आशीष खेतान भी छोड़ चले, ‘आप’ अब चाटुकारों का समूह!

Anurag Anant : अरविंद केजरीवाल ने सिद्ध कर दिया है, जनभावनाओं को वो अनाथ खेत मानते हैं और जब मन करता जोत लेते हैं, जब मन करता है। कुछ बो देते हैं, फसल काट लेते हैं, गाय-भैंस छोड़ देते हैं चरने के लिए। विकास की थोथी अभिधारणा रचने में लगे हुए बौनों आदमियों का समूह बन गयी है आप आदमी पार्टी। Continue reading

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जब केजरी पार्टी ‘पीटी’ जा रही थी तो कांग्रेसी उपदेश देते थे, अब कांग्रेसी ‘मारे’ जा रहे तो आपिये आइना दिखाने लगे!

Sheetal P Singh : अनुभवी लोग… अहमद पटेल पर बन आई तो अब बहुतों को लोकतंत्र याद आ रहा है ………आना चाहिये पर शर्म भी आनी चाहिये कि जब बीते ढाई साल यह बुलडोज़र अकेले केजरीवाल पर चला तब अजय माकन के नेतृत्व में कांग्रेसी राज्यपाल के अधिकारों के व्याख्याकारों की भूमिका में क्यों थे? जब एक बेहतरीन अफ़सर राजेन्द्र कुमार को सीबीआई ने बेहूदगी करके सिर्फ इसलिये फँसा दिया कि वह केजरीवाल का प्रिंसिपल सेक्रेटरी था तब भी लोकतंत्र की हत्या हुई थी कि नहीं? जब दिल्ली के हर दूसरे आप विधायक को गिरफ़्तार कर करके पुलिस और मीडिया परेड कराई गई तब भी यमुना दिल्ली में ही बह रही थी! तब कांग्रेसी बीजेपी के साथ टीवी चैनलों में बैठकर केजरीवाल को अनुभवहीन साबित कर रहे थे! अब अनुभव काम आया?

मोदी जी व अमित शाह की जोड़ी इस देश के हर मानक को चकनाचूर करके एक तानाशाह राज्य के चिन्ह स्थापित कर रही है। इनकम टैक्स ई डी सीबीआई आदि नितांत बेशर्मी से स्तेमाल किये जा रहे हैं। फिलवक्त इनकम टैक्स ने कर्नाटक के उस मंत्री के यहाँ छापा मारा है जिसके यहाँ गुजरात के कांग्रेसी विधायकों को पोचिंग से बचाकर रक्खा गया है! इंदिरा / संजय की तानाशाही का भी एक दौर था! कांग्रेस को वहाँ तक पहुँचने में कई दशक लग गये थे ये डिजिटल पार्टी है सो बुलेट स्पीड से हर पड़ाव पार कर रही है।

पत्रकार से उद्यमी फिर आम आदमी पार्टी के नेता बने शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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चंदा और सरकारी धन के खर्च का हिसाब क्यों नहीं देती ‘आप’?

आम आदमी पार्टी का ताज़ा विवाद गौर तलब है. इससे एक बार फिर टीम अन्ना और अरविंद केजरीवाल की चौकड़ी के भ्रष्टाचार से लड़ने के उन खोखले दावों की पोल खुल कर सामने आ गई है, जो वे पिछले 5 सालों से करते आ रहे थे. कपिल मिश्रा के आरोपों से पहले दिल्ली से लेकर पंजाब तक आम आदमी पार्टी पर तरह-तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं. भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के दौरान खुद अन्ना हजारे ने केजरीवाल द्वारा चंदे का हिसाब नहीं देने का सवाल उठाया था. उससे भी पहले यह सच्चाई सबके सामने आ चुकी थी कि केजरीवाल सरकार का 9 लाख रूपया दबा कर बैठे थे.

दरअसल, ज्ञात और अज्ञात स्रोतों से, देश-विदेश से जो करोड़ों की रकम का अम्बार आम आदमी पार्टी ने खड़ा किया, उसका कहां, कब, किस मकसद के लिए, किस रूप में इस्तेमाल किया – ये सवाल सबके जेहन में है। केजरीवाल ने बतौर मुख्यमंत्री अपनी छवि चमकाने के लिए 5-6 सौ करोड़ और नरेन्द्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री 11 अरब रुपये खर्च कर डाले हैं. सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि यह सरकारी धन की डाकाजनी है, जो  मेहनतकशों और करदाताओं से आता है. सोशलिस्ट पार्टी ने दिल्ली विधानसभा और लोकसभा के चुनावों के वक्त कांग्रेस और भाजपा समेत ‘आप’ को विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन की जांच की मांग गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग से की थी. लेकिन उसकी बात सुनी नहीं गई. 

दूसरे दलों में पारदर्शिता के हिमायती ‘आप’ सुप्रीमो को अपनी पार्टी के चंदे का हिसाब देने के नाम पर सांप सूंघ जाता है। केजरीवाल देश की जनता को चंदे का हिसाब कभी नहीं बताते। उन्होंने चंदा देने वाले लोगों की रजामंदी के बगैर बनारस, गोवा और पंजाब के चुनावों में करोड़ों रुपया खर्च कर डाला. भ्रष्टाचार की पोल खुलने पर वे स्वम्भू ईमानदार होने का पैंतरा चलते हैं, जिसका कुछ स्वार्थी तत्व आँख मूँद कर समर्थन करते हैं. इनमें कई लेखक और बुद्धिजीवी भी शामिल है. इन्हीं लोगों के बल पर केजरीवाल न चंदे का हिसाब देते हैं, न विदेशी यात्राओं पर खर्च किये गए सरकारी धन का. 

सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि ‘आप’ शुरु से ही जिस तरह के तत्वों का जमावड़ा रही है, उसमें यह संभव है कि कल तक केजरीवाल के करीबी और ‘आप’ सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्रा को भाजपा ने खरीदा हुआ हो. लेकिन अकूत चंदे का हिसाब तथा मंत्रियों की विदेश यात्राओं पर खर्च किये गए सरकारी धन का सवाल अपनी जगह बना हुआ है.  

सोशलिस्ट पार्टी एक बार फिर देशवासियों के सामने यह सच्चाई रखना चाहती है कि ‘आप’ कार्पोरेट राजनीति का अभिन्न अंग है. नवसाम्राज्यवाद विरोधी प्रतिरोध को निष्क्रिय करने के लिए कांग्रेस-भाजपा के बाद वह कार्पोरेट का नया हथियार है, जो देश की मेहनतकश जनता के खिलाफ चलाया गया है.  

योगेश पासवान
महासचिव व प्रवक्ता
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) दिल्ली प्रदेश    

Why Does AAP not account for the spending of donations and government funds?

Aam Aadmi Party’s latest controversy is worth noting. Once more, it has exposed the empty claims to fight corruption made by Anna Hazare, Arvind Kejriwal and their ilk have been making for over five years now. Before Kapil Sharma’s accusations, the Aam Aadmi Party (AAP) has been accused of corruption from Delhi to Punjab. During the anti-corruption campaign, Anna Hazare had himself charged Kejriwal for not divulging the details regarding donations. Before even that, it had been revealed to all that Kejriwal, as a government employee, had appropriated 9 lakh rupees of the government. How, when, where and to what use was the massive fund raised in the course of the movement (through known and unknown sources, both national and international) put for, is the one question on everyone’s mind is. Kejriwal in a bid to build his image as chief minister has used up 5-6 hundred crores, just as PM Narendra Modi has spent 11 billion. The Socialist Party believes that this is a brazen looting of public money which is generated by the taxpayers and the labour of the working class. The Socialist Party had requested both the Home Ministry and the Election Commission of India to investigate the funding sources of the BJP, Congress, and AAP, but the request was not heeded.

While it endorses transparency in other parties, the moment questions are raised on its own funding, the AAP has nothing to say. Kejriwal never talks about his own funding sources. He spent a lot of those funds in Benaras, Goa and Punjab without the consent of those who gave the funds. Whenever corruption is to be exposed, he plays the self-styled honest-guy card. Many with vested interests endorse him blindly. These include many writers and intellectuals. Riding on their support, Kejriwal gives no account of either the funds or the government money spent on international travel.

The Socialist Party believe that given the kind of conglomeration AAP has been right from the days of its inception, it is possible that the someone close to Kejriwal till yesterday like Kapil Mishra has been bought overby the BJP. But the question of undeclared funding and the spending of government funds still remains to be answered.

The Socialist Party yet again wants to bring the truth about the AAP to the citizens, which is that AAP is an integral part of corporate politics. It is the newest weapon, after the Congress and BJP, wielded by the corporate establishment to counter the peoples’ resistance to neo-liberalism.

Yogesh Paswan
General Secretary and Spokesperson
Socialist Party (India) Delhi State

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दिल्ली में निगम चुनाव ‘आप’ हारी तो विधानसभा का मध्यावधि चुनाव संभव

Akhilesh Akhil : दिल्ली में मध्यावधि चुनाव की संभावना! क्या दिल्ली में विधानसभा चुनाव समय से पहले भी हो सकते हैं? निगम चुनावों में अगर आप का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो उसमें तोड़फोड़ की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि आप के कई विधायक टूट सकते है। इसके अलावा आप के 21 विधायकों के खिलाफ चुनाव आयोग में लाभ के पद का मामला लंबित है। अगर इनकी सदस्यता ख़त्म हो गयी तो जाहिर मध्यावधि चुनाव संभव है। माना जा रहा है कि 21 विधायकों पर जल्द ही फैसला होना है।

Nadim S. Akhter : अगर केजरीवाल जब एमसीडी का चुनाव हारते हैं तो दोष ईवीएम मशीन पे ही मढ़ा जाएगा ना!! वैसे केजरीवाल भी यही चाहते हैं ताकि जनता के बीच अपनी बुरी तरह घटी साख को ईवीएम में छुपा लें। बेहतर हो कि एमसीडी चुनाव देर से ही सही, पर पर्ची वाली ईवीएम से हो या फिर बैलट से। ताकि हारने वाली पार्टी या व्यक्ति कोई बहाना ना बना सके। ये ईवीएम में गड़बड़ी की बात हर राजनीतिक पार्टी को सूट कर रही है। हार गए तो ईवीएम मैनेज्ड थी जी। और जीत गए तो उंगली से विक्ट्री का निशान बना देंगे। बहुत मोटी चमड़ी है इनकी।

पत्रकार द्वय अखिलेश अखिल और नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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इस हार के लिए केवल केजरीवाल और सिसोदिया जिम्मेदार हैं

Asrar Khan : दिल्ली के राजौरी गार्डन विधान सभा उप चुनाव में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की शर्मनाक हार और भाजपा की जीत तथा कांग्रेस का दूसरे स्थान पर आना शायद इस बात का संकेत हो सकता है कि आम आदमी पार्टी जल्द ही ख़त्म हो जाएगी और कांग्रेस एवं भाजपा फिर से यहां की मुख्य पार्टियां बन जाएंगी…

इस पराजय के लिए केवल केजरीवाल और सिसोदिया जिम्मेदार हैं जो झूठ के बल पर अपनी बात को सही साबित करने की इतनी घटिया कोशिश करते हैं कि इनका समर्थक भी इनसे गहरी एलर्जी फील करने लगता है… केजरीवाल ने ‘आप’ की स्थापना के सारे मूल्यों को जिस तरह रौंद दिया और खुद एक तानाशाह बनकर उभरे उससे भी लोग आहत हुए ..जरूरत से ज्यादा विज्ञापन और फ्लैट में रहने का वादा करके शीला दीक्षित से भी ज्यादा आलीशान कोठी में रहने से भी केजरीवाल बेनकाब हुए और लोगों ने इनको नटवरलाल समझ लिया …

जनसत्ता अखबार में काम कर चुके और सोशल मीडिया पर बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर वरिष्ठ पत्रकार असरार खान की एफबी वॉल से.

Rana Yashwant :  राजनीति में भारी जीत- उम्मीदों और भरोसे से भरी होती है. और उसी जगह पर शर्मनाक हार उनके टूटने का नतीजा होती है. आम आदमी पार्टी की दो साल पुरानी सरकार की छोटी सी कहानी यही है. बाकी दलों की तरह आप के मंत्री भी दफ्तरों, गाड़ियों, कमजोरी छिपाने के लिये दूसरे की कमजोरियों को उकेरने और गाल बजानेवाली राजनीति का शिकार हो गए. बिजली पानी से आगे बढ ही नहीं सके. मोहल्ला क्लीनिक फरेब साबित होने लगे, विकास की लंबी अवधि की योजनाओं की जगह प्रचार पर पैसा बहाने और दूसरे राज्यों में गोटी लाल करने की लालसा जोर मारने लगी. नतीजा एक ही सीट मगर राजौरी गार्डेन की हार बहुत कुछ कहती है. योगी शायद ऐसी स्थितियों का नतीजा समझते हैं, इसलिए वो काफी सक्रिय हैं और लोगों की जरुरतों-मुश्किलों को पहले निपटाने के साथ विकास की लंबी योजनाओं पर भी काम कर रहे हैं.

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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दिल्ली में ‘आप’ सरकार को न कुचला गया तो बीस वर्षों तक भाजपा यहां सत्ता में न आ पाएगी!

Om Thanvi : दिल्ली में आप सरकार के दो वर्षों के कामकाज पर हिंदुस्तान टाइम्स में छपा वृहद सर्वे बताता है कि लोग मानते हैं राजधानी में भ्रष्टाचार घटा है और शिक्षा, चिकित्सा, जल-आपूर्ति और बिजली-प्रबंध के क्षेत्रों में बेहतर काम हुआ है। और, दिल्ली सरकार की यह छवि दो वर्षों तक नजीब जंग की अजीब हरकतों के बावजूद बनी है, जिन्होंने केंद्र सरकार की गोद में बैठकर निर्वाचित शासन के काम में भरसक रोड़े अपनाए।

आप सरकार की सबसे बड़ी सफलता मैं यह मानता हूँ कि उसने यह भरोसा अर्जित किया है कि देश की राजनीति में विकल्प सम्भव हैं। भ्रष्टाचार, वीआइपी ‘संस्कृति’ की ग़लाज़त, वंशवाद, लफ़्फ़ाज़ी आदि को अपेक्षया सादगी, साफ़गोई और काम से पलटा जा सकता है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का शिक्षा के क्षेत्र में काम इसका श्रेष्ठ उदाहरण होगा।

अकारण नहीं है कि पार्टी दिल्ली से बाहर भी पाँव पसार रही है। मुझे एक दफ़ा एक टीवी बहस के बाद अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के एक नेता ने कहा था कि दिल्ली में आप पार्टी को हमने (ग़ैर-वाजिब कोशिशों से) न कुचला तो ये लोग हमें आगे बीस वर्ष और यहाँ सत्ता में नहीं आने देंगे।

मेरा ख़याल है भाजपा की इस कुटिल नीति ने आप को सहानुभूति ही दिलवाई है। बाक़ी उनका काम बोलता है। तीन साल अभी उनके हाथ में हैं। अगर पंजाब में आप पार्टी की सरकार बनी तो दिल्ली में केंद्र का दमन कम होगा और, नतीजतन, यहाँ और बेहतर काम की उम्मीद बांधी जा सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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गुजरात में ‘आप’ की लहर, सूरत की सफल रैली से भाजपा नेताओं को आए पसीने

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह सूरत में हैं. वहां से उन्होंने जो हालात बयान किया उससे तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी की अंदरखाने गुजरात में लहर है. भारतीय जनता पार्टी के कुशासन, भ्रष्टाचार और दमन से सिहरे हुए गुजरात के लोग अब केजरीवाल के शरण में जा रहे हैं. सूरत रैली में उमड़ी भीड़ ने काफी कुछ स्पष्ट कर दिया है. शीतल कहते हैं- ”इस भीड़ का असर मौक़े पर मौजूद लोगों से सैकडों गुना ज्यादा उस अवाम पर होगा जो डराया हुआ है और दूर से बैठकर इसकी कामयाबी की दुआएँ पढ़ रहा है”.

इस बीच, खबर है कि सूरत की आम आदमी पार्टी की सफल रैली के बाद भाजपा नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगी हैं. भाजपा के दिग्गज नेताओं ने इस रैली को सफल न होने देने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था. जगह जगह प्रायोजित विरोध प्रदर्शन कराए गए. ‘आप’ गुजरात के नेताओं को थानों-हवालातों-जेलों में ठूंसा गया, अनाप शनाप मामलों में फंसाकर. यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने जाकर आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रदेश के नेता को एक मामले में आज ही गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद भी सूरत की रैली का सफल होना कई बड़े बदलावों की सूचक है. लोग मान रहे हैं कि गुजरात में भाजपा के खिलाफ लहर है जिसका स्वाभाविक फायदा आम आदमी पार्टी को मिलने जा रहा है क्योंकि लोग मानने लगे हैं कि मोदी से मुकाबला सिर्फ केजरीवाल ही कर सकते हैं.

उधर, हार्दिक पटेल ने केजरीवाल को पत्र लिखकर गुजरात में पूरा समर्थन देने का वादा किया है. अरविंद केजरीवाल ने भी हार्दिक पटेल के आरक्षण आंदोलन के प्रति सहमति जताई है. इससे माना जा रहा है कि ताकतवर पटेल समुदाय गुजरात चुनाव में केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान करेगा ताकि दमन और हिंसा का बदला भाजपा से लिया जा सके.

पेश है सूरत रैली के बारे में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की मौके से टुकड़े टुकड़े में भेजी गई रिपोर्ट के अंश…

डेटलाइन सूरत. शरद गुप्ता ने सुबह उठते ही चाय के कप के साथ टाइम्स आफ इंडिया (सूरत एडीशन) की यह ख़बर सामने कर दी। इसमें एक चित्र और खबर है जो गुजरात में वायरल हो रहा है। इसमें गुजरात के मुख्यमंत्री रूपानी गुजरात के सबसे बड़े अवैध शराब ब्यापारी रमेश माइकल के साथ खुद मुख्यमंत्री निवास पर बुके और गिफ़्ट लेते हुए दिख रहे हैं। यह घटना इसी १३ अक्टूबर की है। रमेश पर गुजरात दमन और महाराष्ट्र में दर्जनों मामले दर्ज हैं। वे इस क्षेत्र के वही हैं जो उत्तर भारत के “डी पी यादव/ मरहूम पोंटी चड्ढा” रहे हैं!

