नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल : इन दो नेताओं का घमंड तो देखो…

Sheel Shukla : ये घमंडी! अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अभी नरेंद्र मोदी इतने शिक्षित नहीं है कि देश के अर्थ शास्त्र को समझ सके। अरविन्द केजरीवाल के ऐसा बोलते समय एक बू आ रही थी कि मैं तो IRS रहा हूँ और मेरी किताबी शिक्षा की कोई तुलना नरेंद्र मोदी की शिक्षा से नहीं है। यह कोई राष्ट्रहित या नोटबंदी के खिलाफ दिया गया बयान नहीं था बल्कि ये अरविन्द केजरीवाल का दम्भ था, घमंड था।

इसी घमंड का शिकार तो बुरी तरह से नरेंद्र मोदी भी है, अभी हाल के बयान सुनिये तो आप को खुद ही पता चल जायेगा की कितना घमंड भरा है नरेंद्र मोदी में, 8 नवम्बर 2016 नोटबंदी की घोषणा वाली तारीख, जिस तरह अपनी हथेलियों को आपस में पीटते हुए बोल रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कोई देश का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि कोई भगवन बोल रहा हो। नरेंद्र मोदी का कहना कि कांग्रेस की औकात चवन्नी की थी तो उन्होंने चवन्नी बंद की और मैंने अपनी औक़ात के हिसाब से हजार के नोट बंद किये, पहले लोग मनी मनी करते थे अब मोदी मोदी कर रहे है, कितना बेतुका दम्भ था ये।

नरेंद्र मोदी तो अपने घमंड में इस स्तर तक उतर गए कि अपने आप को जमीन से उठा हुआ नेता कहने वाले ने डेल्ही के चुनाव को नसीब वाला और बदनसीब के बीच की लड़ाई बता दिया. जिसमे नसीबवाले नरेंद्र मोदी थे और बदनसीब अरविन्द केजरीवाल। क्या होगा देश का जहा ये घमंडी देश और प्रदेश की बागडोर संभाल रहे है।

पत्रकार और उद्यमी शील शुक्ला की एफबी वॉल से.

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केजरीवाल मीडिया को कैसे मैनेज करते हैं

देश में 29 राज्यों के मुख्यमंत्री हैं और दो केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं, जहां मुख्यमंत्री होते हैं। यानी कुल मिलाकर देश में 31 मुख्यमंत्री हैं। अरविंद केजरीवाल इनमें मुख्यमंत्रियों में से एक हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि जितनी कवरेज अरविंद केजरीवाल नेशनल मीडिया में पाते हैं, उतना तो किसी राष्ट्रीय पार्टी को भी नसीब नहीं हो पाता। स्थिति ये है कि कवरेज के मामले में आम आदमी पार्टी बीजेपी-कांग्रेस को जोरदार टक्कर देती है। नेशनल मीडिया को देखें तो ऐसा लगता है कि इस समय पूरे देश में सिर्फ आम आदमी पार्टी विपक्षी पार्टी है और केजरीवाल विपक्ष के नेता। ऐसा क्यों है? बिना किसी लाग-लपेट के तर्क के सहारे सीधे-सीधे अपनी बात रख रहा हूं।

1- ऐसा लगता है कि केजरीवाल ने ये तय कर रखा है कि हर वक्त मीडिया में बने रहना है। चाहे अच्छी वजह से हो, चाहे बुरी वजह से, इसलिए वो कभी स्याही, कभी चप्पल के बहाने भी खबरों में आ जाते हैं। जब कोई खबर नहीं होती, तो किसी दूसरी बड़ी खबर में अपनी टांग अड़ा देते हैं। चाहे इससे पार्टी का या प्रदेश की जनता का कोई लेना-देना हो या न हो। कम से कम इस बहाने खबरों में रहने का मौका मिल जाता है। अगस्ता हेलिकॉप्टर मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

2- केजरीवाल और उनकी टीम ने ये तय कर लिया है कि छापामार राजनीति करो। मतलब ये कि आरोप लगाओ और भाग जाओ। बाद की चिंता बाद में कर लेंगे। यही नहीं आरोप भी सीधे-सीधे आला नेताओं पर लगाओ। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि केजरीवाल टीवी की राजनीति करते हैं। टीवी का फॉर्मूला ये है कि पल भर में खबरें बदल जाती हैं और खबर का फॉलोअप नहीं होता। लोग सब कुछ भूल जाते हैं, इसलिए केजरीवाल ये समझते हैं कि अगर आपने आरोप लगा भी दिए और सनसनीखेज तरीके से खबरें पैदा कर भी दीं, तो उस पर फॉलो अप करने वाला कोई नहीं होता। जनता भूल जाती है। शीला दीक्षित के खिलाफ सैकड़ों पन्नों के सबूत दिखाने वाले केजरीवाल अब शीला दीक्षित के खिलाफ ही दूसरों से सबूत मांग रहे हैं।

3-केजरीवाल और उनकी टीम ने अपनी सियासी जड़ों को मजबूत करने के लिए सबसे बड़ा और अचूक हथियार पत्रकारों और खासकर टीवी पत्रकारों को बनाया। इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि जब शुरुआती दिनों में वो राजनीति में उतरे, तो हर पत्रकार को ये सपना दिखाने में कामयाब हो गए कि वो भी राजनीति में आ सकते हैं, सांसद और विधायक भी बन सकते हैं। सबके लिए सुनहरे भविष्य को थाली में परोस दिया। सच तो ये है कि उन दिनों हर पत्रकार अपने संसदीय सीट चुनने में लगा था। अब पत्रकार आम आदमी पार्टी के दम पर सपने देखेगा तो उसकी आलोचनात्मक समीक्षा क्या करेगा। मेरी इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण ये है कि केजरीवाल की टीम में ज्यादातर लोग पत्रकार ही हैं।

4-इस वक्त भी केजरीवाल ने कई चैनल और कई अखबार में आम आदमी पार्टी से जुड़े ऐसे समर्थक पैदा कर दिए हैं, जो पत्रकार कम उनके कैडर के तौर पर काम करते हैं। केजरीवाल सबसे पहले इन्हें खबर देते हैं। फिर जब इन पत्रकारों की खबरों को अखबार या चैनल चलाते हैं, तो यही पत्रकार उसे सोशल मीडिया में शेयर करते हैं। फिर केजरीवाल और उनकी टीम इन्हीं पत्रकारों और अखबार/चैनल की खबरें रिट्वीट करते हैं और आखिर में ये दावा करते हैं कि ये तो आपके अखबार या चैनल ने दिखाया है, लेकिन सच तो ये है कि सारी खबरें प्लांट होती हैं।

5-मार्केटिंग का एक बड़ा फंडा है। तीन नीतियों पर काम किया जाता है। किसी को अपनी बात मनाने के लिए तीन C का इस्तेमाल होता है। 1. CONVINCE 2. CONFUSE और 3. CORRUPT – टीम केजरीवाल मीडिया को अपने वश में करने के लिए इन तीनों नीतियों का सहारा लेती है। पहली कोशिश किस भी प्रोडक्ट की अच्छी बातें बताकर लोगों को आकर्षित करने की होती है। आम आदमी पार्टी भी अपने स्टाइल से लोगों को कन्वींस करने की कोशिश करती है ताकि बिना किसी परेशानी के खबरों में बने रहें। दूसरा तरीका है कंफ्यूज करने का। उदाहरण के तौर पर आपने एक टुथपेस्ट का प्रचार देखा होगा जिसमें कहा जाता है- क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है? ये अलग बात है कि लोगों को यही न पता हो कि नमक के टूथपेस्ट में होने से क्या फायदा है? टीम केजरीवाल इस तरीके का भी खूब इस्तेमाल करती है। मोदी के मार्कशीट की मांग करना कुछ ऐसा ही है। दरअसल लोग समझ ही नहीं पाए इस मार्कशीट से किसी की प्यास बुझेगी, किसी का पेट भरेगा। लेकिन मीडिया में इतना प्रचारित कर दिया गया कि लोग दिल्ली की बाकी समस्या भूल गए और मीडिया में मार्कशीट की चर्चा होने लगी। केजरीवाल ने इस तरीके से लोगों को बेवकूफ बनाने की खूब कोशिश की। तीसरा तरीका करप्ट करने का है। इसका उदाहरण ये है कि एक टूथपेस्ट के साथ दूसरा मुफ्त में दे दें। टीम केजरीवाल के बारे में इस तरह की बातें अक्सर सुनने को मिल रही हैं। अखबारों में बडे-बड़े विज्ञापन और नेशनल टीवी पर प्रचार में इतना पैसा बहाने के पीछे शायद यही कारण नजर आता है।

6- केजरीवाल इसके अलावा मीडिया को मैनेज करने के लिए धमकी का भी सहारा लेते हैं। एक अखबार के रिपोर्टर को सरेआम ट्वीटर पर धमकी, एक चैनल के खिलाफ अखबार में विज्ञापन छापना इसका सबसे बड़ा सबूत है। बस ये समझ लीजिए कि जिस तरीके से केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने मीडिया में बने रहने के तरीके ढूंढ लिए हैं, और मीडिया सायास या अनायास इनके हाथों का खिलौना बनती जा रही है, वो खतरनाक है।

लेखक हरीश चंद्र बर्णवाल लंबे समय से मुकेश अंबानी के न्यूज चैनल आईबीएन7 में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. हरीश से संपर्क hcburnwal@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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जूते तो केजरीवाल पर फेंके गए लेकिन पिट गए दर्जनभर से भी ज़्यादा न्यूज़ चैनल

Vineet Kumar : जूते तो केजरीवाल पर फेंके गए लेकिन पिट गए दर्जनभर से भी ज़्यादा न्यूज़ चैनल. एक भी चैनल के पास जूते फेंकनेवाले की फ्रंट से तस्वीर नहीं है. साभार, इंडियन एक्सप्रेस लिखकर तस्वीर इस्तेमाल करनी पड़ रही है. आप सोचिये, न्यूज़ चैनलों के पल-पल की खबर, सबसे तेज जैसे दावे कितने खोखले हैं. लाइव में भी प्रिंट से साभार कंटेंट इस्तेमाल करने की ज़रुरत पड़ जाए, न्यूज़ चैनल के लिए इससे ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है? अब लूप की दालमखनी इसी फ्रंट स्टिल के बूते बन रही है..

Mukesh Kumar : पहले उन्हें केजरीवाल के नाम से ही चिढ़ रहती थी। उनका ज़िक्र आते ही मुँह कसैला हो जाता था। उन्हें लगता था कि एक टुटपुंजिया उनके साहब को चुनौती देता रहता है। इसके बाद अब कन्हैया आ गया है। उसके नाम से भी वह उसी तरह चिढते हैं। उसी तरह गरियाते रहते हैं, खोज-खोजकर दोष गिनाते रहते हैं। लेकिन फिर भी दोनों सरपट आगे बढ़े चले जा रहे हैं। अब खिसियाया आदमी जूता नहीं फेंकेगा या फिंकवाएगा तो क्या करेगा? हाँ, कभी-कभी स्याही भी फेंक देता है-फॉर ए चेंज।

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर जब जब कोई जूता, थप्पड़ या स्याही का प्रहार होता है, तो कई ओर से करतल ध्वनि गूँज उठती है, मानो केजरीवाल ही देश की राजनीति के सबसे बड़े विलेन हों. दरअसल यह संकेत है कि देश की राजनीति किस तरह कलुषित हो चुकी है. ताम झाम से यथासंभव दूर रह, अपने वायदों की कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करता हुया एक राजपुरुष, किस तरह चौतरफा असह्य हो जाता है, इसका भी सबूत केजरीवाल हैं. उन्होंने राजनीति के गतानुगतिक प्रवाह के विरुद्ध तैरने का बीड़ा उठाया है, तो ये सारी आपदाएं उन्हें झेलनी ही हैं, लेकिन ध्यान रहे कि केजरीवाल पर उछलने वाला हर जूता लोक उन्मुख राजनीति की पवित्र शुरुआत पर उछल रहा है. केजरीवाल की परम्परा नष्ट हुयी, तो राजनीति में जूता, स्याही, पत्थर और डंडे की भाषा ही प्रमुख होगी.

मीडिया एक्टिविस्ट विनीत कुमार, मुकेश कुमार और राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

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Kejriwal’s Modus Operandi

As I have said many times earlier, Arvind Kejriwal has no solution to the real problems facing the people—massive poverty, unemployment, malnourishment, price rise, lack of healthcare, etc. And yet he must be seen to be doing something to grab the headlines and restore his popularity ( which was rapidly sinking after the initial euphoria).

So the method he has adopted is this : he starts a scheme, which is really a stunt, and people of Delhi ( who are mostly a bunch of gullible, emotional fools ), will initially clap loudly and follow him, like the children following the Pied Piper of Hamelin. Examples are car free day, going on bicycle, lokpal ( which some call Jokepal ), etc. Later, when the shine and glimmer start wearing off, and people see through the realities and start facing the difficulties caused by the scheme, and opposition to it begins, he abandons it and starts a new scheme ( i.e. a new stunt ) and the same rigmarole and drama begins again.

To give the latest example, the Delhiites, who had initially supported the harebrained odd even scheme, thinking it to be the panacea for their problem of air pollution, are now realizing the immense hardships it is causing, with no significant drop in the air pollution. So opposition to the scheme was growing day by day.

Realizing this, our Sapnon ka Saudagar has abandoned the scheme and started a new headline grabbing stunt. He has announced the end of the management quota in admissions to private nursery schools. The people of Delhi will again clap, praise their hero and shout ‘ Sieg Heil ‘ for their Superman, just as Germans did in the 1930s. All this will of course be widely projected by our TRP driven media. But after some time the truth will dawn on them.  Private institutions run for profits, not for charity. So the private nurseries may follow the new rules for a short while, but obviously not for long.

Also, if a Minister, Judge, bureaucrat, police officer, income tax official, municipal official, etc asks for an admission, can the school manager decline ? If he does,he is likely to face a lot of harassment. So in no time the management will find out a way of subverting the scheme, and it will remain on paper only. Then Mr. Kejriwal will forget it and begin some other gimmick or caper. He will keep hopping from stunt to stunt, thinking that in this way the people can be deceived for ever.

जाने माने न्यायाधीश रहे जस्टिस Markandey Katju के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल और उनके सम-विषम की असलियत बता रहे हैं जस्टिस काटजू

The Truth about the Odd Even Scheme

By Justice Katju

AAP had won a landslide victory in the Delhi elections in Februaary, 2015, because people were disgusted with the other parties, and wanted a radical change. Kejriwal had projected himself as an epitome of honesty, a modern Moses, a Superman (as Modi had done earlier) who will lead Delhi into a land of milk and honey. Later, his popularity started to rapidly decline as people started seeing the reality. There is really nothing in the man, he has no solutions to the real problems facing the people— massive poverty, unemployment, malnourishment, lack of healthcare and good education, farmers suicides, etc.

Also people were disillusioned by his dictatorial mentality when he sacked unceremoniously the co-founders of AAP and surrounded himself with chamchas and yes men ( his Sancho Panzas), allocated Rs. 536 crores (21 times last years budget allocation) for his self promoting ads, increased salaries of MLAs manifold, etc. I received many fb messages from his erstwhile ardent supporters who said they were now totally disillusioned by AAP.

Seeing his popularity decline steeply he has now resorted to headline grabbing stunts and gimmicks ( projected by our TRP driven media ) like car free day, going on a bicycle, lokpal (which many people called jokepal), and now the odd even scheme. Unfortunately most people of Delhi, as elsewhere, are gullible, emotional people, and like children following the Pied Piper of Hamelin dutifully follow any Sapnon ka Saudagar, the way at one time they followed that buffoon Anna Hazare who used to shout ” Bharat Mata ki Jai, Inquilab Zindabad and Vande Mataram “: from Ram Lila ground, and people danced like monkeys at the tune of the madaari.

But this will not last long. Public opinion is fickle, like the Roman mob at Caesar’s funeral, which was earlier against Caesar, but changed its attitude after one short speech of Mark Antony (see Shakespeare’s ‘Julius Caesar’). The Kejriwal bubble will sooner or later burst, like a Ponzi scheme. In a few days time the same people who are cheering Kejriwal will start cursing him. In the first few days of the odd even scheme Delhiites were enthusiastically supporting it, but now they are following it out of fear of being challaaned.

But how long can this last? The Delhi High Court has already voiced its concern about the enormous difficulties being faced by Delhiites due to the scheme. People have to go for work every day. For instance, a lawyer has to go to Court every day, not just on odd or even days. Similarly, doctors, other professionals, office goers, shopkeepers, etc have to go to work daily. And as regards the public transportation system, let me tell you that in London one has to walk for only 5-10 minutes from any place to reach a metro station, but in Delhi in several places one has to take a taxi to reach a metro station. And the metros are over crowded.

As regards pollution in Delhi, it has not gone down, as reports from BBC, The Hindu newspaper, IIT, Kanpur, etc indicate. In fact the IIT report says that only 1% of the total air pollution is due to cars, the rest is due to two wheelers, dust, industrial pollution, burning of fodder by farmers in Haryana etc. So the scheme will be abandoned after 2 weeks (though no doubt after declaring it a grand success!), as it will become dangerous to continue it any further due to public hostility and anger. Thereafter Mr. Kejriwal will look for some other stunt or caper.

लेखक जस्टिस मार्कंडेय काटजू देश के जाने माने न्यायाधीश रहे हैं और अपनी बेबाक बयानी व बेबाक लेखनी के लिए जाने जाते हैं.

जस्टिस काटजू का लिखा इसे भी पढ़ें>

भाजपा और कांग्रेस दोनों अपराधी पार्टियां : जस्टिस काटजू

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वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा ने यह गंभीर आरोप मोदी पर लगाया या केजरीवाल पर, पढ़िए और बूझिए

Deepak Sharma : ब्रांड चाहे एक करोड़ की मर्सीडीज़ बेंज हो या 4 रूपए का विमल गुटखा , बाज़ार में बिकने के लिए उसे बाज़ार के उसूल स्वीकार करने ही होंगे. उसे लोगों के हाथ अगर बिकना है तो बाज़ार में दिखना होगा. मार्केटिंग के ये नियम कोका कोला ने बाज़ार में आज से कोई 129 साल पहले तय कर दिए थे. कोका कोला ने दुनिया को तब पहली बार बताया था कि बाज़ार में होने से कहीं ज्यादा बाज़ार में दिखना ज़रूरी है. दिखेंगे तो ब्रांड बनेंगे. ब्रांड बनेगे तो खुद ब खुद बिकेंगे.

ब्रांड निश्चित तौर पर कोई उत्पाद हो सकता है. पर ब्रांड किसी फिल्म का हीरो भी हो सकता है. ब्रांड किसी पेशेवर खेल का खिलाडी भी हो सकता है. ब्रांड कोई आर्किटेक्ट हो सकता है. डिज़ाइनर हो सकता है. क्यूंकि ये सभी लोग एक प्रोडक्ट के तरह बाज़ार से जुड़े हैं. अगर बाज़ार है तो हीरो की फिल्म है. अगर रियल एस्टेट है तो आर्किटेक्ट है.

लेकिन क्या ब्रांड नेता भी हो सकता है ? जिसे गरीबी की अंतिम पंक्ति में खड़े सबसे गरीब के दर्द को महसूस करना है. जिसे कटे हुए शीश वापस लाने है ? क्या ऐसा नेता भी ब्रांड हो सकता है ? जिसे सरकारी कार नही चाहिए ? जिसे सिर्फ दो कमरे का मकान चाहिए ? क्या ऐसा नेता भी ब्रांड हो सकता है.

कंफ्यूज मत हो जाईये …मे किसी एक नेता की बात नही कर रहा. मै तो एक आम सवाल उठा रहा हूँ की क्या नेता ब्रांड हो सकता है ? वो नेता जो कहता है की उसे खरीदने वाला पैदा नही हुआ है ? लेकिन वही नेता रोज़ आपके पैसों से ही खुद को बेच रहा है ? टीवी पर. रेडियो पर. अखबार पर. दीवार पर. होर्डिंग पर. १०००० हज़ार रूपए प्रति दस सेकंड के रेट पर. १०००० हज़ार रूपए प्रति सेंटीमीटर की दर पर.

और सच तो ये है कि आज जितना कोकाकोला का विज्ञापन नहीं दिखता उतना आपका नेता दिखता है. दरअसल कोका कोला को ब्रांडिंग के लिए कम्पनी से पैसे भरने होते हैं लेकिन नेताजी की ब्रांडिंग नेता की जेब से नहीं होती. मित्रों…सोचियेगा….आपका पसंदीदा ब्रांड जो भी हो पर सोचियेगा. क्या नेता ब्रांड है, उत्पाद है ..बाज़ार है?

