बिहार में दैनिक जागरण कर रहा अपने कर्मियों का शोषण, श्रम आयुक्त ने जांच के आदेश दिए

दैनिक जागरण, गया (बिहार) के पत्रकार पंकज कुमार ने श्रम आयुक्त बिहार गोपाल मीणा के यहाँ एक आवेदन दिनांक लगाया था. पिछले महीने 26 जुलाई को दिए गए इस आवेदन में पंकज ने आरोप लगाया था कि गया जिले सहित जागरण के बिहार के सभी चार प्रकाशन केंद्र में श्रम कानून के तहत मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को कई किस्म का लाभ नहीं दिया जा रहा है. यहां 90 प्रतिशत से अधिक पत्रकार एवं गैर पत्रकारों का प्राविडेंट फंड, स्वास्थ्य बीमा, सर्विस बुक सहित कई सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है. साथ ही माननीय सर्वोच्च्य न्यायालय द्वारा मजीठिया वेज बोर्ड के तहत सेलरी, पद और ग्रेड की जो घोषणा की जानी थी, उसे भी नहीं नहीं किया गया है.

श्रम आयुक्त गोपाल मीणा ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए एक आदेश (3 / डी-96 / 2015 श्र० स० 4142 दिनांक 04-08-17) जारी कर दिया है. आदेश के माध्यम से कहा गया है कि दैनिक जागरण में कार्य के माहौल, श्रम नियमों और मजीठिया वेज बोर्ड आदि के अनुपालन की नियमानुकूल आवश्यक जांच की जाए तथा कृत कार्रवाई से संबंधित प्रतिवेदन विभाग को तुरंत उपलब्ध कराया जाए. ये आदेश मगध प्रमंडल के उप श्रमायुक्त को दिया गया है.

पंकज कुमार ने इसके पूर्व माननीय उच्चतम न्यायालय में अवमानना वाद दायर किया था. पंकज का गया से जम्मू विद्वेष के कारण तबादला कर दिया गया था. इस तबादला को स्टे करने तथा मजीठिया वेज बोर्ड की अनुसंशा के आलोक में वेतन सहित अन्य सुविधा देने की मांग पंकज ने की थी. माननीय उच्चतम न्यायालय ने सभी आवेदकों को श्रम आयुक्त के पास इंडस्ट्रियल डिस्पुट एक्ट के तहत आवेदन दायर करने का आदेश दिया है. पंकज कुमार द्वारा दायर अवमानना वाद की खबर भड़ास ने प्रमुखता से एक मई को प्रकाशित किया था. श्रम आयुक्त गोपाल मीणा के ताजे आदेश का लाभ हजारों मीडियाकर्मियों और गैर-मीडियाकर्मियों को मिलेगा जो दैनिक जागरण सहित अन्य प्रकाशन संस्थानों में काम कर रहे हैं.

गया से जाने माने वकील और पत्रकार मदन तिवारी की रिपोर्ट. संपर्क : 8797006594

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दिल्ली की श्रम अदालत ने दैनिक जागरण पर ठोंका दो हजार रुपये का जुर्माना

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े दिलीप कुमार द्विवेदी बनाम जागरण प्रकाशन मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण पर दो हजार रुपये का जुर्माना ठोंक दिया है। इस जुर्माने के बाद से जागरण प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। बताते हैं कि गुरुवार को दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय में दैनिक जागरण के उन 15 लोगों के मामले की सुनवाई थी जिन्होंने मजीठिया बेज बोर्ड की मांग को लेकर जागरण प्रबंधन के खिलाफ केस लगाया था। इन सभी 15 लोगों को बिना किसी जाँच के झूठे आरोप लगाकर टर्मिनेट कर दिया गया था। गुरुवार को जब न्यायालय में पुकार हुयी तो इन कर्मचारियों के वकील श्री विनोद पाण्डे ने अपनी बात बताई।

इस पर जागरण प्रबंधन के वकील श्री आर के दुबे ने कहा कि मेरे सीनियर वकील कागजात के साथ आ रहे हैं, अभी रास्ते में हैं। माननीय जज ने कहा कि अगली तारीख पर दे देते हैं। इस पर वकील विनोद पांडेय ने कहा कि हुजूर, ये लोग मामले को लटकाना चाहते हैं, संबंधित डाक्यूमेंट्स नहीं देना चाहते हैं, वैसे ही हम बहुत लेट हो चुके हैं, आज हम देर से ही सही, आपके सामने इनका जवाब लेंगे। इस पर माननीय जज साहब ने पासओवर दे दिया और कहा कि 12 बजे आइये। तय समय पर वर्कर अपने वकील के साथ हाजिर हुए, तो मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया। जज ने फिर वर्कर को साढ़े बारह बजे आने के लिए कहा। फिर सभी उक्त समय पर हाजिर हुए, तब भी मैनेजमेंट के लोग गायब रहे। इसी बात पर और कानून के हिसाब से जागरण पर 2000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले की अगली तारीख 4 मई की लगी है।

सूत्रों के हवाले से दैनिक जागरण से जुड़ी एक और चर्चा भी यहां चल रही है कि प्रबंधन अब वर्करों से हारने वाला है। ऐसा कई मोर्चों पर हो रहा है। सूत्र कहते हैं कि एक ओर जहां अदालत में जागरण प्रबंधन की किरकिरी हुयी है वहीं उनमें अब हार का डर भी समाने लगा है। दैनिक जागरण में एक और चर्चा है कि जागरण में एक बड़ी मीटिंग हुई है, जिसमें यह बात भी सामने आयी कि जितने भी वर्कर बाहर हों, सबको जल्दी अंदर लिया जाये।

खबर है कि मालिकानों में अब हर जगह हो रही फजीहत की वजह से आपस में ही जूतमपैजार होने की नौबत आ गई है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि मजीठिया मामले को लेकर जागरण का पूरा घराना एक तरफ और संजय गुप्ता अकेले एक तरफ हैं। दूसरी ओर माननीय सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस में भी अब मालिकानों को हार नजर आ रही है, इसलिए भी परेशान हैं। जागरण के मालिक संजय गुप्ता की बात करें तो उन्होंने अपने वर्करों से मजीठिया की मांग करने के दौरान यह कहा था कि नौकरी हम देते हैं, सुप्रीम कोर्ट नहीं, हम जैसे चाहेंगे, वैसे काम कराएँगे, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह तब की बात है, लेकिन आज ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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मनोझ झा बने दैनिक जागरण दिल्ली-एनसीआर के संपादक

मनोज झा

नोएडा स्थित दैनिक जागरण आफिस से एक बड़े बदलाव की सूचना है. अखबार के दिल्ली-एनसीआर एडिशन का संपादक अब मनोज झा को बना दिया गया है. इसके पहले संपादक बृज बिहारी चौबे हुआ करते थे जो करीब हफ्ते भर से आफिस नहीं आ रहे हैं. चर्चा है कि चौबे को या तो अखबार प्रबंधन ने हटा दिया है. सूचना के मुताबिक नोटबंदी के ऐलान वाले दिन इससे संबंधित खबर एनसीआर के एडिशंस में नहीं छपी जिससे नाराज संजय गुप्ता ने चौबे को नौकरी से निकाल दिया.