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डेटलाइन सूरत. पुरबिये बड़ी संख्या में हैं सूरत में । मघई पत्ता गुजराती कट सुपारी और इलैची के साथ बताये सरजीकल से डाऊन हुआ है केजरीवाल ! यानि बीजेपी के होर्डिंग्स नब्ज़ पर हैं । कुछ यू पी के माहौल की तरंग भी है सूरत में ! पनवाड़ी के पास मुलायम सिंह मायावती के खिलाफ बहुत कुछ था । करछना (इलाहाबाद) मूल के हैं । शास्त्री परिवार का सम्मान है केजरीवाल की ईमानदारी पर शक! पर पता सबको है “केजरीवाल की रैली है आज”!

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डेटलाइन सूरत. महाराणा प्रताप पार्क, काकोदरा. जयसुखभाई (काठियावाड़) हीरा पालिश करते हैं। रविवार है तो दोस्तों के साथ पार्क में हैं। ९५ टका पाटीदार भाजप के खिलाफ है यहाँ! क्यों? लोगों पे ज़ुल्म किया, मारा जेल भेजा। अबकी फ़रक पड़ेगा। उनकी काठियावाड़ी और हमारी हिंदी के मिक्स में ये निकला! इस इलाक़े में पाटीदार ही पाटीदार हैं चारों तरफ़। इसी के पड़ोस में “योगी चौक” है जहाँ केजरीवाल आज बोलेंगे। कई बरस पहले मोदी जी यहाँ बोले थे। अमित शाह की हिम्मत न पड़ी तो कई किलोमीटर दूर सभा रक्खी पर वहाँ भी बवाल हो ही गया। बवाल की उम्मीद तो आज भी है पर जयसुखभाई कहते हैं कि बवाल भाजप कार्यकर्ता ही करेंगे आम पाटीदार नहीं! पाटीदार माने उततर भारत के जाट, भरतपुर के गूजर, रायबरेली के राजपूत या औरंगाबाद के मराठे के समकक्ष या बढ़कर।

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डेटलाइन सूरत. बवाल होगा! केजरीवाल की रैली में आज बवाल होगा। ब्राह्मणों के एक वर्ग के संगठन “ब्रह्मपडकार”के सदस्य अहमदाबाद से यहाँ पहुँच चुके हैं। वे आप की एक स्थानीय महिला नेत्री (दलित समाज की) के किसी बयान से कुपित हैं जो ब्राह्मण समाज के खिलाफ है! गुजरात पाटीदार हितरक्षक समिति ने सूरत भर में केजरीवाल के खिलाफ बड़ी बड़ी होर्डिंग और पोस्टर लगाकर विरोध का ऐलान कर रक्खा है जिसे बीजेपी स्पानसर्ड माना जा रहा है। बीजेपी गुजरात और ख़ासकर सूरत में सांगठनिक तौर पर बहुत मज़बूत है । यहाँ बारह के बारह विधायक उसके हैं सांसद उसका है सत्तर प्रतिशत पार्षद उसके हैं । मज़बूत युवा महिला छात्र व्यापारी किसान मज़दूर संगठन उसके पास हैं। केजरीवाल के पास सिर्फ एक चीज़ है “दुस्साहस”! देखिये क्या होता है? क्या क्या होता है?

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डेटलाइन सूरत. दिल्ली पुलिस सूरत पहुँची। गुजरात के प्रभारी आप के विधायक गुलाब सिंह यादव को गिरफतार किया। चार बजे से आज केजरीवाल की सूरत रैली शुरू होनी है!

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डेटलाइन सूरत. सूरत की रैली में शिरकत करने आए एक शख्स ने बातचीत में कहा- ”ऐसा लगता है गुजरात ही बनेगा मोदी के लिए आखिरी हार का रणक्षेत्र? आज सूरत में केजरीवाल की जो सफल रैली हुई है, उसने कई मिथ तोड़ दिए. जैसे ये कि आप सत्ता, पुलिस, दमन, उत्पीड़न, भय, आतंक, झूठ आदि के बल पर किसी को रोक लेंगे… केजरीवाल से लाख असहमति हो लेकिन जमीन पर यही शख्स मोदी से दो-दो हाथ करता दिख रहा है.”

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‘आप’ सिद्धू को सीएम का चेहरा बना रही तो इससे उसकी दरिद्रता ज़ाहिर होती है : ओम थानवी

Om Thanvi : क्या आप पार्टी सचमुच नवजोत सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री का चेहरा बना रही है? अगर ऐसा है तो इससे आप पार्टी की दरिद्रता ही ज़ाहिर होती है। जैसा कि सुनते हैं, पंजाब में पार्टी की ज़बरदस्त साख पहले ही क़ायम हो चुकी है। फिर सिद्धू उसे क्या भोगने आ रहे हैं? ‘आप’ भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा से दूर रहते हुए पनपी पार्टी है। जबकि सिद्धू हिंसा के ऐसे मामले में शामिल रहे हैं, जिसमें उनके ही शहर के एक नागरिक को जान से हाथ धोना पड़ा था।

उच्च न्यायालय ने सिद्धू को उस ग़ैरइरादतन हत्या का अपराधी ठहराया। ज़िल्लत के साथ उन्हें लोकसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। फिर सिद्धू भरोसे के राजनेता भी नहीं। उनकी अमृतसर की सीट अरुण जेटली को दे दी गई तो कहते हैं उन्होंने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार की जड़ें काटीं। हाल में पहले उन्हें राज्यसभा में लाया गया, शायद इसलिए कि पंजाब चुनाव में नुक़सान न पहुँचाएँ। तीन महीने के भीतर उन्होंने अपनी ‘माई-बाप’ पार्टी को फिर पीठ दिखा दी। ऐसा व्यक्ति ‘आप’ के लिए कैसे भरोसे का साबित होगा?

‘आप’ में अनेक नेता ऐसे हैं जिन्हें पूरा पंजाब जानता है। कँवर संधू जैसे कार्यकर्ताओं की सामाजिक ही नहीं, बौद्धिक छवि भी बड़ी है। इस मुक़ाम पर कहाँ केजरीवाल हँसोड़-लपोड़ सिद्धू के चक्कर में पड़ गए (अगर पड़ गए)!

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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सम-विषम के नाम पर आम जनता को परेशान करने के लिए अड़ गई आम आदमी पार्टी की सरकार

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी और सरकार के आगे तर्क!! दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए जांच के तौर पर शुरू की जा रही सम विषम नंबर की कारों को सम विषम तारीखों को ही चलने देने के फैसले की घोषणा में इतनी छूट है कि – यह प्रयोग सफल हो या असफल कोई खास मतलब नहीं है। सम-विषम नंबर के नाम पर असल में दिल्ली की आबादी को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। एक आबादी जो इससे बेसर है। चाहे वह वीआईपी हो या मोटरसाइकिल चलाने वाली या महिलाएं। दूसरी आबादी इससे प्रभावित होने वालों की है और यह दिल्ली में रोज दफ्तर आने जाने वालों का है जो सबसे ज्यादा परेशानी झेलेगी। चूंकि मामला स्थायी नहीं है इसलिए परेशानी और ज्यादा है। वरना परेशान होने वाला अपने लिए कोई इंतजाम करता।

प्रयोग अवधि के दौरान छूट पाने वाली गाडियों में सीएनजी गाड़ियां तो हैं पर महंगी और तथाकथित शून्य उत्सर्जन वाली गाड़ियां नहीं हैं। इसी तरह जिस प्रदूषण जांच के नाम पर दिल्ली वालों को वर्षों से परेशान किया जा रहा है उसका भी कोई मतलब इस परीक्षण अवधि के दौरान नहीं है। सरकारें अपने फैसले कर लेती हैं, जनता से ना पूछा जाता है और ना उनकी राय का कोई मतलब होता है। इसीलिए मेक इन इंडिया और मेक फॉर इंडिया तो है लेकिन मेक फॉर कंज्यूमर की चिन्ता किसी को नहीं है। इसी तरह, प्रदूषण के बहाने नियम तो बना दिए गए, प्रयोग के तौर पर ही सही 15 दिन स्कूल भी बंद कर दिए जाएंगे तो गैर वास्तविक स्थितियों में यह पता कैसे चलेगा कि प्रयोग सफल रहा या असफल। 15 दिन स्कूल बंद करके यह प्रयोग करने से बेहतर नहीं होता कि ऐसे समय किया जाता जब स्कूल बंद रहते हैं। हालांकि, इस दौरान भी ज्यादातर अवधि में स्कूल बंद रहेंगे और ऐसे में जो आबादी दिल्ली के बाहर चली जाएगी उसका अंदाजा कैसे होगा। क्या कोई आंकड़ा है जो यह बताता हो कि छुट्टियों में कितने लोग दिल्ली से बाहर चले जाते हैं।

अगर यह निर्णय़ पक्का होता तो मनुष्य वैकल्पिक स्थायी इंतजाम करता। पर यहां वह स्थिति भी नहीं है। इसलिए प्रयोग ठीक से हो ही नहीं सकता है। उदाहरण के लिए किसी के पास दो गाड़ियां हैं और दोनों सम या विसम नंबर वाली – तो प्रयोग अवधि में वह कुछ नहीं कर सकता है। छह महीने (या ऐसी ही) पूर्व घोषणा होती तो वह कोई उपाय करता। कोई दंपति साथ जाते हैं – एक ही गाड़ी है। इसलिए पति चलाता है। पहले पता होता तो पत्नी सीख लेती, चलाने लगती। दफ्तर जाने वाली महिला 12 साल तक के बच्चे को लेकर जाएगी नहीं और पति के साथ (खुद चलाकर दूसरे नंबर वाली गाड़ी से) नहीं जा सकती है। मुझे यह भी नहीं जम रहा है। ये कुछ उदाहरण हैं मुझे नजर आ रहे हैं। जाहिर है, और भी कई होंगे। पर हर चीज जनता से पूछकर करने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस बार जनता को मौका ही नहीं दिया और प्रयोग के नाम पर 15 दिन (इसके सात-आठ दिन) एक कार वाले या सम-अथवा विषम नंबर की ज्यादा गाड़ियों वाले आम मतदाताओं को परेशान करने की ठान ली है।

हालांकि, मुझे इसमें एक रास्ता नजर आ रहा है। अगर ऐसा कर दिया जाए तो लोगों को सहूलियत हो जाएगी और सरकार को कुछ सही आंकड़े भी मिल सकते हैं। सम नंबर वाले दिन विषम और विषम नंबर वाले दिन सम नंबर की गाड़ी चलाने का जुर्माना दो हजार रुपए है। प्रयोग अवधि में इसे 10 हजार रुपए एक मुश्त कर दिया जाए और यह भी देख लिया जाए कि कितने लोग प्रदूषण कम करने के नाम पर ये पैसे देने के लिए तैयार होते हैं – और प्रयोग अवधि की यह छूट बाद में उपयुक्त समझी जाए तो स्थायी भी हो सकती है। वरना दिल्ली में ज्यादातर लोगों के पास जितना पैसा है उससे दूसरी गाड़ी के नाम पर और फिर सम या विषम नंबर वाली गाड़ी के नाम पर गाड़ियों की संख्या बढ़ेगी ही घटेगी नहीं और उसका दबाव किसी ना किसी रूप में रहेगा ही।

टैक्सियों को महीने में 15 दिन ही चलाने की इजाजात देने का मतलब होगा टैक्सी वाला 15 दिन गाड़ी खड़ी रखने के पैसे यात्रियों-ग्राहकों से ही वसूलेगा। बाकी दिन वही गाड़ियां यूपी और हरियाणा में चलाएगा। प्रदूषण उधर होगा, उसका लाभ भी बढ़ जाएगा। मरेगा आम आदमी। जहां तक टैक्सी को सीएनजी से चलाने का सवाल है, मेरे टैक्सी वाले ने बड़ी व्यावहारिक समस्या बताई। उसका कहना है कि डीजल चुराकर बेचा जा सकता है, सीएनजी नहीं। इसलिए ड्राइवर सीएनजी गाड़ी चलाना नहीं चाहते हैं और यात्रियों को परेशान करते हैं ताकि मालिक उन्हें सीएनजी गाड़ी ना दें (यह बात उसने हर बार सीएनजी भराने की शिकायत करने पर ही बताई थी कि ड्राइवर जानबूझकर यात्री को परेशान करते हैं)। दिल्ली की पूर्व मुख्य शीला दीक्षित ने भी कहा है कि यह शुरुआत आधी-अधूरी तैयारी पर की जा रही है। मजे की बात यह है कि इस पर दिल्ली के अजीब राज्यपाल नजीब जंग को कोई एतराज नहीं है। शायद वे और उनकी केंद्र सरकार इस प्रयोग से मुक्त है इसलिए।

सरकार का यह व्यवहार कैसा है इसे बताने के लिए Sanjay Sinha ने यह चुटकुला लिखा था मैं भी अपनी बात इसी चुटकुले से खत्म करूंगा बाकी पत्नी और सरकार का कुछ किया नहीं जा सकता है। झेलना ही पड़ता है। चुटुकुला इस तरह है – “एक बार एक महिला अपने पति की गैरमौजूदगी में अपने प्रेमी के साथ बेडरूम सो रही में थी। पति शहर से दूर कहीं दौरे पर गया था। पत्नी को मालूम था कि पति दो दिनों के बाद ही आएगा। पर उस रात पति अचानक घर जल्दी पहुंच गया। उसने अपनी चाबी से कमरे का दरवाजा खोला और भीतर चला आया। पत्नी अचानक कमरे में अपने पति को देख कर जरा भी नहीं घबराई। उसने बहुत संयत होकर पूछा, “अरे, तुम जल्दी कैसे चले आए? तुम तो दो दिनों के लिए दौरे पर गए थे न?”

पति ने पत्नी के सवालों का जवाब देने की जगह पत्नी से पूछा कि ये कौन है?

अब पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वो लगभग चिल्लाने वाली स्थिति में थी। उसने कहा, “तुम बात मत बदलो। मैंने जो पूछा है, पहले उसका जवाब दो, तुम जल्दी कैसे आ गए?”

Arvind Kejriwal भी ऐसे ही हैं?

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. वह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके हैं और इन दिनों कंटेंट फील्ड में बतौर उद्यमी सक्रिय हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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‘आप’ सरकार ने दिल्ली में श्रम विभाग के अफसरों को चोर मीडिया मालिकों को सबक सिखाने की खुली छूट दी

Yashwant Singh : दिल्ली राज्य में कार्यरत मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड न दिए जाने को लेकर श्रम विभाग ने मीडिया हाउसों को धड़ाधड़ चांटे मारना शुरू कर दिया है. ऐसा दिल्ली की केजरीवाल सरकार की सख्ती के कारण हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने श्रम विभाग के अफसरों को साफ-साफ कह दिया है कि किसी का मुंह न देखें, कानूनन जो सही है, वही कदम उठाएं.

इस प्रकार सरकार से पूरी तरह छूट मिल जाने के बाद दिल्ली राज्य के श्रम विभाग के अधिकारी चोर मीडिया मालिकों के खिलाफ फुल फार्म में आ चुके हैं. शोभना भरतिया समेत कई मीडिया मालिकों के खिलाफ क्रिमिनल प्रासीक्यूशन शुरू किया जा चुका है. ये है वो लिस्ट…

1-Sobhna Bharatia & 11 other Directors/officer of HT Media Ltd (Case No. 32/1/15.
2-HT Media India Ltd (Case No. 39/1/15)
3-Statesman Ltd (Case No. 33/1/15)
4-Living Media (Case No. 34/1/15)
5-DLA Media (Case No. 35/1/15)
6-Punjab Kesri (Case No. 36/1/15)
7-Sahara (Case No. 37/1/15)
8-Good Morning India (Case No. 38/1/15)
9-Patrakar Prakashan Ltd (Case No. 40/1/15)
10-Amar Ujala, Rajni Maheshwari, Tanmay Maheshwari (Case No. 41/1/15)
11-UNI (Case No. 30/1/15)
12-Pariwartan Bharti (Case No. 31/1/15)

मीडिया मालिकों से भय न खाकर मीडियाकर्मियों को न्याय दिलाने के लिए सख्त रुख अपनाने वाले केजरीवाल और सिसोदिया को थैंक्यू कहना तो बनता है. काश ऐसा ही तेवर-सरोकार बाकी पार्टियों के नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री रख पाए होते. इस प्रकरण के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे तो संबंधित खबर का लिंक नीचे कमेंट बाक्स में दे रहा हूं. http://goo.gl/dlVxPx


Yashwant Singh : एक टेप सुनवा रहा हूं. दैनिक भास्कर का बंदा एक व्यापारी को विज्ञापन के लिए किस कदर धमका रहा है.. व्यापारी ने बस गलती ये कर दी है कि उसने छोटा सा विज्ञापन राजस्थान पत्रिका अखबार को दिया, भास्कर को नहीं. इसी के बाद भास्कर वाला बंदा व्यापारी को धमकाने हड़काने में जुट गया. आपको गुंडों डकैतों लफंगों द्वारा दी जाने वाली धमकी और भास्कर वाले मीडियाकर्मी की धमकी के बीच कोई फर्क नज़र आए तो बताइएगा… https://bhadas4media.com/print/7422-vigyapan-ke-liye-dhamki


Yashwant Singh : धर्म के नाम पर भारत के हिन्दू-मुस्लिम सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी चिरकुटई करना कब बंद करेंगे? अबे करना हो तो अपने घर के बेडरूम या टॉयलेट या किचन या किसी अन्य कमरे में करो। ये सड़क तुम्हारे धर्म या तुम्हारे भगवान् या तुम्हारे खुदा की बपौती नहीं है। कृपया चिरकुट लोग इस पोस्ट को लाइक न करें। याने कि जो लाइक न करेंगे वो खुद ब खुद चिरकुट मान लिए जाएंगे। सेंट्रल मुंबई में कल आधी सड़क पर जुमे की नमाज़ हुई और आधी पर गणपति जुलूस निकला। आप अगर नमाज़ नहीं पढ़ते और गणपति जुलुस नहीं निकालते तो आप इस सड़क पर चलने के हकदार नहीं हैं। पब्लिक प्लेस पर इन तमाशों पर फ़ौरन पाबंदी लगनी चाहिए। एक नमाजी अगर गणपति वाले पर पत्थर मार दे या एक गणपति वाला एक नमाजी पर पत्थर मार दे तो हो गया होता एकता का कथित मिसाल। धर्म को निजी कर्म ही बनाए रखना चाहिए। जहां यह पब्लिस प्लेस पर कब्जा करेगा, वहां खुराफातियों को धर्म की राजनीति करने का मौका मिल जाएगा और आप सबको अच्छी तरह पता है कि धर्म की राजनीति करने के लिए क्या क्या किया जाता है ताकि लड़ाई झगड़ा दंगा फसाद हो।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से संकलित उनके कुछ पोस्ट.