आजतक में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके और इन दिनों इंडिया संवाद नामक पोर्टल संचालित कर रहे पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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छप्पन इंच का लिजलिजा सीना और केजरीवाल का हिम्मत भरा प्रयोग

Sanjaya Kumar Singh : 56 ईंची का लिजलिजा सीना… नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से सूचना के सामान्य स्रोतों और परंपरागत तरीकों को बंद करके सेल्फी पत्रकारिता और मन की बात जैसी रिपोर्टिंग शुरू की है। प्रधानमंत्री विदेशी दौरों में पत्रकारों को अपने साथ विमान में भर या ढो कर नहीं ले जाते हैं इसका ढिंढोरा (गैर सरकारी प्रचारकों द्वारा ही सही) खूब पीटा गया पर रिपोर्टर नहीं जाएंगे तो खबरें कौन भेजेगा और भेजता रहा यह नहीं बताया गया। प्रचार यह किया गया कि ज्यादा पत्रकारों को नहीं ले जाने से प्रधानमंत्री की यात्रा का खर्च कम हो गया है लेकिन यह नहीं बताया गया कि कितना कम हुआ? किस मद में हुआ? क्योंकि, विमान तो वैसे ही जा रहे हैं, अब सीटें खाली रह रही होंगी। जो जानकारी वेबसाइट पर होनी चाहिए वह भी नहीं है। कुल मिलाकर, सरकार का जनता से संवाद नहीं है।

प्रधानमंत्री भले दावा करें कि वे गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले से सोशल मीडिया पर ऐक्टिव हैं पर यह नहीं बताते कि उस समय कौन सी मीडिया पर ऐक्टिव थे। एकतरफा संवाद चल रहा है। जवाब वो देते नहीं सिर्फ मन की बात करते हैं। औचक भौचक लाहौर की यात्रा कर आए लेकिन उससे देश का क्या भला हुआ या होने की उम्मीद है इस बारे में कुछ बताया नहीं गया और पठानकोट हो गया। इसमें कोई शक नहीं कि पहले मामले को दबाने और कम करने के साथ-साथ लापरवाहियों को छिपाने की कोशिश की गई। अभी भी कोई अधिकृत खबर नहीं आ रही है और मीडिया ने मुंबई हमले के समय जो जैसी रिपोर्टिंग की थी वैसे ही कर रही है।

ना मीडिया को जनता या देश या मुश्किल में फंसे लोगों की चिन्ता है और ना सरकार में उनकी भलाई की ईच्छा शक्ति। नुकसान कम या मामूली है यह बताने की कोशिश हर कोई कर रहा है। सरकारें अमूमन ऐसी ही होती हैं। इस सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं करता अगर ये लव लेटर लिखने का मजाक उड़ाकर सत्ता में नहीं आए होते। पर लव लेटर लिखने वाले उतना तो कर रहे थे तुमसे तो जिसपर लव लेटर लिखना बनता है उधर गर्दन नहीं घुमाई जा रही। 56 ईंची सीना इतना लिजलिजा हो सकता है यह अंदाजा किसी को नहीं था। बात सिर्फ पठानकोट या पाकिस्तान पर हमला करने या उससे निपटने की नहीं है। आप तो अरविन्द केजरीवाल को हैंडल नहीं कर पा रहे हैं। आरोप लगा दिया कि ऑड ईवन फार्मूला भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए है और पर्दा डालने के लिए नजीब जंग को छोड़ दिया। वो भी ऐसे कि खुद को छूट मिल गई तो ऑड ईवन में जनता की याद नहीं आई पर दिल्ली सरकार डीडीसीए की जांच नहीं कर सकती है।

दिल्ली सरकार पूरी दिल्ली को (उपराज्यपाल और केंद्रीय मंत्रियों को छोड़ दे तो) नचा सकती है लेकिन डीडीसीए के घोटाले की जांच नहीं कर सकती (क्योंकि घोटाला तब हुआ तब भाजपा का असरदार नेता उसका अध्यक्ष था)। गैर सरकारी प्रचारक ये बताने में लगे हैं कि आज मेट्रो में बहुत भीड़ है। जो मेट्रो से नहीं चलता है वो जानता है कि बहुत भीड़ होती है। फोटो देखता रहा है और जो चलता है उसे पता है शुरू से हो रही है। फिर भी।

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यह प्रयोग गैर जरूरी नहीं है… दिल्ली में ऑड ईवन फॉर्मूला के बारे में आप जो चाहें कहने और राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं (भाषा की शालीनता उसे गंभीर बनाती है) और मैं इस स्वतंत्रता का घनघोर समर्थक हूं। पर केजरीवाल जो कर रहे हैं वह प्रयोग है, शुरू से। कहा था कि जनता अगर नहीं चाहेगी तो इसे लागू नहीं किया जा सकता है और दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट कर दिया था कि स्वयंसेवी लोगों को रोक नहीं सकेंगे। फिर भी ऑड-ईवन चल रहा है तो इसलिए कि इसे जनता का समर्थन है। हो सकता है विरोधी फेस बुक पर ही हों या फिर 2000 रुपए के जुर्माने या किसी और कारण से [इसमें सरकार विरोधी, (मोटे तौर पर भक्त) कहलाना शामिल है] मेट्रो में यात्रा कर रहे हों। कुछेक भक्त समझते हैं कि सत्ता चाटुकार या भक्त ही बनाती है पर सच यह है कि सत्ता के समर्थक और विरोधी होते ही हैं। ऐसे में, दिल्ली में प्रदूषण के मद्देनजर यह प्रयोग लाजमी हो ना हो, गैर जरूरी नहीं है।

इसके बावजूद केजरीवाल सरकार ने यह जोखिम उठाया है तो वह इसके विरोध के लिए तैयार होगी ही। लेकिन तथ्य यह है कि अमूमन सरकारें ऐसा जोखिम भी नहीं उठातीं। केजरीवाल को ड्रामा करना होता तो एलजी और केंद्रीय मंत्रियों को भी इसके दायरे में ले आते और अपने एलजी साब कहां पीछे रहने वाले थे। पर ऐसा नहीं करके उन्होंने यह प्रयोग करने का निर्णय किया है। शुरू के तीन दिन ठीक-ठाक गुजर जाने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि आज कुछ हो जाएगा पर अभी तक सब ठीक ही लगता है। विरोधी भी अभी तक यही कह रहे हैं कि मेट्रो में भीड़ बहुत ज्यादा है। सड़क पर आम सोमवार के मुकाबले ट्रैफिक बहुत कम है इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है। अगर ऐसा है तो मेट्रो में भीड़ नियंत्रित करने के उपाय करने होंगे, किए जा सकते हैं। कर दिए जाएंगे।

मेट्रो से चलने वालों या अपनी गाड़ी छोड़कर जाने वालों को कैसी क्या दिक्कत हुई यह अभी पता नहीं चला है। अभी सिर्फ फोटुएं ही आई हीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कहा है कि 15 तारीख के बाद इसपर विचार करके आगे की योजना बनाई जाएगी। अपने बारे में खुद उन्होंने सुबह ही रेडियो पर कहा था कि वे दो अन्य मंत्रियों के साथ उनकी नैनो कार से दफ्तर जाएंगे। आरोप लगाने और मजाक उड़ाने के लिए कुछ भी कहा जा सकता है।

स्कूल बसों की तरह ऑफिस बसें क्यों नहीं? सम-विषम का फार्मूला लोगों को जागरूक करने के लिए तो ठीक है। कार पूलिंग के लिए प्रेरित करने के लिए भी ठीक है। अपील करने के लिए भी अच्छा है। पर जबरदस्ती लागू करने के लिए ठीक नहीं है। अभी स्थिति यह है कि जिसके पास एक गाड़ी है वह दूसरी खरीदने की सोच रहा है और जिसके पास नहीं है उसे लिफ्ट मिलने की संभावना आधी रह गई है या उससे भी कम क्योंकि वह पूलिंग वाले साथियों को प्राथमिकता देगा। बगैर सार्वजनिक परिवहन को ठीक और दुरुस्त किए कोई भी पाबंदी लगाई जाए गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी, घटेगी नहीं। और भारत में सार्वजनिक परिवहन को ऐसा बनाना कि कार वाले उसमें (स्वेच्छा से) चलने लगें, दुरुह है।

दिल्ली में प्रदूषण का कारण पड़ोसी राज्यों से रोज आने और वापस चले जाने वाले वाहनों की बड़ी संख्या भी होती है। ऑड ईवन में इनके मामले में भी वही व्यवहार होगा पर गाजियाबाद, गुड़गांव, नोएडा और फरीदाबाद में चलने वाली गाड़ियां अपने इलाके में जो प्रदूषण फैलाती हैं उसका असर क्या दिल्ली नहीं पहुंचेगा? ऐसे में सिर्फ दिल्ली वालों से उम्मीद करना उनके साथ ज्यादती भी है। जहां तक सड़कों पर गाड़ियों के कारण प्रदूषण का सवाल है, मेट्रो चलने के बाद बहुत सारे लोग वैसे ही गाड़ी और मोटर साइकिलों से दफ्तर नहीं जाते हैं और इसका पता मेट्रो स्टेशन पर खड़ी गाड़ियों से लगता है। ज्यादातर मेट्रो स्टेशन पर पार्किंग की जगह कम पड़ जाती है। और भी लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें इसके लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर करना होगा।

कार से दफ्तर जाने वाले के लिए मेट्रो से दफ्तर जाना मुश्किल ही नहीं कई मामलों में असंभव भी है। हर कोई खड़े होकर यात्रा नहीं कर सकता। बाकी पार्किंग से प्लैटफॉर्म तक पहुंचना भी आसान नहीं है। इतनी परेशानी के बाद जो प्रदूषण कम होगा वह किसी मंत्री या लाट साब की सरकारी गाड़ी किसी भी क्षण पूरा कर देगी। अगर वाकई सड़क पर गाड़ियां कम करनी है तो स्कूल बसों की तरह ऑफिस बसें (गाड़ियां) चलाई जानी चाहिए। हालांकि, बहुत सारे अभिभावक भिन्न कारणों से बच्चों को भी कार से स्कूल छुड़वाते हैं। इसके कारण देखते हुए ऐसे उपाय किए जाने चाहिए कि ऐसी गाड़ियों का बंदोबस्त किया जाए जो लोगों को घर से ले जाए और वापस घर छोड़े समय से, आराम से। यह काम ऑफिस वाले भी कर सकते हैं और कर्मचारी भी आपसी सहयोग से कर सकते हैं। रोज गाड़ी से दफ्तर जाने वालों के लिए इससे कम कोई उपाय उन्हें मजबूर करना है। कभी-कभी जाने वालों या जिसके पास कार खरीदने के पैसे ही ना हों उसकी बात अलग है। प्रदूषण के प्रति लोगों को जागरूक और प्रेरित करने का लाभ यह हो कि लोग मोहल्ले के बाजार तक पैदल जाने लगें, मेट्रो स्टेशन तक पैदल चले जाएं – वह भी कम नहीं होगा और भीड़-भाड़ भी काफी कम हो जाएगी।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने अनुवादक हैं. उनका ये लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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जा जा रे केजरिया… तू तो एहसासे करा दिए हम गरीबों को कि हम सब ब्लडी गरीब टाइप लोग भेरी भेरी गरीब हैं

Yashwant Singh : कृपया कोई दिल्ला वाला आपाई विशेषज्ञ मेरी इस भड़ास का जवाब दे…

मेरी मारुति अल्टो कार छह सात साल पुरानी है… इसके अलावा मेरे पास कोई दूसरी कार या बाइक या साइकिल नहीं है… मेरी कार का आखिरी अंक 7 पड़ता है. परसों दो तारीख को सिनेमा जाने का प्लान है.. फिर घूमने का… तो क्या मैं परसों बच्चों को कार पर बिठाकर सिनेमा दिखाकर उसके बाद इंडिया गेट घुमाने ले जा सकता हूं… या कार को घर पर धो पोंछकर रखें और हम चार पांच जच्चा बच्चा युक्त सकल परिवार मम पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ठुंसियाने को मजबूर होवें?

हालांकि ये सब लिखते पूछते हुए दिल कचोट रहा है कि साले केजरिया सिसोदिया ये सब के सब पूरा गैंग अपने अपने कार में या अपने धनपशु चेलों की कार से सवारी करेंगे … बेटा बौड़मनाथ.. ज्यादा कुछ करने के चक्कर में अपने ही पिछवाड़े फच्चर मार रहे हो… चिरकुटानंद, तुम ये सम विषम करके हम जैसे गरीबों को ही पैदल कर दिए.. धनपशुए साले तो दूसरी कार खरीद लेंगे…

ऐसा कोई बता रहा था कि कार लॉबी से अच्छा खासा माल लेकर यह केजरिया सम विषम का नाटक फैला रहा है.. प्रदूषण व्रदूषण तो वैसे ही दिखावा है जैसे विकास के नाम पर लंबा माल नेता लोग पेलते हैं…

अबे प्रदूषण भगाना था तो पूरी दिल्ली वालों के लिए महीने में चार पांच रोज कार फ्री डे कर देते… कोई एक दिन साइकिल डे कर देते सभी के लिए अनिवार्य… पर ये क्या, गरीब पैदल होगा और अमीर साला बदल बदल कर कार से चलेगा…

जा जा रे केजरिया… नकिए कटवा देहले रे… बड़ा परचार किए रहे तोहार चुनाव और उससे पहले.. लेकिन अब तो भले भजप्पा या कांग्रेस आ जाए… तोहरे हरावे के बा बेटा… तू तो एहसासे करा दिए हम गरीबों को कि हम सब ब्लडी गरीब टाइप लोग भेरी भेरी गरीब हैं क्योंकि हमारे पास सम विषम हिसाब से दिल्ली में दो दो कार खरीदने रखने की औकात नहीं है… हम नदीम भाई के लिक्खे से सहमत हैं, जिसका लिंक नीचे कमेंट बाक्स में दे रहा हूं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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odd-even : केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा नहीं देखा…

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odd-even : केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा नहीं देखा…

Nadim S. Akhter :  अरविन्द केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा ने नहीं देखा, जिसन वाहवाही बटोरने के चक्कर में बिना सोचे-समझे पूरी जनता को odd-even की खाई में धकेल दिया। पहले से ही मरणासन्न दिल्ली का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम इतनी बड़ी आबादी के सफ़र को कैसे झेलेगी, इस पर एक पल भी नहीं सोचा। ऊपर से ये महामूर्ख मुख्यमंत्री स्कूल में बच्चों के बीच जाकर कह रहे हैं कि बेटे, अपने मम्मी-पाप को इस नियम का पालन करने की सीख देना, उनसे जिद करना। लेकिन ये नहीं बता रहे कि जब टाइम से ऑफिस न पहुचने पे पापा की सैलरी कटेगी और ऑटो लेकर जाने में उनकी जेब से दोगुने नोट ढीले होंगे, घर का बजट बिगड़ेगा, तो पापा घर कैसे चलाएंगे?

केजरीवाल नमक इस मूर्खाधिराज को तो ये भी नहीं मालूम कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण सड़को पे उड़ रही धूल से है, गाड़ियों से नहीं। गाड़ियां बैन करने से पहले अगर उन्होंनेे दिल्ली की टूटी-फूटी सड़कें ही बनवा दी होती तो प्रदूषण का लेवल काफी कम हो गया होता। ऊपर से ये अदूरदर्शी आदमी ये कहता है कि मैं तो अपने मंत्रियों के साथ कार पूलिंग कर लूंगा जी, आप भी कर लो। लेकिन ये नहीं बताता कि आम आदमी कार पूल करने के लिए ममुहल्ले में कहां कहाँ भटकेगा, जब एक पडोसी नौकरी-दुकान के लिए नोएडा जाता हो और दूसरा गुड़गांव, और उसे खुद कहीं और जाना हो।

भारत के चीफ जस्टिस तो सुप्रीम कोर्ट तक अपने साथी जजों के साथ कार पूलिंग कर लेंगे, अकर्मण्य मुख्यमंत्री केजरीवाल तो साथी मंत्रियों के साथ एक ही ऑफिस तक चले जायेंगे, आम जनता कहाँ जायेगी!!! आम आदमी के नाम पे सत्ता पाने वाले इस नौटंकीबाज मुख्यमंत्री ने अपने इस फैसले से उस mango people को भी भारी मुसीबत में डाल दिया है, जिसके पास न तो कार है और न स्विमिंग पूल और न ही उसे कार पूलिंग का मतलब ही समझ आता है। वो तो रोज डीटीसी बसों और मेट्रो से कमाने निकलता है। सो जब मेट्रो और बसों में लोग ठसाठस ठूंसे जायेंगे, तो बेचारे उस गरीब का कचूमर निकलना तय है।

शर्त लगा लीजिये कि अगर आज दिल्ली में चुनाव हों तो इस केजरीवाल एंड कंपनी वाली आम आदमी पार्टी को आम जनता जड़ से उखाड़ कर फेंक देगी, जनता में इतना गुस्सा है। ‘ना बंगला लूंगा और न गाड़ी लूंगा जी’ की बात कहने वाला ये मुख्यमंत्री आज सब सुख भोग रहा है। हाँ, जनता की गाड़ी छीनने में इसने कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदूषण तो बहाना है, असल मकसद केजरीवाल को अपनी राजनीति चमकाना है।

केजरीवाल की पोल तो उसी दिन खुल गई, जब उन्होंने odd-even की आग में आम आदमी को तो झोंक दिया लेकिन vip culture ख़त्म करने की बात कहने वाले इस पूर्व तथाकथित आंदोलनकारी ने दिल्ली के सारे वीआईपीज को इससे छूट दे दी। यानि आम आदमी सड़क पे धक्के खाये और नेता-मंत्री-जज-राज्यपाल मिलकर मौज काटें। मानो उनकी कार से प्रदूषण का धुआं नहीं, ऑक्सीजन गैस निकलती है।

कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल पर निशाना साध प्रशांत भूषण ने काटजू के तर्क को गलत बताया तो जवाब में काटजू ने लिखा लंबा चौड़ा मेल…

Markandey Katju : Mr. Shanti Bhushan’s response to my article in scroll.in in which I said that the Delhi Govt. is a state, and is empowered to constitute a Commission of Inquiry. I have taken his permission to post his email to me…

Justice Katju is totally wrong

Delhi being the capital of India, having the embassies of the entire world located therein, the President of India, the Parliament of India, the Prime Minister, the entire cabinet, etc. it could not belong to the people of Delhi only. It belongs to the people of the whole country.It is the govt elected by the people of the entire country who have to administer Delhi.

This is the reason for enacting Art 239 AA (7) empowering Parliament to enact a law for supplementing the provisions of Part VIII which could even go to the extent of amending that Part .In Fact this power was exercised by the Parliament by enacting the Administration of the National Territory Act.

A look at the provisions of this Act would show that neither the Delhi govt nor even the Delhi Legislative Assembly have been given any real powers.Their function even on subjects not excluded from their jurisdiction is only to assist the Central Govt through its representative the Lt Governor. All powers are rightly with the Central Govt alone.Any exercise of legislative power or executive power requires the approval of the Lt Governor.

It may hurt the ego of Arvind Kejriwal but the constitutional position is that he is only a Chief Minister in name but is effectively only a subordinate officer of the Lt Governor. His role as CM is only ceremonial.

xxx

Markandey Katju : My reply to Mr. Shanti Bhushan..

Dear Shanti Bhushanji,

I have read your email. So according to you Delhi voters wasted their time and money voting for a ceremonial body, and you made a substantial financial contribution also to this ceremonial body.

By your logic Delhiites were cheated and deceived into thinking that they were electing a legislative ( not a merely administrative ) body, and the only authority in Delhi is the unelected chamcha of the central govt, Najeeb Jung, while elected functionaries are only flowerpots.

I find your logic totally unacceptable in a democratic country.

Except for land, police and public order, the Delhi legislature can legislate, and the Delhi Govt. can deal with, all matters in the State and Concurrent List. But how can they legislate and deal with them if they cannot even inquire into them ? Sports is a matter within entry 33 of the state list, and inquiries are a matter covered by entry 45 of the concurrent list.

Hence a purposive, and not literal interpretation has to be given to the word ‘state’ in section 3 of the Commissions of Inquiry Act, 1952. Several decisions of the Indian Supreme Court, as well as English Courts, have adopted the purposive approach.

You write :

” A look at the provisions of this Act would show that neither the Delhi govt nor even the Delhi Legislative Assembly have been given any real powers.Their function even on subjects not excluded from their jurisdiction is only to assist the Central Govt through its representative the Lt Governor. All powers are rightly with the central govt alone “

So according to you, the Delhi C.M. other Delhi Ministers, and MLAs are only civil servants who are subordinate to the Central Govt. and their job is only to assist the Central Govt. With respect, I find this a strange logic.. If your statement is accepted, Article 239AA becomes redundant, and Delhi reverts to becoming a purely administrative unit.