सूत्रों के मुताबिक बृज बिहारी चौबे मजीठिया वेज बोर्ड के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट में याचिक दायर कर संजय गुप्ता से बदला लेंगे. साथ ही अपने मामले को लेबर कोर्ट भी ले जाएंगे. नए बनाए गए संपादक मनोज झा इससे पहले लंबे समय तक दैनिक जागरण, मेरठ के संपादक हुआ करते थे. पिछले दिनों उन्हें तबादला करके नोएडा बुला लिया गया था. दिल्ली एनसीआर के दैनिक जागरण के कुल 18 एडिशन्स हैं जिसमें यूपी, हरियाणा के कई जिले शामिल हैं. मनोज झा ने परसों चार्ज ले लिया. बिहार के मिथिला इलाके के रहने वाले मनोज झा प्रिंट मीडिया के मंझे हुए पत्रकार हैं.

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दैनिक जागरण ने अब तक नहीं दिया मजीठिया वेज, परंतु कर्मचारियों का शोषण जारी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी जागरण मैनेजमेंट के लोग अब तक कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ तो दूर, सम्मानित वेतन तक नहीं दे रहे। एक ही वेतन में दो कार्य (अखबार के लिए रिपोर्टिंग/एडिटिंग और डिजिटल के लिए ऑनलाइन ब्रेकिंग) लिया जा रहा है। लगातार शोषण से जागरण के कर्मी परेशान है। जागरण मैनेजमेंट झूठ पर झूठ बोल रहा है।

जागरण मजीठिया वेज बोर्ड के मानकों के अनुसार वेतन तो नहीं पर दे रहा लेकिन शोषण ज्यादा ही बढ़ गया है। कर्मचारियों को हायर किया जा रहा है, उनसे काम लिया जा रहा है पर वे जागरण के कर्मचारी के रूप में नहीं अपितु किसी अनजान कंपनी के नाम पर पंजीकृत कर्मचारी हैं। सबसे 8-10 घंटे काम लिया जा रहा है और वेतन 5000 रुपये या उससे भी कम दिया जा रहा है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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शोषण से त्रस्त सिक्योरिटी गार्डों ने दैनिक जागरण इलाहाबाद को दिया जोरदार सबक

दुनिया भर के लोगों की लड़ाई लड़ने वाले मीडियाकर्मी अपने हक-अधिकार के नाम पर सोए लगते हैं लेकिन कम पढ़े लिखे उन्हीं के आफिस के सिक्योरिटी गार्ड अपने अधिकार को लेकर गजब के सतर्क निकले. इलाहाबाद से खबर है कि दैनिक जागरण प्रबंधन के शोषण से त्रस्त सिक्योरिटी गार्डों ने सेलरी मिलने के बाद अचानक ही आफिस को उसके हाल पर छोड़कर गायब हो गए. कई घंटे बीत जाने के बाद आफिस के लोगों ने गौर किया तो उन्हें समझ में आया कि सिक्योरिटी गार्ड तो गायब हो चुके हैं.

इसकी जानकारी मैनेजरों को दी गई तो सबके तोते उड़ गए. सूत्रों का कहना है कि दैनिक जागरण इलाहाबाद का एक बददिमाग मैनेजर सिक्योरिटी गार्ड्स का ही शोषण करने लगा था. गार्डों को जितनी सेलरी देने की बात तय हुई थी, उससे कम उन्हें दी गई तो गार्ड हत्थे से उखड़ गए और सबक सिखाने के लिए अचानक ही आफिस को उसके हाल पर छोड़कर गायब हो गए.

मैनेजर ने रात ग्यारह बजे आफिस पहुंच कर दिन की पारी के चपरासियों को आफिस बुलवाया और सभी को गेट पर खड़ा कर दिया. कुल मिलाकर इस स्थिति का जागरण के मीडियाकर्मियों ने खूब आनंद लिया और आपस में बात करते दिखे कि ये सिक्योरिटी वाले तो हम मीडियाकर्मियों से बहुत ज्यादा फायरब्रांड निकले. कम से कम वो अपना शोषण तो कराने के लिए तैयार नहीं हैं. बताया जा रहा है कि मैनेजर अमित श्रीवास्तव की हरकतों के कारण गार्ड्स में नाराजगी थी. इन गार्ड्स को सिक्योरिटी एजेंसी से जिन टर्म्स एंड कंडीशन पर लाया गया था, उसका पालन अमित श्रीवास्तव नहीं करा रहे थे. इससे गार्ड्स में रोष था और सेलरी कम मिलते देख उनका गुस्सा फूट पड़ा.

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उफ्फ… दैनिक जागरण अलीगढ़ और ईनाडु टीवी हैदराबाद में हुई इन दो मौतों पर पूरी तरह लीपापोती कर दी गई

अलीगढ दैनिक जागरण के मशीन विभाग में कार्यरत एक सदस्य की पिछले दिनों मशीन की चपेट में आकर मृत्यु हो गई. न थाने ने रिपोर्ट लिखा और न ही डीएम ने कुछ कहा. शायद सब के सब जागरण के प्रभाव में हैं. यह वर्कर 2 दिन पहले वहां तैनात किया गया था. उसका भाई वहां पहले से कार्यरत था. पंचनामा जबरन कर लाश को उठवा दिया गया. बताया जाता है कि अलीगढ़ दैनिक जागरण में शाफ्ट टूट कर सिर में लगने से मौत हुई.

यह कर्मचारी दो दिनों से ड्यूटी पर आ रहा था और उसका ट्रायल लिया जा रहा था. दैनिक जागरण प्रबंधन ने इसे रोड एक्सीडेंट दिखा दिया. पीड़ित को कहीं से कोई मदद नहीं मिली. कर्मचारी का नाम केशव प्रजापति बताया जाता है. घटना 24 सितंबर की रात ढाई बजे की है. कर्मचारी का मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस को कई बार बुलाया गया लेकिन पुलिस नहीं आई. पंचनामा जागरण प्रबंधन के निर्देश के अनुसार भरा गया.

उधर, पत्रकार अमित सिंह चौहान (जी न्यूज में कार्यरत) के भाई यशपाल सिंह जो कि ईनाडु टीवी डिजिटल के हिंदी डेस्क पर कंटेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थे, का 19 सितंबर 2016 को निधन हो गया.  डॉक्टर के अनुसार यशपाल सिंह का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ. यशपाल सिंह को उनके सहकर्मियों द्वारा समय से हैदराबाद के मशहूर ग्लोबल अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था.  लेकिन अस्पताल की तरफ से एक लाख रुपए सिक्योरिटी के रूप में जमा करने को कहा गया तो ऐसा हो न सका क्योंकि किसी सहकर्मी के पास पैसा नहीं था. हालांकि ईलाज पर जो खर्च हो रहा था, इसके लिए पैसे लगातार जमा किए जा रहे थे. लोगों ने आनन फानन में ईनाडु दफ्तर को पूरी बात से अवगत कराया. बावजूद इसके ऑफिस से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई. यशपाल सिंह के फैमिली मेंबर से बात होने के बाद और पहुंचकर पूरे पैसे चुकाने के आश्वासन के बाद भी ऑफिस ने पैसे जमा नहीं किए. इससे इलाज के आभाव में 30 वर्षीय यशपाल सिंह का उक्त तारीख को रात दस बजे निधन हो गया.