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क्या ‘प्याज’ घोटाला छिपाने के लिए दिया गया फुल पेज का विज्ञापन?

नई दिल्ली: प्याज को लेकर घोटाले के आरोपों से घिरी दिल्ली सरकार ने घोटाले के आरोपों को नकार दिया है. लेकिन आज केजरीवाल सरकार ने अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन छापकर आजतक चैनल पर निशाना साधते हुए बदनाम करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है. बीजेपी ने कहा है कि करोड़ों का विज्ञापन देकर सरकार ने प्याज घोटाला छुपाने की कोशिश की है. केजरीवाल सरकार पर सस्ते में प्याज खरीदकर जनता को महंगा बेचने का आरोप लगा है. बड़ा सवाल ये है कि प्याज में घोटाला हुआ या नहीं.

प्याज की बिक्री पर कथित घोटाले के आरोपों के बीच केजरीवाल सरकार ने हर बड़े अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन छापकर न्यूज चैनल आज तक पर बदनाम करने के लिए झूठी खबरें चलाने का आरोप लगाया. विज्ञापन में लिखा है कि केंद्र सरकार ने नासिक से प्याज 18 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदी. केंद्र सरकार ने ही दिल्ली सरकार को प्याज 33 रुपये किलो की दर से बेची. दिल्ली सरकार ने 33 रुपये प्रति कोल के ऊपर ट्रांसपोर्टेशन, लोडिंग-अन लोडिंग और दुकनदारों के मार्जन मनी पर 7 रुपये अतिरिक्त खर्च करके भी जनता को तीस रूपये किलो की दर से प्याज उपलब्ध कराई. केंद्र सरकार ने अपनी दो एजेंसियों डीएमएस और सफल के माध्यम से प्याज 35 से 40 रुपये किलो तक बेची.

संजय सिंह ने बताया कि कोई घोटाला नहीं हुआ. घोटाले की फर्जी खबर दिखाई जा रही है. अगर ऐसी खबरें दिखाई जाएंगी तो जवाब देना होगा.. चाहे विज्ञापन देना पड़े. विज्ञापन में आंकडों के हवाले से वही दावा किया गया है जो घोटाले के आरोप में सफाई में दिल्ली सरकार कह चुकी है. अब बीजेपी कह रही है कि प्याज घोटाला छिपाने के लिए अखबारों में करोड़ों का विज्ञापन छपवाया गया. एबीपी न्यूज ने दिल्ली सरकार का विज्ञापन देने वाली संस्था डीएवीपी के रेट के आधार पर जब विज्ञापनों के खर्च का हिसाब लगाया तो ये 23 लाख 65 हजार रुपये तक पहुंचा. अगर ये अनुमान सही है कि विज्ञापन के खर्च के पैसे से 72 हजार 2 किलो प्याज आ जाता जो केजरीवाल सरकार एक दिन में 72 हजार लोगों को एक-एक किलो फ्री में बांट सकती थी. एबीपी न्यूज ने ईमेल भेजकर आप सरकार से विज्ञापन पर खर्च का हिसाब मांगा है जिसका जवाब अभी तक नहीं मिला है. दिल्ली सरकार के सूत्रों के मुताबिक प्रत्येक सरकारी काम नियमों के तहत होता है. तय DAVP रेट पर पारदर्शी तरीके से विज्ञापन जारी किया जाता है. विधिवत तरीके से सारी जानकारी सरकार से ली जा सकती है. इधर आरटीआई के जरिये खुलासा करके घोटाले का दावा करने वाले विवेक गर्ग ने एंटी करप्शन ब्रांच और उपराज्यपाल के पास घोटाले की शिकायत दर्ज कराई है. केजरीवाल सरकार पर 24.45 रुपये की दर से प्याज खरीदकर तीस रुपये किलो बेचने का आरोप लगा था जिसके बाद दिल्ली सरकार ने दस्तावेज जारी करके दावा किया था कि केंद्र सरकार से खरीदकर प्याज बाजार में चालीस रुपये के भाव का पड़ा था जिसे तीस रुपये किलो बेचा गया. बड़ा सवाल ये है क्या विज्ञापन देकर जनता के पैसे की बर्बाद की? (साभार- एबीपी न्यूज)

मूल खबर…

प्‍याज घोटाले का आरोप लगने पर केजरीवाल सरकार ने आजतक न्‍यूज चैनल पर निशाना साधते हुए अखबारों में निकाला पूरे पेज का विज्ञापन

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प्‍याज घोटाले का आरोप लगने पर केजरीवाल सरकार ने आजतक न्‍यूज चैनल पर निशाना साधते हुए अखबारों में निकाला पूरे पेज का विज्ञापन

नई दिल्‍ली। दिल्‍ली में केजरीवाल सरकार पर कम दामों में प्‍याज खरीदकर ज्‍यादा दामों में बेचने के आरोप लगने के बाद आप की सफाई आई है। उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया ने रविवार को एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करते हुए कहा कि हमने प्‍याज 32.86 रुपए में खरीदे और बाजार में अपनी जेब से पैसे भरते हुए कम कीमत पर बेचे। जबकि केंद्र सरकार 33 रुपए में खरीदा प्‍याज ज्‍यादा दामों में बेच रही थी। उन्‍होंने आरोप लगाया कि यह सब लोगों का ध्‍यान हटाने के लिए किया जा रहा है। मीडिया को कागज दिखाते हुए उन्‍होंने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि हमने केंद्र की एजेंसी एसफएसी से प्‍याज खरीदे थे।

उन्‍होंने केंद्र पर आरोप लगाते हुए कहा कि, ‘यह पूरी तरह गलत है कि हमने नासिक से प्‍याज खरीदे। इसकी बजाय नाफेड और एसएफएसी ने केंद्र की तरफ से महाराष्‍ट्र से 18 रुपए प्रति किलो की दर से प्‍याज खरीदे और हमें यही प्‍याज 32.86 रुपए प्रति किलो की दर से बेचे। इसमें जो 14 रुपए अतिरिक्‍त हैं वो एडमिनिस्‍ट्रेटिव एक्‍सपेंस के रूप में बीजेपी सरकार ने चार्ज किए हैं। अगर कोई गड़बड़ है तो वो नफेड और एसएफएसी की तरफ से है।’

सि‍सोदिया ने आजतक न्यूज चैनल पर भी निशाना साधा और कहा कि वो लगातार झूठी खबर दिखा रहा है। सिसोदिया ने कहा कि भाजपा विपक्ष में है और उसका हक है सवाल करना जिसका हम जवाब देंगे लेकिन एक न्‍यूज चैनल इस तरह की झूठी खबरें कैसे दिखा सकता है। नफेड के दावे को लेकर उन्‍होंने कहा कि नफेड ने 19 रुपए किलो की कीमत पर प्‍याज देने के लिए कहा था तो हमने पत्र लिखा की आप दिल्‍ली में हमें यह उपलब्‍ध करा सकते हो जिसका अब तक कोई जवाब नहीं आया। सिसोदिया ने कहा कि ये जानबूझकर उस वक्‍त किया जा रहा है जब दिल्‍ली सरकार लगातार मेहनत करते हुए डेंगू पर नियंत्रण पाने लगी है।

इस मामले को लेकर फेसबुक पर आईं कुछ टिप्पणियां इस प्रकार है…

Sandeep Verma : कजरी सरकार तो विज्ञापन देने में माहिर सरकार है. मुझे लगता है यह इस मद में भाजपा को बखूबी पछाड़ सकते हैं. मोदी सरकार की बनियों के साथ मिलकर की जा रही मुनाफाखोरी का पर्दाफ़ाश जिस मीडिया को करना था, उसने उलटे कजरी को फंसाया.. डबल फायदा… मोदी सरकार की चमचागिरी और कजरी से विज्ञापन…

Sanjay Kumar Singh : ‘जंग लगी’ सरकार के राज में जनता का पैसा ऐसे ही बर्बाद होता है। मीडिया को टीआरपी की मलाई के साथ-साथ विज्ञापन की सौगात भी।

Mohammad Anas : आज पूरे देश के अख़बारों में अरविंद केजरीवाल ने प्याज़ मुद्दे पर फुल पेज विज्ञापन दिया है। केजरीवाल सरकार ने आजतक न्यूज़ चैनल पर झूठ बोलने का आरोप लगाया और केंद्र सरकार द्वारा प्याज़ की खरीद बिक्री पर विस्तार से बात की है। अरविंद केजरीवाल जब से दिल्ली पर काबिज़ हैं तब से वे कुछ न कुछ प्रपंच कर रहे हैं। जनता का पैसा बेहिसाब विज्ञापनों पर खर्च कर रहे हैं। राज्यपाल से दिखावे की लड़ाई और मोदी से मिलाई। आज निकाले गए विज्ञापनों का हिसाब लगाया जाए तो करोड़ों रूपए बनते हैं। यदि इन पैसों से प्याज़ खरीद कर दिल्ली वालों को दिया जाता तो कम से कम जनता को फायदा होता लेकिन मीडिया में झूठमूठ के मुद्दों पर बने रहने के लिए केजरीवाल ने जन हित को किनारे रख दिया। केंद्र कैसा है वह पता है, केजरीवाल कैसे हैं वह भी मालूम है। जिस लोकपाल के मुद्दे पर वे जंतर मंतर पर बैठे थे, उसे भूल चुके हैं। केजरीवाल की लड़ाईयों से केंद्र की निरंकुशता पर रत्ती भर फर्क़ नहीं पड़ा। अब धरने प्रदर्शन सिर्फ अपने आप को सही सिद्ध करने के लिए होते हैं। इन सबके बीच किसान/गरीब/आम जनता के मुद्दे पोस्टर बैनर तक सिमट जा रहे हैं। केजरीवाल- मोदी- मीडिया के चकल्लस से किसे फायदा हो रहा? सरकार को। सरकार में शामिल लोगों को। करोड़ों का विज्ञापन निकाल कर आरोप प्रत्यारोप करने से फुर्सत मिल जाए तो प्याज़ सस्ता करवा दीजिएगा।


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आम आदमी पार्टी ने ऐसा किया होता हाहाकार मच जाता

यदि आम आदमी पार्टी की सरकार ने ऐसा किया होता तो अब तक हाहाकार मच जाता कि पत्रकारों पर नकेल डाली जा रही है!

भारत सरकार ने नया कायदा बनाया है कि अब हर साल पीआइबी की मान्यता नवी (रिन्यू) करवाने से पहले पुलिस की जाँच जरूरी होगी। अभी पहली बार कार्ड बनते वक्त यह जाँच होती है, नवीकरण पर नहीं। हाँ, नवीकरण के लिए प्रधान संपादक या नियोक्ता से अनुमोदन का पत्र हर साल देना होता है। करीब ढाई हजार पत्रकार पत्र सूचना ब्यूरो से मान्यता पाए हुए हैं। इसके सहारे केंद्र सरकार के दफ्तरों, प्रेस वार्ताओं आदि में उनका प्रवेश आसान होता है।

पत्रकारों को भय है कि पुलिस सत्यापन अगर वक्त पर न हो सका पत्रकार के कामकाज को लटकाएगा। हो सकता है थाने के चक्कर भी कटवाए।

ओम थानवी के एफबी वाल से

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बड़बड़िया न्यूज चैनलों की अब कड़ी निगरानी करेगी दिल्ली सरकार

मीडिया पर आम आदमी पार्टी को खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाने के चंद रोज बाद अब अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने तय किया है कि वह तमाम न्यूज चैनलों के कॉन्टेंट पर कड़ी निगाह रखेगी । दिल्ली सरकार ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे टीवी चैनलों पर ब्रॉडकास्ट होने वाले कॉन्टेंट को मॉनिटर करें। इस संबंध में डायरेक्टरेट ऑफ इन्फर्मेशन ऐंड पब्लिसिटी (डीआईपी) के अधिकारियों को जारी आदेश में कहा गया है कि वे सुबह 9 बजे से रात 11 बजे के बीच टीवी चैनलों पर प्रसारित कॉन्टेंट को मॉनिटर करें।

ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब दिल्ली की किसी सरकार ने इस तरह का आदेश दिया है। अभी तक यह चलन रहा है कि डीआईपी के अधिकारी न्यूज पेपर्स में सरकार से जुड़ी खबरों की कटिंग रखा करते हैं, लेकिन अब से न्यूज चैनलों पर भी नजर रखी जाएगी। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि डीआईपी के अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे सरकार से जुड़े न्यूज चैनलों के कॉन्टेंट को मॉनिटर करें और इस पर रोजाना मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) को रिपोर्ट भेजें।

सूत्रों ने बताया कि डीआईपी अफसरों को निर्देश मिला है कि वे चैनलों को सुबह 9 बजे से लेकर रात 11 बजे तक मॉनिटर करें। अधिकारियों को फिलहाल अगले एक महीने तक ऐसा करने का निर्देश दिया गया है, जिसके बाद दिल्ली सरकार इस काम के लिए विशेष स्टाफ की नियुक्ति के लिए टेंडर जारी करेगी।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने महज चंद रोज पहले एक न्यूज पोर्टल को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि मीडिया के एक बड़े तबके ने आम आदमी पार्टी को खत्म करने की सुपारी ली है। मीडिया का पब्लिक ट्रायल होना चाहिए। सीएम ने कहा था कि दिल्ली में ऐसी 8-10 जगहें तय कर दी जानी चाहिए, जहां हम लोगों के समूह को इकट्ठा करें और उन्हें चैनलों पर प्रसारित होने वाले ‘दोषपूर्ण’ क्लिप दिखाए जाएं।

‘आजतक’ से साभार

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आशू के आंसू : उस दिन तो साढ़े तीन सौ घरों के चूल्हे बुझ जाने पर भी नहीं रोए थे आशुतोष

जब आईबीएन7 से साढ़े तीन सौ लोग निकाले गए थे और इनके घरों का चूल्हा अचानक ठंडा पड़ गया था तब मैनेजिंग एडिटर पद पर आसीन आशुतोष के आंसू तो छोड़िए, बोल तक नहीं फूटे थे. धरना प्रदर्शन सब हुआ लेकिन आशुतोष चुप रहे. आजकल वे अक्सर टीवी शोज में कहते रहते हैं कि मैं नौकरी छोड़कर राजनीति में आया… पर हम लोगों को पता है कि आशुतोष को निकाला जाना था… कारपोरेट में एक वाक्य होता है स्मूथ एक्जिट. यानि लात मार कर निकाले जाने से पहले सम्मानजनक तरीके से खुद छोड़ देने की प्रक्रिया. 

तब आशुतोष ने यही किया था. बजाय नया चैनल खोजने के, वे केजरीवाल को खोज चुके थे, अन्ना आंदोलन पर किताब लिखकर केजरीवाल के गुडबुक में आ चुके थे, सो राजनीति में कूद पड़े. आशुतोष के करियर को ध्यान से देखें तो उसमें टर्निंग प्वाइंट तभी आया जब उनके साथ कोई हादसा घटिया हुआ या प्लान हुआ. एक बार बेडरूम में घुसने की कोशिश में तमाचा क्या पड़ा, पत्रकारिता में इनकी गाड़ी दौड़ पड़ी, सौजन्य से कांशीराम-एसपी सिंह. एक तमाचे से आशुतोष का पत्रकारीय करियर संवर गया. 

अब जबकि आशू की राजनीतिक गाड़ी गड़बड़ाई डगमगाई हुई है, बेतुकी बयानबाजी और ओवर रिएक्शन के कारण, तो उन्होंने बिलकुल सही समय पर बिलकुल सही चैनल चुना और फफक फूट कर आंसू बहाने लगे, लाइव.. पीपली लाइव में ये वाला लाइव ऐसा कि कुछ भावुक दर्शक भी रुमाल निकाल पड़े. जो शख्स दशकों तक टीवी, टीआरपी. लाइव और इमोशंस का मास्टर रहा हो, उसे खूब पता है कि वह क्या कर रहा है. और, उसे यह भी पता है कि यह भावुक देश उसके रोने के बाद उसके सारे पाप माफ कर देने की कूव्वत रखता है. 