Your reference to Article 239AA(7) is totally misplaced. That provision reads :
” (a) Parliament may, by law, make provisions for giving effect to, or supplementing provisions contained in the foregoing clauses and for all matter incidental or consequential thereto .

(b) Any such law as is referred to in sub-clause (a) shall not be deemed to be an amendment of this constitution for the purposes of article 368 not withstanding that it contains any provision which amends or has the effect of amending this constitution. “

A perusal of the above shows that it only empowers Parliament to make supplementary, incidental or consequential laws. It does not derogate from the legislative powers of the Delhi Legislature on matters on which it is competent to legislate.

I may mention that by virtue of Articles 249 and 250 of the Constitution in some situations Parliament can legislate on matters covered by the state list.
Regards

Markandey Katju

फेसबुक से.

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भक्तों की भाषा पर वर्षों चुप-शांत रहे अरुण जेटली अब केजरीवाल को भाषा संबंधी सीख दे रहे हैं

Sanjaya Kumar Singh : अरुण जेटली का महत्त्व… लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जब नरेन्द्र मोदी अनोखे और बाद में जुमले घोषित किए जा चुके दावे कर रहे थे तो पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि नरेन्द्र मोदी का आर्थिक ज्ञान रसीदी टिकट के पीछे लिखे जाने भर है। नरेन्द्र मोदी ने यह कहकर इसका जवाब दिया था कि वे जानकारों के सहयोग से सरकार चलाएंगे। ऐसे में वित्त मंत्री कौन होता है यह महत्त्वपूर्ण था और जब अरुण जेटली का नाम सार्वजनिक हो गया तो समझ में आ गया कि राजा की जान किस तोते में है।

यह तो मालूम ही था कि अरुण जेटली को अमृतसर से मशहूर क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू की जगह टिकट दिया गया था और वे कांग्रेस के अमरेन्द्र सिंह से चुनाव हार गए थे। फिर भी मंत्री बने तो उनका महत्त्व नहीं समझने वाला राजनीति का कोई नवसिखुआ ही होगा। इसलिए, कीर्ति आजाद ने जब डीडीसीए के मामले में ही सही, अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोल लिया तो मामला गंभीर होना ही था। कीर्ति आजाद ने अपनी ओर से सावधानी बरती भी लेकिन कीर्ति के खुलासे का लाभ उठाने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपना हिसाब बराबर करने की कोशिश में अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के नेताओं ने अरुण जेटली को अपनी सहिष्णुता दिखाने का मौका दिखा और उन्होंने उसकी कीमत 10 करोड़ रुपए लगाई।

भक्तों की भाषा पर वर्षों चुप और शांत रहे अरुण जेटली अब अरविन्द केजरीवाल को भाषा संबंधी सीख दे रहे हैं (वे कह रहे हैं कि अरविन्द मुख्यमंत्री हैं उसका ख्याल उन्हें रखना चाहिए बाकी लोगों की बात अलग है) पर यह अलग मुद्दा है। जेटली के महत्त्व का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि मानहानि के मामले में जब वे बयान दर्ज करवाने अदालत पहुंचे तो उनके साथ केंद्रीय मंत्री स्‍मृति ईरानी और पीयूष गोयल भी थे। जेटली के अदालत पहुंचने से पहले उनके समर्थक कोर्ट के बाहर मौजूद रहकर नारेबाजी करते रहे। पटियाला हाउस कोर्ट में इस पर 5 जनवरी को सुनवाई होगी।

खास बात यह रही कि जेटली ने कीर्ति आज़ाद के खिलाफ केस दर्ज नहीं किया है। उधर, भारतीय जनता पार्टी ने अरुण जेटली के महत्त्व को समझते हुए, कीर्ति आजाद को पार्टी से निलंबित कर दिया है। अब कीर्ति का पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से यह पूछना जायज है (जब जेटली को उनसे कोई शिकायत ही नहीं है, होती तो उनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराते) कि उन्हें उनका अपराध बताया जाए। यही नहीं, जेटली की ओर से दायर आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ इस मुकदमे में आम आदमी पार्टी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी पेश होंगे।

कुल मिलाकर, स्थितियां ऐसी बनीं हैं जैसे कांग्रेस की जान अगर सोनिया गांधी और राहुल गांधी में है तो केंद्र की मौजूदा सरकार की जान अरुण जेटली में है। इससे सुब्रह्मणियम स्वामी से बेहतर कौन समझेगा। सो वे कीर्ति आजाद के साथ है। और सुना है डीडीसीए के मामले में कीर्ति भी अदालत में मुकदमा दायर करेंगे (दोनों मामलों में समानता यह है कि आरोप पुराने हैं, सरकार जांच करा चुकी है, कुछ नहीं मिला है। पर जेटली को हेरल्ड मामले में और कीर्ति को डीडीसीए मामले में हुई जांच से संतोष नहीं है और जैसे स्वामी ने नेशनल हेरल्ड मामले में किया है वैसे ही वे डीडीसीए मामले में करने वाले हैं)।

रही सही कसर दिल्ली के अजीब लाटसाब नजीब जंग ने पूरी कर दी है। डीडीसीए के इस मामले में वे अरविन्द केजरीवाल की जांच कराने की कोशिशों में हमेशा की तरह अड़ंगा लगाने का अपने कर्तव्य उम्मीद के अनुसार पूरी लगन से निभा रहे हैं। और ऐसे में ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ वाली पार्टी जिसे ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ भी कहा जाता है का नया कदम देखने लायक होगा। ‘कोऊ नृप हों हमें का हानि’ – में विश्वास करने वाले सभी लोगों को मुफ्त का यह मनोरंजन मुबारक। उम्मीद है, सिर्फ मुनाफा पहुंचाने वाली मुफ्त की खबरों से टीआरपी बटोरने और टाइमपास करने को मजबूर सेल्फी मीडिया को भी इस मामले से पर्याप्त मसाला मिलेगा।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली की केजरी सरकार ने मीडियाकर्मियों के हित में उठाया बड़ा कदम, श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम में संशोधन हेतु बिल पेश किया

नयी दिल्ली : दिल्ली सरकार ने श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक पेश किया जिसमें किसी भी उल्लंघन के लिए एक साल तक की कैद की सजा और 10,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रस्ताव रखा गया है।

दिल्ली विधानसभा में विधेयक पेश करते हुए श्रम मंत्री गोपाल राय ने कहा कि वर्तमान अधिनियम की खामियां पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों के लिए मजीठिया वेतन बोर्ड की कई सिफारिशों के कार्यान्वयन के रास्ते में आ रही हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘श्रमजीवी पत्रकारों और अखबारों के दूसरे कर्मचारियों ने वेतन के भुगतान संबंधी कई मुद्दे उठाए और साथ ही श्रमजीवी पत्रकारों एवं अखबारों के दूसरे कर्मचारियों के लिए उचित वेतन लागू करने की दिशा में सही प्रावधानों की कमी का मुद्दा भी उठाया।’’

श्रमजीवी पत्रकारों एवं दूसरे अखबार कर्मचारियों के लिए अधिनियम (सेवा की स्थिति और विविध प्रावधान : दिल्ली संशोधन अधिनियम 2015) का उद्देश्य उचित मुआवजा उपलब्ध कराना और अधिनियम का पालन ना करने के मामलों में दंडात्मक प्रावधानों को मजबूत करना है।

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मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

इस अंदाज को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कहना चाहा। मोदी सरकार ने अपनाना चाहा। इसी राह को केजरीवाल सरकार कहना चाहती है। अपनाना चाहती है। और, पन्नों को पलटें तो मनमोहन सरकार में भी आखिरी दिनों यही गुमान आ गया था जब वह खुले तौर पर अन्ना आंदोलन के वक्त यह कहने से नहीं चूक रही थी कि चुनाव लड़कर देख लीजिये। अभी हम जीते हैं तो जनता ने हमें वोट दिया है, तो हमारी सुनिये। सिर्फ हम ही सही हैं। हम ही सच कह रहे हैं। क्योंकि जनता को लेकर हम ही जमींदार हैं। यही है पूर्ण ताकत का गुमान। यानी लोकतंत्र के पहरुये के तौर पर अगर कोई भी स्तंभ सत्ता के खिलाफ नजर आयेगा तो सत्ता ही कभी न्याय करेगी तो कभी कार्यपालिका, कभी विधायिका तो कभी मीडिया बन कर अपनी पूर्ण ताकत का एहसास कराने से नहीं चूकेगी। ध्यान दें तो बेहद महीन लकीर समाज के बीच हर संस्थान में संस्थानों के ही अंतर्विरोध की खिंच रही है।

दिल्ली सरकार का कहना है, मानना है कि केन्द्र सरकार उसे ढहाने पर लगी है। बिहार में लालू यादव को इस पर खुली आपत्ति है कि ओवैसी बिहार चुनाव लड़ने आ कैसे गये। नौकरशाही सत्ता की पसंद नापसंदी के बीच जा खड़ी हुई है। केन्द्र में तो खुले तौर पर नौकरशाह पसंद किये जाते हैं या ठिकाने लगा दिये जाते हैं लेकिन राज्यो के हालात भी पसंद के नौकरशाहों को साथ रखने और नापसंद के नौकरशाहों को हाशिये पर ढकेल देने का हो चला है। पुलिसिया मिजाज कैसे किसी सत्ता के लिये काम कर सकता है और ना करे तो कैसे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, यह मुबंई पुलिस कमिश्नर मारिया के तबादले और तबादले की वजह बताने के बाद उसी वजह को नयी नियुक्ति के साथ खारिज करने के तरीको ने बदला दिया। क्योंकि मारिया जिस पद के लाय़क थे वह कमिश्नर का पद नहीं था और जिस पद से लाकर जिसे कमिश्नर बनाया गया वह कमिश्नर बनते ही उसी पद के हो गये, जिसके लिये मारिया को हटाया गया। यानी संस्थानों की गरिमा चाहे गिरे लेकिन सत्ता गरिमा गिराकर ही अपने अनुकूल कैसे बना लेती है, इसका खुला चेहरा पीएमओ और सचिवों को लेकर मोदी मॉडल पर अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की रिपोर्ट बताती है तो यूपी सरकार के नियुक्ति प्रकरण पर इलाहबाद हाईकोर्ट की रोक भी खुला अंदेशा देती है कि राजनीतिक सत्ता पूर्ण ताकत के लिये कैसे मचल रही है। और, इन सभी पर निगरानी अगर स्वच्छंद तौर पत्रकारिता करने लगे तो पहले उसे मीडिया हाउस के अंतर्विरोध तले ध्वस्त किया गया। और फिर मीडिया को मुनाफे के खेल में खड़ा कर बांटने सिलसिला शुरू हुआ। असर इसी का है कि कुछ खास संपादक-रिपोर्टरो के साथ प्रधानमंत्री को डिनर पसंद है और कुछ खास पत्रकारों को दिल्ली सरकार में कई जगह नियुक्त कर सुविधाओं की पोटली केजरीवाल सरकार को खोलना पसंद है।

इसी तर्ज पर क्या यूपी क्या बिहार हर जगह ‘निगाहों में भी मीडिया को और निशाने पर भी मीडिया को’ लेने का खुला खेल हर जगह चलता रहा है। तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया समूहों ने अपनी गरिमा खत्म कर ली है या फिर मुनाफे की भागमभाग में सत्ता ही एकमात्र ठौर हर मीडिया संस्थान का हो चला है। इसलिये जो सत्ता कहे उसके अनुकूल या प्रतिकूल जनता के खिलाफ चले जाना है या फिर सत्ता मीडिया के इसी मुनाफे के खेल का लाभ उठाकर सबकुछ अपने अनुकूल चाहती है। और वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि कोई उस पर निगरानी रखे कि सत्ता का रास्ता सही है या नहीं। इतना ही नहीं सत्ता मुद्दों को लेकर जो परिभाषा गढ़ता है उस परिभाषा पर अंगुली उठाना भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। हिन्दू राष्ट्र भारत कैसे हो सकता है, कहा गया तो सत्ता के माध्यमों ने तुरंत आपको राष्ट्रविरोधी करार दे दिया। अब आप वक्त निकालिये और लड़ते रहिये हिन्दू राष्ट्र को परिभाषित करने में।

इसी के समानांतर कोई दूसरा मीडिया समूह बताने आ जायेगा कि हिन्दू राष्ट्र तो भारतीय रगों में दौड़ता है। अब दो तथ्य ही मीडिया ने परिभाषित किये। जो सत्ता के अनुकूल, उसे सत्ता के तमाम प्रचार तंत्र ने पत्रकारिता करार दिया बाकियों को राष्ट्र विरोधी। इसी तर्ज पर किसी ने विकास का जिक्र किया तो किसी ने ईमानदारी का। अब विकास का मतलब दो जून की रोटी के बाद वाई फाई और बुलेट ट्रेन होगा या बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया ही। तो मीडिया इस पर भी बंट गई। जो सत्ता के साथ खड़ा, वह देश-हित में सोचता है। जो दो जून की रोटी का सवाल खड़ा करता है, वह बिका हुआ है। किसी पत्रकार ने सवाल खड़ा कर दिया कि सौ स्मार्ट सिटी तो छोडिये सिर्फ एक स्मार्ट सिटी बनाकर तो बताईये कि कैसी होगी स्मार्ट सिटी। तो झटके में उसे कांग्रेसी करार दिया गया। किसी ने गांव के बदतर होते हालात का जिक्र किया तो सत्ता ने भोंपू तंत्र बजाकर बताया कि कैसे मीडिया आधुनिक विकास को समझ नहीं पाता। और जब संघ परिवार ने गांव की फिक्र की तो झटके में स्मार्ट गांव का भी जिक्र सरकारी तौर पर हो गया।

इसी लकीर को ईमानदारी के राग के साथ दिल्ली में केजरीवाल सरकार बन गयी तो किसी पत्रकार ने सवाल उठाया कि जनलोकपाल से चले थे लेकिन आपका अपना लोकपाल कहां है तो उस मीडिया समूह को या निरे अकेले पत्रकार को ही अपने विरोधियो से मिला बताकर खारिज कर दिया गया। पांच साल केजरीवाल का नारा लगाने वाली प्रचार कंपनी पायोनियर पब्लिसिटी को ही सत्ता में आने के बाद प्रचार के करोड़ों के ठेके बिना टेंडर निकाले क्यों दे दिये जाते हैं। इसका जिक्र करना भी विरोधियो के हाथों में बिका हुआ करार दिया जाता है। जैन बिल्डर्स को लेकर जब दिल्ली सरकार से तार जोड़ने का कोई प्रयास करता है तो उसे बीजेपी का प्रवक्ता करार देने में भी देर नहीं लगायी जाती। और, इसी दौर में मुनाफे के लिये कोई मीडिया संस्थान सरकार से गलबिहयां करता है या फिर सत्ता नजदीक जाता है कि किसी एक मीडिया संस्थान से गलबहियां कर उससे पत्रकारो के बीच अपनी साख बनाये रखी जाती है तो बकायदा मंच पर बैठकर केजरीवाल यह कहने से नहीं हिचकते कि हम तो आपके साझीदार हैं।

यानी कैसे मीडिया को खारिज कर और पत्रकारों की साख पर हमला कर उसे सत्ता के आगे नतमस्तक किया जाये, यह खेल सत्ता के लिये ऐसा सुहावना हो गया है जिससे लगने यही लगा है कि सत्ता के लिये मीडिया की कैडर है। मीडिया ही मुद्दा है। मीडिया ही सियासी ताकत है और मीडिया ही दुश्मन है। यानी तकनीक के आसरे जन जन तक अगर मीडिया पहुंच सकती है और सत्ता पाने के बाद कोई राजनीतिक पार्टी एयर कंडिशन्ड कमरों से बाहर निकल नहीं सकती तो फिर कार्यकर्ता का काम तो मीडिया बखूबी कर सकती है। और मीडिया का मतलब भी अगर मुनाफा है या कहें कमाई है और सत्ता अलग अलग माध्यमों से यह कमाई कराने में सक्षम है तो फिर दिल्ली में डेंगू हो या प्याज। देश में गांव की बदहाली हो या खाली एकाउंट का झुनझुना लिये 18 करोड़ लोग। या फिर किसी भी प्रदेश में चंद हथेलियों में सिमटता समूचा लाभ हो, उसकी रिपोर्ट करने निकलेगा कौन सा पत्रकार या कौन सा मीडिया समूह चाहेगा कि सत्ता की जड़ों को परखा जाये।

पत्रकारों को ग्राउंड जीरो पर रिपोर्ट करने भेजा जाये तो क्या मौजूदा वक्त एक ऐसे नेक्सस में बंध गया है, जहां सत्ता में आकर सत्ता में बने रहने के लिये लोकतंत्र को ही खत्म कर जनता को यह एहसास कराना है कि लोकतंत्र तो राजनीतिक सत्ता में बसता है। क्योंकि हर पांच बरस बाद जनता वोट से चाहे तो सत्ता बदल सकती है। लेकिन वोटिंग ना तो नौकरशाही को लेकर होती है ना ही न्याय पालिका को लेकर ना ही देश के संवैधानिक संस्थानों को लेकर और ना ही मीडिया को लेकर। तो आखिरी लाइन उन पत्रकारों को धमकी देकर हर सत्ताधारी अपने अपने दायरे में यह कहने से नहीं चूकता की हमें तो जनता ने चुना है। आप सही हैं तो चुनाव लड़ लीजिये। और फिर मीडिया से कोई केजरीवाल की तर्ज पर निकले और कहे कि हम तो राजनीति के कीचड़ में कूदेंगे तभी राजनीति साफ होगी। और जनता को लगेगा कि वाकई यही मौजूदा दौर का अमिताभ बच्चन है। बस हवा उस दिशा में बह जायेगी। यानी लोकतंत्र ताक पर और तानाशाही का नायाब लोकतंत्र सतह पर।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने-माने पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


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(पार्ट एक) क्या वाकई मीडिया की आजादी का बोलने-लिखने से कोई वास्ता है : पुण्य प्रसून बाजपेयी

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(पार्ट दो) सत्ता-मीडिया गठजोड़ सांगठनिक अपराध में तब्दील हो गया : पुण्य प्रसून बाजपेयी

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(पार्ट तीन) मीडिया ने जिस बिजनेस माडल को चुना वह सत्ता के खिलाफ जाकर मुनाफा दिलाने में सक्षम नहीं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

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दिल्ली में डेंगू से लड़ने का ठेका सिर्फ अरविन्द केजरीवाल ने लिया है!

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली में डेंगू से लड़ने का ठेका सिर्फ अरविन्द केजरीवाल ने लिया है। बाकी देश में तो ना मच्छर हैं ना डेंगू होता है। गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव में भी नहीं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री पिछली दफा बिहार चुनाव के उम्मीदवारों की घोषणा कर रहे थे और माननीय उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के अफसरों को बता रहे हैं कि उन्हें किसका आदेश मानना है, किसका नहीं।

भाजपा के आम कार्यकर्ता दिल्ली सरकार के घोटाले ढूंढ़ने में लगे हैं और ढूंढ़ निकाला कि दिल्ली सरकार ने 30 रुपए किलो प्याज बेचकर भी कमाई की। 70-80 रुपए किलो बेचने वालों ने कोई कमाई नहीं की। जानते हैं क्यों? अरविन्द केजरीवाल आईआईटी के पढ़े, भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी जो रहे हैं। हालांकि, भक्त फिर भी कहते हैं कि आईआईटी पर सरकार बेकार खर्च कर रही है – आईआईटी वालों से देश को कोई लाभ नहीं हुआ है।

भाजपा ने यह आरोप तब लगाया है जब उसके एक नेता पिछले दिनों रेडियो विज्ञापन के जरिए बता रहे थे कि अप्रैल में केंद्र सरकार ने 19 रुपए किलो प्याज खरीदकर रखा था। दिल्ली सरकार ने ध्यान नहीं दिया। ना प्याज खरीदा। उल्टे कुछ मुनाफाखोरों को बढ़ावा दिया और इस महंगाई को बढ़ावा देने के कारण आज प्याज महंगा बिक रहा है। अब वही भाजपा कह रही है कि अरविन्द केजरीवाल ने 18 रुपए किलो खरीदा और 30 रुपए किलो बेचकर घोटाला कर दिया। केंद्र सरकार ने 19 रुपए किलो खरीदकर रखा था वो 70 रुपए किलो बिका फिर भी कोई घोटाला नहीं हुआ। भैया सोच लो क्या आरोप लगाना है। आपस में बैठकर तय कर लो। मोदी जी तो टीम इंडिया की बात कर रहे थे और यहां टीम भाजपा की कथनी और करनी में ही अंतर दिख रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल और राजदीप सरदेसाई की ‘आफ दी रिकार्ड’ बातचीत लीक, आप भी देखें वीडियो

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की आफ दी रिकार्ड बातचीत लीक होने का मामला सभी को पता है. अब केजरीवाल और राजदीप सरदेसाई की निजी बातचीत लीक हो गई है. राजदीप सरदेसाई जब केजरीवाल का इंटरव्यू करने के लिए बैठे तो नजीब जंग के मसले पर निजी बात करने लगे. इस दौरान इंटरव्यू की तैयारी के लिए बाकी स्टाफ सक्रिय था. निजी बातचीत के दौरान माइक और कैमरा आन था. नजीब जंग के पाला बदलने को लेकर दोनों लोग दुखी दिखे.