यशपाल सिंह के बड़े भाई पत्रकार अमित फ्लाइट से जब तक हैदराबाद पहुंचते तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अमित सिंह ने भाई के निधन के बाद लापरवाही के कारण हत्या का केस दर्ज कराया है. इसकी स्थानीय एलबी नगर पुलिस जांच कर रही है. मामला बडे मीडिया हाउस से जुड़े होने के कारण पुलिस पर काफी दबाव है. अस्पताल प्रशासन और ईनाडु ग्रुप मामले को एक दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं. इस मामले की रामोजी फिल्मसिटी में खूब चर्चा है. खबर यह भी है कि बीमारी के बाद भी यशपाल सिंह को काम से छुट्टी नही मिली थी. इसके कारण खराब तबीयत में उनने निधन से एक दिन पहले तक आफिस में काम किया था. यशपाल सिंह इसके पहले दिल्ली में एपीएन न्यूज व खबर भारती में काम कर चुके हैं. यशपाल यूपी के बहराइच जिले के रहने वाले थे. ईनाडु प्रबंधन ने मामला दबाने की लाख कोशिश की लेकिन पत्रकारों में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है.

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जागरण प्रबंधन की नीच हरकत : जानिए क्यों निकाल दिया अपने दो पत्रकारों अरविंद और संजीव को…

Arjun Sharma : टोनी व श्रीवास्तव का जागरण से बाहर होना आज की मीडिया की वास्तविकता… दोस्तों दैनिक जागरण प्रबंधन ने आज अपने दो वरिष्ठ पत्रकारों लुधियाना के ब्यूरो चीफ अरविंद श्रीवास्तव व प्रमुख फोटो जर्नलिस्ट संजीव टोनी से इस जुर्म के बदले त्यागपत्र मांगा क्योंकि एक अकाली पार्षद की गुंडागर्दी के खिलाफ जागरण प्रबंधन के कहने पर ही इन दोनों पत्रकारों ने ये मुद्दा उठाया पर बीते रोज अरविंद केजरीवाल ने लुधियाना दौरे के दौरान जब पत्रकारों के साथ हो रही धक्केशाही का मुद्दा उठा दिया तो इल्जाम ये लगाया कि उन्होंने (इन दोनों पत्रकारों ने) पंजाब में अरविंद केजरीवाल को अकालियों के खिलाफ मुद्दा दे दिया है।

फिलहाल दोनों का तबादला धनबाद बिहार में करने का प्रस्ताव भी दिया गया है। जाहिर है कि यहां से बाहर कर दिये गए, क्योंकि ये लोग धनबाद तो जाएंगे नहीं। बहुत अफसोसनाक है सरकारों और अखबार प्रबंधन का ये गठजोड़।

इसके पहले की खबर ये है… अकाली पार्षद ने पत्रकार को दी जान से मारने की धमकी …. जालंधर…. पंजाब में लुधियाना के एक अकाली पार्षद द्वारा  संवाददाता को जान से मारने की धमकी देने के मामले में जालंधर के पत्रकारों ने आरोपी पार्षद को गिरफ्तार किए जाने की मांग को लेकर आज पुलिस एवं प्रशासन को मुख्य मंत्री प्रकाश सिंह बादल के नाम ज्ञापन सौँपा। प्रिंट एंड इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन के प्रधान सुरिंदर पाल ने बताया कि लुधियाना के रिपोर्टर अरविंद श्रीवास्तव बलात्कार के एक मामले की रिपोर्टिंग कर रहे थे। इस मामले में अकाली पार्षद ने उन्हें खबरें न लिखने के लिए कहा, लेकिन अरविंद सच्चाई लिखते रहे। इससे गुस्साए अकाली पार्षद ने पत्रकार को जान से मारने की धमकी दी।

पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन शर्मा की एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण में कितने यादव हैं, सीएम अखिलेश ने सरेआम पूछ लिया (देखें वीडियो)

Mahendra Yadav : मिस्टर दैनिक जागरण ! आप बताते क्यों नहीं कि दैनिक जागरण में कितने यादव हैं? जागरण फोरम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ये सवाल किया है तो जवाब तो बनता है न! चलिए, ब्राह्मण कितने हैं, ठाकुरों को कितनी जगह मिली है, कायस्थों को कितनी सीटें मिली हैं, बनियों को कितनी मिली है, कितने अल्पसंख्यक हैं, कितने आदिवासी हैं…कितने ओबीसी हैं..यही बता दीजिए..

सुनील यादव : सुने हैं कि आज फिर से किसी दलाल अखबार वाले ने यह सवाल उठाया कि यूपी पुलिस में यादव कितने हैं? उसका प्रत्युत्तर भी ठीक मिला कि तुम्हारे अखबार में यादव कितने हैं? पर उन हरामखोरों के लिए मैं एक बात लिखना चाहूँगा जिनके पेट में यूपी पुलिस में यादवों कि संख्या पर मरोड़ उठने लगती है ….उनको यह लगता है कि सपा सरकार ने यादवों को सर्वाधिक यूपी पुलिस में ठूस दिया है तो ….सुनो…..बसपा सरकार के समय की पुलिस भर्ती का रिजेल्ट उठा के देख लो और बहुत पीछे के उन गैर सपा सरकारों के पुलिस भर्ती का रिजेल्ट उठा के देखों …यह देखो की सपा सरकार में इन सरकारों की अपेक्षा कम यादव भर्ती क्यों हुए? .केवल बकलोली से निष्कर्ष नहीं निकलता शारीरिक दक्षता वाली भर्तियों के रिजेल्ट उठाओ उसे गौर से देखों फिर समझ में आएगा असली मामला क्या है? असली मामला दलाली का नहीं है असली मामला गरीब गुरबों के श्रम का है …जिसे तुम बार बार लतियाते रहते हो …यह घनघोर श्रम के अपमान का मामला है। आज पहली बार आपका यह तमाचा भरा जवाब मुझे खुश कर गया शुक्रिया….

Yashwant Singh : दैनिक जागरण ने यादवीकरण का सवाल पूछ कर चौका मारना चाहा तो अखिलेश यादव ने दैनिक जागरण में यादवों की संख्या पूछ कर छक्का मार दिया. दैनिक जागरण की तरफ से लखनऊ में जागरण फोरम नामक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. इसमें शिरकत कर रहे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से दैनिक जागरण के नेशनल ब्यूरो चीफ प्रशांत मिश्रा ने सवाल यूपी में थानों के यादवीकरण पर किया तो अखिलेश ने पलट कर पूछ लिया कि बताओ दैनिक जागरण में कितने यादव हैं?

