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विष्णु त्रिपाठी का खेल, दैनिक जागरण की बन गई रेल

दैनिक जागरण में संपादक पद की शोभा बढ़ाने वाला स्वनामधन्य विष्णु त्रिपाठी किस प्रकार गेम करके अखबार को क्षति पहुंचा रहा है उसकी एक बानगी हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। मजीठिया मामले में मालिकों से बुरी तरह लताड़े जाने के बाद अब मालिकों के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए विष्णु त्रिपाठी रोज नई नई चालें चल रहे हैं।पिछले दिनों रेल बजट और आम बजट के दौरान सेंट्रल डेस्‍क को नीचा दिखाने और अपनी वाहवाही करवाने की अपने गुर्गों के सहारे चली चालें उल्‍टी पड़ गई लगती हैं। प्‍लान ये था कि बजट और रेल बजट से सेंट्रल डेस्‍क को अलग कर यह दिखाया जाए कि इन महत्‍वपूर्ण अवसरों पर सेंट्रल डेस्‍क की भूमिका न के बराबर है। और इस तरह सेंट्रल डेस्‍क पर अपने चपाटियों के हवाले करने की साजिश कुछ इस तरह रची गई।

दैनिक जागरण में संपादक पद की शोभा बढ़ाने वाला स्वनामधन्य विष्णु त्रिपाठी किस प्रकार गेम करके अखबार को क्षति पहुंचा रहा है उसकी एक बानगी हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। मजीठिया मामले में मालिकों से बुरी तरह लताड़े जाने के बाद अब मालिकों के बीच अपनी छवि चमकाने के लिए विष्णु त्रिपाठी रोज नई नई चालें चल रहे हैं।पिछले दिनों रेल बजट और आम बजट के दौरान सेंट्रल डेस्‍क को नीचा दिखाने और अपनी वाहवाही करवाने की अपने गुर्गों के सहारे चली चालें उल्‍टी पड़ गई लगती हैं। प्‍लान ये था कि बजट और रेल बजट से सेंट्रल डेस्‍क को अलग कर यह दिखाया जाए कि इन महत्‍वपूर्ण अवसरों पर सेंट्रल डेस्‍क की भूमिका न के बराबर है। और इस तरह सेंट्रल डेस्‍क पर अपने चपाटियों के हवाले करने की साजिश कुछ इस तरह रची गई।

रेल बजट से चार दिन पहले नेशनल ब्यूरो के सदस्यों के साथ सेंट्रल डेस्क और नोएडा एडीशन के साथियों की प्लानिंग और तैयारियों के सिलसिले में बैठक हुई थी। मीटिंग में हर साल की तरह पूर्ववत सब कुछ तय हुआ था। सेंट्रल डेस्क का पूरा रोल था। एक्जीक्यूटिव एडीटर विष्णु ने अपनी मंशा जाहिर नहीं होने दी। इसलिए नेशनल ब्यूरो के लोगों तक को पता नहीं चल पाया कि एडीटर के दिमाग में क्या चल रहा है, हां नोएडा एडीशन के प्रभारी बृज चौबे, प्रतीक चटर्जी और सर्वेश को जरूर बता दिया गया था। अचानक रेल बजट वाले दिन अपने गेमप्लान के मुताबिक उसने पूरी प्लानिंग ही बदल दी। सेंट्रल डेस्क को परिदृश्य से लगभग गायब कर दिया। नेशनल ब्यूरो की खबरें पास करने, उन्हें पन्ने पर लगाने और ब्यूरो के साथ कोऑर्डिनेशन सब कुछ नोएडा मदर एडीशन के हाथ में दे दिया गया। सेंट्रल डेस्क सिर्फ प्रतिक्रियाएं बनाकर रह गई। इसका नतीजा यह हुआ कि जागरण पन्ने काले-पीले करने में तो प्रतिस्पर्धियों से आगे था, मगर अमर उजाला और दैनिक भास्कर ने कंटेंट व प्रजेंटेशन में जागरण को जमकर धोया।