(वीडियो देखने के लिए उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक करें)

केजरीवाल का यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. इस नए वीडियो में राजदीप से केजरीवाल की जो अनाधिकारिक बातचीत है, उसमें राजदीप पूछते हैं केजरी से कि क्या वो बिहार में प्रचार करेंगे. इस पर केजरी कहते हैं कि वह इस सवाल का इंटरव्यू के दौरान जवाब देना चाहेंगे. गौरतलब है कि इसी टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस को ठुल्ला कहकर पुकारा था जिसके बाद दो पुलिस कॉस्टेबलों ने उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया था.

केजरीवाल ने हाल ही में यह साक्षात्कार दिया था जिसमें उन्होंने कई सवालों का जवाब दिया. लेकिन जिस तरह से यह वीडियो लीक हुआ है उसने एक बार फिर से केजरीवाल की मीडियाकर्मियों के साथ नजदीकी सामने आयी है. इससे पहले भी केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें उनकी टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी से बातचीत थी और उस साक्षात्कार में केजरीवाल यह कहते हुए सुने गए थे कि इस बात को थोड़ा बार-बार चला दीजिएग.

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: www.goo.gl/pYmdp9

(नोट- वीडियो फ्लैश फाइल यानि FLV फार्मेट में है इसलिए संभव है कइयों के मोबाइल पर न दिखे. इसलिए इसे आप अपने लैपटाप या कंप्यूटर पर देखें.)

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ये केजरीवाल सरकार का नहीं, दिल्ली के लोगों का अपमान है

Sushil Upadhyay : बस्सी, केजरीवाल और चाबी भरा खिलौना… कुछ महीने पहले तक ज्यादातर लोगों को नहीं पता था कि बी.एस.बस्सी कौन है ? उनके बारे में पता न होना कोई बड़ी बात भी नहीं है, क्योंकि उनके जैसे सैंकड़ों आईपीएस अफसर इस देश में काम करते हैं। लेकिन, अब अधिकतर लोग जानते हैं कि बी.एस. बस्सी दिल्ली के पुलिस आयुक्त हैं और लोगों द्वारा चुनी गई सरकार की लगातार खिल्ली उड़ा रहे हैं। हाल के दिनों में कई बार बी.एस. बस्सी टीवी पर देखने का मौका मिला है, वे जिस प्रकार की शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, उसे देखकर लगता है कि कोई अधिकारी नहीं, बल्कि नेता बोल रहा है।

तीन दिन पहले उन्हें मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मिलने बुलाया तो वे सीधे मीडिया से मुखाबित हुए और शान बघारते हुए बताया कि दिल्ली सरकार ने मुलाकात के लिए ‘रिक्वेस्ट’ भेजी है। तो क्या दिल्ली का पुलिस आयुक्त इतना बड़ा हो गया कि एक करोड़ लोगों की प्रतिनिधित्व करने वाली दिल्ली सरकार उन्हें मिलने के लिए ’रिक्वेस्ट’ भेज रही है? ये केजरीवाल सरकार का नहीं, दिल्ली के लोगों का अपमान है। ये बात बी.एस. बस्सी को समझ में नहीं आएगी क्योंकि लोगों को पता है कि वे ‘चाबी भरा हुआ खिलौना’ हैं। जब तब चाबी भरी जाती रहेगी, वे नाचते कूदते रहेंगे। कल फिर उन्होंने एक और हिमाकत की। एक विज्ञापन में केजरीवाल यह कहते हुए सुनाई देते हैं कि प्रधानमंत्री जी, दिल्ली पुलिस को हमें सौंप दीजिए, हम उन्हें ‘ठीक कर लेंगे’।

इसके जवाब में बी.एस. बस्सी पत्रकारों को कहा कि केजरीवाल दिल्ली पुलिस को ‘ठीक कर देंगे’ की बात कह रहे हैं। क्या किसी अफसर के पास ये अधिकार है कि वे सरकार के मुखिया द्वारा कही गई बात को ट्विस्ट कर दें! बी.एस. जस्सी का अगला ठिकाना राजनीतिक दल ही है और इसी को सामने रखकर वे खुलकर खेल रहे हैं। कामना कीजिए कि उनके हाथ न जलें, वैसे आग से खेलने में वे कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं।

देहरादून के पत्रकार और शिक्षक सुशील उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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इस सदी के स्वघोषित सबसे बड़े महानायक केजरीवाल की नाक जड़ से कट गई…

Samarendra Singh : जिसका अंदेशा था वही हुआ. अभय कुमार दुबे की बात सही निकली. किसी एक की नाक जड़ से कटनी थी और इस सदी के स्वघोषित सबसे बड़े महानायक की नाक जड़ से कट गई. कमाल के केजरीवाल जी दुखी हैं. बोलते नहीं बन रहा है. इसलिए अदालत के फैसले का इंतजार किये बगैर उन्होंने अपने क्रांतिकारियों को अपने बचाव में आगे कर दिया है. तोमर की डिग्री फर्जी है, यह मानने के लिए अब उन्हें किसी अदालत के फैसले की जरुरत महसूस नहीं हो रही है. अब उनके क्रांतिकारी कह रहे हैं कि माननीय को गहरा सदमा लगा है. तोमर ने उन पर जादू कर दिया था. फर्जी आरटीआई दिखा कर भ्रमित कर दिया था. हद है बेशर्मी की. बार-बार झूठ बोलने पर जरा भी लाज नहीं आती.

दरअसल यह सारा खेल औकात बताने से शुरु हुआ था. केजरीवाल को कुछ लोगों को उनकी औकात बतानी थी. प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और आनंद कुमार को बताना था कि उन्होंने आम आदमी पार्टी को अपने पसीने से भले ही सींचा हो, इसमें उनकी हैसियत दो कौड़ी से अधिक नहीं है. आम आदमी पार्टी तो सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल और उनके क्रांतिकारियों के हिसाब से चलेगी. वो कहेंगे दाएं तो दाएं और बाएं तो बाएं मुड़ेगी. और तमाम सवालों के बावजूद न केवल तोमर को टिकट दिया बल्कि मंत्री भी बना दिया. अब कह रहे हैं कि गुमराह किया गया था.

सच तो ये है कि केजरीवाल बहुत हल्के आदमी हैं. उनके क्रांतिकारी तो उनसे भी अधिक हल्के हैं. जिस तरह की उनकी भाषा है उससे जाहिर होता है कि वैचारिक स्तर पर ये सभी बहुत छिछले हैं. संसद, संविधान और कानून में इनकी आस्था न के बराबर है. देश के ढांचे को ये कुछ नहीं समझते. केंद्र और राज्य के रिश्तों के बारे में इनकी समझ न के बराबर है. जब ये कहते हैं कि “हमें अदालत और मुकदमों से डराने की कोशिश हो रही है जिन्हें हम कुछ समझते ही नहीं ” तो इनका हल्कापन जाहिर होता है.

यही नहीं, इन सभी ने अपने पुराने साथियों और पार्टी के संस्थापकों के खिलाफ जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया था… उन पर उनके परिवार पर जिस बेशर्मी से हमला किया था उससे यह जाहिर होता है कि वह सभी व्यक्तिगत संबंधों का भी मान नहीं रख सकते. मगर केजरीवाल और उनके क्रांतिकारी कुछ बातों में माहिर हैं. झूठ बोलने में और नौटंकी करने में तो ये किसी को मात दे देंगे. मुंह बना-बना कर ऐसे बोलते हैं जैसे इनसे अधिक प्रतिबद्ध कोई दूसरा नहीं.

बीते कुछ दिन में बहुत से लोग यह दलील दे रहे थे कि पुलिस राज्य सरकार के हवाले क्यों नहीं सौंप दी जाती. मेरी तो राय है कि यह कभी नहीं होना चाहिए. दिल्ली की पुलिस राज्य सरकार के हवाले नहीं की जा सकती. तब तो कतई नहीं जब केजरीवाल जैसा सनकी व्यक्ति, जिसकी आस्था संविधान और कानून में न के बराबर हो, यहां का मुख्यमंत्री हो. वह कुछ भी फैसला ले सकता है. प्रधानमंत्री का रूट लगाने से इनकार कर सकता है. वीआईपी सुरक्षा खत्म कर सकता है. टकराव के नए-नए बहाने खोज सकता है. और जिस तरह की इस देश की राजनीति है उसमें उसे कई अन्य जगहों से समर्थन भी मिल सकता है. ऐसा हुआ तो केंद्र की ताकत कम होगी. कहीं भी केंद्र कमजोर हुआ तो विखराब शुरु हो जाता है. इसलिए दिल्ली अर्धराज्य है और उसे अर्धराज्य ही रहना चाहिए. इसे पूर्ण राज्य नहीं बनाया जा सकता. दिल्ली को देश के तमाम राज्यों की तुलना में अधिक सुविधाएं इसीलिए मिली हैं कि वह केंद्र की सत्ता का केंद्र है और अर्धराज्य है.

खैर इन सब बातों का कोई मतलब है. भैंस के आगे बीन बनाने से वह गाना नहीं गाने लगेगी. केजरीवाल और उनके क्रांतिकारी खामोशी से काम ही नहीं कर सकते. वह जल्दी ही हमारे बीच नई नौटंकी के साथ हाजिर होंगे. कुछ नया जिससे तमाशा खड़ा हो सकता हो. जिस पर नए चुटकुले बन सकते हों. कार्टून बनाए जा सकते हों. तल्ख टिप्पणियां हो सकती हैं. लेकिन सकारात्मक बदलाव नहीं हो सकता. दिल्लीवालों की जिंदगी बेहतर नहीं हो सकती.

एनडीटीवी इंडिया में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके प्रतिभाशाली पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.


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मोदी और केजरी : आइए, दो नए नेताओं के शीघ्र पतन पर मातम मनाएं…

Yashwant Singh : यथास्थितिवाद और कदाचार से उबी जनता ने दो नए लोगों को गद्दी पर बिठाया, मोदी को देश दिया और केजरीवाल को दिल्ली राज्य. दोनों ने निराश किया. दोनों बेहद बौने साबित हुए. दोनों परम अहंकारी निकले. पूंजीपति यानि देश के असल शासक जो पर्दे के पीछे से राज करते हैं, टटोलते रहते हैं ऐसे लोग जिनमें छिछोरी नारेबाजी और अवसरवादी किस्म की क्रांतिकारिता भरी बसी हो, उन्हें प्रोजेक्ट करते हैं, उन्हें जनता के गुस्से को शांत कराने के लिए बतौर समाधान पेश करते हैं. लेकिन होता वही है जो वे चाहते हैं.

नए चेहरों को लांच कर, सपोर्ट कर, फंड कर उन्हें आगे बढ़ाते हैं और उनकी क्रांतिकारिता से जनता को प्रभावित कराते हैं. जनता उन्हें चुनते हुए मस्त हो जाती है कि अब तो समस्याओं का स्थायी समाधान निकलने वाला है. पुराने को हटाते हुए नए को लाकर जनता को लगता है कि उसने दम दिखा दिया. इससे जनता का गुस्सा फौरी तौर पर शांत हो भी जाता है और ये फर्जी क्रांतिकारी टाइप नेता अंतत: पीएम सीएम बन जाते हैं.

सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद इनका खोखलापन, इनका फर्जीपना, इनका बड़बोलापन, इनकी चिरकुटई, इनका व्यक्तिवाद, इनका अहंकार, इनका अलोकतांत्रिक व्यक्तित्व, इनका जनविरोधी रुख सामने आ जाता है. मोदी और केजरी को इस पैमाने पर देखिए कसिए तो समझ आएगा कि ये कितने बड़े फ्रॉड हैं. भ्रष्टाचार और महंगाई पर लगाम न लगा पाना मोदी की सबसे बड़ी विफलता है तो अलोकतांत्रिक किस्म के घटिया आदमी के रूप में पतित हो जाना केजरीवाल की सबसे बड़ी दिक्कत है. आइए, दो नए नेताओं के शीघ्र पतन पर मातम मनाएं व कुछ पल मौन रखें.

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मीडिया के खिलाफ दिल्ली सरकार के सर्कुलर पर सुप्रीम कोर्ट का ब्रेक

मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिश के तहत दिल्ली सरकार की ओर से जारी किए गए एक सर्कुलर पर सुप्रीम कोर्ट ने आज रोक लगा दी है। अरविंद केजरीवाल की सरकार ने 6 मई को जारी इस सर्कुलर के जरिए अपने अधिकारियों को सरकार, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की छवि खराब करने वालों की खबरों की पहचान कर इसके लिए मीडिया के खिलाफ लीगल ऐक्शन लेने का निर्देश दिया था।

इसके बाद से ही दिल्ली सरकार के इस मीडिया सर्कुलर का मामला गर्मा गया और सरकार पर राजनीतिक हमले तेज हो गए थे। मंगलवार को BJP सांसद रमेश बिधुड़ी ने AAP सरकार के इस सर्कुलर का मुद्दा संसद में भी उठाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश कपिल सिब्बल के बेटे अमित सिब्बल की याचिका पर दिया। अमित ने केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का भी केस किया हुआ है।

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सच्चाई जान जाएंगे तो आप भी कहेंगे- ”केजरी ने अब तक भूषण तिकड़ी और योगेंद्र यादव को पार्टी से बाहर निकाला क्यों नहीं!”

(लेखक यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक हैं.)


उन दिनों मेरे पास अंदर से कोई खबर नहीं थी. सिर्फ मीडिया द्वारा परोसे दिखाए जा रहे तथ्यों-खबरों पर निर्भर था. उस निर्भरता के जरिए ये राय बना ली कि केजरीवाल तो चुनाव जीतने के बाद अहंकारी हो गए हैं और इन्हें योगेंद्र व प्रशांत को कतई पोलिटिकल अफेयर्स कमेटी से नहीं निकालना चाहिए. जब इन दोनों को निकाल दिया गया तो मुझे भी बहुत धक्का लगा कि आखिर ये क्या हो रहा है, कहीं ‘आप’ नेता केजरीवाल तानाशाही की तरफ तो नहीं बढ़ रहे, कहीं केजरीवाल आलाकमान सिस्टम तो नहीं लागू कर रहे, कहीं केजरीवाल वन मैन पार्टी तो नहीं बना दे रहे ‘आप’ को…

अपने तात्कालिक जज्बातों को फेसबुक पर दो पोस्टों के जरिए अभिव्यक्त भी किया (देखें इस पोस्ट के बिलकुल नीचे)… लेकिन पिछले कुछ दिनों में मैं पूरे मामले की गहराई तक गया, ‘आप’ नेताओं, उनके नजदीकी लोगों, शुभचिंतकों, कार्यकर्ताओं, संगठकों आदि से मिला तो पता चला कि केजरीवाल ने अब तक अदभुत धैर्य बनाए रखा. अगर उनकी जगह कोई दूसरा होता तो जाने कबका पार्टी को दो फाड़ करा चुका होता या फिर भूषण खानदान की तिकड़ी और योगेंद्र यादव को कबका बाहर का रास्ता दिखा चुका होता. लेकिन केजरीवाल ने धैर्य नहीं खोया और चुनाव तक चुप्पी साधे रखी, ताकि ‘आप’ पार्टी को लेकर जनता के आकांक्षाओं पर तुषारापात न हो. तो आप भी जानिए, वे सारे कारण जिससे पीड़ित होकर केजरीवाल ने किसी हालत में भूषण खानदान की तिकड़ी (बाप शांति भूषण, बेटा प्रशांत भूषण, बेटी शालिनी गुप्ता) और योगेंद्र यादव के साथ काम न करने का फैसला लिया है.

–‘आप’ पार्टी के गठन से लेकर अब तक बाप शांति भूषण ने दो करोड़ रुपये दिए. बेटा प्रशांत भूषण ने पार्टी का ढांचा और संविधान बनाया. बेटी शालिनी गुप्ता ने एनआरआई मोर्चे को संभाला. इस तिकड़ी के मन में शुरू से यह बात रही कि ये पार्टी उनके इशारे पर चलेगी और उनके अनुरूप चलेगी. केजरीवाल को पार्टी के बैठकों में ये लोग कदम कदम पर अपमानित करते थे. खासकर प्रशांत भूषण और शांति भूषण पार्टी बैठकों में केजरीवाल व अन्य को इस तरह डांटते डपटते थे कि जैसे वे दारोगा हों, बाकी सब चोर-उचक्के. दो बार तो केजरीवाल रो चुके हैं ऐसे अपमान और कड़वी झिकड़कियों के कारण. 

–केजरीवाल के पक्ष में लहर देखकर भूषण तिकड़ी ने तय किया कि अगर जल्द ही इस बंदे को पार्टी संयोजक पद से न हटाया गया तो पूरी पार्टी केजरीवाल के नियंत्रण में हो सकती है. इस कारण भूषण तिकड़ी ने योगेंद्र यादव को अपने पाले में किया और उन्हें केजरीवाल के पैरलल प्रोजेक्ट कर नया संयोजक बनाने का अभियान छेड़ा. केजरीवाल को फेल साबित करने के लिए पार्टी बैठकों में वकील बाप बेटे शांति-प्रशांत भूषण द्वारा लंबा चौड़ा चार्जशीट पेश किया जाता जिसे योगेंद्र यादव बौद्धिक मुलम्मे में सपोर्ट करते.

–दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भूषण तिकड़ी ने ‘आप’ को भाजपा के बाद नंबर दो की पार्टी बनाने के लिए काम किया. बेटी शालिनी गुप्ता ने फंड देने वाले एनआरआई को बीच चुनाव मेल कर दिया कि पार्टी को पैसे देने की जरूरत नहीं है क्योंकि केजरीवाल कई ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़वा रहा हैं जिनका बैकग्राउंड संदिग्ध है. बाप शांति भूषण ने बयान दे दिया कि वे सीएम के रूप में किरण बेदी को नंबर एक पसंद मानते हैं. ये सारी बातें स्थितियां केजरीवाल को पता चलती रहीं पर उन्होंने चुप्पी साध कर सिर्फ और सिर्फ अपना लक्ष्य की तरफ खुद को केंद्रित किए रखा.

–योगेंद्र यादव ने पत्रकारों को ब्रीफ कर कर के ऐसी खबरें छपवाईं जिससे पार्टी डैमेज हो और पार्टी के भीतर का विवाद जगजाहिर हो ताकि केजरीवाल व पार्टी की छवि पर असर पड़े. इससे संबंधित आडियो पिछले दिनों जारी किया गया जिसमें साफ साफ द हिंदू की महिला पत्रकार कह रही हैं कि उन्होंने जो कुछ पार्टी के खिलाफ लिखा उसे योगेंद्र यादव ने ब्रीफ किया.

-शांति भूषण और प्रशांत भूषण ने योगेंद्र यादव को अपने कब्जे में कर रखा था ताकि उन्हें एक कठपुतली नेता मिल सके जो उनके हिसाब से पार्टी को चलाए. योगेंद्र यादव यह बात जानते थे कि ये पार्टी शांति भूषण के पैसे से बनी है. इसका संविधान ढांचा प्रशांत भूषण ने बनाया. फंड के मोर्चे पर एनआरआईज को हैंडल कर रही शालिनी की भूमिका बड़ी है. उन्हें लगा कि वे इस तिकड़ी के साथ काम करके अपना कद पद बढ़ा सकते हैं और पार्टी के भीतर मनचाही स्थितियां पैदा कर सकते हैं.

–एक तरफ भितरघात कर रहे शांति भूषण, प्रशांत भूषण, शालिनी गुप्ता और योगेंद्र यादव की टीम थी जो जमीन पर कम, मीडिया व बौद्धिक हलकों में ज्यादा सक्रिय रही. इन लोगों की अंदरखाने कोशिश थी कि पार्टी नंबर दो की पोजीशन पर रहे ताकि हार का ठीकरा केजरीवाल पर फोड़कर उन्हें संयोजक पद से हटाया जा सके, भूषण तिकड़ी के अनुरूप न काम करने का दंड दिया जा सके और योगेंद्र यादव को नया संयोजक बनाया जा सके.