सच कहूं तो सोनिया राहुल मनमोहन कांग्रेस और मोदी अमित शाह राजनाथ भाजपा के मुकाबले बहुत छोटे पापी हैं केजरीवाल, आशुतोष, सिसोदिया आदि इत्यादि लेकिन जब पूरा का पूरा कारपोरेट करप्ट मीडिया इन बड़े पापियों के हिसाब से संचालित होते हों, छोटे मोटे पापी पकड़कर गला दबाते हों तो तो छोटे मोटे पापियों को पाप धोने का देसी तरीका रुदालियों की तरह लोटपोट करके रोना छाती पीटना और माफी मांगना ही तो हो सकता है. इसलिए आशुतोष को आप लोग भी माफ करिए… लेकिन ध्यान रखते हुए कि इन सज्जन के संपादकत्व में सैकड़ों घरों के चूल्हे बुझे थे, पर इनकी आत्मा ने तब इन्हें झकझोरा नहीं, इनकी आंखों ने एक बूंद आंसू नहीं टपकाए, इनके मुंह से सांत्वाना के एक बोल नहीं फूटे… सो, आशू भाई… मैं तो यही कहूंगा… ”रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों…”

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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‘आप’ से बाहर किए गए योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और अजित झा

वही हुआ जिसकी आशंका थी. तानाशाही दिखाते हुए सत्ता के नशे में चूर अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और अजित झा को निकाल बाहर कर दिया है. इन सभी पर पार्टी विरोधी गतिविधियों और घोर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया है. इसके पहले इन नेताओं को पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया था. इन नेताओं को पार्टी से निकाले जाने का फैसला लेने का नाटक राष्ट्रीय अनुशासन समिति ने किया. समिति का कहना है कि वह कारण बताओ नोटिस के लिए मिले जवाब से संतुष्ट नहीं है.

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता दीपक बाजपेयी ने बताया कि पार्टी की राष्ट्रीय अनुशासन समिति ने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और अजित झा को निकालने का फैसला किया है. उन्हें घोर अनुशासनहीनता, पार्टी विरोधी गतिविधियों और पार्टी की आचार संहिता के उल्लंघन करने के कारण निष्कासित किया गया है. बागी नेताओं को ‘स्वराज संवाद’ आयोजित करने का कारण बताने के लिए 17 अप्रैल को नोटिस जारी किया गया था. भूषण पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी को हराने के लिए काम करने का आरोप लगाया गया था. उन पर पार्टी से अलग हुए धड़े ‘अवाम’ का समर्थन करने का भी आरोप लगाया गया. प्रशांत भूषण ने आज इस नोटिस को लेकर पलटवार करते हुए राष्ट्रीय अनुशासन समिति (एनडीसी) के सदस्य पंकज गुप्ता पर संदिग्ध कंपनियों से चंदा लेने और आशीष खेतान पर एक कंपनी का पक्ष लेते हुए ‘पेड न्यूज़’ स्टोरी करने का आरोप लगाया था.

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आशीष खेतान के लिखे पेड न्यूज पर ‘तहलका’ को तीन करोड़ रुपये मिले थे!

इन दिनों आम आदमी पार्टी के नेता आशीष खेतान जब तहलका मीडिया हाउस में पत्रकार हुआ करते थे तो उन्होंने एस्सार कंपनी के पक्ष में पेड न्यूज लिखा था. इस पेड न्यूज के एवज में तहलका को तीन करोड़ रुपये मिले थे. ये आरोप लगाए हैं ‘आप’ के बागी नेता प्रशांत भूषण ने. उन्होंने पार्टी नेता आशीष खेतान पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि 2 जी मामले में खेतान ने एस्सार के समर्थन में लेख लिखा था, जिसके एवज में तहलका को तीन करोड़ रुपए मिले थे.

भूषण ने कहा कि 31 दिसंबर 2011 को छपा यह लेख खेतान ने तत्कालीन मंत्री सलमान खुर्शीद की सलाह पर लिखा था, जबकि दूसरी ओर उन्हीं दिनों आम आदमी पार्टी ने खुर्शीद समेत केन्द्र के 15 मंत्रियों के खिलाफ प्रदर्शन किया था. प्रशांत भूषण ने आप नेता आशीष खेतान और पंकज गुप्ता पर करोड़ों रुपए घूस लेने का आरोप लगाया है. प्रशांत भूषण ने आशीष खेतान पर आरोप लगाया है कि उन्होंने तहलका मैगजीन में काम करने के दौरान एस्सार ग्रुप के पक्ष में खबर लिखने के लिए कंपनी से तीन करोड़ रुपए की रिश्वत ली थी. उन्होंने 2जी घोटाले में आरोपी कंपनी का समर्थन करने के लिए पेड न्यूज लिखी थी और इसके लिए उन्होंने तीन करोड़ रुपए लिए थे. ज्ञात हो कि एस्सार ग्रुप के पक्ष में खबर लिखने के बाद एस्सार ग्रुप ने तहलका मैगजीन के कार्यक्रमों को प्रायोजित करना शुरू कर दिया था.

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‘आप’ के बागी अभी अलग पार्टी नहीं बनाएंगे, छह माह तक देशव्यापी अभियान का फैसला

गुड़गांव : आम आदमी पार्टी की चेतावनी के बावजूद मंगलवार को यहां योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण गुट के ‘स्वराज संवाद’ में हजारों कार्यकर्ताओं ने शिरकत की। कार्यकर्ताओं का मत था कि आम आदमी पार्टी में रहते हुए योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को ‘स्वराज’ के लिए संघर्ष करते रहना चाहिए। फैसला किया गया है कि आप से अलग होकर नई पार्टी नहीं बनाई जाएगी। पार्टी में रहकर ही स्वराज के लिए आवाज बुलंद की जाएगी। अब आगामी छह महीने तक पार्टी का यह असंतुष्ट धड़ा देशव्यापी अभियान चलाएगा।

इस निर्णय से पहले प्रशांत भूषण ने ‘स्वराज संवाद’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आज आम आदमी पार्टी में स्वराज नहीं रह गया है। आप पर अब कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है। आम आदमी पार्टी को चौकड़ी से मुक्ति दिलाना हमारा पहला लक्ष्य है। इसके लिए तीन विकल्प हैं। एक तो पार्टी को इस चौकड़ी से छुटाने की कोशिश करें, दूसरे कोई नई पार्टी बनाएं और तीसरा विकल्प है, हमने जो गलती इसबार की, वो फिर न करें। गुस्सा आता है कि जिस पार्टी को हमलोगों ने मिलकर बनाया था उस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया। कब्जा छुटाने के लिए हमें कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। हमें अपना समय और ऊर्जा उस लड़ाई में लगाने की जरूरत है क्योंकि पार्टी में चार चीजें होती हैं नाम, सिंबल, उसका पैसा और कार्यकर्ता। सबसे अहम पार्टी के कार्यकर्ता होते हैं।

योगेंद्र यादव ने कहा कि कार्यकर्ताओं ने एक बात तो साबित कर दी कि पार्टी में जो कुछ चल रहा था उससे दिक्कत सिर्फ एक दो लोगों को नहीं थी, इस पार्टी का आदर्शवादी कार्यकर्ता नामंजूर करता है। लोगों से पूछा गया था कि क्या पार्टी स्वराज के सिद्धांत पर चल रही है तो 100 में से 93 लोगों ने जवाब ना में दिया।

आज की बैठक को ‘एक नयी शुरूआत’ का नाम दिया गया। यादव और भूषण ने आप के शीर्ष पदों से हटाए जाने के बाद भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों पर चर्चा करने के लिए ‘स्वराज संवाद’ नामक चर्चा आयोजित करने के अपने निर्णय की घोषणा की थी। इससे ये कयास लगाए जा रहे थे कि बैठक में एक नयी पार्टी के गठन की घोषणा हो सकती है लेकिन नयी पार्टी बनाने का कोई ऐलान नहीं हुआ । सम्मेलन में आनंद कुमार और अजित झा, तिमारपुर के विधायक पंकज पुष्कर और विभिन्न राज्यों में लोकसभा चुनावों के कई उम्मीदवार शामिल हुए। पुष्कर ने कहा, ‘‘हमारी पार्टी नयी है। अलग-अलग लोगों की अनुशासन पर अलग-अलग राय है। मेरा मानना है कि आज की बैठक हमारी पार्टी के आदर्शों के अनुरूप है।’’ 

बैठक को एक घंटा हो जाने के बाद, एडमिरल एल रामदास का एक ऑडियो संदेश मंच से सुनाया गया। संदेश में रामदास ने कहा है कि एकसंवाद को ‘‘पार्टी विरोधी गतिविधि’’ के रूप में नहीं देखा जा सकता और लोगों को एक लोकतंत्र में बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए। मैं आप के किसी गुट विशेष से नहीं हूं। मेरे लिए ‘आप’ एक ही है। पार्टी के सिद्धांत और छवि को सबसे ज्यादा नुकसान उस जोर-जबरदस्ती ने पहुंचाया, जो हाल में की गई और हम एक पार्टी के तौर पर बड़े शोचनीय ढंग से विफल रहे हैं…एक ऐसी पार्टी, जिसका गठन स्वराज के सिद्धांतों पर हुआ था। 

इस बीच अप्रत्यक्ष तौर पर धमकी देते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने कहा है कि आप की शक्तिशाली राजनीतिक मामलों की समिति ‘पीएसी’ और इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी ‘एनई’ बैठक के बाद इस संदर्भ में अगले कदम पर निर्णय लेगी। ‘‘स्वराज संवाद पार्टी का समारोह नहीं है। पीएसी और एनई बैठक के बाद यह निर्णय लेगी कि क्या कार्रवाई की जानी चाहिए?

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‘स्वराज संवाद’ में कुलदीप नैयर, अरुणा, मेधा समेत ‘आप’ के 100 बागी भी शिरकत करेंगे

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी (आप) के बागी गुट ने दावा किया कि अगले हफ्ते उनकी ओर से बुलाए गए ‘स्वराज संवाद’ नाम के कार्यक्रम में प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा रॉय के साथ-साथ 100 से ज्यादा ऐसे लोकसभा उम्मीदवार शामिल होंगे जिन्होंने पार्टी के टिकट पर पिछला आम चुनाव लड़ा था ।

बागी गुट की ओर से बनाए गए एक ट्विटर अकाउंट पर यह दावा भी किया गया कि वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर भी ‘स्वराज संवाद’ में शामिल होंगे। यह दावा भी किया गया कि 14 अप्रैल को गुड़गांव में होने वाले इस कार्यक्रम के लिए करीब 3,591 लोगों से प्रतिक्रिया मिली है। सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के भी शामिल होने का दावा किया गया है। मेधा ने पिछले दिनों आप से इस्तीफा दे दिया था।

गौरतलब है कि ‘आप’ के असंतुष्ट नेताओं योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने ‘स्वराज संवाद’ के लिए पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को भी निमंत्रण भेजा है। योगेंद्र यादव ने कहा है कि मेधा पाटकर, अरुणा राय और निखिल राय के अलावा आप के टिकट पर लोकसभा चुनाव लडने वाले 70 उम्मीदवार ‘संवाद’ में शामिल होंगे। जब पूछा गया कि क्या नई पार्टी बनाएंगे, यादव बोले कि लोग ऐसा कह रहे हैं, लेकिन उनके पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। जब उनका ध्यान पार्टी नेता गोपाल राय की ओर दिलाया गया, जिन्होंने अपनी उत्तर प्रदेश यात्रा के दौरान ‘हूटर’ और ‘बेकन लाइट’ का इस्तेमाल किया था तो यादव ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन यदि यह सही है तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि ‘आप’ वीआईपी संस्कृति के खिलाफ है।

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योगेंद्र यादव ने पूछा- स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व’ कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा?

Yogendra Yadav : आज एक सवाल आपसे… अमूमन अपने लेख के जरिये मैं किसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करता हूँ। लेकिन आज यह टेक छोड़ते हुए मैं ही आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। देश बदलने की जो यात्रा आज से चार साल पहले शुरू हुई थी उसकी दिशा अब क्या हो? पिछले दिनों की घटनाओं ने अब इस सवाल को सार्वजनिक कर दिया है। जैसा मीडिया अक्सर करता है, इस सवाल को व्यक्तियों के चश्मे से देखा जा रहा है। देश के सामने पेश एक बड़ी दुविधा को तीन लोगो के झगड़े या अहम की लड़ाई के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऊपर से स्टिंग का तड़का लगाकर परोसा जा रहा है। कोई चस्का ले रहा है, कोई छी-छी कर रहा है तो कोई चुपचाप अपने सपनों के टूटने पर रो रहा है। बड़ा सवाल सबकी नज़र से ओझल हो रहा है।

 

आज से चार साल पहले जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से एक नयी यात्रा शुरू हुई थी। पैंसठ साल से तंत्र के तले दबे लोक ने अपना सर उठाया था। हर शहर, हर कस्बे ने अपना जंतर-मंतर ढूंढ लिया था, हर गाँव ने अपना अन्ना खोज निकाला था। घोटालों के विरुद्ध शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कारवाँ बन गयी। भ्रष्टाचार की गंगोत्री को रोकने की कोशिश इस यात्रा को चुनावी राजनीति के मैदान तक ले आई। राजनीति का विकल्प बनने के बजाय यह आंदोलन वैकल्पिक राजनीति का वाहन बनता दिखाई दिया।

आज यह यात्रा जिस पड़ाव पर खड़ी है, वहां कुछ बुनियादी सवालों का उठना लाज़मी है। क्या इस आंदोलन का राजनैतिक वाहन वैकल्पिक राजनीति की जगह सामान्य पार्टियों जैसा एक चालू राजनैतिक विकल्प बनेगा? पूरे देश में बदलाव का बीड़ा उठाने वाले क्या सिर्फ दिल्ली का क्षेत्रीय दल बनाकर रह जायेंगे? स्वराज का मंत्र लेकर चली इस यात्रा का ‘स्व’ कहीं एक व्यक्ति तक सिमट कर तो नहीं रह जायेगा? मतलब, इस आंदोलन का राजनैतिक औज़ार कहीं इस आंदोलन की मूल भावना से ही विमुख तो नहीं हो गया?

जो सवाल आज सार्वजनिक हुए हैं वो मेरे और प्रशांत भूषण जैसे सहयात्रियों के मन में बहुत समय से चल रहे हैं। इस यात्रा के भटकाव के चिन्ह बहुत समय से दिख रहे थे। कुछ साथी उन मुद्दों को उठाकर यात्रा छोड़ भी चुके थे। लेकिन हम दोनों जैसे अनेक साथियों ने तय किया कि इस सवालों को अंदर रहते हुए ही सुलझाने की हर संभव कोशिश करेंगे। चूंकि तोड़ना आसान है और बनाना बहुत मुश्किल। एक बार लोगों की आशा टूट जाये तो फिर भविष्य में कुछ भी नया और शुभ करना असंभव हो जायेगा। हमारी दुविधा यह थी कि आंदोलन की एकता भी बनाये रखी जाय और इसकी आत्मा भी बचायी जाय। एक तरफ यह खतरा था कि कहीं हमारी भूल से इतना बड़ा प्रयास टूट न जाये, कहीं देश भर में फैले हुए कार्यकर्ताओं की उम्मीदें न टूट जाएँ तो दूसरी ओर यह खतरा था की हम कहीं पाप के भागीदार ना बन जाएँ, कल को ये न लगे कि सब कुछ जान-बूझते हम इस आंदोलन के नैतिक पतन के मूक दर्शक बने रहे।

आज इस आंदोलन के कार्यकर्ता, समर्थक और शुभचिंतक एक तिराहे पर खड़े हैं। एक रास्ता है कि हम जहां से आये थे वहीं वापिस चले जाएँ। यानी राजनीति को छोड़ दें और अपने अपने तरीके से समाज की सेवा में लग जाएँ। दिक्कत ये है कि ऐसा करने से लोकतंत्र मजबूत होने की बजाय और कमजोर हो जायेगा। ‘राजनीति तो गन्दी ही होती है’ वाला विचार लोकतन्त्र की जड़ काटने का काम करता है। राजनीति को छोड़ देंगे तो लोकतंत्र को कैसे सुधारेंगे?

दूसरा रास्ता है कि इसी वाहन को ठोक-पीट कर ठीक किया जाय। कई लोगों की राय है कि पिछले दिनों की गलतियों को सुधारने के लिए कोर्ट-कचहरी या फिर चुनाव आयोग की शरण ली जाय। इसमें कोई शक नहीं कि 28 तारीख को आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में जो कुछ हुआ वह पार्टी के संविधान और लोकतंत्र की मर्यादा के बिलकुल खिलाफ था। लेकिन क्या इस मामले को खानदानी जायदाद के झगड़े की तरह कोर्ट-कचहरी में सालों तक घसीटा जाय ? लोकतान्त्रिक राजनीति में सबसे बड़ी अदालत तो जनता की अदालत होती है। अगर कोर्ट-कचहरी नहीं तो फिर और किस तरीके से इस वाहन को सुधारा जाय? जहाँ हर मतभिन्नता को विद्रोह करार दिया जाय, वहां भीतर से बदलाव कैसे हो?