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=iTtX0D-bCA4

महेंद्र, सुनील और यशवंत की एफबी वॉल से.

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कैराना का पलायन और जागरण की पत्रकारिता : इस बेवकूफी भरी रिपोर्टिंग पर ना हंसा जा सकता है ना रोया जा सकता है

Sanjaya Kumar Singh : कैराना से हिन्दुओं के कथित पलायन के आरोप और आरोप लगाने वाले सांसद, उनकी पार्टी की राजनीति के बाद अब देखिए जागरण की पत्रकारिता। “फिलहाल कलेजा थाम कर बैठा है कैराना” – शीर्षक अपनी रपट में अवनीन्द्र कमल, कैराना (शामली) लिखते हैं, “दोपहर की चिलचिलाती धूप में पानीपत रोड पर लकड़ी की गुमटी में अपने कुतुबखाने के सामने बैठे मियां मुस्तकीम मुकद्दस रमजान महीने में रोजे से हैं। पलायन प्रकरण को लेकर उनके जेहन में खदबदाहट है। चाय की चुस्कियों में रह-रहकर चिन्ताएं घुल रही हैं, मुस्तकीम की। कहते हैं मुल्क में कैराना को लेकर जैसी हलचल है, वैसी यहां नहीं। देख लीजिए। यह सब सियासतदां कर रहे हैं। चुनावी आहट है न। धार्मिक आधार पर मतों के ध्रुवीकरण के लिए कैराना को बदनाम किया जा रहा है, क्यों? दल कोई हो, बरी कोई नहीं है। नैतिकताएं रेगिस्तान हो रही हैं। हां गुंडों- अपराधियों ने यहां के माहौल को जरूर बिगाड़ा है, लेकिन अभी गनीमत है।”

यह खबर के बीच या आखिर में जगह भरने या उपसंहार के रूप में नहीं लिखा गया है। यह शुरुआत है, यही खबर है। इसके बाद मुझसे आगे पढ़ा नहीं गया। आप चाहें तो 20 जून के शामली एडिशन में खबर आनलाइन जागरण के ईपेपर पर पढ़ सकते हैं।  इस खबर में खास बात यह है कि रमजान महीने में मस्तकीम मियां को रोजे से बताया गया है और यह भी कहा गया है कि, चाय की चुस्कियों में रह-रहकर चिन्ताएं घुल रही हैं, मुस्तकीम की।

अव्वल तो यह जरूरी नहीं है कि हरेक मुस्तकीम मुकद्दस रमजान महीने में रोजे से हों। लेकिन पलायन प्रकरण को लेकर उनके जेहन में खदबदाहट हो सकती है। रमजान का महीना चल रहा है यह भी जागरण का हर पाठक जाने – कोई जरूरी नहीं है। पर आप ही बता रहे हैं कि मियां मुस्तकीम मुकद्दस रमजान महीने में रोजे से हैं। फिर आप ही लिख रहे हैं, चाय की चुस्कियों में रह-रहकर चिन्ताएं घुल रही हैं, मुस्तकीम की।

इस बेवकूफी भरी रिपोर्टिंग पर ना हंसा जा सकता है ना रोया जा सकता है। मीडिया ऐसे ही लोगों के भरोसे है और मीडिया से जो अपेक्षाएं हैं अपनी जगह। इसी मामले पर सोशल एक्टिविस्ट और पत्रकार वसीम अकरम त्यागी का लिखा भी पढ़ सकते हैं, नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.bhadas4media.com/print/9928-kamal-ki-galat-reporting

जनसत्ता अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके पत्रकार संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से. 

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मूर्ख पत्रकार अवनींद्र कमल ने मुस्तकीम को रोजे में चाय पीते हुए बताया और इसे दैनिक जागरण ने छाप दिया!

Wasim Akram Tyagi : दैनिक जागरण का एक पत्रकार अवनीन्द्र कमल कैराना पहुंचा. लौटकर अपने हिसाब से ‘बेहतरीन’ रिपोर्ताज लिखा. शीर्षक है- ”फिलहाल कलेजा थामकर बैठा है कैराना”. यह रिपोर्ताज जागरण के 20 जून के शामली संस्करण में प्रकाशित भी हो गया. अब जरा इन महोदय की लफ्फाजी देखिये…

”दोपहर की चिलचिलाती धूप में पानीपत रोड पर लकड़ी की गुमटी में अपने कुतुबखाने के सामने बैठे मियां मुस्तकीम मुकद्दस रमजान महीने में रोजे से हैं। पलायन प्रकरण को लेकर उनके जेहन में खदबदाहट है। चाय की चुस्कियों में रह-रहकर चिंताएं घुल रही हैं, मुस्तकीम की।”

यह रिपोर्ट पूरी तरह फर्जी प्रतीत हो रही है क्योंकि मुस्तकीम मियां को जागरण संवाददाता ने रोजे की हालत में चाय की चुस्की लेते हुए बता दिया है. कैराना मामले में पलायन की खबरों में उतनी ही सच्चाई है जितनी जागरण के संवाददाता ने मुस्तकीम को रोजे की हालत में चाय की चुस्की लेते हुए बताया है. बात का बतंगड़ बनाकर पेश करने वाले जागरण के पत्रकार इस कदर बेसुध हैं कि उन्हें मालूम ही नहीं कि रोजे में खान पान पूरी तरह से प्रतिबंधित रहता है. सह कहा जाता है कि हिन्दी पत्रकारिता वेंटीलेटर पर है.

सोशल एक्टिविस्ट और पत्रकार वसीम अकरम त्यागी के एफबी वॉल से.

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दैनिक जागरण कपूरथला का कारनामा

दैनिक जागरण के कपूरथला के अंक में जसकीरत अपहरण कांड संबधित कवरेज छपी है। यह सारी कवरेज उन्होंने दैनिकमेल.काम से उठाई है और खास बात यह है कि एक शब्द भी खबर में नहीं बदला पूरी की पूरी कापी पेस्ट। दैनिकमेल.डाट काम निखिल शर्मा चला रहे हैं जो दैनिकजागरण में पन्द्रह साल क्राम रिपोर्टर रहे हैं। पिछले साल मजीठिया के खिलाफ आवाज उठाई तो जागरण से उनका पंगा हो गया। निखिल शर्मा ने मजीठिया मामले में जागरण मैनेजमेंट और जालंधर के संपादक विजय गुप्ता के खिलाफ शिकायत भी दर्ज करवाई हुई है जिसमें विजय गुप्ता थाने में पेश होकर बयान भी देकर आए थे।

निखिल अब अपना वेबपोर्टल दैनिक मेल डाट काम चला रहे हैं। जालंधर और कपूरथला में व्हट्सएप ग्रुप के जरिए दैनिकमेल के लिंक फैलते हैं। कपूरथला में जसकीरत नामक बच्चे की किडनेपिंग और मौत की खबर का मामला ट्रेस होने के बाद दैनिक जागरण कपूरथला ने दैनिक मेल डाट काम की कवरेज को हूबहू कापी पेस्ट करके छाप दिया। इस तरह दैनिक जागरण अपने ही पूर्व रिपोर्टर की वेबसाइट से खबरें चुरा रहा है। नीचे लिंक है….