–चुनाव लड़ने के लिए घोषित किए गए प्रत्याशियों में अपनी मनमानी न चलते देख भूषण तिकड़ी ने 12 उम्मीदवारों पर तरह तरह के आरोपों का हवाला देकर पार्टी के भीतर तूफान पैदा किया. पार्टी लोकपाल एडमिरल रामदास ने जांच के बाद 12 में से दस प्रत्याशियों पर आरोपों को खारिज कर दिया. जिन दो पर आरोपों में सत्यता पाई गई उन्हें चुनाव के बीच ही केजरीवाल ने बदल दिया और दूसरे लोगों को टिकट दे दिया. पर भूषण तिकड़ी इससे ही शांत न थी. आरोप है कि इन लोगों ने जी न्यूज तक सारी आंतरिक बहस, विवाद को लीक कर दिया जिसके बाद मीडिया में ‘आप’ के दागी प्रत्याशियों पर बहस शुरू हो गई. इससे चुनावी माहौल में ‘आप’ की छवि को भारी धक्का लगा.

–आरोप है कि चुनाव के दौरान ‘आप’ पर जितने चंदे, हवाला आदि के आरोप लगे, उनके पीछे मास्टरमाइंड ये भूषण तिकड़ी ही थी. इनकी कोशिश हर हाल में ‘आप’ को बहुमत दिलाने से रोकना था ताकि केजरीवाल का सर कलम किया जा सके. पर सारी साजिशों, बेइमानियों, भितरघातों, बयानबाजियों, मेलबाजियों के बावजूद भूषण तिकड़ी को मुंहकी खानी पड़ी.

–केजरीवाल और उनकी टीम की अथक मेहनत, धैर्य और आंतरिक झगड़ों पर चुप्पी का इनाम ये मिला कि उनके पक्ष में लहर नहीं, तूफान नहीं, सुनामी चल पड़ी. 70 में से 67 सीटें ‘आप’ को मिली. इससे भूषण तिकड़ी सकते में आ गई. फिर भी ये लोग नहीं माने और पार्टी संयोजक का पद योगेंद्र यादव को दिलाने के लिए अभियान शुरू कर दिया. इस बार सहारा लिया एक व्यक्ति एक पद का.

–भूषण तिकड़ी की हरकतों-दुर्व्यवहारों-पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण दो-दो बार भरी मीटिंग में रो चुके केजरीवाल ने चुनाव बाद भी इन लोगों की साजिशें न रुकते देख एक दिन फैसला कर लिया कि वे किसी हालत में इन लोगों के साथ कोई मीटिंग शेयर नहीं करेंगे. संदेश साफ था. केजरीवाल अब इन भूषण तिकड़ी की डांट डपट चार्जशीट आरोप झिड़की विवाद भितरघात आदि को सहन करने को बिलकुल तैयार नहीं थे. उन्होंने अपने लोगों से साफ कह दिया कि ये लोग या तो खुद अलग-अलग प्रदेशों की जिम्मेदारी लेकर वहां मेहनत कर जनांदोलन खड़ा करें, जीतें या फिर पार्टी छोड़कर चले जाएं और अपनी पार्टी बनाकर नई शुरुआत करें, जैसे एक जमाने में मतभेद होने पर अन्ना ने किया था.

–मीडिया फ्रेंडली भूषण और योगेंद्र यादव ने अरविंद केजरीवाल के सख्त रुख को भांपकर मीडिया का जमकर इस्तेमाल करते हुए विधवा विलाप शुरू कर दिया और केजरीवाल को तानाशाह, अलोकतांत्रिक, वन मैन पार्टी आदि आदि आदि के जुमले से रंग डाला. योगेंद्र यादव, जो खुद यादव बहुल गुड़गांव की लोकसभा सीट पर अस्सी हजार के करीब ही वोट पा सके थे और हरियाणा में पार्टी कार्यकर्ता से लड़कर इस्तीफा दे डाले थे कि या तो इसे रखो या मैं बाहर चला जाउंगा, भी मीडिया के सामने अपनी पूरी ताकत के साथ अपने को पीड़ित के रूप में पेश करने में कामयाब रहे. जबकि उन दिनों केजरीवाल ने मोदी के खिलाफ ताल ठोंक कर बिलकुल नई जगह से चुनाव लड़कर लोकसभा में ढाई लाख से ज्यादा वोट पाए थे.

–लोकसभा चुनाव के नतीजों से मतलब साफ था. जनता के बीच केजरीवाल अदभुत काम कर पा रहे थे, जनता को कनेक्ट करने में सफल हो पा रहे थे लेकिन योगेंद्र यादव और भूषण तिकड़ी जनता के बीच बिलकुल फ्लाप शो साबित हो रहे थे. भूषण तिकड़ी तो सीधे-सीधे चुनाव मैदान में उतरने, प्रत्याशियों का प्रचार करने तक से बिलकुल कतराती रही. उस समय भी केजरीवाल को इन लोगों ने खूब घेरा. लोकसभा चुनाव देश भर में लड़ने का फैसला योगेंद्र यादव और भूषण खानदान का था, लेकिन इन लोगों ने खुद हार का जिम्मा लेने व गलत फैसला किए जाने का अपराधबोध होने के बजाय केजरीवाल को घेर लिया, संयोजक पद छोड़ने के लिए लाबिंग शुरू कर दी. जैसे तैसे केजरीवाल आंतरिक राजनीति को इगनोर कर दिल्ली की जनता के बीच कठिन मेहनत करके उन्हें एक बार पूरा मौका देने के लिए अनुरोध करते रहे. साथ ही साथियों के साथ तरह तरह के कार्यक्रम करके दिल्ली की जनता से कनेक्ट होते रहे.

–दिल्ली विधानसभा में सुपरहिट बहुमत से सरकार बनाने के बाद और अपने खिलाफ आंतरिक राजनीति फिर तेज होते देख बीमारी से जूझ रहे केजरीवाल ने मौन धारण कर लिया. उन्होंने मन ही मन एक नया फैसला ले लिया, इरादा बना लिया. साथियों से अपनी पीड़ा, अपना फैसला, अपना इरादा कनवे करने के बाद केजरीवाल इलाज के लिए बेंगलोर चले गए. वे नहीं चाहते थे कि वे जवाब देकर पार्टी के झगड़े को बढ़ाएं और खुद की भदद् पिटवाएं.

–अब जब कि भूषण खानदान की बेटी शालिनी के पार्टी विरोधी मेल जगजाहिर हो चुके हैं, शांति भूषण और प्रशांत भूषण समेत योगेंद्र यादव की पूरी मंशा सबको पता चल चुकी है, ‘आप’ शुभचिंतक हर कोई चाहने लगा है कि ये लोग या तो खुद पार्टी छोड़ दें या फिर इन्हें निकाल दिया जाए ताकि अरविंद केजरीवाल वह सब कुछ कर सकें जो उन्होंने जनता से वादा किया था चुनावों के दौरान. पार्टी कार्यकर्ता यह समझने लगे हैं कि दरअसल पार्टी को खड़ा करने वाला और उसे यहां तक ले आने वाले अरविंद केजरीवाल व उनके साथी ही हैं.

–अगर बौद्धिक विलाप से पार्टियां खड़ी हो सकती थीं और चुनाव जीत सकती थीं तो इस देश में कम्युनिस्ट पार्टियां कई कई बार पूर्ण बहुमत से केंद्र से लेकर सारे प्रदेशों में सत्तानशीं हो सकती थीं. लेकिन बौद्धिक समझ के साथ असल ताकत जनता और समाज की समझ के साथ उन्हें अपने पक्ष में खड़ा कर लेने की होती है जिससे योगेंद्र यादव से लेकर भूषण तिकड़ी तक अनजान है. यही कारण है कि ये लोग सिर्फ पार्टी पर नियंत्रण और अपने इशारे पर सब कुछ चलाते रहने की साजिशों में जुटे रहे.

— नीचे उस मेल के कुछ अंश हैं जिसे प्रशांत भूषण की बहन शालिनी भूषण उर्फ शालिनी गुप्ता ने आठ सौ एनआरआई वाले ईमेल ग्रुप को भेजा था, जिसे ‘आप ग्लोबल ग्रुप’ कहा जाता है… ये मेल चुनाव के दौरान भेजे गए ताकि ‘आप’ को फंड न मिले, ‘आप’ में विवाद बढ़े और फूट पड़े जिससे अंततः पार्टी कमजोर पड़े व भाजपा जीत जाए. ‘आप’ की हार से भूषण तिकड़ी केजरीवाल को संयोजक पद से हटा देती और योगेंद्र यादव को बिठा देती. लीजिए मेल के कुछ अंश पढ़िए…

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Since all of you are important stakeholders in the party, donating your time and money some straight talk is warranted. Here is my perspective. You will get a different answer to your question depending on who you talk to.

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One camp believes that in this game of politics if we have to pick some candidates and employ some techniques that other political parties do. Also the benchmark that arvind is using is even if these candidates have recently been inducted from other political, parties and we all know their reputation, source of disproportionate assets etc, or that they have used money and muscle to win previous elections, they are ok as AAP candidates as long as there is no concrete proof of any wrongdoing that would be evidence in court.

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The other camp of leaders believe that even if there is no concrete proof, if they have an unsavory reputation as local thugs, have disproportionate assets and illegal professions, and have used wrong means to win previous elections they do not come up to the standards of AAP candidate and we cannot expect them to work in public interest if they win.  Many such people have a setting with the police and do not allow FIRs to be registered against them.  So to use proof as a standard is not enough for AAP.  These are career politicians just out to make money.  Moreover to fight the election with such candidates is political suicide.

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This negotiation has happened because of very strong push by a group of leaders led by Prashant Bhushan who did not want to see the party ideology of clean politics thrown by the wayside.

उपरोक्त मेल के जवाब में कुछ परेशान एनआरआई ने रिप्लाई भी किया. पढ़िए एक एनआरआई मोतिका आनंद का छह जनवरी को भेजा गया जवाब…

I wanted to finalise adopting a constituency as there might not be enough time for elections. I want to see AAP winning the elections and at this point I want to canvass for AAP not a particular candidate. This needs to be cleared up as to what is going on? Whether we focus on candidates or AAP as a whole?

एक अन्य एनआरआई अतुल आनंद लिखते हैं:

Imho these complaints, dont know how many seats we are talking about, should have been reviewed before announcing candidates. We will be made a laughing stock for these ticket cancellations which media/bjp will only gleefully grab as another uturn [U-turn] by AAP.

जब दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बन गई तो एक जय चटर्जी ने शालिनी गुप्ता के पत्र के जवाब में उनसे पूछा…

is that true that you are the same Shalini Gupta who is the daughter of Shanti Bhusan? If that’s true then you should step down as NRI coordinator and get elected through a pre-declared, transparent and due process.

तो ये रहे कुछ फैक्ट्स जिसके आधार पर पार्टी के शुभचिंतक खुलकर कहने लगे हैं कि ‘आप’ विरोधियों और आम आदमी द्रोहियों को पार्टी में रहने का कतई हक नहीं हैं. अगर वे खुद नहीं चले जाते हैं तो उन्हें पार्टी से बाहर निकाल फेंकना चाहिए क्योंकि अनुशासनहीनता की भी हद होती है. लोग इन सारे तथ्यों को जानने के बाद कहने लगे हैं कि केजरीवाल अदभुत व्यक्ति हैं, वे इतना सब कुछ जानने के बावजूद अब तक क्यों और कैसे इन विभीषणों को झेलते रहे. भूषण तिकड़ी और योगेंद्र यादव के पार्टी द्रोह की बातें यहीं नहीं खत्म होती. एक लंबा सिलसिला है, कई अध्याय हैं. पूरा वही जान सकता है जिसके पास आम आदमी पार्टी के बनने से लेकर अब तक मिली सफलता-असफलता की कहानी सुनाने वाला सही व्यक्ति हो और सुनने के लिए पूरा टाइम हो. अगर शार्टकट में पड़कर और मीडिया जनित रिपोर्टों के आधार पर भावुक होकर फैसले ले रहे हों तो आप केजरीवाल को उसी तरह गरियायेंगे जैसे मैं गरिया चुका हूं (देखें नीचे शीर्षक), अधजल गगरी छलकत जाय की तर्ज पर. पूरा ज्ञान होने के बाद फैसले लेंगे तो ज्यादा रेशनल, ज्यादा डेमोक्रेटिक और ज्यादा साइंटिफिक होंगे. इसीलिए, कहीं ऐसा न आप कर दें कि सबको कहना पड़े- लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई.

लेखक यशवंत सिंह से संपर्क Yashwant@Bhadas4Media.com के जरिए किया जा सकता है.


उपरोक्त विश्लेषण पर फेसबुक पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Prakash Kukrety भैया हम तो पहले से ही यह सब जानते थे, यकीन न हो तो वाल पर देखिये,मैने खुलकर भूषण और यादव को पार्टी से निकालने की बात कही है
Mukund Hari राजनीतिक महत्वाकांक्षा का इतना गन्दा खेल !
संजय राय to, ab finali kya kiya jaye …yashwant ji …..
Meenu Jain आप एक प्रबुद्ध चिन्तक एवं विचारक है तो इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि आप एक कुशल राजनीतिज्ञ भी है.
Arun Sathi गंभीर आरोप है और इससे उबर कर देश की आकांक्षाओं पे ख़ड़े उतरना ही चुनौती है.. केजरीवाल ने बाकई धैर्य का काम किया पर मिडिया उस मुद्दे को प्रायोजित कर उछाल दिया
Ashish Verma मुझे शुरुवात से केजरीवाल पे भरोसा था। मयंक गांधी भी इसलिए उछाल रहस रही हैं AAP मुंबई में मनपा चुनाव नही लड़ेगी
Mannu Singh ap logo ki thothi bato se jhooth sach me ni badal jayega. sach ko pachana sikhiye.
Binod Verma kanhi garbar lag raha hay Yashwant ji!!!
Dinesh Jindal ek baat samajh me nahi aayi shalini jii itni badi bewkoofi kaise kar sakti hain.. apni id se mail karke
Kumar Abhishek shalini ne mail kaise kia hoga ??
Kishlay Sharma Yashwant Bhai main todha shocked tha jab aapne Kejri ko tanaashah kaha tha…par noe i am happy kyonki meri research aur result bhi hai hai.
Yashwant Singh शालिनी ‘आप ग्लोबल सेल’ की हेड हैं. मेल करना एनआरआई को जोड़ना, पार्टी के लिए एनआरआई से फंड कलेक्ट करना उनका नियमित काम था. उन्होंने ओपन मेल किया है, यह सब आन रिकार्ड है. कई बार ताकत और अहंकार आंख पर पट्टी बांध देता है. भूषण तिकड़ी को यह कतई नहीं पता था कि एक दिन पार्टी के भीतर उनकी हरकतों पर सवाल होंगे और ये लोग निकाले भी जाएंगे. ये पता होता तो ये लोग बिलकुल राइट टाइम होते
Yashwant Singh भाई Binod Verma जी, हर कहानी पर शक करना चाहिए. और, हर कहानी से आगे की कहानी पर ध्यान गड़ाना चाहिए. सच की पड़ताल एक सतत प्रक्रिया है. जिन डूबे तिन पाइंया… आपको नया कुछ पता हो तो स्वागत है. मुझे खुद को अपग्रेड करने में खुशी होगी.
Jass Singh yy ji 57 se seats ayengi. akhir kyon baar baar predict kar rahe the. sab se sateek bhavishvani yy ji he sach sabit hui. kitni mohala sabayien yy ji ne ke. kya delhi ke logo ke rai le yy ji ne kush galat kiya. ek pahlu he mat dekhe. dusre ko moka be de. aur rahi baat pb aur sb aur un ke larki ke toh wo jaror shak ke ghere me hai.
Kishlay Sharma Shalini ne yeh mail bhi Lokpal enquiry ka result aane se pehle hi kar diya tha…they wanted highjack party as per their whims and fancies.
Saleem Akhter Siddiqui यशवंत जी राय बदलने से पहले अभी थोड़ा इंतजार करना चाहिए था। तिकड़ी के तथ्य भी सामने आने दीजिए।
Yashwant Singh राय नहीं बदला है. अब तक उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आंकलन किया है. तिकड़ी के पास अब कहने रोने के लिए कुछ नहीं है क्योंकि वो सब कुछ मीडिया में कह रो लीक पोक चुके हैं…
सोबन सिंह महर पढ़ लिया ये वाला भी, गजब का निकली तिकड़ी.
Jyotika Patteson  स्वार्थ और महत्वकाक्षांओं के मुँह पर तमाचा है अरविंद का ये निर्णय… हर राजनेता को केजरीवाल जैसा ही निर्णय लेना चाहिए..
नवीन रमण  आप पार्टी की पड़ताल करता और कुछ तथ्य उजागर करता लेख । योगेन्द्र यादव और तिकड़ी भूषण की अपनी लालसाएं
माधो दास उदासीन एक विश्लेष्ण यह भी…
Neha Sweetu क्या ये सच है???
संजय राय लीजिये ये आ गया सच …. आम आदमी पार्टी का …….आप को ज्ञातब्य हो की जब अन्ना ने स्वामी अग्निवेश , शांति भूषण , प्रसान्त भूसन , किरण , अरविन्द , manish की टीम घोषित की जनांदोलन के लिए …तो मैंने सबसे पहले सवाल किया था बाप -बेटा एक साथ क्यों ? मैं क्यों नहीं …..तो लोगों ने मेरा बिरोध किया था …..बाप-बेटा मिल के अन्ना को अलग किये , फिर बाप अलग हुआ …..बेटे ने योगेंदर के साथ मिल ये गेम रच दिया ……….कोइ कैसे करे काम …स्वार्थ और मह्त्वाकांछा के चलते ……….हद हो गयी ये तो ….
Manish Tiwari आप का एक रोचक रहस्योदघाटन ! पढ़े जरूर ।
Santosh Singh अब जरा इसको भी पढिए ई किसी भड़ासिये का भड़ास नहीं है यह पार्टी के शुभ चिंतक द्वारा लिखा गया पोस्ट है जो कि चाहता है कि ‘आम आदमी पार्टी’ का यह प्रयोग जनता परिवार की तरह चुच्चू और मुरब्बा न बन जाये।
Saurabh Rajput क्या यही हकीकत है यदि हाँ तो लगता है जो पार्टी ने किया वो ठीक ही किया ?
Saket Sisodia Bhai yeh to ‘mann ki baat’ lagti hai. Isme tathayatmak jaisa kuch nahi. Volunteers emotional fool nahi hain, Yashwantji unhe rajniti na padaye.
Yashwant Singh सच के कई परत होते हैं.. जितने गहरे उतरिए, उतने ज्यादा सच पाते जाइए… ‘आप’ का असली सच…
Kishlay Sharma The final nail by otherwise YY and PB sympathiser Yashwant Singh of Bhadas 4 Media.


इसी प्रकरण पर यशवंत सिंह द्वारा शुरुआत में केजरी के खिलाफ लिखे गए आक्रोश भरे कुछ आलेख यूं हैं…

केजरीवाल से मेरा मोहभंग… दूसरी पार्टियों के आलाकमानों जैसा ही है यह शख्स…

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योगेंद्र-प्रशांत निष्कासन प्रकरण के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है

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किस-किस को कत्ल करोगे केजरीवाल… हिम्मत हो तो अब मयंक गांधी को बाहर निकाल कर दिखाओ…

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किस-किस को कत्ल करोगे केजरीवाल… हिम्मत हो तो अब मयंक गांधी को बाहर निकाल कर दिखाओ…

Yashwant Singh :  किस-किस को कत्ल करोगे केजरीवाल… हिम्मत हो तो अब मयंक गांधी को बाहर निकाल कर दिखाओ… मयंक गांधी ने सारी सच्चाई बयान कर दी है… (पढ़ने के लिए क्लिक करें: http://goo.gl/IY1Bx9 ) …मयंक गांधी ने आम आदमी पार्टी बनने और चलाए जाने के असली विजन को बेहद ईमानदारी से सबके सामने रख दिया है… इसलिए, हे केजरी, 67 सीटें जीत जाने से ये मत सोचो कि सिर्फ केजरीवाल के कारण ये सीटें मिल गई हैं और तुम्हीं सबके बाप हो… कांग्रेस और भाजपा की घटिया व परंपरागत राजनीति से उबे करोड़ों लोगों का तन मन धन लगा, दुआएं मिलीं, आशीर्वाद और प्यार मिला, अलग-अलग किस्म की क्रांतिकारी धाराएं एकजुट हुईं तब जाकर सब मिलाकर आम आदमी पार्टी नामक परिघटना तैयार होती है..