तीसरा रास्ता एक नयी किस्म की राजनीति की ओर ले जाता है। ऐसी राजनीति जो स्वराज के आंदोलन की मूल भावना के अनुरूप हो। राजनीति का विकल्प बनाने या सिर्फ चालू राजनैतिक विकल्प बन जाने की जगह एक सच्चे अर्थ में वैकल्पिक राजनीति का रास्ता। सवाल है कि कैसी होगी यह राजनीति? इसका वैचारिक ताना-बाना क्या होगा ? तात्कालिक सफलता के लालच से मुक्त कैसे रहा जाय? अपने नैतिक आदर्शों से समझौता किये बिना सफलता कैसे हासिल की जा सकती है? और, यह भी कि क्या दूध से जली जनता क्या ऐसे किसी नए प्रयास से जुड़ेगी? ये मेरे और प्रशांत भूषण के प्रश्न नहीं है। यह आज पूरे देश के प्रश्न हैं। आपके प्रश्न हैं। इस बार उत्तर भी आप ही देंगे।

‘आप’ के नेता योगेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

उपरोक्त प्रकरण पर Rakesh Srivastava की पोस्ट : Yogendra Yadav जिन सिद्धांतों पर अड़े हैं, उस पर न अड़ें, तो वह राजनीति में हों ही क्‍यों .. एक पार्टी बने, वह पार्टी सत्‍ता में आ जाए, वह पा‍र्टी बहुत अच्‍छा शासन भी दे दे, योगेंद्र यादव का विजन यहीं पर जाकर खत्‍म नहीं हो सकता .. … कुछ लोग उस मिट्टी के बने होते हैं जिनकी जिंदगी का सारा डायनामिक्‍स उनके नैतिक विश्‍वास से चालित होता है .. बौद्धिकता के तेज के पीछे वह मानवीय करूणा होती है .. दुनियावी मानदंडों पर यह आदमी पिछड़ जाएगा, इसे अपना बोया काटने को नहीं मिलेगा, पर यह अपने उसूल पर बना रहेगा .. .. योगेंद्र उस वि़जन के निर्माताओं में केंद्रीय हैं जिसे केजरीवाल ने बेचा .. योगेंद्र और उन जैसे सैकड़ों विद्वानों और सिविल राईट व नव आंदोलनों के नेताओं अध्‍येताओं ने केजरीवाल की उर्जा देखकर उनपर बाजी लगाई .. जनता ने ख्‍ाूब खूब खरीदा क्‍योंकि जनता को अभी परिवर्तन की तगड़ी भूख है .. केजरीवाल को अब राजनीति की व्‍यावहारिकताएं दिख रही हैं, उनके करीब के लोगों को नई- पुरानी लॉबियों से मिलने वाले संभावित लाभ और सत्‍ताएं दिख रही हैं .. पर योगेंद्र को यह दिख रहा है कि इस ‘नई’ राजनीति को जमीनी अधिकार- आंदोलनों और संगठनों से अपनी सापेक्षताएं बनाए रखनी चाहिए और पार्टी की वह लोकतांत्रिकता बनाए रखनी चाहिए जिससे पार्टी और गवर्नेंस नए- नए लोगों और नए उभरे हित- समूहों को इस नई राजनति में ऊपर खींचने का माध्‍यम बनी रहे .. यही परिवर्तन की राजनीति है .. .. सिविल संगठनों से निरपेक्ष होकर पार्टियां व्‍यक्ति- केंद्रित हो जाती है, और व्‍यक्ति- केंद्रित होकर सिविल संगठनों से निरपेक्ष हो जाती है .. मध्‍यमार्ग की सभी पार्टियां ऐसी ही हैं .. दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा के तार आरएसएस जैसे सिविल संगठन से तो कम्‍यूनिस्‍ट पार्टियों के तार मजदूर और किसान संगठनों से जुड़ते हैं इसलिए ये पार्टियां करिश्‍माई नेतृत्‍व पैदा करने वाली होते हुए भी व्‍यक्ति पूजक नहीं हैं .. मध्‍यमार्गी पार्टियां व्‍यक्ति- पूजक, और कालांतर में परिवारवादी, वंशवादी, जातिवादी और क्रोनी कैपिटलिजम से आर्थिक- सुरक्षा प्राप्‍त करने वाली होकर रह जा रही हैं .. .. योगेंद्र यादव उस राजनीति के प्रतीक हैं जो मध्‍यमार्गी राजनीति को नव सृजित और विकेंद्रित हजारों सिविल संगठनों से जोड़कर नई उर्जा की राजनीति बनाना चाहता है .. इस राजनीति की जमीन तैयार है, फसल पकी है .. इसके लिए आम आदमी पार्टी को आंतरिक लोकतंत्र से पूर्ण प्रतिबद्धता दिखानी होगी जिससे कोई समझौता नहीं हो सकता .. इसी बिंदु पर योगेंद्र यादव की जिद को समझा जा सकता है .. .. केजरीवाल की सफलता सिर्फ केजरीवाल की सफलता नहीं है .. यह उस विजन और जनता में परिवर्तन की गहरी इच्‍छा की सफलता थी .. कुछ लोग उस सफलता को ले उड़ें, पर योगेंद्र अपने विश्‍वास अपनी जिद पर बने रहेंगे ..”

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दिल्ली से बाहर निकलते ही केजरीवाल के मंत्री Gopal Rai ने लाल बत्ती लगी कार धारण कर ली

Yashwant Singh : केजरीवाल के एक मंत्री Gopal Rai लाल बत्ती लगी कार से अपने गांव गए थे. क्या बुरा है भाई. वीवीआईपी कल्चर सिर्फ दिल्ली में खत्म करने का वादा था. कोई यूपी बिहार का नाम थोड़े लिया था ‘आप’ ने. वैसे भी, जंगली प्रदेश यानि यूपी में लाल बत्ती लगी कार से नहीं जाएंगो तो अफसर लोग से लेकर नेता लोग अउर जनता लोग तक इनको मंत्री ही नहीं मानेंगे. इसलिए जैसा देस वैसा भेष. दूसरे, गोपाल जी को अपने गांव के लोगों को भी तो एक बार दिखाना था कि देखो, हम मंत्री बन गया हूं, लाल बत्ती वाला… पों पों पों पों…

एनडीटीवी की मूल खबर ये है….

वीआईपी कल्चर को बढ़ावा देते दिखे गोपाल राय, काफिले संग लाल बत्ती की गाड़ी में पहुंचे गांव

नई दिल्ली : वीआईपी कल्चर खत्म करने के शपथ पत्र पर दस्तखत करने वाली आम आदमी पार्टी के नेता और मंत्री खुद वीआईपी कल्चर को बढ़ावा देते दिख रहे हैं। अभी पिछले हफ़्ते ही दिल्ली सरकार के एक कार्यक्रम में वीआईपी और वीवीआईपी लोगों के लिए अलग गेट को लेकर विवाद हुआ था। अब दिल्ली के परिवहन मंत्री गोपाल राय लाल बत्ती लगी गाड़ी में बैठे दिखे।

गोपाल राय यूपी के मऊ जिले में अपने पैतृक गांव गए थे। वहां वह यूपी सरकार की लाल बत्ती लगी गाड़ी से पहुंचे। यही नहीं, उनकी गाड़ी के आगे पीछे गाड़ियों का एक बड़ा काफिला भी चल रहा था। वहां के एसडीएम और आरटीओ भी उनके काफिले के साथ थे ताकि उन्हें किसी तरह की दिक्कत न हो। हालांकि इस पूरे मामले पर सफाई देते गोपाल राय ने कहा कि उन्होंने लाल बत्ती हटवा दी थी, लेकिन तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि वह लाल बत्ती की गाड़ी में सवार होकर गांव पहुंचे। जहां तक काफिले की बात है तो गोपाल राय ने कहा कि वहां उनसे मिलने बहुत से लोग आए थे, जिनमें हर तरह के लोग थे, जो गांव तक उनके साथ गए थे।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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केजरीवाल से आज फिर निराश हुए ओम थानवी

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जानिए, अंकित लाल ने क्यों दिया ‘आप’ के सोशल मीडिया प्रमुख पद से इस्तीफा

अंकित लाल ने आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया है. इस तरह उन्होंने आम आदमी पार्टी के फेसबुक ग्रुप की एडमिनशिप छोड़ दिया है. इसके पीछे क्या कारण रहे, इसे अंकित लाल ने एक पत्र के जरिए स्पष्ट किया है जो उन्होंने फेसबुक पर शेयर किया है. अंकित ने आहत मन से पार्टी संग अपने सफर को याद किया और कार्यकर्ताओं के नाम चिट्ठी लिखी जिसमें अन्ना आंदोलन से लेकर केजरीवाल के दूसरी बार सत्तारोहण व झगड़े का जिक्र है. अंकित की मूल चिट्ठी अंग्रेजी में है.

पढ़िए अंकित की चिट्ठी….

आज मैं आपको एक कहानी सुनाऊंगा. कहानी जो बताएगी कि मैंने किस तरह आम आदमी पार्टी (AAP) के एक फेसबुक पेज की एडमिनशिप छोड़ दी. यह वह जिम्मेदारी थी, जो मैं कभी उठाना नहीं चाहता था. लेकिन जब मुझे इसके लायक पाया गया तो मैं बचकर भाग नहीं सका. और यह कहानी थोड़ी सी बड़ी होगी, प्लीज बर्दाश्त कीजिएगा.

2009 में बीटेक कंप्लीट करने के बाद मैं बतौर ERP कंसल्टेंट जॉब करने लगा था. अप्रैल 2011 में मैंने दफ्तर से छुट्टी ली थी. मकसद था एक बार फिर जीआरई (ग्रेजुएट रिकॉर्ड एग्जाम) देने का. 2009 में भी मैंने जीआरई का एग्जाम दिया था और मेरा स्कोर 1290 था. मुझे लगा कि मैं इससे बेहतर कर सकता हूं. इसलिए नौकरी से छुट्टी ली. लेकिन वह इम्तहान मैं कभी नहीं दे सका, क्योंकि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (IAC) की एक फेसबुक पोस्ट ने मुझे जंतर-मंतर पहुंचा दिया. मैं इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) से बतौर वॉलंटियर जुड़ चुका था. इस दौरान मैंने पानी बांटा, अनशनकारियों की देखभाल करते हुए आरएमल अस्पताल में रातें बिताईं और वो सारे काम किए जो ‘एक्टिविस्ट’ किया करते हैं.

मेरे मैनेजर ने फेसबुक प्रोफाइल पर आंदोलन की तस्वीरें देख छुट्टियां रद्द कर दीं. यह 20 अप्रैल के आस-पास की बात होगी. तब तक मुझे आईएसी के ऑफिशियल ईमेल का जवाब देने का काम दे दिया गया था. हमारी टीम ने अप्रैल के महीने में ही करीब 12 हजार ईमेल के जवाब दिए थे.

छुट्टियों से लौटकर मैंने नौकरी जॉइन की. फिर गाजियाबाद की ग्राउंड टीम का हिस्सा बन गया (क्योंकि मेरा घर वैशाली में है.) मई से अगस्त 2011 तक इस ग्राउंड टीम का नेतृत्व किया. मकसद- जनलोकपाल!!

क्योंकि मैं ईमेल टीम का नेतृत्व कर रहा था, इसलिए मेरे पास ढेर सारी तस्वीरें आया करती थीं. इन तस्वीरों को फेसबुक पेज पर पोस्ट करवाने के मकसद से मैं शिवेंद्र के संपर्क में आया. शिवेंद्र IAC का फेसबुक पेज संभाल रहे थे. मुझे IAC की वेबसाइट की जिम्मेदारी भी दे दी गई क्योंकि मैं उनमें तकनीकी बैकग्राउंड का इकलौता कार्यकर्ता था. ज्यादातर काम ऑनलाइन होता था, यानी मैं जॉब करते हुए भी आंदोलन में सहयोग कर सकता था.

15 अगस्त को (अन्ना और केजरीवाल की गिरफ्तारी से एक दिन पहले) मैं उस 12 सदस्यीय टीम का हिस्सा था जो कम्युनिकेशन बैकबोन के रूप में काम करने के लिए अंडरग्राउंड हो गई थी. यह अरविंद केजरीवाल का ही आइडिया था, जो सफल रहा. इसने हमें हमारे प्लान में बनाए रखा.

मैंने दफ्तर से 15 दिन की छुट्टी मांगी थी, पर वह नहीं मिली. मैंने इस्तीफे की पेशकश कर दी. बाद में मैनेजर ने मुझे 10 दिन की छुट्टी देना स्वीकार कर लिया. 15 से 18 तारीख तक हम अंडरग्राउंड रहे, उसके बाद मैंने रामलीला मैदान में ही डेरा डाल लिया. वहीं रहा, खाया और सोया. यही वह समय था जब मैंने IAC के फेसबुक पेज के लिए भी पोस्ट लिखनी शुरू कर दी थी.

आंदोलन खत्म हो गया था. मैंने नौकरी शुरू कर दी और फिर आगे की पढ़ाई की तैयारियों में जुट गया. फिर दिसंबर का आंदोलन हुआ और नाकाम रहा. इसके बाद बहुत कुछ धुंधला हो गया.

20 जनवरी 2012. यह वो तारीख थी जब मुझे अरविंद केजरीवाल का बुलावा आया. उन्होंने मुझे नौकरी छोड़कर अपना एनजीओ PCRF जॉइन करने का प्रस्ताव दिया. एनजीओ के सदस्य के नाते मुझे 20 हजार रुपये हर महीने का स्टाइपेंड ऑफर किया गया, जो मेरी पिछली सैलरी से काफी कम था. केजरीवाल को भी एनजीओ से इतना ही स्टाइपेंड मिलता था. 22 जनवरी को मैंने नौकरी छोड़ दी और अगले दिन उनके एनजीओ से जुड़ गया. लगभग इसी समय दिलीप पांडे भी नौकरी छोड़कर केजरीवाल से जुड़ने भारत आ गए थे.

फरवरी में MS के लिए मेरी एप्लीकेशन न्यूजर्सी इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में स्वीकार कर ली गई. मेरे लिए फिर असमंजस की स्थिति थी. लेकिन मैंने यहीं रुकना तय किया. इसके कुछ समय बाद मैंने एक लड़की से शादी कर ली. उससे मैं IAC में ही मिला था. ये दोनों काम परिवार को बिना बताए किए गए थे.

मैं अब भी IAC का सोशल मीडिया मैनेज कर रहा था. लेकिन अप्रैल में शिवेंद्र ने IAC के सारे अधिकार अपने पास रख लिए. अब हमें सब कुछ जीरो से शुरू करना था. इसके बाद मैंने FWAC बनाया और नई टीम बनानी शुरू की. फिर मैं उस टीम का हिस्सा बना जिसने उन 15 मंत्रियों के खिलाफ रिसर्च की, जिनके खिलाफ केजरीवाल जुलाई-अगस्त 2012 में अनशन पर बैठे. इसके बाद ही आंदोलन के नेताओं के बीच मतभेद उभरने शुरू हो गए.

समस्याओं के हल के लिए अरविंद जो मुहिम चला रहे थे, मैं उनसे जुड़ा रहा, क्योंकि मैं यही सपना लेकर आया था. सितंबर 2012 में जब नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात आई तो हमने अपनी सोशल मीडिया की टीम नए सिरे से बनानी शुरू की. सुधीर, उज्ज्वल, प्रणव और बहुत सारे लोग इससे जुड़े. हमने राष्ट्रीय से लेकर, प्रदेश और जिला स्तर तक 800 से ज्यादा फेसबुक पेज बनाए और जीरो लाइक से सब कुछ शुरू किया. यह ग्रुप भी उसी समय सोमू ने बनाया था. नवंबर में जब पार्टी बनी तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी (NE) ने मुझे आधिकारिक रूप सोशल मीडिया की कमान सौंपी.

एक बड़ी दुविधा पार्टी के लॉन्च (26 नवंबर) से पहले मुंह बाए मेरे सामने खड़ी थी. पीसीआरएफ में स्टाइपेंड लेकर काम कर रहे ज्यादातर लोग अब पार्टी दफ्तर में कर्मचारी की हैसियत से ही जुड़ रहे थे. ऑफिस ब्वॉय को मिलाकर इनकी संख्या 17 थी. चूंकि ये लोग कर्मचारी थे, लिहाजा वे पार्टी का हिस्सा नहीं हो सकते थे.

असमंजस यह था कि मैं अपना करियर छोड़ चुका था, जहां मैं अपनी जरूरत से काफी ज्यदा कमा सकता था और अब ये 20 हजार रुपये महीने की छोटी सी रकम मेरे सपने के आड़े आ रही थी. मैंने फैसला लिया. मैंने पार्टी से जुड़ने के लिए पीसीआरएफ से इस्तीफा दे दिया. इस तरह मैं पार्टी की नेशनल काउंसिल का सदस्य बना. नवंबर 2012 से फरवरी 2014 तक मेरा घर पत्नी की कमाई से ही चला जो एक मीडिया हाउस में नौकरी करती थी. वह मुश्किल समय था, पर धीरे-धीरे बीत गया.

फिर संतोष (कोली) के एक्सीडेंट की खबर आई तो मैं हैरान रह गया. मैं उनके साथ 5-6 दिनों तक अस्पताल में रहा. उस सदमे से उभरने में मुझे कुछ समय लगा, तब तक सोशल मीडिया की हालत बिगड़ चुकी थी. ऐसे गुट बन गए थे जो खुलेआम एक-दूसरे से गाली-गलौज कर रहे थे. एक-दूसरे पर प्रहार और व्यक्तित्व पर कमेंट किए जा रहे थे और यह सब कुछ लोगों की वजह से हो रहा था. इन्हीं लोगों में वह ‘डॉक्टर’ भी शामिल हैं जो आजकल बड़े एक्टिव रहते हैं.

हमने टीम भंग कर दी और इसे दोबारा बनाना शुरू किया. इसमें पंकज, प्रत्यूष, आरती, मलय और महेंद्र जैसे लोग लाए गए. करीब दो सालों से यह टीम ‘वॉर मशीन’ की तरह काम कर रही है. 2013 और 2015 के चुनाव में हमने बीजेपी के लिए जो चुनौती पेश की, वह इससे पहले कोई पार्टी नहीं कर पाई. चरणजीत, अरशी और अभिनव हमारे अहम योद्धाओं में से थे, जिन्होंने अपने दिन और रातें AAP के सोशल मीडिया को समर्पित कर दिए.

लोकसभा चुनाव के बाद मैंने अपना सोशल मीडिया बिजनेस शुरू कर दिया. लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही मुझे पार्टी की ओर से बुला लिया गया. तब मेरे दोस्त आगे आए. उनके उधार के पैसों से मेरा घर चला. उम्मीद करता हूं कि अपनी नई शुरुआत से मैं बहुत जल्द उनका पैसा लौटा दूंगा.

इस टीम ने BAAP, अवाम और बीजेपी से लड़ाई लड़ी है और उन्हें हराया है. यह अपने रास्ते में आने वाली हर चुनौती से पार पा सकती है. मैं बस यही सुनिश्चित करूंगा.