कपूरथला जागरण का लिंक
http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/09-may-2016-edition-Kapurthala-page_20-34878-4326-187.html

दैनिकमेल EXCLUSIVE का लिंक (यह खबर दैनिकमेल ने शनिवार को दी थी मगर जागरण ने इसे सोमवार को कापी कर छापा वो भी बिल्कुल हूब्हु एक एक शब्द वही है)  http://dainikmail.com/2016/05/दैनिकमेल-exclusive-यह-कैसा-भाई-80-रू/

ये रहा निखिल शर्मा का फेसबुक पोस्ट…
https://www.facebook.com/nikhiljournalist/posts/10153607723740098?notif_t=like¬if_id=1462811645977871

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दैनिक जागरण ने इलाहाबाद के पूर्व मेयर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह को जीते जी मार दिया

दैनिक जागरण महान अखबार है. यहां कभी मायावती के लिए गंदी गंदी गालियां छप जाया करती हैं तो कभी जिंदा लोगों को मरा घोषित कर दिया जाता है. ताजा मामला इलाहाबाद एडिशन का है. कल दैनिक जागरण इलाहाबाद में पेज नंबर नौ पर एक छोटी सी खबर छपी है जिसमें बताया गया है कि पूर्व मेयर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह के निधन के बाद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष निर्मल खत्री ने उनके घर पहुंचे और उन्होंने वहां शोक संतप्त परिवार को सांत्वाना दी.

अखबार में यह खबर पढ़कर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह के होश उड़ गए. लोग उनके मरने की खबर जब पढ़े तो उनके घर पहुंच गए लेकिन हवां देखा कि चौधरी साहब तो जिंदा हैं और जागरण को पानी पी पी कर कोस रहे हैं. पता चला कि चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह की चाची जी का तेरह दिनों पहले निधन हुआ था और तेरहवीं में शामिल होने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष निर्मल खत्री आए थे. इस संबंध में कांग्रेसियों ने प्रेस रिलीज भेजी कि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष निर्मल खत्री ने पूर्व मेयर चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह की चाची जी के निधन पर तेरहवीं में शामिल होने उनके घर पहुंचे और शोक संतप्त परिवार को सांत्वना दी.

लेकिन इस प्रेस रिलीज को विद्वान दैनिक जागरण वालों ने कुछ ऐसा एडिट किया को चाची को गायब करके डायरेक्ट पूर्व मेयर साहब को ही मार डाला. कांग्रेस बेचारे हाय मार डाला हाय मार डाला कह कर भले अपना सिर धुनते रहें लेकिन दैनिक जागरण वाले तो अपना कर्म कर के आगे बढ़ चले हैं, कोई जिए मरे उनकी बला से.

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मजीठिया : लेटलतीफी और समय पर जवाब न देने पर जागरण पर लगा 10 हजार रुपये का जुर्माना

नई‍ दिल्‍ली। दिल्‍ली में विश्‍वकर्मा नगर (झिलमिल कालोनी) स्थित उप श्रमायुक्‍त कार्यालय में चल रहे रिकवरी मामले में लेटलतीफी और समय पर जवाब नहीं देने पर दैनिक जागरण पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।

जागरण के रवैये से नाराज उप श्रमायुक्‍त ने पहले 15 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। जागरण प्रबंधन द्वारा गुहार करने पर बाद में यह रकम 10 हजार रुपये कर दी गई। मजीठिया वेजबोर्ड की लड़ाई लड़ रहे जागरण कर्मी श्‍याम सुंदर ने यहां 69 लाख रुपये से ऊपर की रिकवरी लगा रखी है।

सूत्रों के अनुसार रिकवरी मामले में जागरण प्रबंधन उप श्रमायुक्‍त कार्यालय में कभी भी समय पर नहीं पहुंचता या फि‍र आता ही नहीं है। मालूम हो कि नई दुनिया के एक कर्मी की रिकवरी मामले में भी दैनिक जागरण 1 हजार रुपये का जुर्माना भर चुका है।

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जागरण में काम कर चुके दंगाई राष्ट्रवादी पत्रकार डा. अनिल दीक्षित ने फेसबुक पर क्या लिख डाला, पढ़िए

Arun Maheshwari : अगर यह व्यक्ति दैनिक जागरण दैनिक का संपादक है तो कहना होगा, एक बदस्तूर अपराधी व्यक्ति भारत में हिंदी के एक प्रमुख अखबार का संपादक बना हुआ है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह के संपादकों की परंपरा वाली हिंदी भाषा के लिये इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है।

Mahendra Mishra : पत्रकारिता गिर रही है। लगातार गिरती ही जा रही है। लेकिन उसके पतन की कोई तो सीमा होगी? आलम यह है कि पत्रकारिता के एक हिस्से के वैचारिक स्तर को देखकर गली में बहने वाला परनाला भी शर्मा जाए। समाज की घृणित सोच का उसकी पूरी जेहनियत पर कब्ज़ा हो गया है। कलम जज बनकर कबीलाई फैसले सुना रही है। यकीन ना हो तो आप खुद ही देख लीजिए। जागरण में वरिष्ठ संपादकीय पद पर कार्यरत एक सज्जन ने क्या लिखा है। जिनको समाज को रोशनी दिखाने का काम मिला था वह क्या कर रहे हैं।

Mohammad Anas : दैनिक जागरण का यह दंगाई राष्ट्रवादी पत्रकार, डिप्टी न्यूज़ एडिटर के बतौर काम कर रहा है। इसका कहना है कि देशद्रोह के कथित आरोपियों जिन्होंने कल रात भारतीय कानून और अदालत में विश्वास जताते हुए सरेंडर किया है उनके साथ जेल में कैदियों को क्या करना चाहिए। मैं आप सभी साथियों से निवेदन करता हूं कि डॉ. अनिल दीक्षित जैसे विक्षिप्त व्यक्ति को इनबॉक्स में जाकर समझाएं की वे जो चाहते हैं वह कितना गलत है।  साथियों, सोशल मीडिया पर डॉ. अनिल दीक्षित जैसे लोग बहुत हैं। आज सुबह बीबीसी में काम करने वाले जर्नलिस्ट दोस्त ने जब मुझे दैनिक जागरण के डिप्टी न्यूज़ एडिटर द्वारा जेएनयू मामलें में कथित तौर पर राष्ट्रद्रोह का आरोप झेल रहे स्टूडेंट्स का रेप करने की धमकी और उलाहना देती हुई पोस्ट दिखाई तो मैं विचलित हो गया। थोड़ी ही देर बाद उस पोस्ट का स्क्रीन शॉट लगा कर पोस्ट हटाने की मुहिम चल पड़ी। उन साथियों का धन्यवाद जिन्होंने मीडिया में काम करने वाले इस दंगाई पत्रकार की पोस्ट डिलीट करवाने की मुहिम चलाई। पोस्ट डिलीट की जा चुकी है। सारा राष्ट्रवाद फड़फड़ा कर दम तोड़ दिया है।

Bharat Singh : पत्रकारिता सुरक्षित हाथों में हैं, ये धंधे को ख़ूब आगे ले जाएँगे। सारे बनियों को ऐसे ही मैनेजर चाहिए। जय हो…

साहित्यकार अरुण माहेश्वरी, पत्रकार महेंद्र मिश्रा, मोहम्मद अनस और भारत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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प्रबंधन द्वारा सताए जागरण के सैकड़ों मीडियाकर्मियों को सुप्रीम कोर्ट से हासिल हुई निराशा

Stupidity of Two Advocates has let down Newspaper Employees

Newspaper employees, in general, and Dainik Jagran employees, in particular, got a jolt in the Supreme Court today because of the foolishness of their two advocates namely; Vinod Pandey and Ashwin Vaish when the Hon’ble Court refused to grant any relief to the employees, who are either victimised or about to be victimised.