ये मत समझना केजरीवाल की तुम्हारी खांसी और तुम्हारे मफलर के कारण 67 सीटें मिलीं. ये सब कुछ एक बड़ी परिघटना का हिस्सा है जिसके तुम भी एक गतिमान पार्ट हो और जिसके योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण भी एक्टिव तत्व हैं. जिस दिन आम आदमी पार्टी के भीतर आंतरिक बहसों का गला घोंटे जाने लगा और आलाकमान कल्चर डेवलप हो गया, तो समझ लेना आम आदमी पार्टी की आत्मा मर गई. आम आदमी पार्टी की खासियत ही इसकी इनटरनल डेमोक्रेसी है और विविध किस्म के मन-मस्तिष्क हैं. तभी तो संघी से लेकर कम्युनिस्ट तक ने आम आदमी पार्टी को अंदर खाने सपोर्ट किया और दिल्ली में बीजेपी की बैंड बजा दी. ये सब लोग ‘आप’ के उतने ही बड़े शेयरहोल्डर हैं जितना कोई केजरीवाल या कोई संजय सिंह या कोई आशुतोष.

ये आम लोगों के खून पसीने से बनी पार्टी है जिसमें वैचारिक विविधता हमेशा रहेगी… तुम अगर अपने चंपूओं आशुतोषों, संजय सिंहों, आशीष खेतानों के दम पर इसे दलालों मीडियाकरों अवसरवादियों जी हुजूरियों येस मैनों की पार्टी बना देना चाहते हो तो सुन लो.. तुमसे ये न हो सकेगा… योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को चेलों के जरिए बाहर कराकर तूने अपना हाल देख लिया… पूरा देश तुम पर थूक रहा है…. अब मयंक गांधी ने तेरे गाल पर तमाचा मारा है.. बन तू जारा आलाकमान… सब निकाल लेंगे अपने अपने तीर कमान और तुझे औकात दिखा देंगे… अब भी वक्त है.. अहंकार त्यागो.. मयंक गांधी ने जो कुछ लिखा कहा है, उसे पढ़ो गुनो सुनो… सदबुद्धि आए तो योगेंद्र और प्रशांत से क्षमा मांग लेना, अपनी साजिशों और चिरकुटइयों के लिए..

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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केजरी की तानाशाही के खिलाफ मयंक गांधी का विद्रोह, पढें कार्यकर्ताओं के नाम खुली चिट्ठी

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केजरीवाल की तानाशाही के खिलाफ मयंक गांधी ने किया विद्रोह, पढ़िए कार्यकर्ताओं के नाम लिखी उनकी खुली चिट्ठी

प्रिय कार्यकर्ताओं,

मैं माफी चाहता हूं कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कल जो कुछ हुआ उसे बाहर किसी को न बताने के निर्देशों को तोड़ रहा हूं। वैसे मैं पार्टी का एक अनुशासित सिपाही हूं। 2011 में जब अरविंद केजरीवाल लोकपाल के लिए बनी ज्वाइंट ड्राफ्ट कमेटी की बैठक से बाहर आते थे तो कहते थे कि कपिल सिब्बल ने उनसे कहा है कि बैठक में जो कुछ हुआ उसे वो बाहर न बताएं। लेकिन अरविंद कहते थे कि ये उनका कर्तव्य है कि वे देश को बैठक की कार्यवाही के बारे में बताएं क्योंकि वो कोई नेता नहीं थे बल्कि लोगों के प्रतिनिधि थे। अरविंद ने जो कुछ किया वो वास्तव में सत्य और पारदर्शिता थी।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मेरी मौजूदगी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधि के तौर पर ही है और मैं ईमानदार नहीं होऊंगा अगर मैं ये निर्देश मानता हूं। कार्यकर्ताओं को किसी समीकरण से नहीं हटाया जा सकता। वे पार्टी के स्रोत हैं। उन्हें सेलेक्टिव लीक और छिटपुट बयानों से जानकारी मिले, इसकी बजाय मैंने फैसला किया है कि मैं मीटिंग का तथ्यात्मक ब्योरा सार्वजनिक करूंगा।

पिछली रात मुझसे कहा गया कि अगर मैंने कुछ भी खुलासा किया तो मेरे खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। अब जो हो, मेरी पहली निष्ठा सत्य के प्रति है। यहां योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बर्खास्तगी के संबंध में मीटिंग के तथ्य दिए जा रहे हैं। मैं राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निवेदन करूंगा कि मीटिंग के मिनिट्स रिलीज किए जाएं।

संक्षिप्त पृष्ठभूमि
दिल्ली के चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत भूषण ने कई बार धमकी दी कि वे पार्टी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे क्योंकि उन्हें उम्मीदवारों के चयन पर कुछ आपत्ति थी। हममें से कुछ किसी तरह इस मुद्दे को चुनाव तक शांत रखने में सफल रहे। आरोप था कि योगेंद्र यादव अरविंद केजरीवाल के खिलाफ साजिश कर रहे हैं और इसके कुछ सबूत भी रखे गए। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के बीच मतभेद सुलझने की हद से बाहर चले गए और उनके बीच विश्वास का संकट था। 26 फरवरी की रात जब राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य उनसे मिलना चाहते थे, अरविंद ने ये संदेश दिया कि अगर ये दो सदस्य पीएसी में रहेंगे तो वो संयोजक के तौर पर कार्य नहीं कर पाएंगे। 4 मार्च को हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की यही पृष्ठभूमि थी।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक
योगेंद्र यादव ने कहा कि वो समझ सकते हैं कि अरविंद उन्हें पीएसी में नहीं देखना चाहते, चूंकि अरविंद के लिए उनके साथ काम करना मुश्किल है इसलिए वो और प्रशांत पीएसी से बाहर रहेंगे लेकिन उन्हें बाहर नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे में दो फॉर्मूले उनके द्वारा पेश किए गए।

-पीएसी का पुनर्गठन हो और नए सदस्य चुने जाएं। इसके लिए होने वाले चुनाव में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव अपनी उम्मीदवारी पेश नहीं करेंगे।
-पीएसी अपने वर्तमान रूप में ही काम करती रहे और योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण मीटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे।

मीटिंग कुछ समय के लिए रुक गई और मनीष व अन्य सदस्यों ने दिल्ली टीम के आशीष खेतान, आशुतोष, दिलीप पांडेय और अन्य से मशविरा किया। इसके बाद मनीष ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की बर्खास्तगी का प्रस्ताव रखा। संजय सिंह ने इसका समर्थन किया। मैं इन दो कारणों की वजह से वोटिंग से बाहर रहा।

-अरविंद पीएसी में अच्छे से काम कर सकें इसके लिए मैं इस बात से सहमत हूं कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव पीएसी से बाहर रह सकते हैं और कुछ दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका ले सकते हैं।
-मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से बाहर रखने के प्रस्ताव के विरोध में था खासकर तब जब कि वे खुद अलग होना चाहते थे। इसके अलावा उन्हें हटाने का ये फैसला दुनिया भर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ है।

यानी, मैं उनके पीएसी से बाहर जाने से सहमत था लेकिन जिस तरह से और जिस भावना से ये प्रस्ताव लाया गया वो अस्वीकार्य था। इसलिए मैंने गैरहाजिर रहने का निर्णय लिया। दूसरी जानकारियां मीटिंग के मिनट्स जारी होने पर बाहर आ सकती हैं।

ये कोई विद्रोह नहीं है और न ही पब्लिसिटी का कदम है। मैं प्रेस में नहीं जाऊंगा। मेरे इस कदम के चलते मेरे खिलाफ प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई हो सकती है, तो ऐसा हो जाए।

जय हिंद

मयंक गांधी


मूल पत्र अंग्रेजी में है जिसे मयंक गांधी ने अपने ब्लाग पर अपलोड किया हुआ है… मूल पत्र को यहां भी दिया जा रहा है…

Dear Volunteers,

I am extremely sorry that I am breaking the diktat of not speaking to anyone outside on what transpired in the National Executive meeting, yesterday. Generally, I am a disciplined soldier of the party.

Arvind used to say that when they were coming out of the joint draft committee meeting of the Lokpal in 2011, Kapil Sibal used to ask them not to reveal anything to the outside world. Arvind used to answer that it was his primary duty to inform the nation about the proceedings, as he was not a leader but a representative of the people. Truth and transparency was all that he had.

My presence in the National Executive is only as a representative of the volunteers. And I would be dishonest to accept the gag order. The volunteers cannot be removed from the equation; they are the source of the party. Rather than get information from selective leaks and stray statements, I have decided to give some factual details of the meeting in the public domain.

Last night I was told that disciplinary action would be taken against me, if I revealed anything. So be it – my first allegiance is to the higher truth. Here is an essence of the meeting with regards to removal of YY and PB, based on my understanding. I would request NE to release the minutes of the meeting.

Short background
During the Delhi campaign, Prashant Bhushan had threatened multiple times that he will hold press conference against the party, because of his concerns on candidate selection. Some of us were successful in somehow or other to stave off the threat till the elections. It was alleged that Yogendra Yadav was conspiring against Arvind and some evidences were produced. There were also operational irreconcilable differences and trust deficit between AK, PB and YY

On 26th Feb night when members of the NE went to meet him, Arvind conveyed that he will not be able to work as Convenor, if these two members were part of the PAC. That was the background of the NE on 4th March.

NE meeting
Yogendra said that he understood that Arvind did not want them in PAC, as it was difficult to him to work together. He and Prashant would be happy to stay out of PAC, but they should not be singled out. Two formulas were put forward by him.

· That the PAC be reconstituted and new PAC members be elected through voting. PB and YY will not put their candidature.

· That PAC continue to function in the present form and YY and PB would not attend any of the meetings.

The meeting broke for some time and Manish and others conferred with the Delhi team of Ashish Khetan, Asutosh, Dilip Pandey and others. After reassembling, Manish proposed a resolution that YY and PB be removed from the PAC and it was seconded by Sanjay Singh.

I abstained to vote, because of two contrary reasons

1. Arvind needs a smooth working in the PAC. So, I agreed that PB and YY may be out of PAC and take some alternate important roles.

2. I was taken aback by the resolution of removing them publicly, especially as they themselves were willing to leave.Also, this decision to sack them was against the overwhelming sentiments of volunteers from all over the world.

So, while I agreed that they can step down from the PAC, the manner and intention behind the resolution was not acceptable. Hence, the decision to abstain.

The other details may come when the minutes of meeting is released.

This is not a revolt, nor is this some publicity ploy. I will not go to the press. There may be some repercussions overt and covert against me. So be it.

Jai Hind

Love

Mayank Gandhi


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योगेंद्र-प्रशांत निष्कासन प्रकरण से केजरीवाल की लोकप्रियता में तेजी से कमी आई

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योगेंद्र-प्रशांत निष्कासन प्रकरण के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है

‘आप’ की ‘पीएसी’ से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को निकलाने व इसके पहले चले पूरे विवाद के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है. सोशल मीडिया पर जो चिंतक, पत्रकार और एक्टिविस्ट किस्म के लोग केजरीवाल की तारीफ करते न अघाते थे, अब वे इस घटनाक्रम के बाद से केजरीवाल पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं. साथ ही, पूरे प्रकरण के बाद से योगेंद्र यादव की लोकप्रियता और कद में इजाफा हुआ है. यहां फेसबुक से उन कुछ स्टेटस को दिया जा रहा है जिससे पता चलता है कि अब तक ‘आप’ को सपोर्ट करते रहे लोग पूरे प्रकरण से दुखी हैं और केजरीवाल को कोस रहे हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

Om Thanvi : केजरीवाल की चुप्पी इसका संकेत देती थी, पर अब यही जाहिर है कि योगेंद्र यादव को पीएसी से बाहर करवाकर अरविंद उन युवतर ‘नेताओं’ के अभियान का हिस्सा बन गए जो खुद अहंकार और बड़बोलेपन से ग्रस्त हैं। इससे आप पार्टी का नुकसान होगा, शायद केजरीवाल की अपनी छवि को ठेस पहुंचे जिनका कद – पारंपरिक राजनीति से जुदा होने के कारण – लोग बहुत ऊँचा मानते आए हैं। अगर (पार्टी के मोरचे पर) यह आगाज है तो अंजाम की खुदा से दुआ ही कर सकते हैं। प्रशांत भूषण को भी पीएसी से निकाला। कहीं केजरीवाल छुट्टी से यह ट्वीट न करें कि वे इस पर भी दुखी और आहत हैं। कहते थे, हम दूसरों को राजनीति सिखा देंगे। भाईजान, ये राजनीति तो दूसरे पता नहीं कब से कर रहे हैं!

Mukesh Yadav : केजरीवाल की जो तानाशाह टाइप इमेज बनती जा रही थी अब उस पर मुहर लग गई!…लेकिन बात अभी ख़त्म नहीं होगी !..आठ लोगों ने योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण के समर्थन में वोट किया है। हालांकि अब इस पार्टी में वो बात नहीं रह जाएगी। दिल्ली को तो विकल्प मिल गया लेकिन बाकी देश के लोग दशकों तक इन्तजार क्यों करें? अच्छा तो यही हो कि सभी साथ बनें रहें! लेकिन अगर सहमति नहीं बनती तो ठीक है केजरीवाल दिल्ली संभालें और आप को भी संभालें! योगेन्द्र यादव-भूषण जैसे लोगों को अलग होकर दूसरे राज्यों में संगठन खड़ा करना चाहिए! लोगों के पास ज्यादा साफ़-सुथरे विकल्प होंगे। भविष्य में लोगों को केजरीवाल की आप और अगर कोई नई पार्टी इस टूट से निकलती है तो उसके बीच चुनाव करने का विकल्प होगा! साथ ही पुराने ढर्रे की राजनीति को भी विदा किया जा सकेगा। किसी ने सही ही कहा है कि हर संकट, एक नया अवसर भी साथ लेकर आता है। रही बात हमारी तो हम तो दोनों को आगे बढ़ाएंगे। क्यों?

Sheetal P Singh : The Yogendra Yadav/Prashant Bhushan won the battle of perception in their favour amongst masses connected to net or watching TV in urban centres though defeated on floor with a narrow margin. camp Kejriwal couldn’t perform as per expectations n one has to admit that the score of YY/PB is impressive

Mukesh Kumar : अब आप पर टिप्पणी करने का मन नहीं करता। लगता है दो मिनट का मौन रख लिया जाए।

Mohammad Anas : आम आदमी पार्टी एन जी ओ और मीडिया से छूटे उन लोगों का समूह है जिन्होंने क्रांति और स्वराज का सपना दिखा कर आम आदमी को ठग लिया. अरविंद केजरीवाल ठगों के सरगना हैं.

Amitaabh Srivastava : सचिव , वैद, गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज, धर्म , तन तीनि कर होइ बेगिही नास।। अरविंद केजरीवाल जी , रामचरित मानस में ये दोहा रावण को खुशामदी किस्म के और गलत सलाह देने वाले दरबारियों से बचने की चेतावनी के प्रसंग के तौर पर आता है। सबको मालूम है अंतिम नतीजा क्या हुआ। हालांकि इस तरह की राजनीतिक संस्कृति के प्रतिनिधि लोकप्रिय जननेता आपसे पहले भी बहुत रहे हैं लेकिन आपने भी अलग होने का भ्रम तोड़ दिया है। नतीजा भी भुगतना पड़ेगा।

Vivek Singh : और इस तरह प्रशांत भूषण के हटाए जाने के बाद आम आदमी पार्टी पूरी तरह राष्ट्रवादी हो गई है। दरअसल यह आम आदमी पार्टी की घरवापसी है।

Vineet Kumar : इस देश के महान दागदार संपादक सुधीर चौधरी अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहरा रहे हैं. दोषी इस बात के लिये नहीं जिसकी चर्चा सोशल मीडिया अउर बाकी चैनलों पर चल रही है. दोषी इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खांसी के लिए जिस डॉ से इलाज़ कराने की सलाह दी थी, उस पर केजरीवाल ने बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया. डीएनए में चौधरी ने केजरीवाल के खाँसी,सुगर से जुड़े मामले को इस तरह पेश किया कि वो चिंता कम, उनका और आप का मज़ाक बनाना ज़्यादा था.चुनकर आज के ही दिन ऐसा करना क्या कम बडा सर्कस है.‪

Mayank Saxena : दरअसल यह आम आदमी पार्टी के अंदर समाजवादियों का जमावड़ा है…समाजवादी, जो इस देश की राजनीति की सबसे अस्पष्ट राजनैतिक विचारधारा और अवसरवादी राजनीति रही है…समाजवादियों का इतिहास साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए, उनसे ही लगातार गठबंधन करते रहने, घनघोर दलित एवम् महिला विरोधी रहने और जातिवाद का इतिहास है… बाकी सब कुछ शीशे की तरह साफ है…संघी और समाजवादी जब मिलते हैं…तो सेक्युलरिज़्म और राष्ट्रवाद दोनों के नारे गूंजते हैं…वाम को गाली दी जाती है…अल्पसंख्यकों को छला जाता है और विकास के एजेंडे को महिमामंडित किया जाता है…अंततः परिणाम कभी 1977 की तरह 2 साल में ही सामने आ जाता है…तो कभी एनडीए की तरह 17 साल बाद… आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल, आप को ‘आप’ का जेडीयू-आरजेडी-सपा-आरएलडी-जेएमएम-जनसंघीकरण मुबारक हो…

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केजरीवाल से मेरा मोहभंग… दूसरी पार्टियों के आलाकमानों जैसा ही है यह शख्स…

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केजरीवाल से मेरा मोहभंग… दूसरी पार्टियों के आलाकमानों जैसा ही है यह शख्स…

Yashwant Singh : केजरीवाल से मेरा मोहभंग… घटिया आदमी निकला… दूसरे नेताओं जैसा ही है यह आदमी… संजय सिंह, आशुतोष, खेतान जैसे चापलूसों और जी-हुजूरियों की फ़ौज बचेगी ‘आप’ में… सारा गेम प्लान एडवांस में रचने के बाद खुद को बीमार बता बेंगलोर चला गया और चेलों के जरिए योगेन्द्र-प्रशांत को निपटवा दिया… तुम्हारी महानता की नौटंकी सब जान चुके हैं केजरी बाबू… तुम्हारी आत्मा कतई डेमोक्रेटिक नहीं है… तुम सच में तानाशाह और आत्मकेंद्रित व्यक्ति हो… तुममें और दूसरी पार्टियों के आलाकमानों में कोई फर्क नहीं है…

केजरीवाल ने शपथ ग्रहण के दिन दूसरों को उपदेश पेला था कि अहंकार मत करना. लेकिन सबसे पहले अहंकार देवी ने केजरीवाल को ही शिकार बनाया और इस आदमी को पता तक नहीं चला. यह पुराना खेल खेलता रहा. अपने चिंटूओं संजय सिंह, आशीष खेतान, आशुतोष आदि को योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण के खिलाफ सक्रिय कर दिया. उसके बाद खुद के बारे में अफवाह फैला दी कि बहुत बीमार हैं, बहुत मेहनत कर रहे हैं, इलाज कराने जा रहे हैं, बहुत दुखी हैं विवाद से आदि आदि. अंततः अहंकारी अरविंद केजरीवाल ने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पीएसी यानि पोलिटिकल अफेयर्स कमेटी से बाहर का रास्ता दिखवा दिया. खुद चुप्पी साधे महाप्रभु बना बैठा है.

अरविंद केजरीवाल ने अहंकार से ग्रस्त होकर दोनों साथियों को पीएसी से निकलवाकर खुद को भले ही मजबूत और सबसे प्रभावी साबित किया व विजेता घोषित कराया हो लेकिन उनकी इस जीत में भी हार है. मेरे जैसे करोड़ों लोग अरविंद केजरीवाल को बहुत डेमोक्रेटिक और अत्यंत धैर्यवान नेता मानते थे. यह भी मानते थे कि अरविंद दूसरों को गौर से सुनते विचारते हैं. पर यह सब छवि खंडित हो गई और यह एहसास हो गया कि यह आदमी भी बाकी पार्टियों के नेताओं की तरह बहुत छोटे दिल दिमाग का आदमी है. राजनीतिक फायदे के लिए शब्दों की जलेबी छानते हुए केजरीवाल भले ही खुद को खुद की जुबान से इमानदार से लेकर अति आम तक साबित करता फिरता रहा हो पर अब जब सफलता उनके चरणों में लोट रही है और पूरे देश की निगाह उनके क्रिया-कलापों पर है तो केजरीवाल ने अपनी नीच हरकत से खुद को एक्सपोज कर लिया है.