मैं इस ग्रुप के सोशल मीडिया की जिम्मेदारी किसी को देकर अलग हो जाऊंगा. मैं भी अपनी जिंदगी और परिवार के लिए कुछ समय चाहता हूं. उम्मीद करता हूं एक दिन मैं इस लायक भी हो जाऊंगा.

तब तक, मैं काम करता रहूंगा, इस बात की परवाह किए बगैर कि कौन क्या कह रहा है!

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लव, सेक्स, धोखा और आप…. : ‘आप’ अब राजनीतिक दल नहीं, बल्कि गैंग है…

70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में 67 विधायक अरविन्द केजरीवाल के हैं. ये सबको मालूम है. कमाल का बन्दा है ये केजरीवाल. क्या सहयोगी, क्या विरोधी. सबको ठिकाने लगा देता है. क्या अपने- क्या पराये. “जो हमसे टकराएगा-चूर चूर हो जाएगा” के मंत्र का निरंतर जाप करता हुआ ये शख़्स ज़ुबाँ से भाईचारे का पैगाम देता है, मगर, वैचारिक विरोधियों को चारे की तरह हलाल करने से बाज नहीं आता.

राजनीतिक हमाम में जब इस बन्दे ने घुसपैठ की तो इस शख़्स के बेहद क़रीबी लोगों में बेहद छिछोरे किस्म के लोग थे, जो अपनी निजी ज़िंदगी, आम आदमी से बे-ख़बर,  पूरे ऐशो-आराम के साथ जीते हैं लेकिन सार्वजनिक जीवन में इस क़दर लफ़्फ़ाज़ी करते हैं कि पूछो मत. आशुतोष जैसे कइयों की “आप” में हैसियत वाली उपस्थिति इस बात की गवाही देने के लिए काफ़ी है. पूर्व राजस्व आयुक्त से लफ़्फ़ाज़ी किंग बन चुके, “आप” के एकमात्र नेता अरविन्द केजरीवाल से कोई ये पूछे कि योगेन्द्र यादव और कुमार विश्वास, आशुतोष, दिलीप पाण्डेय जैसे लोगों में से ज़्यादा विश्वसनीय कौन है, तो, केजरीवाल कुमार विश्वास, आशुतोष, पाण्डेय के पक्ष में नज़र आएंगे जबकि आम आदमी, जो इन सबको क़रीब से जानता होगा, वो केजरीवाल की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टर्स, विश्वास, आशुतोष, दिलीप पाण्डेय, जैसे जोकरों से ज़्यादा योगेन्द्र यादव को योग्य क़रार देगा. पर योग्यता लेकर केरीवाल करेंगे क्या?

जितने ज़्यादा जोकर या मूर्ख होंगे, उनके बीच खुद को सबसे ज़्यादा गंभीर व बुद्धिमान साबित करना उतना ही आसान होगा. सबसे ज़्यादा योग्य होने का तमगा तो वो खुद को बहुल पहले ही दे चुके हैं. जोकर होना या मूर्ख होना भी खतरनाक नहीं है. खतरनाक है खुद को गन्दगी के दलदल में खड़ा रख, सफाई-अभियान की अगुवाई का दम्भ भरना. खतरनाक है, आम आदमी के विश्वास की ह्त्या करना. केजरीवाल और उनके स्वयंभू कलाकारों के अंदर की “गन्दगी” सड़ी हुई लाश की तरह “आप” के पानी में सतह पर आ चुकी है. केजरीवाल के साथ जो लोग हैं, वो चना खाकर आंदोलन करने वाले लोग नहीं बल्कि संपन्न तबके के वो लोग हैं, जो ठीक-ठाक पैसा हासिल करने के बाद अब, पावर की जुगाड़ में हैं.

अन्ना की गँवारूपन वाली ईमानदारी को, आई.आई.टी. से निकला केजरीवाल नाम का “बुद्धिमान” पढ़ा-लिखा आदमी तुरंत पकड़ लिया. हमारे ज़्यादातर प्रोफेशनल टॉप इंस्टीच्यूट, देश सेवा की बजाय, अवसरवादी सोच की पाठशाला साबित हुए हैं. केजरीवाल भी अपवाद साबित नहीं हुए. थोड़ा सा दिमाग चलाया, और, अब “आप” के बेताज बादशाह हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. एक ऐसा इंसान जो बात लोकतंत्र की करता है मगर लोकतंत्र से इस इंसान को ज़बरदस्त नफ़रत है. 2014 की “भाईचारा” फिल्म के बाद, मार्च 2015 में “नफ़रत” फ़िल्म भी ज़ोरदार तरीक़े से रिलीज़ हुई. भाईचारा नाम की फिल्म का  “नायक”, राजनीति के परदे पर, इस बार, खलनायक की तरह नज़र आया. हिन्दी फिल्मों के खलनायक की तरह इस शख़्स ने भी गली-छाप टपोरियों के भरोसे, विरोध की हर आवाज़ को ठिकाने लगाने का रास्ता अख़्तियार कर लिया है.

“आप” की ज़मीन तैयार करने वाले कई लोगों को ज़मींदोज़ कर दिया गया. “आप” अब एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि, एक गैंग है. ये गैंग सपने दिखा कर सपनों का क़त्ल करने में उस्ताद है. ये गैंग बद से बदनामी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है. अपनों से लव की स्टोरी के बाद धोखा और सहयोगी के साथ सेक्स वाला सोना के साथ लगातार साज़िशों का दौर. ये है आज “आप” की तस्वीर. बावजूद इस गैंग को इस बात का भरोसा है, कि, केजरीवाल नाम का ये नायक और इसकी “आप”, राजनीतिक हमाम में कपड़ों में दिखाई देंगे. अपने चेलों के साथ, गुरु बनने का ढोंग रच कर, गुरु जी ने, खुद को गुरु-घंटाल साबित करने की कोशिश की है. 

गुरु घंटाल, केजरीवाल जी को यकीन है कि दिल्ली के 67 विधायक उनके साथ हैं. मगर इस गैंग लीडर को ये भी यकीन होगा कि राजनीति बड़ी बेरहम होती है. विधायकों का ईमान-धर्म, सत्ता के साथ ही हिलता-डुलता है. आज केजरीवाल के साथ, तो हो सकता है, कल योगेन्द्र यादव के साथ. इस गैंग लीडर को भी इस बात का अंदाज़ होगा कि पब्लिक, नेताओं से भी ज़्यादा बेरहम होती है. सर पर बैठा कर तो रखती है, मगर, सपनों के क़त्ल की साज़िश रचने वालों को सरेआम “फांसी” पर चढ़ाने से गुरेज़ नहीं करती. फिल्म में एक्टिंग करना एक कला है. तीन घंटे की फिल्म के दौरान कई बार नायक के लिए तालियां बजती हैं, मगर क्लाइमेक्स में जब ये पता चलता है कि फिल्म का नायक ही असली खलनायक है और नायक के पीछे चलने वाले हफ्ता वसूली करने वाले टपोरी, तो, दर्शकों का गुस्सा सातवें आसमान पर होता है और 3 घंटे की फिल्म के बाद भी कई दिनों तक नायक बने खलनायक को गालियां मिलती हैं. “आप” गैंग के लीडर और इसके सदस्यों ने ऐसी फ़िल्में कई बार देखी होगी.   ख़ुदा ख़ैर करें!

लेखक नीरज वर्मा ‘लीक से हटकर’ ब्लाग के संचालक हैं.

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आम आदमी पार्टी ने लोगों की उम्मीदें तोड़ दीं, सड़क पर उतरे कवि नरेश सक्‍सेना

लखनऊ : वरिष्‍ठ कवि नरेश सक्‍सेना ने कहा कि अन्ना आंदोलन और उसके बाद आप पार्टी के गठन से बहुत से लोगों में जो उम्‍मीदें जगी थीं, वे बहुत जल्‍दी ही टूट गई हैं और अब ये स्‍पष्‍ट होता जा रहा है कि ये भी दूसरी पार्टियों की ही डगर पर चल रहे हैं।

नरेश सक्‍सेना अरविन्द केजरीवाल सरकार को उसके चुनावी वादों की याद दिलाने गये हज़ारों मज़दूरों एवं छात्रों पर 25 मार्च को दिल्ली सचिवालय पर पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के विरोध में जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। 

प्रदर्शन में कवि अनिल श्रीवास्‍तव ने कहा कि ऐसी दमनात्‍मक कार्रवाइयों के विरोध में साझा आंदोलन खड़ा करने का प्रयास होना चाहिए। कवयित्री कात्यायनी ने कहा कि इस घटना से साफ हो गया है कि पुरानी पूँजीवादी पार्टियों से जनता के बढ़ते मोहभंग का लाभ उठाकर लोकलुभावन जुमलों और दिखावटी जनसरोकारों की बात करते हुए उभरी यह नयी पार्टी चुनावी बाज़ार में नयी पैकिंग में पुराने माल को बेचने वाले एक धूर्त व्यापारी के सिवा और कुछ नहीं है। ‘आप’ के भीतर इस समय चल रही कुत्ताघसीटी भी यही साबित कर रही है। 

प्रदर्शन में लखनऊ विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग कालेज तथा टेक्सटाइटिल इंजीनियरिंग कालेज, कानपुर के छात्र भी शामिल हुए। इनमें श्री जानकी प्रसाद गौड़, डा. राजीव कौशल, रोडवेज़ संविदा कर्मचारी संघ के होमेंद्र मिश्रा, महानगर बस सेवा कर्मचारी संघ के प्रदीप कुमार पांडेय, आइसा के सुधांशु, अनुराग ट्रस्‍ट के अध्‍यक्ष रामबाबू, पत्रकार संजय श्रीवास्‍तव, स्‍त्री मुक्ति लीग की शाकंभरी, शिप्रा श्रीवास्‍तव, शिवा, रूपा, पत्रकार एस.के. गोपाल, राष्‍ट्रीय प्रस्‍तावना के संपादक प्रभात कुमार आदि प्रमुख थे। 

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आम आदमी पार्टी ने लात-घूसे के बीच योगेंद्र, प्रशांत, आनंद और अजित को राष्ट्रीय कार्यपरिषद से निकाला

दिल्ली : दिल्ली-गुड़गांव सीमा पर शनिवार को कापसहेड़ा में राष्ट्रीय परिषद की बैठक में प्रशांत भूषण और योंगेद्र यादव, अजीत झा और प्रोफेसर आनंद कुमार को आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया है। प्रस्ताव पर 200 सदस्यों ने हस्ताक्षर कर दिए। केजरीवाल धड़े का मानना है कि इन चारो नेताओं ने केजरीवाल को ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटाने के लिए साजिश रची। बैठक में जमकर लात-घूंसे भी चले, जिससे कई एक घायल हो गए। योगेंद्र यादव के समर्थक रमजान चौधरी को बाउंसर्स ने उठा कर पटक दिया। उनके पैर की हड्डी टूट गई। एक और नेता का पैर टूट गया। आरोप है कि बैठक हॉल में तीन दर्जन से अधिक बाउंसर्स तैनात किए गए थे।

आम आदमी पार्टी की बैठक के दौरान धक्कामुक्की के बाद धरने पर बैठे योगेंद्र यादव

भारी हंगामे के बीच शुरू हुई मीटिंग में सबसे पहले आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल का भाषण हुआ। केजरीवाल के भाषण के बाद मीटिंग की अध्यक्षता गोपाल राय ने की और मनीष सिसोदिया ने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अजीत झा और प्रफेसर आनंद कुमार को बाहर निकालने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव पास हो गया और इन चारों नेताओं को पार्टी के सभी पदों से हटा दिया गया। 

अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक को संबोधित करके बाहर निकल गए। जाने से पहले केजरीवाल ने मीटिंग में भावुक भाषण दिया। वह ऐसे हालात में काम नहीं कर सकते। केजरीवाल ने करीब 30-35 मिनट का अध्यक्षीय भाषण दिया। इसके बाद गोपाल राय को अध्यक्षता की जिम्मेदारी सौंप दी। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने बैठक से बाहर निकलने के बाद मीडिया को बताया कि हमारे लोगों के साथ मारपीट की गई। अरविंद के भाषण के दौरान गद्दारों को बाहर करो के नारे लगे। पहले से मीटिंग की स्क्रिप्ट तय थी। लोकपाल को मीटिंग में आने नहीं दिया गया। गोपाल को एक मिनट में चेयरमैन बना दिया गया।

पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में शामिल होने के बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण मीटिंग बीच में ही छोड़कर बाहर आ गए। उन्होंने टिप्पणी की कि बैठक में लोकतंत्र की हत्या हुई है। प्रशांत भूषण ने इसे अपने ख़िलाफ़ षडयंत्र बताया है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को बाउंसर बुलाकर पीटा गया। इससे पहले योगेंद्र यादव ने ट्विट कर लिखा कि “सभी साथियों, समर्थकों और शुभचिंतकों से मेरा अनुरोध अगर आप पार्टी की आत्मा और एकता को बनाए रखना चाहते हैं तो घर बैठकर प्रार्थना करें। राष्ट्रीय स्थल की बैठक के बाहर किसी शक्ति परीक्षण या तू-तू मैं-मैं का हिस्सा न बनें।”

प्रोफ़ेसर आनंद कुमार ने कहा कि बैठक में जो कुछ हुआ, वह लोकतांत्रिक नहीं था और उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। भले ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया है लेकिन वह अब भी पार्टी के कार्यकर्ता हैं। न पार्टी छोड़ेंगे, न तोड़ेंगे बल्कि सुधरेंगे और सुधारेंगे।

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आप में दुर्दिन क्यों ?

दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को आज जो दुर्दिन देखने को मिल रहे हैं, उनके लक्षण स्पष्टतः पार्टी के जन्म से ही परिलक्षित होने लगे थे हालांकि वे दृष्टव्य होने के बावजूद अनदेखी किये जाने के फलस्वरूप नासूर बन गये। राम नवमी पर 28 मार्च को राष्ट्रीय परिषद – आप की बैठक में वह कथित नासूर विस्फोटक रूप ले सकता है।

जरूरी है कि सियासी पारी में कथित राष्ट्रीय परिषद सहित सभी इकाईयों को भंग कर एकल प्रणाली के तहत पार्टी प्रमुख एवं सीएम केजरीवाल को सर्वेसर्वा हो जाना चाहिए। इसके बाद अपनी मनचाही राष्ट्रीय परिषद, अन्य कमेटियां गठित करनी होंगी। यहां तक कि राज्य व जिला संयोजकों के साथ उन इकाईयों का पुनर्गठन करना होगा। सवाल उठता है कि आखिर ये सब तमाशा क्यों खड़ा हुआ? 

दरअसल में दुर्दिन का मूल कारण है आंदोलन  बनाम राजनीति। दोनों उत्तर-दक्षिण ध्रुव हैं, जिन्हें एक करने का दुस्साहस ऐसे ही रासायनिक विस्फोटक का विज्ञान-सूत्र सिद्ध करता है। जब आन्दोलन को सियासी जामा पहनाया गया तो जो अनासक्त भाव से व्यवस्था परिवर्तन की नियत से आन्दोलन रत सत्यनिष्ठ जनों की जमात थी, उसे ही राष्ट्रीय परिषद आदि में समायोजित कर लिया गया, फलस्वरूप कथित रूप से व्यवस्था परिवर्तन की सियासी पारी में जिस मन्तव्य से उस सत्यनिष्ठ जमात ने अपनी स्वीकृति दी थी, वही अब प्रदूषित होती सियासी पारी में घुटन महसूस कर रहे हैं, और क्रमशः विद्रोही साबित होते जा रहे हैं। जिनमें अश्विनी उपाध्याय, पूर्व कानूनमंत्री शान्तिभूषण, मयंक गांधी, शाजिया इल्मी, विनोद कुमार बिन्नी, प्रशान्त भूषण आदि के नाम उल्लेखनीय है। इस स्वच्छ मानसिकता के लगभग 200 लोग आपकी राष्ट्रीय परिषद में हैं, जिनसे ही सियासी जमात को खतरा है। यही कारण है, योगेन्द्र-प्रशान्त द्वारा राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों के नाम सार्वजनिक करने की मांग उठाते ही इस जोड़ी को अस्तित्व हीन करार दे दिया गया। 

अन्ततोगत्वा विस्फोटक हालात में पहुंच चुकी आप में अब एक ही विकल्प है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन नामधारी आन्दोलनसेवी सत्यनिष्ठों को मातृ-संस्थावत मानकर सियासत से अलग किया जाये। जो काम शुरू में नहीं हुआ तो अब हो सकता है। दरअसल आन्दोलन के राजनीतिकरण का अंकुरण ठीक 4 साल पहले हो चुका था, जब लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, रामपुर, मैनपुरी व इटावा आदि जगहों पर तेजी से घटनाक्रम का दौर चला। आईएसी के प्रारंभिक संस्थापक सदस्यों को हाशिये पर लाते हुए अनैतिक घुसपैठ को बढ़ावा दिया गया। जब उन्हीं आंदोलन सेवी सत्यनिष्ठ जनों को सियासी पारी के संस्थापक सदस्य के रूप में समायोजित किया गया तो नैतिक मूल्यों के होते ह्रास को देखकर घुटन महसूस करने लगे और उन्हें विद्रोही की उपाधि देने का क्रम शुरू हो गया था, जो थमने का नाम नहीं ले रहा। 

लेखक आईएसी के प्रारंभिक कोआर्डीनेटरों शामिल है

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‘आप’ का वार सोशल मीडिया के आरपार : ट्विटर पर सिसौदिया, फेसबुक पर योगेंद्र-प्रशांत का पत्राचार