On the last date of hearing i.e. on 12th of January, 2016 the bench of the Hon’ble Justices Shri Ranjan Gogoi and Shri Prafulla C. Pant had directed the employees to file their affidavits of the victimisation and harassment for demanding the Majithia Award. In response to that hundreds of employees of different newspapers have already filed their affidavits narrating their exploitation and harassment by their managements.

However, for the reasons, not known to anybody, some of the employees of Dainik Jagran obviously on being misled by the above named two advocates filed two Interim Applications to hear the case of handful employees of Dainik Jagran praying for the stay of any action against them by the management.

The Hon’ble Justice Gogoi reiterated in the court that as per the judgment of the Supreme Court of 7th February 2014, the employees would be entitled to get wages and allowances and arrears but if any disciplinary action was taken against them, the same could not be interfered. This has come as big setback to hundreds of employees of newspapers because of the basic legal ignorance and audacious behaviour of the advocates, who misguided the leaders of the Jagran Employees Union.

M.P. Singh
Advocate
(Present at the time of hearing in the Court Room)
mataprasadsingh@gmail.com

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बुलंदशहर में महिला डीएम के खिलाफ कुत्सित अभियान चलाने वाले दैनिक जागरण के खिलाफ जनता का गुस्सा भड़का, फूंका पुतला (देखें तस्वीरें)

बुलंदशहर में महिला आईएएस बी. चंद्रकला के खिलाफ लगातार कुत्सित अभियान चलाने वाले दैनिक जागरण से नाराज होकर लोगों ने अखबार और इसके पदाधिकारियों का पुतला फूंका. डीएम के खिलाफ महिला विरोधी घटिया अभियान चलाने को लेकर लोगों को गुस्सा फूटा. पंद्रह दिनों से रोज फर्जी न्यूज छापकर दैनिक जागरण ब्लैकमेलिंग की अपनी पत्रकारिता पर अडिग है और डीम को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा है. रोज चार लड़कों को खड़ा कर प्रदर्शन की फर्जी तस्वीर और नेताओं के झूठे बयान छापने से जनता में भारी नाराजगी है.

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर खतरे की दुहाई देने वाले दैनिक जागरण ने पिछले 15 दिनों से जिलाधिकारी बी0 चन्द्रकला के खिलाफ फर्जी खबरों से मोर्चा खोल रखा है। एक से दो और तीन पन्ने तक की खबरें हर रोज डीएम के खिलाफ धरनों, प्रदर्शनों और प्रतिक्रियाओं से भरी होती है। लेकिन अब दैनिक जागरण की इस चाल की असलियत जनता के सामने आने लगी है। विभिन्न मुद्दों पर होने वाले प्रदर्शनों को जागरण डीएम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बताकर छाप रहा है।

एक नजीर आपके सामने है।

इसके अलावा राज्य सरकार के एक मंत्री और एक विधायक ने बिना बयान लिये अखबार में डीएम के खिलाफ बयान छापने पर जबाब मांगा है और पुलिस को केस दर्ज करने के लिए शिकायत भी दी है। खुर्जा में हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए वकीलों के प्रदर्शन को भी दैनिक जागरण ने अपनी रंजिश का रंग दे दिया। नतीजा यह हुआ कि वकीलों ने जागरण का पुतला फूँककर जागरण के व्यूरोचीफ और संपादक को कानूनी नोटिस भेजकर जबाब मांगा है। अपनी पीत पत्रकारिता और कारगुजारियों से दैनिक जागरण पत्रकारिता के पवित्र पेशे को कलंकित तो कर ही रहा है, लोकतन्त्र में जनता के हितों का गला भी उसके द्वारा घोंटा जा रहा है।

खुद को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मुखपृष्ठ बताने वाले इस अखबार की मानसिकता इसी बात से जानी जा सकती है कि जागरण की इस मुहिम के शुरू होने का कारण जागरण के द्वारा उस आरोपी के साथ खड़े होकर उसकी पैरवी करना था जिसने डीएम के आफिस में घुसकर उनकी जबरन सेल्फी ली थी। आईटीआई नकल रैकेट, चकलाघरों से रंगदारी और व्यापारियों से अवैध उगाही के मामलों में फँसे जागरण के पत्रकार इस ओछी हरकत से खुद को सफेद साबित करना चाहते है।

सवाल ये है कि अखबार की ये हरकतें क्या किसी कानून के तहत नही आती? समाज को फर्जी खबरें दिखाकर जागरण पत्रकारिता के कौन से धर्म का पालन कर रहा है? क्या सरकार और उसकी पुलिस इन हरकतों पर अंकुश लगाने में नाकाम है? या किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण के चलते जागरण समाज में जहर घोलने पर आमादा है?

लखनऊ बार एसोसिएशन भी आया डीएम के पक्ष में…

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दैनिक जागरण और दिलीप अवस्थी का दोगलापन

सर
सादर प्रणाम

सादर अवगत कराना है कि दैनिक जागरण जनपद अमेठी के विकासखंड बाजार शुकुल से मैं बतौर क्षेत्रीय रिपोर्टर पिछले पाँच वर्षों से समाचार लिख रहा था। कुछ माह पूर्व हुए पंचायत चुनाव में मैंने क्षेत्रपंचायत का चुनाव लड़ा। पंचायत चुनाव लड़ने के कारण मुझे दैनिक जागरण से यह कहकर हटा दिया गया कि दैनिक जागरण में चुनाव लड़ने वाले पत्रकारों को सम्पादक दिलीप अवस्थी द्वारा निकालने का आदेश हुआ है।

आपको बताना चाहूंगा कि पंचायत चुनाव में अमेठी से अमित मिश्रा ने क्षेत्र पंचायत का चुनाव तथा सिंहपुर में अर्जुन सिंह ने ग्राम प्रधान पद के लिए चुनाव लड़ा। उक्त दोनों लोग भी दैनिक जागरण में बतौर क्षेत्रीय रिपोर्टर कार्य कर रहे हैं। अर्जुन सिंह भदौरिया ने चुनाव जीता। वे वर्तमान में सिंहपुर के प्रधान संघ के अध्यक्ष भी हैं। इन लोगों पर कार्यवाई नहीं हुई। ये लोग वर्तमान में समाचार लिख रहे हैं।

