव-भूषण जैसे लोगों को अलग होकर दूसरे राज्यों में संगठन खड़ा करना चाहिए! लोगों के पास ज्यादा साफ़-सुथरे विकल्प होंगे। भविष्य में लोगों को केजरीवाल की आप और अगर कोई नई पार्टी इस टूट से निकलती है तो उसके बीच चुनाव करने का विकल्प होगा! साथ ही पुराने ढर्रे की राजनीति को भी विदा किया जा सकेगा। किसी ने सही ही कहा है कि हर संकट, एक नया अवसर भी साथ लेकर आता है। रही बात हमारी तो हम तो दोनों को आगे बढ़ाएंगे। क्यों?

Sheetal P Singh : The Yogendra Yadav/Prashant Bhushan won the battle of perception in their favour amongst masses connected to net or watching TV in urban centres though defeated on floor with a narrow margin. camp Kejriwal couldn’t perform as per expectations n one has to admit that the score of YY/PB is impressive

Mukesh Kumar : अब आप पर टिप्पणी करने का मन नहीं करता। लगता है दो मिनट का मौन रख लिया जाए।

Mohammad Anas : आम आदमी पार्टी एन जी ओ और मीडिया से छूटे उन लोगों का समूह है जिन्होंने क्रांति और स्वराज का सपना दिखा कर आम आदमी को ठग लिया. अरविंद केजरीवाल ठगों के सरगना हैं.

Amitaabh Srivastava : सचिव , वैद, गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज, धर्म , तन तीनि कर होइ बेगिही नास।। अरविंद केजरीवाल जी , रामचरित मानस में ये दोहा रावण को खुशामदी किस्म के और गलत सलाह देने वाले दरबारियों से बचने की चेतावनी के प्रसंग के तौर पर आता है। सबको मालूम है अंतिम नतीजा क्या हुआ। हालांकि इस तरह की राजनीतिक संस्कृति के प्रतिनिधि लोकप्रिय जननेता आपसे पहले भी बहुत रहे हैं लेकिन आपने भी अलग होने का भ्रम तोड़ दिया है। नतीजा भी भुगतना पड़ेगा।

Vivek Singh : और इस तरह प्रशांत भूषण के हटाए जाने के बाद आम आदमी पार्टी पूरी तरह राष्ट्रवादी हो गई है। दरअसल यह आम आदमी पार्टी की घरवापसी है।

Vineet Kumar : इस देश के महान दागदार संपादक सुधीर चौधरी अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहरा रहे हैं. दोषी इस बात के लिये नहीं जिसकी चर्चा सोशल मीडिया अउर बाकी चैनलों पर चल रही है. दोषी इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खांसी के लिए जिस डॉ से इलाज़ कराने की सलाह दी थी, उस पर केजरीवाल ने बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया. डीएनए में चौधरी ने केजरीवाल के खाँसी,सुगर से जुड़े मामले को इस तरह पेश किया कि वो चिंता कम, उनका और आप का मज़ाक बनाना ज़्यादा था.चुनकर आज के ही दिन ऐसा करना क्या कम बडा सर्कस है.‪

Mayank Saxena : दरअसल यह आम आदमी पार्टी के अंदर समाजवादियों का जमावड़ा है…समाजवादी, जो इस देश की राजनीति की सबसे अस्पष्ट राजनैतिक विचारधारा और अवसरवादी राजनीति रही है…समाजवादियों का इतिहास साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए, उनसे ही लगातार गठबंधन करते रहने, घनघोर दलित एवम् महिला विरोधी रहने और जातिवाद का इतिहास है… बाकी सब कुछ शीशे की तरह साफ है…संघी और समाजवादी जब मिलते हैं…तो सेक्युलरिज़्म और राष्ट्रवाद दोनों के नारे गूंजते हैं…वाम को गाली दी जाती है…अल्पसंख्यकों को छला जाता है और विकास के एजेंडे को महिमामंडित किया जाता है…अंततः परिणाम कभी 1977 की तरह 2 साल में ही सामने आ जाता है…तो कभी एनडीए की तरह 17 साल बाद… आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल, आप को ‘आप’ का जेडीयू-आरजेडी-सपा-आरएलडी-जेएमएम-जनसंघीकरण मुबारक हो…

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