नई दिल्ली : सत्ता में आने के बाद से ही मीडिया से सोशल मीडिया तक छाया हुआ आम आदमी पार्टी का अंदर-बाहर का जमा-जुबानी घमासान शनिवार को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की होने वाली बैठक से ठीक पहले गुरुवार शाम चरम पर पहुंच गया। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया कि योगेंद्र और भूषण केजरीवाल को हटाने पर अड़े हैं। मैं इसके खिलाफ हूं लेकिन अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी को फैसला करने दें। योगेंद्र यादव ने फेसबुक पर लिखा कि जिस चिट्ठी को उनका इस्तीफा बताया जा रहा है, वह दरअसल कुछ मांगों को लेकर लिखा गया एक नोट था। इस नोट में हमने कहा था कि अगर हमारी पांच मांगें मान ली जाती हैं, तो हम इस्तीफा दे देंगे। क्या हमारी ये मांगें पूरी हुई हैं। 

इससे पहले आम आदमी पार्टी की ओर से कुमार विश्वास ने मीडिया से कहा कि प्रशांत व योगेंद्र द्वारा रखी गई सभी पांच शर्तें मंजूर कर ली गई हैं। पार्टी ने प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव का इस्तीफा मंजूर कर लिया है लेकिन इसपर अंतिम फैसला राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वोटिंग के जरिए होगा। इसी बीच प्रशांत भूषण ने खंडन कर दिया कि हमने केजरीवाल का इस्तीफा मांगने की कोई शर्त नहीं रखी है। ये सरासर झूठ है। योगेंद्र यादव ने भी ट्वीट किया कि केजरीवाल के इस्तीफे मांगने का दावा पूरी तरह से गलत है।

अरविंद केजरीवाल के नाम योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने खुली चिट्ठी फेसबुक पर सार्वजनिक कर दी है, जो इस प्रकार है – 

” अरविन्द भाई, हम दोनों को मजबूर होकर आपके नाम यह खुली चिठ्ठी लिखनी पड़ रही है। दस दिन पहले आपके बंगलूर से आने पर हमने आपसे मुलाक़ात का समय माँगा था। लेकिन अभी तक आप समय नहीं निकाल पाये हैं। ऐसे में बहुत अनिश्चितता का माहौल बना है। पार्टी के तमाम वॉलंटियर, समर्थक और शुभचिंतक यह आस लगाये बैठे हैं कि बात-चीत चल रही है और कुछ अच्छी खबर आने वाली है। मन ही मन चिंतित भी हैं कि पार्टी की एकता बनी रहेगी या नहीं। यह आशंका भी जताई जा रही है कि बंद कमरों की इस बातचीत में पार्टी के सिद्धांतो से कोई समझौता तो नहीं किया जा रहा। इसलिए हम इस चिठ्ठी को सार्वजनिक कर रहे हैं।

”आपके बंगलूर से वापिस आने के बाद उसी रात को पार्टी के कई वरिष्ठ साथी घर मिलने आये। उसके बाद बातचीत का एक सिलसिला शुरू हुआ जिसमे हमारी और से प्रा. आनंद कुमार और प्रा. अजीत झा थे। हम दोनों ने इस बातचीत के लिए एक लिखित प्रस्ताव रखा। शुरू में लगा कि बातचीत ठीक दिशा में बढ़ रही है। लगा कि राष्ट्रीय संयोजक पद जैसे फ़िज़ूल के मुद्दों और आरोपों से पिंड छूटा है। जब पीएसी ने देश भर में संगठन निर्माण, दिल्ली के बाहर चुनाव पर विचार और वॉलंटियर की आवाज़ सुनने की घोषणा की तो हमें भी लगा कि आखिर अब उन सवालों पर जवाब मिल रहा है जो हमने उठाये थे। लेकिन जब पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र के इन सवालों पर ठोस बातचीत हुई तो निराशा ही हाथ लगी। कहने को सिद्धांतों पर सहमति थी लेकिन किसी भी ठोस सुझाव पर या तो साफ़ इंकार था या फिर टालमटोल। 

”1. हमारा आग्रह था कि स्वराज की भावना के अनुरूप राज्य के फैसले राज्य स्तर पर हों। हमें बताया गया कि यह संगठन और कार्यक्रम के छोटे-मोटे मामले में तो चल सकता है, लेकिन देश के किसी भी कोने में पंचायत और म्युनिसिपालिटी के चुनाव लड़ने का फैसला भी दिल्ली से ही लिया जायेगा, और वो भी सिर्फ पीएसी द्वारा ।कुमार

”भाई को महाराष्ट्र भेजने के फैसले ने हमारे संदेह की पुष्टि की है।

”2. हमने मांग की थी कि हमारे आंदोलन की मूल भावना के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में पार्टी पर लगाये गए चार बड़े आरोपों (दो करोड़ के चैक, उत्तमनगर में शराब बरामदगी, विधि मंत्री की डिग्री और दल-बदल और जोड़-तोड़ के सहारे सरकार बनाने की कोशिश) की लोकपाल से जांच करवाई जाय। जवाब मिला कि बाकी सब संभव है, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े किसी भी “संवेदनशील” मामले पर जांच की मांग भी न की जाय।

”3. हमने सुझाव दिया था कि लोकतान्त्रिक भागीदारी की हमारी मांग के अनुरूप पार्टी के हर बड़े फैसले में वॉलंटियरों की राय ली जाय, मांग हो तो वोट के ज़रिये। जवाब मिला कि राय तो पूछ सकते हैं, लेकिन वॉलंटियर द्वारा वोट की बात भूल जाएँ, खासतौर पर उम्मीदवार चुनते वक्त। 

”4. हमने कहा था कि पार्टी अपने वादे के मुताबिक़ RTI के तहत आना स्वीकार करे। हमें बताया गया कि पार्टी कुछ जानकारी सार्वजनिक कर देगी, लेकिन RTI के दायरे में आना व्यवहारिक नहीं है। 

”5. आपकी तरफ से प्रस्ताव आया कि सभी पदाधिकारी चुनाव आयोग वाला एफिडेविट भर कर अपनी संपत्ति का ब्यौरा दें, आयकर का ब्यौरा पार्टी को दें और परिवार एक पद का नियम आमंत्रित सदस्यों पर भी लागू हो। हमने यह सब एकदम मान लिया। 

”6. आपकी तरफ से एक मुद्दा बार-बार उठाया गया। योगेन्द्र को कहा गया की वे चाहे तो उन्हें हरियाणा में खुली छूट दी जा सकती है। जिन लोगों ने वहां योगेन्द्र के काम में रोड़े अटकाए है, उन्हें राज्य बाहर कर दिया जायेगा। हमने स्वीकार नहीं किया चूंकि जब तक आतंरिक लोकतंत्र के हमारे मूल सवालों का जवाब नहीं मिलता तब तक ऐसी किसी चर्चा में भाग लेना भी सौदेबाजी होगी।

”हमने इन सब सवालों पर खुले मन से बातचीत की। जब पृथ्वी रेड्डी ने इन मुद्दों पर अपना एक प्रस्ताव रखा जो हमारे प्रस्ताव से बहुत अलग था, तो हमने उसे भी स्वीकार कर लिया । लेकिन अब पृथ्वी इस न्यूनतम प्रस्ताव को लेकर मिले तो आपने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया। एडमिरल रामदास को भी असफलता ही हाथ लगी।

”हमें ऐसा समझ आने लगा कि बातचीत का मकसद हमारे मुद्दों को सुलझाना नहीं था, बल्कि हमारा इस्तीफ़ा हासिल करना था। आपकी ओर से बात कर रहे साथी घुमा-फिरा कर एक ही आग्रह बार-बार दोहराते थे कि हम दोनों अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस्तीफ़ा दे दें। कारण यही बताया जाता था कि यह आपका व्यक्तिगत आग्रह है, आपने कहा है कि जब तक हम दोनों राष्ट्रीय कार्यकारिणी में हैं तब तक आप राष्ट्रीय संयोजक के पद पर काम नहीं कर सकते। यही बात आपने तब भी कही थी जब हमें पीएसी से निकलने का प्रस्ताव लाया गया था। आपके कई नजदीकी लोग सार्वजनिक रूप से यह भी कह रहे हैं कि हमें पार्टी से ही निष्काषित किया जायेगा। कुल मिलाकर आपकी तरफ से सन्देश आ रहा है की या तो शराफत से इस्तीफ़ा दे दो, या फिर अपमानित करके निकाला जायेगा। ये सब आपके सलाहकार ही नहीं, आप खुद कहलवा रहे हैं यह सुनकर हमें बहुत दुःख और धक्का लगा है।

”हमने ऐसा क्या किया है, अरविन्द भाई, जो आप हमसे इतनी व्यक्तिगत खुंदक पाले हुए है? आपके मित्रगण मीडिया में चाहे जो भी झूठ फैला रहे हों, लेकिन आप सच्चाई से अछी तरह वाकिफ़ हैं. हमने आज तक कभी भी आपसे कोई पद, ओहदा या लाभ नहीं माँगा. हमने कभी भी आपको अपदस्थ करने की कोशिश नहीं की है. यहाँ गिनाना शोभा नहीं देता लेकिन आप जानते है कि हम दोनों ने हर नाजुक मोड़ पर आपकी मदद की. हाँ, हमने आपसे सवाल ज़रूर पूछे है. तब भी पूछे हैं जब आप नहीं चाहते थे. हाँ, हमने नासमझी और उतावली के खिलाफ आपको आगाह जरूर किया है, और हाँ, जब आपने सुनने से भी मना किया तो हमने संगठन की मर्यादा के भीतर रहकर विरोध भी किया. स्वराज के सिद्धांतों पर बनी हमारी पार्टी में क्या ऐसा करना कोई अपराध है? हाँ, हमरी बातें तकलीफदेह हो सकती हैं और हमेश रहेंगी. लेकिन क्या आप ऐसे किसी व्यक्ति को पार्टी में नहीं रखना चाहते जो आपकी आँखों में आँखें डालकर सच बोल सके?

”यूं भी, अरविन्द भाई, जैसा कि आप जानते हैं, हमने खुद इस बातचीत के लिए लिखित नोट में अपने इस्तीफे की पेशकश की थी, बशर्ते:

”· पंचायत और म्युनिसिपेलिटी चुनाव में भागीदारी का अंतिम फैसला राज्य इकाई के हाथ में देने की घोषणा हो

”· हाल में पार्टी से जुड़े चारों बड़े आरोपों की जांच एकदम राष्ट्रीय लोकपाल को सौंप दी जाय

· सभी राज्यों में लोकायुक्त को राष्ट्रीय लोकपाल की राय से तत्काल नियुक्त किया जाय

”· नीति, कार्यक्रम और चुनाव के हर बड़े फैसले पर कार्यकर्ता की राय और जरूरत पड़ने पर वोट दर्ज़ करना शुरू किया जाय

”· पार्टी CIC के आर्डर के मुताबिक RTI स्वीकार करने की घोषणा करे

”· राष्ट्रीय कार्यकारिणी के रिक्त पदों को संविधान के अनुसार राष्ट्रीय परिषद द्वारा गुप्त मतदान से भरा जाय

”हम अपने प्रस्ताव पर आज भी कायम हैं। अगर हमारे इस्तीफ़ा देने भर से पार्टी में इतने बड़े सुधार एक बार में हो सकते हैं, तो हमें बहुत खुशी होगी। हमारे लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बने रहना अहम् का मुद्दा नहीं है। असली बात यह है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुछ स्वतंत्र आवाजों का बचे रहना संगठन और खुद आपके लिए बेहद जरूरी है।

”अरविन्द भाई, आज देश में वैकल्पिक राजनीति की सम्भावना बहुत नाजुक मोड़ पर है। आम आदमी पार्टी सिर्फ दिल्ली नहीं पूरे देश के लिए नयी राजनीती की आशा बनकर उभरी है। हमारी एक छोटी सी गलती इस आंदोलन को गहरा नुक्सान पहुँचा सकती है। आज देश और दुनिया में न जाने कितने भारतीयों ने इस पार्टी से बड़ी बड़ी उम्मीदें बाँधी हैं। पिछले हफ़्तों में हमें हज़ारों वॉलंटियर सन्देश मिले हैं। उन्हें पार्टी में जो कुछ हो रहा है उससे धक्का लगा है। वो सब यही चाहते हैं कि किसी तरह से पार्टी के नेता मिलजुलकर काम करें, पार्टी के एकता बनी रहे और साथ ही साथ उसकी आत्मा भी बची रहे। किसी भी चीज़ को तोडना आसान है, बनाना बहुत मुश्किल है। आपके नेतृत्व में दिल्ली की ऐतिहासिक विजय के बाद आज वक्त बड़े मन से कुछ बड़े काम करने का है। सारा देश हमें देख रहा है, ख़ास तौर पर आपको। हमें उम्मीद है की आप इस ऐतिहासिक अवसर को नहीं गँवाएगे।

”राष्ट्रीय परिषद की बैठक में बस एक दिन बाकी है। उम्मीद है इस अवसर पर एक बड़ी सोच रखते हुए आप पार्टी की एकता और उसकी आत्मा बचाये रखने का कोई रास्ता निकालेंगे। ऐसे किसी भी प्रयास में आप हमें अपने साथ पाएंगे।

” सस्नेह आपके, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव” ( चिट्टी, योगेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से)

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अबे चिरकुट आपियों, खुद को अब मोदी-भाजपा से अलग कैसे कहोगे…

Yashwant Singh : चोरकट केजरी और सिसोदिया का असली रूप आया सामने.. दिल्ली में पानी के दाम में 10 परसेंट वृद्धि। अबे चिरकुट आपियों, मोदी-भाजपा से खुद को अलग अब कैसे कहोगे। सत्ता पाकर तुम लोग भी आम जन विरोधी हो गए! अरे करना ही था तो चोर अफसरों के यहाँ छापे मरवाकर उनकी संपत्ति जब्त कराते और उस पैसे को बिजली पानी में लगाते। जल बोर्ड के करप्ट अफसरों और पानी माफिया की ही घेराबंदी कर देते तो इनके यहाँ से हजार करोड़ निकल आता। पर अमेरिकी फोर्ड फाउंडेशन के धन पर करियर बनाने वाले इन दोनों नेताओं से अमेरिकी माडल के पूंजीवाद से इतर काम करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

सिस्टम के कल पुर्जों- करप्ट अफसरों, करप्ट नेताओं, करप्ट मीडिया और करप्ट पूंजीपतियों के खिलाफ कारवाई ना कर, एक तरह से इन्हें साथ लेकर व संरक्षण देकर शासन करने की पद्धति अमेरिका मार्का पूंजीवादी लोकतान्त्रिक पद्धति है जिसे पहले कांग्रेस अपनाए थी, अब मोदी अपनाये हुवे है और इसी रास्ते पर केजरी चल रहा है। देखते जाईयेगा, ये आपी सारे वही कुतर्क पेश करेंगे जो मोदी भक्त पेश करते हैं।चिरकुटों, बता दो कितने भ्रष्ट अफसरों को जेल भेजा। पूर्ण स्वराज और लोकपाल के लिए क्या आगे काम किया। जिन वादों नारों के चलते राजनीति की टोपी पहनी वो सत्ता मिलने पर किधर हवा हो गए। सब के सब सत्ता मिलते ही कम्बल ओढ़ कर घी पीने में जुट गए हैं। जो कोई सवाल उठाएगा वो चोरों के चेलों के जरिये अपमानित करके पार्टी से बाहर फेंक दिया जाएगा। देखते जाइए, इन रंगे सियारों की असलियत एक एक करके सामने आएगी। इन पर सवाल उठाने और दबाव बनाये रखने की ज़रूरत है दोस्तों वरना इनके मोदी की तरह जन विरोधी बनते देर न लगेगी। अपना फंडा हमेशा एक रहा है- जो संघर्ष कर रहा है उसको सपोर्ट करो… जब सत्ता में आ जाए तो नकेल कसो।

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सरकार बनवा देना बड़ा काम होता है तो उससे भी बड़ा काम सरकार बन जाने के बाद उस पर दबाव बनाए रखना होता है. इसी के तहत केजरी और ‘आप’ की हरकतों पर जहां कहीं कुछ सार्थक कहा सुना लिखा जाता है, उसे हम लोग भड़ास पर प्रकाशित कर रहे हैं. मेरा निजी मत भी ये है कि केजरीवाल की अपनी निजी खेती है आम आदमी पार्टी. वो अपने इमोशन्स के हिसाब से पार्टी चलाता है. जब जी आए आम आदमी बन जाए. जब जी आए खास नजर आए. जब जी आए पार्टी के भीतर युद्ध छिड़वा दे. जब जी आए शांति का इशारा कर दे. जब जी आए चुप्पी साध ले. जब जी आए खूब बोले, लगातार बोले. मतलब ये कि आम आदमी पार्टी किसी विचारधारा और संगठन से निर्मित पार्टी नहीं बल्कि यह दूसरी पार्टियों जैसी व्यक्ति केंद्रित पार्टी है और व्यक्ति पूजक लोग इसके कार्यकर्ता. जैसे यूपी में सपा का जन्म पिछड़ी जाति के वोट बैंक के कारण हुआ और बसपा का दलित वोटरों के उठ खड़े होने के कारण, कुछ उसी तरह दिल्ली में ‘आप’ नामक परिघटना के पीछे पढ़ा-लिखा तबका है जो कांग्रेस-भाजपा से आजिज आने के कारण नई पार्टी नए व्यक्ति को खुदा मान लिया और जिता दिया. लेकिन ये पढ़ा लिखा तबका मूर्ख नहीं है. केजरीवाल अगर मुलायम या मायावती की स्टाइल में दिल्ली में राज करना चाहेंगे तो वो बुरी तरह से पिटेंगे. हर तरह से पिटेंगे. केजरीवाल कुछ अलग करते नहीं दिख रहे, उल्टे वे अपने अहंकार का बारंबार प्रदर्शन करते जा रहे हैं… हम लोगों का काम कमजोरों को सपोर्ट कर उन्हें जिताना, सफल बनाना होता है ताकि बदलाव चालू रहे. पर जब ये बदलाव अंततः यथास्थितिवाद का विस्तार समझ आने लगे तो सवाल करना और करवाना लाजिमी है. केजरीवाल, उनकी पार्टी और उनकी सरकार पर इन दो रिपोर्टों को पढ़िए…

1-

‘आप’ की हरकतें कहीं से भी उसे देश की दूसरी पार्टियों से अलग नहीं करती है
http://goo.gl/mPl4h6

2-
केजरीवाल सरकार भी बांटने लगी रेवड़ियां, संसदीय सचिव बनाकार 21 MLA को मंत्री पद का दर्ज़ा दिया
http://goo.gl/ICxbN5

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इस बहादुर लड़की को आप सभी का सपोर्ट चाहिए। दिल्ली की केजरीवाल सरकार को अपने झगड़ों से फुरसत कहाँ जो आम दिल्ली वालों की पीड़ा का संज्ञान ले। सत्ता में आकर सब एक जैसे हो जाते हैं, कोई खुला हरामी तो कोई छिपा हरामी। आईये हम आप इस लड़की को सपोर्ट करने जंतर मंतर पहुंचे और इसकी लड़ाई को सपोर्ट कर इसके हौसले को बुलंद करें… इस लिंक पर क्लिक करें: Bahadur Ladki

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Binod Kumar Sir jee aapki astha har din badalti hai

Yashwant Singh जो लड़ रहा है, उसको सपोर्ट करो। जब सत्ता में आ जाए तो नकेल कसो।

Binod Kumar Right sir, but image damage to hoti hai na apki

Yashwant Singh बिनोद जी, मेरी इमेज पहले से ही बहुत डैमेज है। उसकी चिंता न करें। केजरी और सिसोदिया की इमेज की चिंता करें।

Rakesh Shukla Can’t believe a journalist is using great words like “chirkut” and “chorkat”. You can criticize them without being abusive. You lost my respect too like they did. Unfollowed you just like I unfollowed all AAP pages.