सर ये कहाँ का न्याय है कि एक पर कार्यवाई हो, अन्य पर न हो। यही नहीं, अमेठी जनपद के दैनिक जागरण ब्यूरो चीफ दिलीप सिंह जहाँ शिक्षा मित्र के पद से समायोजित होकर सहायक शिक्षक बन चुके हैं वहीं बाज़ार शुकुल से रिपोर्टिंग कर रहे कृष्ण कुमार मिश्रा उर्फ़ के0के0 मिश्रा भी शिक्षा मित्र से समायोजित होकर सहायक अध्यापक बन चुके हैं। पर दोनों लोग सरकारी नौकरी करते हुए भी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। क्या सरकारी नौकरी में रहते हुये रिपोर्टिंग की जा सकती है? यदि की जा सकती है तो दोनों एक साथ कैसे? क्या ऐसे में पत्रकारिता में पारदर्शिता सम्भव है?

कुलदीप शुक्ला 
शुकुल बाजार
अमेठी
यू0पी0
मो0नम्बर-9919718584
reporterkuldeepshukla@gmail.com

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दैनिक जागरण ने कब्जाई व्यापारी की करोड़ो की जमीन, कोर्ट में केस दर्ज

बुलंदशहर की जिलाधिकारी बी. चन्द्रकला के संग जबरन सेल्फी प्रकरण के बाद आरोपी की वकालत में फँसे दैनिक जागरण का नया फर्जीवाड़ा सामने आया है। बी0 चंद्रकला को उनके माता-पिता द्वारा परिवार की सम्पत्ति बँटवारे में मिले एक फ्लैट और तेलंगाना के नक्सल प्रभावित रंगारेड्डी जिले में कृषि योग्य कुछ ज़मीन पर सवाल खड़े करने वाला दैनिक जागरण खुद भूमाफिया है। समाचार-पत्र की आड़ में सरकारी सिस्टम पर हेकड़ी जमाकर दैनिक जागरण ने काली कमाई और अवैध जमीनों की खरीद का एक बड़ा साम्राज्य देश में खड़ा किया है। ताज़ा मामला राजधानी लखनऊ का है। आपको बताते हैं कैसे जागरण ने 50 करोड़ की ज़मीन को फर्जीवाड़ा करके कब्जा रखा है।

लखनऊ में फ़ैज़ाबाद रोड नेशनल हाइवे पर एक गाँव बसा हुआ है…नाम है अनोरा। अनोरा गाँव में दैनिक जागरण ने रोड से लगी हुई करोड़ो रूपये कीमत की सात बीघा जमीन कब्जा कर रखी है। जबकि इस जमीन का मालिकाना हक लखनऊ के जाने-माने व्यापारी रामशंकर वर्मा/जितिन वर्मा का है। दैनिक जागरण की नजर कई बरसों से वर्मा परिवार की जमीन पर थी। लिहाजा लखनऊ में फर्जी दस्तावेज़ के जरिये ज़मीन हड़पने की योजना बनाई गयी।

इस फर्जीवाड़े में नटवरलाल अशोक पाठक भी शामिल है जो लखनऊ का कुख्यात औऱ घोषित भूमाफिया है। अशोक पाठक हाल ही में एक फ्राड के मामले में जेल काटकर लौटा है। रामशंकर वर्मा और जतिन वर्मा को पता ही नहीं कब दैनिक जागरण वालों ने अशोक पाठक को उप-निबंधक कार्यालय में खड़ा करके वर्मा परिवार की पूरी सात बीघा जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली और पुलिस में अपने रसूखों के चलते वर्मा परिवार की जमीन पर कब्जा भी कर लिया।

दैनिक जागरण की करतूतों का कालाचिठ्ठा जब वर्मा परिवार ने समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता के सामने रखा और सारी हकीकत बयान की तो सरकार भी दैनिक जागरण की इस करतूत पर हैरान रह गयी। कोई अखबार समूह भला फर्जीवाड़ा और हथकंडे अपनाकर कैसे किसी की जमीन हड़प सकता है। रामशंकर वर्मा और जतिन वर्मा ने अपनी जमीन बचाने के लिए फौरन कोर्ट का सहारा लिया और अदालत में दैनिक जागरण के खिलाफ धोखाधड़ी और फर्जीवाड़ा करके रजिस्ट्री कराये गये बैनामा के निरस्तीकरण के लिए केस दर्ज कर दिया है।

दैनिक जागरण द्वारा फर्जी बैनामे के आधार पर तहसीलदार की अदालत में दायर अमलदरामत का वाद खारिज कर दिया गया है और जमीन को वर्मा परिवार के नाम अभिलेखों में अंकित कर दिया गया है। दैनिक जागरण द्वारा कब्जाई गयी जमीन पर मालिकों के गुंडे और असामाजिक तत्वों को जमावड़ा रहता है जो जमीन पर अभी भी कब्जा किये हुए है। दैनिक जागरण द्वारा अपने गुंडों और रसूखदार लोगो के जरिये अब वर्मा परिवार पर इस बात का दबाब बनाया जा रहा है कि वह कौड़ियों के भाव में अपनी जमीन छोड़ दें। लेकिन वर्मा परिवार किसी भी सूरत में अपनी बेशकीमती जमीन छोड़ने को तैयार नही है। खुद को प्रतिष्ठित और दुनियां का सबसे ज्यादा प्रसारित प्रतिष्ठित अखबार कहने वाला दैनिक जागरण अब जमीन डकारने के लिए गुंडई पर उतारू है। पहले वर्मा परिवार की जमीन पर फर्जीवाड़े से कब्जा किया और अब जमीन न छोड़ने को लेकर जागरण गुंडागर्दी कर रहा है।

हकीकत ये है कि लोकतन्त्र में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दैनिक जागरण के मालिक पूरे देश में इस तरह के कारनामों को अंजाम दे रहे है। इन्हें फोकट का माल चाहिए और इसके लिए अखबार के नाम की आड़ में पुलिस-प्रशासन पर दबाब बनाकर ये लोग किसी की भी जमीनें हथिया लेते है। दैनिक जागरण अखबार चोरी, बेईमानी और सीनाजोरी का अड्डा बन चुका है। दैनिक जागरण खुद, चोर, भ्रष्ट और बेईमान है। खुद तो पत्रकारिता की आड़ में आपराधिक कृत्य करते है औऱ दूसरों के ऊपर उँगलियां उठाते है। आज जरूरत है दैनिक जागरण को ये अच्छे से जानने की कि अगर दूसरों के लिए गड्डा खोदोगे तो खुद ही उसमें जमीदोंज हो जाओगे और अगर आसमान की ओर थूकने की जुर्रत की तो तुम्हारा ही मुँह मैला हो जायेगा।

दैनिक जागरण के संस्थापकों ने जिस जोश और जुनून और मिशन के लिए इस अखबार को अपने खून-पसीने से सींचा, उनके वारिस आज भूमाफियाओं के साथ मिलकर जमीन कब्जाने जैसी गलीच हरकतें कर रहे है। सवाल ये है कि इस अखबार समूह को आखिर कौन बचा रहा है इनके आपराधिक कृत्यों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नही होती। रामशंकर वर्मा औऱ जतिन वर्मा ने इस मामले में सरकार से दखल की अपील की है और अनुरोध किया है कि सरकार उनकी जमीन दैनिक जागरण के कब्जे से मुक्त कराये…जिससे अखिलेश यादव की सरकार पर व्यापारियों का भरोसा कायम रह सके।

श्री रामशंकर लखनऊ में जाने-माने व्यापारी हैं। उनसे संपर्क करके कोई भी पूरी जानकारी हासिल कर सकता है.