यही प्रक्रिया बजट के दिन 28 फरवरी को दोहराई गई। सेंट्रल डेस्क जो रेल और आम बजट का पूरा जिम्मा संभालती थी, बस ट्विटर कमेंट और टिप्पणियां बनाकर रह गई। उन्हें कुछ पता ही नहीं था कि क्या करना है और क्या हो रहा है। कंटेंट में गलती पर गलती देखने के बावजूद हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, क्योंकि सख्त आदेश था कि सेंट्रल डेस्क को नेशनल ब्यूरो की खबरों या किसी अन्य महत्वपूर्ण कंटेंट में हाथ नहीं लगाना है। यानी, लगभग कोई भूमिका ही नहीं बची। नतीजा उसी रात को दिखने लगा, जालंधर, पटना, रांची और लखनऊ जैसी यूनिटों में बन रहे पन्ने देरी से संस्करणों को मिल पाए।

गलतियों की तो कमी थी ही नहीं, मगर खबरें भी पन्नों में रिपीट हुईं। मगर परवाह किसे थी, विष्णु के गेमप्लान को अंजाम देने में उनके सिपहसालार जुटे हुए थे। इसलिए पन्ने काले-पीले कर दिए गए। इस काम में मुस्तैदी से जुटे प्रतीक और बृज चौबे। मगर विष्णु त्रिपाठी के भक्तों से रहा नहीं गया और उनका खामोश गेमप्लान कमोबेश उजागर हो ही गया। चौबे जी को बाहर की यूनिटों के अपने साथियों से कहते सुना गया कि अगर बजट ठीक-ठाक निकल जाए तो सेंट्रल डेस्क पर भी अपना कब्जा हो जाएगा। वैसे विष्णु के निकटस्थ सूत्र भी बता रहे हैं कि बीबीसी या प्रतीक में से किसी को सेंट्रल डेस्क कम नेशनल एडीशन की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। वैसे, ज्यादा संभावना चौबे की है, जबकि उनकी जगह पर प्रतीत को प्रमोट किया जा सकता है। इस खेल में विष्णु त्रिपाठी कितना कामयाब हो पाता है, यह तो समय ही बताएगा। मगर इतना पक्का है कि किसी भी सूरत में नुकसान दैनिक जागरण का ही होगा, क्योंकि हमेशा से ही विष्णु त्रिपाठी का फंडा रहा है कि जागरण को चाहे जितना नुकसान पहुंचे, उसकी गोटियां बस लाल हो जाएं। लगे रहो भाई, तुम्हारी हरकत तुम्हें मुबारक।

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दैनिक जागरण में लोगों को परेशान कर विष्णु त्रिपाठी ने टीम को इतना कमजोर और असहाय बना दिया है कि अब गलतियों की भरमार हर पेज पर दिखने लगी है और अखबार से पाठकों का विश्वास उठने लगा है। शायद यही वजह है कि अखबार की प्रसार संख्या दिनोंदिन गिर रही है और उसी के साथ गिर रहा है विष्णु त्रिपाठी का आत्म विश्वास। उसे सिर्फ अपनी खुराफात की चिंता रहती है अखबार की नहीं। यकीन नहीं आता तो अखबार के बजट का पेज देख लीजिए, जिसमें लीड खबर ही रिपीट है।

जागरण के दो कर्मियों द्वारा भड़ास को मिली दो मेल पर आधारित.

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2 Comments

2 Comments

  1. ashok mishra

    March 2, 2015 at 11:33 am

    दैनिक जागरण के इसी विष्णु त्रिपाठी को चैनल सेवन ने आईबीएनसेवन बनने के बाद तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया था। संजय गुप्ता का अखबार बंद कराकर ही मानेगा।

    अशोक मिश्र संपादक

  2. kapil

    March 15, 2015 at 12:16 pm

    इसी विष्णु त्रिपाठी के चेले हैं पटना के संपादक सदगुरु जी। पटना यूनिट में कर्मचारियों को तोड़ने में लगे रहते हैं। जान बुझ कर इनपुट की क्रेडिट आउटपुट के लोगों को देते हैं। पहले वो यहाँ अपने चमचे लेकर आये। कुछ चमच ब्रांड लोग dne बनने की छह में पूरी तेल लगा रहे हैं। इसमें वो चेहरा भी शामिल है, जिसे जागरण से निकल जा चूका है और सदगुरु जी ने स्टेट हेड से ये बात छुपाकर उसे दोबारा नौकरी पर रख लिया। इसे जिसने नौकरी पर रखवाने के लिए एड़ी चोटी एक कर दी वो भी dne का दावेदार बन रहा है। ये वही चेहरा है जिसके महिला कर्मचारी के प्रेम प्रसंग पर बवाल की चर्चा पूरे यूनिट में अब भी सुर्ख़ियों में है।

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