Yashwant Singh राकेश जी। चिरकुट और चोरकट शब्द से नहीं, चिरकुटों और चोरकटों से पीड़ित महसूस करिये।

Binod Kumar Na sir jee aap ki image damage hokr bhi in politicicians se behtar hi rhegi jinki fitrat hi kursi aur dhokha hai

Pralhad Giri Kya baat hai Yashwant ji.. Aap likhte bahut achha hain.

Shubh Narayan Pathak करप्ट अफसर, करप्ट नेता, करप्ट मीडिया, करप्ट पूंजीपति। करप्ट पब्लिक, करप्ट आम आदमी मैं इसमें जोड़ रहा हूं। करप्ट संविधान, करप्ट व्यवस्था हर चीज को करप्ट बना रही है, हर एक को करप्ट होने का अवसर दे रही है। एक वेश्या हर एक को एड्स बांट रही है।

Virendra Rai मैं आपकी बात से सहमत हूँ । हम लोग जब स्वयं संघर्ष कर रहें रोज़ी रोटी के लिये तो स्वाभाविक है कि संघर्षशील लोगो के प्रति सहानुभूति लाज़मी हैं ।

Chandrabhan Singh पत्रकारिता में किसी व्यक्ति या विचार ,दलीय आस्था या निष्ठा का कोई स्थान नहीं होता । पत्रकारिता में साहित्य न खोजकर जन भाषा के प्रचलित शब्दों से भाव और विचारों पर जाना चाहिए । एक बात और कि भाई यशवंत सिह जैसे निष्पक्ष और वैचारिक रूप से निष्ठुर पत्रकार से किसी तरह की मानसिक गुलामी का मुगालता नहीं ही पाला जाना चाहिए ।

Sanjay Sharma Bhopal काहे का लोकतंत्र, काहे का स्वराज, बसपा, सपा, लालू, जैसी अन्य पार्टियों की तरह सुप्रीमो पावर वाली स्थिति है, भ्रस्ट्राचार के खिलाफ जंग लड़ कर आये हो तो भ्रस्ट अफसरों के खिलाफ कार्यवाही करो, लोकायुक्त के छापे डालो, कुछ नहीं हुआ अभी तक…

Jayram Viplav कल जो चित्रगुप्त वाला जोक पोस्ट किये थे अब भी उसे एडिट कर यदि केजरीवाल का नाम लिख दें तो तथ्यों के साथ न्याय होगा ।
Yashwant Singh भाई Jayram Viplav जी. समझ रहा हूं. आपका भाजपा और मोदी प्रेम इतना ज्यादा है कि रह रह कर चित्रगुप्त वाली पोस्ट आपके दिल में हूक जगा रही है. पर ये सच है कि इस सदी का सबसे बड़ा झुट्ठा मोदी ही है. जनता से फर्जी वादे करके वोट लिया और अब काम कर रहा है पूंजीपतियों के लिए. पेट्रोल चोर मोदी के कितने काले कारनामे गिनाए जाएं भाई. आपमे अगर जरा भी नैतिकता हो तो भाजपा से इस्तीफा दे देना चाहिए.

Sanjay Sharma Bhopal एक आपिया ने मैसेज बाक्स में लिखा है की तू इतना बड़ा ज्ञानी और हिम्मती है तो फिर अपने गृहराज्य यूपी में क्यों नही रहता क्यों नही यूपी में जाकर वहां काम करता .. वैसे आपियो की चिंता जायज है .. क्योकि ये कभी अपनी बीबी की चिंता नही करते .. खैर जब मैंने उससे कुछ पूछा तो वो दूम दबाकर भाग गया .. इनका खुदा केजरीवाल खुद यूपी का निवासी है .. गाजियाबाद में उसका स्थाई पता है .. कुमार विस्वास और मनीष सिसौदिया दोनों हापुड़ के पिलखुवा के रहने वाले है .. गोपाल राय मऊ जिले के मधुवन के रहने वाले है … संजय सिंह सुल्तानपुर के रहने वाले है .. प्रशांत भूषण इलाहाबाद के रहने वाले है और वर्तमान में भी यूपी में ही नोयडा में रहते है ..सोमनाथ भारती बिहार के रहने वाले है .. दिलीप पांडे फैजाबाद के रहने वाले है .. आशीष खेतान राजस्थान के रहने वाले है … योगेन्द्र यादव हरियाणा के रहने वाले है .. इनका एक भी मंत्री दिल्ली का निवासी नही है … सिर्फ इनके दो विधायक ही ऐसे है जो दिल्ली में पैदा हुए है .. फिर क्या कोई आपिया बता सकता है की ये गैंग जो यूपी की रहने वाली है इसने यूपी में व्याप्त भ्रष्टाचार गुंडागर्दी आदि के खिलाफ आवाज कभी भी क्यों नही उठाई ? इस गैंग ने अपने ही राज्य यूपी को छोडकर दिल्ली में आकर राजनीती क्यों की ? copied frm jitendra pal singh,s wall.

Ahsän Kämrän शुरुआती 2 शब्द बिलकुल सटीक।

Ramkishore Pathak YE TO HONA HI THA.JANTA HER BAR THAGI.

Km Madhavi Jab Yugpurush khud kahte hai ki haan mai Anarchist hun..phir kejariwal aur gang ki harkatein…..dimag ki battie jala de….

Ahsän Kämrän you do good flip flop brothers!

Yashwant Singh पहले एक सूत्रीय अभियान रहा मेरा. दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस का विकल्प तैयार कराना व उसे सपोर्ट करना. अब जबकि भाजपा कांग्रेस का विकल्प आ गया तो फर्ज है कि इस विकल्प पर नजर रखते हुए इसके चरित्र का विश्लेषण किया जाए व इसके आगे की संभावना टटोली जाए.

Ahsän Kämrän wo nhi…first u said kejriwal se mohbhang…then long report on yy n pb’s wrong doings…then again pro yy n pb n anti ak !
 
Prakash Bisht Yashwant Ji aap ki bebaak bol ko salaam hai.Aam Aadmi Party ko samay rhte hi sudhrna hoga. warna is party ko bhi baaki party jaaisa banane mai der nhi lagegi
 
Vinod Yadav धन्यबाद आपके लिए आपका यही रास्ता है
 
Jai Prakash Tripathi मैंने तो उसी समय कह दिया था ये सरकार भी बाबाजी का ठुल्लू, एक से एक अघोरी, बस मतदाताओंकी आंख में धूल झोकने के हथकंडे भर का फर्क

Ravi Rawat आप तो अब समझे, हम तो 2013 में 28 सीटें जीतकर ही इनकी हरकतों से समझ गए थे ।
 
Priydarshi Poojan यहां पिटेंगे नहीं, लोग पीटेगे । बस शुरुआत की देर हैं।

Jayram Viplav मोदी सरकार के काम का फल 2019 में आयेगा। तब तक आपके बेवजह के आरोपों को कोई आधार नहीं मिलने वाला है। नैतिकता का प्रश्न मार्क्स-माओ स्कुल ऑफ़ थौट के लोगों को शोभा नहीं देता। राजनीति में आयाराम-गयाराम की तरह में मैं कार्य नहीं करता हूँ। ना ही आपकी तरह अति उत्साह में केजरीवाल क्रांति का हिस्सा बनने और फिर इस्तीफा और गलियाने का क्रम शुरू। इस प्रकार की हड़बड़ी वाली सतही राजनीति से कोई बदलाव नहीं आएगा। लगता है अब भी केजरीवाल के प्रति लगाव।

Yashwant Singh  जयराम जी. यही बात चुनाव के समय कहे होते मोदी जी की सारा फल हम इकट्ठा 2019 में हगेंगे तो जनता को उनकी इमानदारी पर बिलकुल शक नहीं होता. रही बाद राजनीति की तो राजनेता मूलतः चोर होते हैं. अगर उन पर लगातार दबाव न हो तो वो देश बेच खाएं. दिल्ली में दो परम चोट्टों कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ एक थर्ड लेकिन छोटा चोट्टा चाहिए था जिससे चोट्टई में एकता टूटे तो ‘आप’ को सपोर्ट किया और आप जब सत्ता में आई है तो हम लोग उस पर नकेल कसे हैं. आप की तरह नहीं कि जिनका नमक चाटेंगे उनके चोरी उचक्कई पर एक शब्द नहीं बोलेंगे. आखिर चोरी के माल का नमक चाटने का हक तो अदा करना ही पड़ता है न वैसे, आप लोग चोट्टई के अमेरिकी स्कूल के उपज हैं या ब्रिटिश संस्थान के?

Jayram Viplav यशवंत जी। आपकी भाषा पढ़कर प्रतिक्रिया देने की इच्छा नहीं है।

Yashwant Singh जयराम विप्लव जी, आपको नहीं कह रहा हूं लेकिन आप ध्यान से देखिए सोचिएगा कि जो जितना बड़ा चोट्टा होता है उसकी भाषा उतनी ही सभ्या और एलीट होती है.


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‘आप’ में घमासान जारी : केजरी का स्टिंग करने वाले राजेश गर्ग निकाले गए, कुमार विश्वास को लीगल नोटिस

आम आदमी पार्टी यानि ‘आप’ में आपसी घमासान जारी है. आम आदमी पार्टी ने बागी नेता और पूर्व विधायक राजेश गर्ग को पार्टी से निकाल बाहर कर दिया है. पार्टी का कहना है कि राजेश ने पार्टी के खिलाफ काम किया. एक टेप पिछले दिनों मीडिया में लीक किया गया जिसमें राजेश गर्ग और केजरीवाल की बातचीत थी. इसमें केजरीवाल कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की बात कर रहे थे.

राजेश गर्ग ने मीडिया के सामने आकर टेप को सच बताया. आम आदमी पार्टी का कहना है कि इस टेप से पार्टी की छवि खराब हुई. इसके कारण राजेश गर्ग को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. राजेश ने केजरीवाल के साथ कुमार विश्वास पर भी निशाना साधा था. राजेश गर्ग ने दावा किया था कि उन्होंने ये ऑडियो टेप कुमार विश्वास को दिया था. फिर ये टेप मीडिया के पास कैसे पहुंचा गया. राजेश ने विश्वास पर टेप लीक करने का आरोप लगाया था.

राजेश गर्ग ने कुमार विश्र्वास को अपने ऊपर गलत टिप्णियां करने के लिए लीगल नोटिस भिजवाया है. गर्ग ने मानहानि का कानूनी नोटिस भेजा है. विश्वास ने कहा था कि 30 दिसंबर 2014 को पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग ने उनको एसएमएस भेजकर पार्टी को बर्बाद करने की धमकी दी थी. उन्होंने मीडिया में बयान देकर अपनी बातें मनवाने के लिए दवाब डालने का आरोप लगाते हुए गर्ग को ब्लैकमेलर भी करार दिया था. कुमार विश्वास का कहना था कि टिकट पाने के लिए गर्ग पार्टी को ब्लैकमेल कर रहे थे.

कुमार विश्वास ने अपनी बात को प्रूव करने के लिए कुछ एसएमएस के स्क्रीनशॉट सामने रखे थे. कुमार विश्वास ने बताया था कि 17 फरवरी को राजेश गर्ग ने उनको ऑडियो ई-मेल किया था जिसको उन्होंने पार्टी को पहले ही भेज दिया था. हाल ही में राजेश गर्ग ने जब विश्वास पर ये आरोप लगाया कि उन्होंने मीडिया में ऑडियो लीक किया है तब कुमार ने जवाब दिया कि जिस ऑडियो की बात हो रही है उसे तो गर्ग ने खुद ही मंगलवार रात को ही एक न्यूज चैनल के शो में लाइव चला दिया था.

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उजागर हुआ AAP के स्टिंग में शामिल संपादक का नाम, अन्ना बोले-अरविंद ने देश का विश्वास तोड़ा

नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और मनीष सिसोदिया का स्टिंग करने का दावा करने वाले कांग्रेस के पूर्व विधायक आसिफ मोहम्मद शुक्रवार को टेप जारी करने के वादे से मुकर गए। आसिफ का कहना है कि स्टिंग में एक संपादक की बातचीत भी शामिल है और वह नहीं चाहते कि उनकी बदनामी हो। उधर, कांग्रेस के पूर्व विधायक आसिफ मोहमम्द खान दो दिनों से संजय सिंह के स्टिंग होने का दावा कर रहे हैं. लेकिन सबूत सामने नहीं रख रहे. हां दोनों नेता इस बात को जरूर कबूल रहे हैं कि नोएडा में एक पत्रकार के घर पर मुलाकात हुई थी. अब सवाल ये है कि स्टिंग जारी नहीं करने के पीछे क्या मंशा केवल उस पत्रकार की नौकरी बचाने की है या फिर माजरा कुछ और है ?

आम आदमी पार्टी में चल रह झग़़डे और लगातार स्टिंग पर अन्ना हजारे बेहद दुखी हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कल उजागर हुए स्टिंग से क्षुब्ध अन्ना हजारे ने कहा है कि अरविंद ने मेरा ही नहीं, पूरे देश का विश्वास तोड़ा है। आप नेता शाहिद आजाद ने केजरीवाल का कल एक नया ऑडियो क्लिप जारी किया था जिसमें अरविंद केजरीवाल मुसलमान सीटों पर उम्मीदवारों के बारे में बात कर रहे हैं। 

सूत्रों का कहना है कि स्टिंग में संपादक ऐसे बात कर रहे थे, जैसे वो राज्यसभा जाने की तैयारी कर रहे थे। आसिफ मोहम्मद खान ने आप नेताओं से और भी कई तरह की बातें कही हैं जिससे उनकी दिक्कत बढ़ने का अंदेशा है। सूत्रों के मुताबिक संजय सिंह ने इस बैठक में आसिफ से कहा था कि ”राजेश गर्ग से कांग्रेस के 6 विधायकों को तोड़ने की बात कही गई है, लेकिन उन्हें आप छोड़ दें। आप ये काम कीजिए। 6 विधायकों की अलग से पार्टी बनाकर आप मुझे सपोर्ट करें। इसके बदले में आपको मंत्री बना दिया जाएगा और बाकियों को दूसरी जगह एडस्ट कर दिया जाएगा।”

सूत्रों के मुताबिक स्टिंग में शामिल संपादक का नाम सैयद फैजल अली बताया गया है, जो एक उर्दू अखबार और चैनल के संपादक हैं। उन्होंने ही आप नेताओं और आसिफ के बीच मीटिंग अरेंज कराई थी और यह मीटिंग नोएडा के सेक्टर 37 स्थित उनके फ्लैट नंबर 177 में रखी गई थी। बताया गया है कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव के दौरान इस संपादक को एक घंटे का विशेष इंटरव्यू दिया था। 

आसिफ मोहम्मद खान की बेटी अरीबा खान ने दावा किया है कि उनके पिता खुलासा करने के लिए बिल्कुल तैयार हैं, लेकिन संपादक की बदनामी होने की आशंका से डर रहे हैं। अरीबा के अनुसार टेप करीब एक घंटे का है, जिसमें उनके पिता, संजय सिंह, संपादक और दो अन्य लोगों की बातचीत दर्ज है। एमिटी यूनिवर्सिटी से इंग्लिश ऑनर्स कर रहीं अरीबा खान का यह भी कहना है कि इस बैठक के तीन दिन पहले भी उनके पिता की मीटिंग मनीष सिसौदिया से हुई। ये मीटिंग मनीष की ससुराल में हुई थी।

अरीबा खान का कहना है कि टेप में संजय सिंह से ज्यादा संपादक की बातचीत दर्ज है, लिहाजा उनके पापा खुलासा करने से बच रहे हैं। अरीबा के अनुसार स्टिंग में दर्ज बातचीत में संजय सिंह उनके पिता को मंत्री बनाने की बात कह रहे हैं, लेकिन उनके पिता ने इस ऑफर को ठुकरा दिया। उनके पिता मतीन अहमद को मंत्री बनवाना चाहते थे, क्योंकि वे उनसे ज्यादा सीनियर थे। इस बैठक में अरविंद केजरीवाल औऱ मनीष सिसौदिया भी आने वाले थे, लेकिन बाद में वे नहीं पहुंचे।

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