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे विचारवान व एक्टिविस्ट लोगों को किनारे करके केजरीवाल मूर्खों व चापलूसों की फौज मात्र ही तैयार करेंगे और अंत में इस पार्टी में वही सारे रोग लग जाएंगे जो दूसरी पार्टियों में हैं. किसी ने सच कहा था कि सारी क्रांतिकारिता का अंत सत्ता में घुसकर पावर एक्वायर कर लेने तक होती है, उसके बाद लोग अपने रीयल फेस, असली चाल चरित्र चेहरे में चले आते हैं. उम्मीद करते हैं कि केजरीवाल को अकल आएगी और अपनी गल्ती सुधारेंगे. अन्यथा, अहंकार बड़े बड़ों को नष्ट भ्रष्ट कर देता है, केजरीवाल क्या चीज हैं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट इस प्रकार हैं…

Janardan Yadav शत प्रतिशत समर्थन

Ishan Vidyarthi Uncle I have been following ur posts from long time..and really appreciated ur respect and liking for AK also today’s candid confession corroborates ur strong understanding of politics.!!!

Kamal Kumar Singh देर आये दरुस्त आये।

Vinod Rajput Ashutosh aur Khetan aaj bahot khush hain,bt jis din bahar nikala jayega,us din unka chehra dekhne layak hoga

चंदन एस.डी.आर सूरज चलिए अच्छा है, आपको भी समझ आ गया

Hardeep Siddhu ‘आप’ में ऐसा क्यों हुआ? असली वजह कुछ गिनेचुने लोगों को ही पता है। ये लोग कुछ भी बोलने को तैयार नही है और जिन्हें कुछ नही पता वो चुप होने को तैयार नही है।

Saleem Akhter Siddiqui ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी.

Vinod Rajput Dilip Pandey frm Zamania ye to bechare n ghar ke rahenge n ghat ke

Prakash Bisht Very sad dicision. Saare volunteers iss faisle se khush nhi hain

Arbind Jha der se he sahi nind to khula na bhaiya

Prakash Bisht Bhut dukh hua aaj

Santosh Singh चंपू गिरी जिंदाबाद.. भयउ विभव बिन तबहीं अभागा….अरे जो अन्ना और अरूणा राय के न हुए वो योगेंद्र और प्रशांत के क्या होंगे।

Drigvindu Mani Singh Yashwant bhai hum sabhi bhavuk log thaga hua mahsoos kar rahe hain……koyee kejariwal se to koyee modi se to koyee rahul se….

Yusuf Akhter 8-11 ke score mein nibta diya…koi football match Hai kya?

Vipul Prakash Rrg ye kya ho gaya bhai jaan? AAP to usake bahut bade fan the!!!
 
Mohit Prakash Singh खांग्रेस जैसी
 
Laxmi Narayan Der se hua
 
Ranjana Singh पहली बारिश में मुखौटा धुला
 
आशुतोष मित्रा जहां आँख खुले वहीं सवेरा…
 
Anil Singh Rajneeti badi zalim hoti hai. Etihas ne apne aapko dohra diya. Ek bar fir Akbar ne apne sarankshak Bairam Khan ko doodh ki makkhi ki bhati nikal feka
 
Kamlesh Yadav शातिर बदमाश निकला ,ऐसी उम्मीद नहीं थी।
 
Deepak Khokhar कोई फर्क नहीं है, फर्क है तो सिर्फ चेहरे में। सारा ड्रामा शुरू से ही चला आ रहा है। चोरों की टोली का सरदार है असल में ये।
 
Meena Gautam सर आप बिलकुल ठीक कह रहे है।

Hardeep Siddhu या तो आपको सबकुछ पता है या कुछ नही पता

Vk Sharma मेने पहले ही समझाया था Yashwant Singh भैया जी ये सबको मुर्ख मान रहा है और आप बन भी गए

Yashwant Singh Hardeep Siddhu bhayi. Aap bata dijiye. Mujhe nahi pata.

Santosh Yadav बहुत कुछ सूना है हम ने आस्तीन के ”साँप” के बारे में लेकिन मैं कुछ नही कहूंगा आज ”आप” के बारे में – संतोष यादव
 
Ashok Aggarwal यशवंत भाई वाकई में जौहरी हो ।
 
Dinesh Singh Sab Ek Saman Dal Hai , Bus Mauka Milne Ki Baat Hai
 
राजीव राय AAP ek loktantrik party hai..
 
Mahesh Dubey अब तक का सबसे सटीक विस्लेषण !
 
Shravan Shukla कल जब कहा तब गाली मिली। आज हम आपके पुराने रुख लार कायम हैं खैर… राजनीति में सबकुछ चलता है। केजरीवाल खिलाड़ी निकले
 
Ankit Patel यदि राष्ट्रीय कार्य कारिणी सर्वसम्मति से यह फैसला लेती कि अरविन्द केजरीवाल को संयोजक पद छोड़ देना चाहिये तो भी क्या इतना ही दुःख होता ? …. इसलिये धैर्य रखिये ! @Yashwant Singh Ji
 
Palash Dubey Ab kiski poochh pakde…?
 
Vivek Singh जब केजरीवाल के बगल में हमेशा संजय स‌िंह खड़े रहते थे तभी मुझे केजरीवाल पर शक होता था और 67 सीट जीतने के बाद जब आशुतोष से गले मिल रहे थे तब और समझ में आ गया।
 
Ravi Misra Bhai Maine bahut pehle hi kaha tha ye aadmi sahi nahi h.
 
Hardeep Siddhu Yashwant Singhसर जी मुझे नही पता। और जानने की लिए उत्सुक हूँ। उसके बाद ही सही गलत के बारे में कह पाउँगा। अपने केजरीवाल को घटिया करार दिया तो आपको सबकुछ पता होगा इसलिए पूछ रहा हूँ।
 
Sandeep Baslas हम तो पहले ही कहे रहे कि लुल्ल है ।

Vivek Singh और लड़ना ही था तो सामने से लड़ते केजरीवाल, बैठक में जाते और प्रशांत और योगेंद्र के खिलाफ वोट देते। पर जिसके बाप से पार्टी बनाने के लिए पैसा लिए हों उसके विरोध कर पाने का कलेजा कहां से लाते, इसीलिए भाग गए।
 
Citizen Journalist Jhunjhunu प्रशांत भूषण का कहा मुक़ाबला करेंगे ये !

रामचन्द्र लठवाल ग्रामीण छोटा मुँह बड़ी बात जो यशवंत जी की पोस्ट पर कोमेंट लिख रहा हूँ ……पर मुझे ये थोड़ी जल्दबाजी लग रही है …..अगले दो महीने लाला के कठिनतम हैं ……मगर उसके बाद अप्रत्याशित …..मोदी भी चरम छुयेगा …..अजीब घटनाक्रम के साक्षी बनेगे हम सब

Citizen Journalist Jhunjhunu आम आदमी पार्टी के स्तम्भ , प्रशांत भूषण ( जिनके पिता शांतिभूषण ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटने के लिए मज़बूर कर दिया था , राजनारायण केस में वकील ) जिनके व्यक्तिगत रूप से उठाये हुए सभी मुद्दो को आम आदमी पार्टी ने स्वयं द्वारा उठाये हुए बता कर जनता में अपनी छवि बनायीं , के साथ आज मुद्दे उठाने के सजा स्वरुप जो किया गया वो बेहद निंदनीय है एवं अनीति की पराकाष्ठा है ! श्री कृष्णा ने महाभारत में नीति अनीति पर कौरवो की सभा में जो कहा , उसे केजरीवाल और उनके लघु ह्रदय के साथीओ को ज़रूर पढ़ लेना चाहिए !

Vinit Utpal कोई बतायगा कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव की गलती क्या थी.
 
Sudhir Pradhan Right yashwant ji
 
Sushant Vimukt इस बार तो 49 दिन भी नहीं चले | अहंकार की बू आ रही है..
 
Vinit Utpal #RIPAAP
 
Yashwant Singh Hardeep Siddhu ji. केजरीवाल ने जो घटियापना किया कराया है, उसके बाद उन्हें घटिया आदमी न कहा जाय तो क्या कहा जाय।
 
Richa Mishra दो मदारी देश पर राज कर रहे है बेवक़ूफ़ बना रहे है और जनता तमाशा देख कर खुश है
 
Harish Singh Ho gayan bantdhar
 
Mini Sharma Ufffff yeh politics
 
Dilip Singh C,,h banata hai
 
Bhogendra Thakur आपने मेरे दिल की बात कह दी।
 
Vinod Rajput #AAP = Arvind Alone Party
 
Kishlay Sharma taana shah tab hota jab NE ki voting ko over rule kar ke YY ya PB ko bacha leta ..infact uske so called gang ke Ashish Khetan ,Ashutosh ,Dilip Pandey etc ke vote bhi nahin the NE mein ,Mayank Gandhi ne vote nahin kiya ..shayad Vishwas ne bhi vote nahin kiya…mere hisaab se tanashaah jaisa kuchh nahin hua shayad…ya fir ho bhi sakta hai main galat hoon.
 
Ahmad Ali Samani kejriwal 14 faruary ko ramlila maidan me kaha tha hamari party ko ahankaar nhi aana chahiye ..aaj sab ne dekh liya
 
Alok Pathak Aaa Gaya Humari mitti ka Sher Yashwant Singh wapas apne roop me aur sahi aukat batai Kejriwal ki . Mahadev aur Yashwant bhai ko holy ki badhai
 
Vinay Shri सौ फीसदी सच कहा
 
Arun Srivastava Jo bhee huaa bahut galat huaa….
 
Mantu Soni केजरी कितना अच्छा है उसका जवाब कुछ महीनों मे पता चल जाएगा ।
 
Nakul Chaturvedi अच्छा है Yashwant जी.. देर आए.. दुरुस्त आए… ख़ुशी इस बात की है कि आप जैसा बेबाक पत्रकार फ़र्ज़ी आम आदमी को जल्दी समझ गया… मगर अफ़सोस इस बात का कि आपने फरेबी आदमी का साथ इतने दिनों तक दिया.. वो भी पूरी शिद्दत से.. उम्मीद है भविष्य में आप .. कथित सच्चे आदमियों के चक्कर में नहीं पड़ेंगे..?

डॉ. प्रमोद सिंह अच्छा हुआ । इन माझियों का कोई भरोसा नहीं । न जाने कब नांव डूबोने पे आमादा हो जाएँ ।
 
Chandrabhan Singh Chalo achchha hua bhai samajh to gaya.
 
Jitendra Dave नकाब चढ़ते-उतरते रहे, रहनुमा लड़ते-झगड़ते रहे…

Rupendra Rinku यशवन्त जी आप गलत सावित होंगे। केजरीवाल के मन में ईतनी छोटी बात नही आ सकती, मेरे समझ के अनुसार
 
Arun Rai Bhagoda phir meeting chod kar bhaga ,
 
Praveen Praveen “आप ” ने वही आज किया जो “भाजपा” ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में यानी शिर्ष नेतृत्व के आपसी सिर फुटवैल में जमीनी कार्यकर्ता और वोटर के सहानुभूति को नजरअंदाज कर दिया गया और एक फैसला थोप दिया गया ।
 
Gulab Singh भूषण परिवार को केजरीवाल और उनके चापलूस कम ही जानते हैं।सो आप के ठाकुर चापलूसों को शांति भूषण परिवार के इतिहास को गहनता से पढ़ लेना चाहिए।ये वही लोग हैं जो छह दसक से लगातार देश के अधिनायकवादियो से संघर्ष कर रहे हैं।योगेन्द्र यादव।इनके कौशल व आभा से कोन परिचित नही है।
 
Nevil Clarke Is nirnaya se AAP ki kamar toot gayi( volunteers) party se vimukh ho gaye
 
Ayush Kumar विश्वास ने अपने दो बेहतरीन कांटो को हटा अपना राज्यसभा टिकट फाइनल कर लिया।
 
Harish Misra @ Gulab Singh इस देश मे हजारो परिवारो ने कुर्बानियां दी हैं,भूषण के सुर्खाब के पर नहीं लगे है ।”ठाकुर चापलूस ” एक निहायत बेहूदा टिप्पड़ी है । चापलूसों,कमजरफ़ो की जाति धर्म नहीं होता… केजरीवाल जनता के गुस्से की पैदाइस है और कोई ज्यादा…See More
 
Anita Bharati abhi yeh aaklan jaldbaaji hoga. kejari janta ke vishwas par khara utrega
 
Gulab Singh आप मुझे शायद ठीक पढ नही पाए हैं। या मै वैसे लिख नही पाया हूं जिसे आप सरल तरीके से पढ सके है। अपने देश में कई रजवाङे ठाकुरों के हुआ करते थे।जिनके फैसले ऐसे ही होते थे।जैसे कल महाभारत के विदुर,आचार्य और कृपाचार्य को, तानाशाही तरीके से राजनीतिक सूझबूझ की बलि चढ दी।केजरीवाल इतने बीमार नही हो सकते हैं कि संकट भरी, अपनी सभा में नही आ सकते थे।कल भूषण और यादव की क्षति नही हुई।यह आदमी के आधिकारो के लिए लङने वालों पर बङा हमला है।जिसकी नीवं गहरी हो गयी है।
 
Shubh Narayan Pathak मैं बहुत ही खास आदमी हूं। पता है क्यों – मैनें आंधी-तूफां के दौर में भी केजरी वाली टोपी नहीं पहनी।
 
Gulab Singh आरती जी,आमीन…..काश भगवान ऐसा करे।ईश्वर केजरीवालों के दिलों के आकार को बढाए।
 
Manoj Kumar Absolutly right sir
 
Babloo Yadav आआप का मतलब केजरीवाल कतई नहीं रहा मेरे लिए। आआप को एक विचार के रूप में ही लिया। लेकिन सत्ता लोलुप चाटुकारों ने इसे केजरीवाल का पर्याय बना दिया। ऐसी पार्टी का मैं कतई हिस्सा नहीं हो सकता।
 
Sandeep Singh AAP के NE के सदस्य हैं कौन ?
 
Sandeep Singh अरविंद और मनीष के NGO में काम करनेवाले वेतनभोगी कर्मचारी ?
 
Bahu Rani ये भी कोई कजरी वाली चाल तो नहीं Yashwant बाबू … परदे के पीछे छुपे आप विरोधी कोकरोचों को ढूंढ कर हिट से सफाया (block) करने का ???
 
Nawal Kishore It is time to wait
 
Alka Singh ghatiya woh pehle se hi tha – aap so rahe the
 
Ramesh Pandey behad satir hai bholay baba bana rahta hai aur taray taray kaat deta hai
 
Alka Singh farak to hai – doosari partiyan kamini hain to qubool to karti hain yeh ma$%#%#$%$%^&^&^&^ to apne ko acha dikha ke peeche se gala kaat deta hai
 
Suneel Tiwari Satya hai muskan bholi hai pr admi bahut shatir ar tanashah hai. Iski soch hai ye sahi hai baki Sab galat.
 
Kumar Rahman आम आदमी पार्टी के अंदर लोकतंत्र खत्म हो चला है और यहां चापलूसों की जमात इकट्ठा हो गई है… जहां सवाल उठाना मना है…
 
Dinker Srivastava देर से ही सही ज्ञान तो प्राप्त हुआ आपको……वैसे दुनिया में बहुत सारे लोग अपने ही अनुभव से सीखते हैं…..दूसरे लोगों की उचित सलाह भी उन्हें कभी कभी गाली सी लगती है…
 
Suresh Kumar Bijarniya जब केजरीवाल जनता से माफ़ी की नौटंकी करके सर्वोच्च पद पर रह सकते हैं तो यादव जी और प्रशांत को माफ़ क्यूँ नहीं किया जा सकता ? जनता से ज्यादा बडी हो गयी कार्यकारिणी?
 
Harpal Bhatia 1000%सहमत
 
Govind Baboo केजरीवाल ने अपनी प्रकृति के अनुसार किया । सब भौचक्के क्यों हैं । यह तो होना ही था । आगे आगे देखिऐ होता है क्या ।
 
Arun Sathi बंटाधार
 
Vinod Kumar Barai Better .. “AAP should decide on rotational leadership for fixed period” where every capabel leaders can get chance to show their performance, also a new way of leading….Yogendra Yadav is a strong-pillar-personality… (combination of 8:11 proves that)…
 
Vinay Yadav सर केजरीवाल के पास चापलूसों की जमात है। जो सिर्फ केजरीवाल की वजह से ही जाने पहचाने जाते हैं। चाहे वह संजय सिंह हों अथवा दिलीप पांडेय हों अथवा कोई और हो इस पार्टी की पीएसी में कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकियों को कौन जानता है। सारे केजरीवाल की परछाई हैं। ये संजय सिंह कौन हैं? इनका खुद का वजूद क्या है? लेकिन लोकतंत्र में जो चमचागिरी करने में माहिर हैं वो हमेशा मौज में रहते हैं। इसका उदाहरण संजय सिंह तथा अन्य लोग भी हैं। संजय सिंह ने बड़ी ही चालाकी से अपने रास्ते के सारे काटें निकाल फेंके हैं। सारा ड्रामा सिर्फ राज्य सभा के चुनाव की दावेदारी के लिए है। इन दो के रहते संजय सिंह और कुमार विश्वास की दाल नही गलती इसलिए ये सारा ड्रामा रचा गया।
 
Nilesh Malpani अभी किसी भी निष्कर्ष पर पहुचना जल्दबाजी होगी ।चुनाव के दौरान शांतिभूषण की बयानबाजी को भूलना नहीं चाहिये ।इसके पीछे की कहानी सामने आने दीजिये ।
 
Rubina Saifi Sir mujhe b yahi laga…. y faisla kisi bhi mayne m sahi nahi tha….
 
Ram Dayal Rajpurohit इतना जल्दी मोहभंग ,,,
 
Krishan Kant Upadhyay Sach kaha
 
Nitin Joshi yashvant ji 100% true
 
Shailendra Kumar Nimbalkar Asahmat
 
Sanjay Shukla Politics is the art of possibilities.. They should approach BJP or Congress!
 
Kapildev Tripathi मोह का भंग होना ही अच्‍छा। आप को केजरीवाल से मोह होगया था। टूट गया। अच्‍छा हुआ। वेसे भी अप जैसे मोहासक्‍त लोग हमेंशा अपने मन के अनुरूप देवता की खोज में रहते हैं। केजरीवाल देवता नहीं हैं। और वैसा तो बिलकुल नहीं हैं जैसा कि मोहंभंग के बाद उन्‍हें देख रहे हैं।
 
Pappu Nakhat देर से ही सही असलियत सामने आनी चाहिए
 
Gajendra Kumar Singh abhi eak cm aap ke pass hai use kitne log batenge prasant n yogendra bhi jaldi me hai aur neta 1 hota hai tabhi party chalti hai yah bahas ka bada mudda hai yaha nahi niptega


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योगेंद्र-प्रशांत निष्कासन प्रकरण के बाद अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है

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अंग्रेजी न्यूज चैनल का अहंकारी एंकर और केजरीवाल की जीत

Binod Ringania


पिछले सप्ताह राष्ट्रीय विमर्श में जिस शब्द का सबसे अधिक उपयोग किया गया वह था अहंकार। दिल्ली में बीजेपी की हार के बाद लोगों ने एक स्वर में कहना शुरू कर दिया कि यह हार अहंकार की वजह से हुई है। इन दिनों तरह-तरह का मीडिया बाजार में आ गया है। एक तरफ से कोई आवाज निकालता है तो सब उसकी नकल करने लगते हैं। और एक-दो दिन में ही किसी विचार को बिना पूरी जांच के स्वीकार कर लिया जाता है। इस तरह दिल्ली में हार की वजह को बीजेपी का अहंकार मान लिया गया। कल को किसी राज्य में बीजेपी फिर से जीत गई तो ये लोग उसका विश्लेषण कैसे करेंगे पता नहीं।

बीजेपी में कितना अहंकार आया है यह तो सोचने वाली बात है, लेकिन यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है आज इलेक्ट्रानिक मीडिया (आगे सिर्फ मीडिया लिखेंगे) का एक हिस्सा पूरी तरह अहंकार में डूबा हुआ है। आप यदि ऊंचे पद पर हैं तो उसके विरुद्ध कुछ बोल भी नहीं सकते। पिछली बार केजरीवाल को जब दिल्ली में जीत हासिल हुई थी तब मीडिया को मुगालता हो गया था कि यह जीत उसी की वजह से हुई है। इसलिए जब केजरीवाल ने मीडिया वालों को जेल भिजवाने की बात कही तो मीडिया बुरी तरह भड़क गया। केजरीवाल की खबरों पर एक तरह से बैन लग गया और मीडिया का आचरण ऐसा हो गया कि देखें अब कैसे जीतते हो। लेकिन केजरीवाल फिर से जीत गए।

मीडिया पर कोई-कोई एंकर तो इतना बुरा आचरण करता है कि आप शो को पूरा देख ही नहीं सकते। एक अंग्रेजी राष्ट्रीय चैनल के एंकर का नाम इसमें सबसे ऊपर आता है। यह अपने अतिथियों पर जमकर चिल्लाता है, उन्हें बोलने नहीं देता, उनकी ऐसी ग्रिलिंग करता है जैसी शायद सीबीआई वाले भी नहीं करते होंगे। जो शब्द उसके मुंह से बार-बार निकलते हैं वे होते हैं माय शो, माय शो। यानी मेरा कार्यक्रम, मेरा कार्यक्रम। कोई अहंकार में कितना डूबा हुआ है इसे मापने का एक तरीका यह है कि वह कितनी बार हम की बजाय मैं शब्द का इस्तेमाल करता है। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी भी हमारे गुजरात की बजाय मेरे गुजरात बोला करते थे। यह अलग बात है कि तब देश उनके रंग में पूरी तरह डूबा हुआ था और इन सब बातों पर ध्यान देने का किसी के पास वक्त नहीं था।

आप सबके खिलाफ बोल सकते हैं। बस कोर्ट और मीडिया के विरुद्ध नहीं बोल सकते। लेकिन अब मीडिया को भी औकात दिखाने वाला सुपर मीडिया बाजार में आ चुका है। यह सुपर मीडिया है इंटरनेट पर यूट्यूब। इस सप्ताह एक वीडियो शो यूट्यूब पर वायरल बुखार की तरह फैला और लाखों लोगों ने इसे देखा। इसमें एक नकली और और साथ में असली केजरीवाल का नकली इंटरव्यू लिया गया था। इंटरव्यू लेने वाला उस अंग्रेजी चैनल के अहंकारी एंकर की नकल कर रहा था जिससे उसके दर्शक आजिज आ चुके हैं। वह केजरीवाल को बोलने नहीं दे रहा था, हर पांच सेकंड पर उनकी बात काट रहा था, दिस इस माय शो, कहकर चिल्ला रहा था।

सोचने वाली बात है कि जब 24 घंटे के चैनल उपलब्ध हैं, तब क्यों लाखों लोगों ने यूट्यूब पर इस वीडियो को देखा। इसका मतलब है कि लोग इस एंकर के आचरण से बुरी तरह नाराज हैं। एक तरह से लोग मीडिया के कुल आचरण से ही नाराज हैं। जो युवा पीढ़ी है वह इस तरह के मीडिया को सहन करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। और हो सकता है कि आने वाले दिनों में युवा पीढ़ी ही मुख्यधारा के मीडिया को अपना आचरण बदलने के लिए बाध्य कर दे।

गुवाहाटी में हमारे मित्र अतनु भुयां ने एक किताब लिखी है टीआरपी। दो महीनों के अंदर ही इसके कई संस्करण निकालने पड़ गए। असम की पुस्तक इंडस्ट्री में यह एक अभूतपूर्व बात है। भुयां ने अपनी पुस्तक में बताया है कि टीआरपी क्या होती है। दरअसल टीआरपी मापने वाली कंपनी एक शहर के कुछ चुने हुए घरों में टीवी के साथ टीआरपी मशीन फिट कर देती है। उसके बाद उस घर के लोग किस समय कौन सा कार्यक्रम देखते हैं वह सबकुछ रिकार्ड होता रहता है। उदाहरण के लिए गुवाहाटी के चालीस या पचास घरों में ये मशीनें लगी हुई हैं। इन चालीस या पचास घरों में टीवी पर जो कुछ देखा जाता है उसी पर गुवाहाटी की टीआरपी निर्भर करती है।

अतनु लिखते हैं कि होमेन बरगोहाईं की टीआरपी बिल्कुल कम आती है, जबिक शाम के समय दिखाई जाने वाली गुवाहाटी की क्राइम न्यूज की टीआरपी काफी अधिक होती है। किसी चोर-उचक्के को पकड़कर  उसकी पिटाई (जो कि कानूनन जुर्म है) करने के दृश्य की टीआरपी भी बहुत अधिक होती है। चैनलों का ध्यान इस बात पर रहता है कि इन चालीस-पचास परिवारों की रुचि क्या है। उन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि राज्य भर के लोग कौन से कार्यक्रम देखना चाहते हैं। इस तरह चालीस-पचास परिवार (ये परिवार कौन से हैं कोई नहीं जानता) ही असम राज्य के सभी चैनलों पर क्या दिखाया जाएगा इसे तय करते  हैं। यह हाल सारे देश का है। ऐसे में मीडिया के कार्यक्रमों का स्तर क्या रह जाएगा सोचने वाली बात है।

…….

अंततः केजरीवाल फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। यह दिल्ली या देश के लिए अच्छा होगा या बुरा। कुछ भी हो केजरीवाल जुनूनी तो हैं ही। एक समय उन्हें लगता था राइट टु इंफार्मेशन ही सबकुछ है। इससे भ्रष्टाचार दूर हो जाएगा। फिर उन्हें लगा कि लोकपाल आने पर सबकुछ ठीक हो जाएगा। फिर लगने लगा कि सत्ता हासिल किए बिना कुछ भी संभव नहीं है। वे किसी भी चीज के पीछे जुनूनी बनकर लग जाते हैं। जब तक उन्हें नहीं लगता कि लक्ष्य हासिल करने के लिए यह सही औजार नहीं है तब तक वे उसे छोड़ते नहीं हैं। इसी तरह नया करने की उनमें बुद्धि और सामर्थ्य है। टीएन शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले किसी को इस पद की ताकत का पता नहीं था। हमें लगता है मुख्यमंत्री पद की ताकत का भी अभी तक किसी ने पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया है। एक धारणा बन गई है कि भारत में सरकारी कर्मचारियों से काम करवाना आसान नहीं है, न ही यहां घूसखोरी को खत्म करना आसान है। हो सकता है केजरीवाल हमें मुख्यमंत्री की असली ताकत का एहसास करवा दे। आप समर्थन करें या विरोध – आईआईटी खड़गपुर का यह पूर्व छात्र बुद्धिमान तो है ही। आईआईटी केएचजी का टेंपो हाई है।

लेखक Binod Ringania से संपर्क +919864072186 के जरिए कर सकते हैं.

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एक अकेले बंदे ने, एक अकेली शख्सियत ने पूरी की पूरी केंद्र सरकार की नींद उड़ा रखी है

दिल्ली चुनाव इन दिनों आकर्षण और चर्चा का केंद्र है. हो भी क्यों ना, एक अकेले बंदे ने, एक अकेली शख्सियत ने पूरी की पूरी केंद्र सरकार की नींद उड़ा कर रखी हुई है. आपको याद होगा कि 2013 में सरकार गठन पर अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि अन्य दलों को राजनीति तो अब आम आदमी पार्टी सिखाएगी. अब जाकर यह बात सही साबित होती हुई दिखाई दे रही है. जहाँ महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू कश्मीर और हरियाणा में बीजेपी ने बिना चेहरे के मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा और नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन दिल्ली में उसे चेहरा देना ही पड़ा. अपने पुराने सिपहसालारों व वफादारों को पीछे करके एक बाहरी शख्सियत को आगे लाया गया. देखा जाए तो ये भी अपने आप में केजरीवाल और उनकी पार्टी की जीत है. कहना पड़ेगा, जो भी हो, बन्दे में दम है.

दिल्ली चुनाव में आवाम संस्था द्वारा उठाये गए सवालों पर भी कई सवाल हैं. सबसे पहले वक़्त और नीयत का है. क्या अगर आवाम की नीयत साफ़ थी तो लोक सभा चुनावों के वक़्त यह आरोप क्यों नहीं लगाए. फिर आवाम दावा करती है कि काले धन को चेक से सफ़ेद किया जा सकता है. इसका मतलब अगर मान लिया जाए यह काला धन था तो सवाल है कि क्या ‘आप’ पर सवाल उठाने वाली अन्य पार्टियां भी अपनी फंडिंग की जाँच कराने के लिए तैयार होंगी. ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है. इसका जवाब ख़ास तौर पर बीजेपी और कांग्रेस को भी देना चाहिए. वो भी जब केंद्रीय बीजेपी नेतागण भी काले धन की चेक से फंडिंग की संभावना को मानते हैं.

आरोप लगाया जाता है कि अरविन्द दिल्ली छोड़ कर भाग गए. उन्हें भगोड़े का तमगा दिया गया, लेकिन यदि दिल्ली चुनाव में ‘आप’ दूसरी बड़ी पार्टी थी तो जम्मू काश्मीर में बीजेपी भी दूसरी बड़ी पार्टी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जम्मू काश्मीर में सरकार गठन के सवाल पर बीजेपी भी रणछोड़ या भगौड़ी नहीं है. दिल्ली को सरकार विहीन बनाने के लिए ‘आप’ को जिम्मेवार मानने वाली पार्टी क्या खुद जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालात के लिए जिम्मेवार नहीं है. जम्मू काश्मीर में दोबारा चुनाव की सुगबुगाहट के लिए क्या बीजेपी जिम्मेवार नहीं है.

यदि जनलोकपाल और भ्रष्टाचार रोकने जैसे गंभीर किसी मुद्दे पर इस्तीफ़ा देना रणछोड़ है तो क्या बीजेपी यह मानती है कि सरकार पूरे समय चलाओ और फिर चाहे इसके लिए कितना भी भ्रष्टाचार हो,  वो जायज़ है. चाहे जितने मर्ज़ी कारोबारियों को आम जनता की जेब काटकर फायदा दिया जाए. ये भी एक सवाल है क्योंकि मानें या ना मानें, दिल्ली में ‘आप’ की सरकार के दौरान भ्रष्टाचार पर लगाम तो लगी थी. मेरे खुद के राज्य हिमाचल प्रदेश के ड्राइवर भाई इस बात के गवाह हैं, जिन्हें पहले दिल्ली माल ले जाने पर सिर्फ एक चक्कर के हज़ार हज़ार रुपये रिश्वत देनी पड़ती थी, लेकिन अरविन्द सरकार के दौरान उन्हें इस प्रथा से मुक्ति मिली. तब वही ड्राइवर भाई जो पहले दिल्ली जाने से कतराते थे, अरविन्द सरकार के दौरान दिल्ली जाने के लिए उत्सुक और खुश होते थे. दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों के लोग भी इस बात को मानते हैं. अब दिल्ली की जनता तय करे कि उसे किसे मौका देना है.

संदीप खड़वाल 
वरिष्ठ पत्रकार
ऊना, हिमाचल प्रदेश
088949-12501
stringerslife@gmail.com

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एनडीटीवी प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को पूरी तरह घेर लिया

Shambhunath Shukla : एक अच्छा पत्रकार वही है जो नेता को अपने बोल-बचन से घेर ले। बेचारा नेता तर्क ही न दे पाए और हताशा में अंट-शंट बकने लगे। खासकर टीवी पत्रकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। बीस जनवरी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को ऐसा घेरा कि उन्हें जवाब तक नहीं सूझ सका। अकेले कोहली ही नहीं कांग्रेस के प्रवक्ता जय प्रकाश अग्रवाल भी लडख़ड़ा गए। नौसिखुआ पत्रकारों को इन दिग्गजों से सीखना चाहिए कि कैसे टीवी पत्रकारिता की जाए और कैसे डिबेट में शामिल वरिष्ठ पत्रकार संचालन कर रहे पत्रकार के साथ सही और तार्किक मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं। पत्रकार इसी समाज का हिस्सा है। राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति उसे भी प्रभावित करेगी। निष्पक्ष तो कोई बेजान चीज ही हो सकती है। मगर एक चेतन प्राणी को पक्षकार तो बनना ही पड़ेगा। अब देखना यह है कि यह पक्षधरता किसके साथ है। जो पत्रकार जनता के साथ हैं, वे निश्चय ही सम्मान के काबिल हैं।

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी (अरविन्द केजरीवाल) नहीं होती तो दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई मनोज तिवारी, जगदीश मुखी, विजय कुमार मल्होत्रा या स्मृति ईरानी हो सकता था। पर मोदी की दिल्ली रैली के बाद पार्टी को लगा कि बेहतर विकल्प की जरूरत है और किरण बेदी परिदृश्य में आईं। बेशक यह दिल्ली के लिए बेहतर विकल्प है। दूसरे संभावित उम्मीदवारों से अच्छी हैं। दिल्ली को लाभ हुआ है। भारतीय जनता पार्टी आम आदमी पार्टी से परेशान है। मोदी के नाम पर वोट मांगने की रणनीति बदलनी पड़ी। भाजपा को केजरीवाल से (बादल + चौटाला+पवार से भी) ज्यादा डर लग रहा है। यह अच्छी बात है। अरविन्द केजरीवाल के कारण ही हम देख रहे हैं कि संघ से बाहर का भी कोई व्यक्ति भाजपा का चेहरा बन पाया। और मोदी ही हर जगह भाजपा के चेहरा नहीं रहेंगे। यह भी अच्छी बात है, सकारात्मक है। अगर हम एक ईमानदार और अच्छी साख वाली ताकत बना सकें तो स्थापित राष्ट्रीय पार्टियां ईमानदार नए चेहरों को जोड़ने के लिए मजबूर होंगी। इस दबाव को बनाए रखने की जरूरत है। आप को समर्थन का मतलब है राष्ट्रीय दलों को जनता के प्रति अपना व्यवहार बदलने के लिए मजबूर करना।

Mukesh Kumar : केजरीवाल का कहना सही लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी नाक बचाने के लिए किरण बेदी को आनन-फानन में मुख्यंमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया है। अब अगर हारे तो ठीकरा बेदी के सिर फूटेगा और जीते तो कहा जाएगा मोदी बड़े रणनीतिकार हैं। लेकिन दिल्ली की हार मोदी एंड कंपनी के लिए बड़ी हार होगी और इसके ब़ड़े प्रभाव भविष्य की राजनीति पर देखने को मिलेंगे। आपको क्या लगता है, बेदी के कंधों पर रखकर बंदूक चलाने के इस प्रयोग से मोदी दिल्ली बचा पाएंगे?

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला, संजय कुमार सिंह और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर अच्छा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने रेडियो पर एक विज्ञापन चलाया जो इस प्रकार है, “गलती मेरी ही थी। आम आदमी, आम आदमी कहकर धोखा दे दिया। बड़े-बड़े वादे। पानी मुफ्त कर देंगे। आंसू दे गया। घर के काम छोड़कर उसके लिए मीटिंग करवाई, मोहल्लों में। पर बदले में क्या मिला। सब छोड़कर भाग गया। इनके अपने आदमी तक चले गए। गैर जिम्मेदारी का बदला लेंगे। अब इस नाकाम आदमी को वोट न देंगे। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

इसका जवाब अरविन्द केजरीवाल की आवाज में आ रहा है। रेडियो विज्ञापन में वे कहते हैं, “मैंने एफएम रेडियो पर एक बुजुर्ग महिला की आवाज सुनी। बहुत दुखी नजर आ रही थीं क्योंकि उन्होंने मुझे वोट दिया और मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा, मैंने उनके वोट का सम्मान नहीं किया। आज मैं उन्हीं से मुखातिब हूं। मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि माताजी, मैं कहीं भाग के नहीं गया कुछ ही दिनों में पूर्ण बहुमत लेके आपकी सेवा में फिर आ रहा हूं। आप अपना विश्वास बनाए रखिए। ना तो आपका वोट व्यर्थ गया ना आपका परिश्रम। कमी रह गई थी तो कुछ सीटों की आप विश्वास और आशीर्वाद बनाए रखिए हम पूर्ण बहुमत लेकर आपकी सेवा करने पूरे पांच साल के लिए फिर से वापस आ रहे हैं। आप नाराजगी छोड़िए, थोड़ा मुस्कुरा दीजिए।”

इसके अलावा, भाजपा और उसके सहयोगियों ने जो वोटबटोरू मुद्दे उठाए हैं (जीन्स पहनने, महिलाओं की नौकरी, लव जेहाद, गोड्से की मूर्ति) उनका मजाक उड़ाने वाला एक विज्ञापन आम आदमी पार्टी की ओर से आता है। हालांकि इसमें भाजपा का नाम नहीं लिया गया है। भाजपा के ज्यादातर विज्ञापन आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को लक्ष्य करते हैं। मुद्दे उसके पास हैं नहीं या उन्हें अभी सामने नहीं ला रही है पर अभी जो तीर दागे जा रहे हैं उसका एक और नमूना देखिए…

“कुछ ना था वो। चार दिन की चांदनी दिखाकर भाग गया। तुम खुद सोचो, जो अपने लालच के लिए एक बार जनता का विश्वास तोड़ सकता है वो दोबारा क्या ऐसा नहीं कर सकता? मगर भाई … … अरे तू रहने दे। सरकारी बंगला ठुकराने के बाद बंगला ले लिया… गाड़ी ठुकराने के बाद वो भी ले ली। जो अपने वादों पर ना टिका वो अपने विश्वास पर क्या खाक टिकेगा? ऐसी बचकानी हरकत करने वाले को तू चाहता है कि मैं वोट दूं। बात करता है। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

देखना है जनता नाराजगी छोड़कर मुस्कुराती है या मुस्कुराते हुए मोदी के साथ चली जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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ABP न्यूज ने ‘तर्क’ से जिताया मोदी को

पाठकों की राय को दरकिनार कर ABP न्यूज ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साल 2014 का व्यक्ति विशेष बना डाला। ABP न्यूज ने अपनी वेबसाइट ABP live पर साल 2014 के व्यक्ति विशेष का पोल करवाया। इस पोल में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुरी तरह पछाड़ दिया। मगर, ABP न्यूज ने निम्न तर्क देते हुए अरविंद केजरीवाल को हरा दिया।

”दर्शकों की राय में अरविंद केजरीवाल व्यक्ति विशेष हैं. लेकिन देश को पिछले 30 साल में पहली बार 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार नरेंद्र मोदी ने दी है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ABP न्यूज के 2014 के व्यक्ति विशेष हैं।”

लगता है कि ABP न्यूज ने अपनी छवि को बचाने के लिए इस तरह का हथकंडा अपनाया है। कहीं, उस पर आम आदमी पार्टी का पक्षपाती होने का आरोप न लग जाए। इस पोल में अरविंद केजरीवाल को 52.63 फीसदी मत मिले, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 34.12 फीसदी। इस तरह लोगों की पसंद में केजरीवाल आगे रहे।

Kulwant Happy
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अजीत अंजुम की बिटिया जिया ने मोदी की बजाय केजरी पर मुहर मारा (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : अजीत अंजुम ‘इंडिया टीवी’ चैनल में मैनेजिंग एडिटर हैं. इनकी एक प्यारी सी बिटिया है. नाम है- जिया. लगभग साढ़े आठ साल की होंगी. एक रोज यूं ही जिया ने अपने पापा से बातचीत के दौरान केजरीवाल और मोदी को लेकर जिक्र किया. अजीत अंजुम के भीतर का पत्रकार जगा और उन्होंने जिया से सहज भाव से बातचीत करते हुए सब कुछ मोबाइल में रिकार्ड कर लिया. जिया की मम्मी हैं गीताश्री जो खुद जानी-मानी महिला पत्रकार हैं. पत्रकार मां-पिता की बिटिया होने से उन्हें घर में बहस और विचार का माहौल मिलेगा ही. और, इस माहौल में अगर बच्चा अपनी कोई ओपीनियन बनाए तो वह सुनने जानने लायक होगा.

इस वीडियो में जिया ने कितने प्यार से बताया कि मोदी खुद का टीवी में विज्ञापन चलवा चलवा कर वोट पाए हैं. मोदी और केजरीवाल में से किसी एक के चुनने के सवाल पर जिया पहले तो दोनों को अच्छा बताती है, साथ ही यह भी कहती है कि किसी एक को अच्छा कहूंगी तो दूसरा बुरा मान जाएगा. लेकिन जब पपा अजीत अंजुम ने उनसे कहा कि आप एक पर राय बनाइए और बताइए तो जिया ने केजरीवाल का नाम लिया और केजरीवाल को चुनने का कारण बताया. जरूर देखने लायक वीडियो है. राजनीतिक रूप से हम किसी से सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन इस वीडियो में जो खास बात देखने समझने लायक है वह एक बच्ची का मनोविज्ञान. वह राजनीतिक रूप से अपने हम उम्र बच्चों से काफी सचेत है. उसकी पूरी बातचीत इन्नोसेंस से भरी पड़ी है. वीडियो देख कर मैं तो यही कह उठा कि पुत्री के पांव पालने में दिख रहे हैं. यानि ये बिटिया पक्का एक दिन मां-पिता और देश-समाज का नाम रोशन करेगी. लव यू जिया. हजारों साल जियो.

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=X7FG3Y58QM4

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस / वीडियो पर वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की टिप्पणी कुछ यूं है… Sanjaya Kumar Singh : अच्छे जवाब के लिए अजीत ने जिया को गुड कहा है। अच्छे आईडिया के लिए अजीत भी गुड कहलाने के पात्र हैं। वाकई पॉलिटिकली काफी जागरूक है जिया।

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