लखनऊ से गीत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: singhgeetsingh66@gmail.com

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किसी राष्ट्रीय अखबार का मोदी भक्ति के लिए इतना गिरना भी ठीक नहीं

खुद को विश्‍व का नबंर वन अखबार होने का दावा करता दैनिक जागरण मोदी भक्ति व संघ विचारधारा के प्रचार प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। पत्रकारिता के सारे उसूलों को सिरे से खारिज कर बेहद मूर्खाना व्‍यवहार करने पर तुला है यह संघी अखबार। 14 फरवरी को वेलेटाइन डे के मौके पर संघी, बजरंगी इसे झूठे तौर पर शहीदी दिवस करार देने में जुटे रहे। संघ और बजरंग से जुड़े लोगों का दावा है कि 14 फरवरी को शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी, इसलिए वेलेंटाइन डे का आयोजन शहीदों का अपमान है। हालांकि तथ्‍य यह है कि 23 मार्च को इन तीनों शहीदों को फांसी दी गई थी।

चलिए मान लें कि संघी बजरंगी किताबों से दूर हैं, उन्‍हें इतिहास की जानकारी नहीं, उनका जंग ए आजादी से भी कोई लेना देना नहीं। लेकिन, अखबार के पत्रकार को तो अपना ज्ञान दुरूस्‍त करना ही चाहिए। हुआ यूं कि देहरादून दैनिक जागरण में एक खबर छपी कि विकासनगर में कुछ युवाओं ने शहीदी दिवस मनाया और शहीदों को श्रद्धांजलि दी। अखबार के रिपोर्टर ने खबर लिखी, डेस्‍क ने चेक की इसे अखबार पर भी जगह मिल गई। न कोई सवाल, न कोई जवाब।

13 फरवरी के अंक में भी ऐसी ही गलती है। मोदी सरकार की हर बात को जायज बताने का नशा जागरण पर कुछ यूं छाया है कि अखबार ने अंतरराष्‍ट्रीय पेज पर खुद ही घोषणा कर दी कि जेएनयू के छात्रों के समर्थन में हाफिज सइद ने ट्ववीट किया। अरे भाई हाफिज मियां खुद ही इनकार कर चुके हैं कि उनका कोई सोशल मीडिया अकाउंट नहीं है। यह किसी भारतीय और मोदी भक्‍त की चाल है जो हाफिज के नाम से फर्जी अकाउंट चलाता है। आप यदि उस अकाउंट को खंगालेंगे तो यह अकाउंट बिहार चुनाव में भी ज्‍यादा सक्रिय दिखा,  सिर्फ यह बताने के लिए कि यदि भाजपा की हार हुई तो पाकिसतान के लिए फायदे की बात होगी। खैर, मोदी भक्ति के नए आयाम गढ़ चुके इस अखबार से इतनी बेवकूफाना हरकत की उम्‍मीद तो की ही जा सकती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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नरेंद्र मोदी की शह पाकर दैनिक जागरण के मालिक और सीईओ संजय गुप्‍ता अपराध की राह पर निकल पड़े हैं!

Fourth Pillar : अपराधियों, घोटालेबाजों और तस्‍करों को संरक्षण दे रहे हैं संजय गुप्‍ता… वाहन पर प्रेस लिखा देख कर पुलिस वाले सम्‍मान में वाहन को नहीं रोकते और उसकी जांच करना पत्रकारिता का अपमान समझते हैं। उन्‍हें लगता है कि इस वाहन में कोई गणेश शंकर विद्यार्थी बैठा होगा। पहले कमोवेश यह बात सही भी रही होगी, लेकिन सावधान। दैनिक जागरण के प्रेस लिखे वाहन में कोई अपराधी, घोटालेबाज अथवा तस्‍कर भी हो सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शह पाकर दैनिक जागरण के मालिक और सीईओ संजय गुप्‍ता अपराध की राह पर निकल पड़े हैं और वह अपराधियों, घोटालेबाजों और तस्‍करों को संरक्षण देने लगे हैं। मजीठिया मामले में उन पर हजारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस तो कर ही रखा है, उनकी कंपनी जागरण प्रकाशन लिमिटेड के प्रबंधकों पर हमला कराने और छिनैती कराने के मामले की जांच नोएडा, गौतमबुद्ध नगर के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में लंबित है। वह अखबार के प्रभाव का इस्‍तेमाल कर पुलिस, प्रशासन और यहां तक कि व्‍यवस्‍थापिका की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।

उनके भ्रमजाल में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी फंस गए हैं, जिससे अपराध की ताकत दिनोंदिन बढ़ रही है। मोदी जी को इसकी कीमत दिल्‍ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के रूप में चुकानी पड़ी है। खैर, मोदी जी को समझ कब आएगी, यह भगवान जानें, लेकिन जाने-अनजाने मोदी जी देश के एक बहुत बड़े अपराधी का साथ दे रहे हैं, जिसके हाथ मजीठिया लाभार्थी अतुल के खून से रंगे हैं।

संजय गुप्‍ता के दूसरे अपराधों की बात करें तो दैनिक जागरण की जम्‍मू यूनिट का जिक्र करना प्रासंगिक होगा। वहां के जीएम और संपादक का एक नजदीकी व्‍यक्ति जिसे दैनिक जागरण में नौकरी दी गई, ड्रग तस्‍करी में पकड़ा गया। बताया जाता है कि जम्‍मू यूनिट की एक महिला कर्मचारी का भाई है वह तस्‍कर। महिला कर्मचारी के साथ जम्‍मू के संपादक के अंतरंग रिश्‍ते बताए जाते हैं। संपादक पहले उस तस्‍कर को पुलिस से बचाता रहा, लेकिन जम्‍मू में आतंकियों की घुसपैठ बढ़ने पर पुलिस सख्‍त हुई और संपादक अपने चहेते तस्‍कर को पुलिस के शिकंजे से नहीं बचा पाया।

संजय गुप्‍ता के अपराधों की कड़ी में आइए कानपुर यूनिट चलते हैं, जहां कई फर्जी कंपनियां बनाकर कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान से वंचित किया जा रहा है। इस काम को अंजाम देने में दैनिक जागरण का आज्ञाकारी डाइरेक्‍टर सतीश मिश्रा लगा हुआ है। मीठा बोलने वाला सतीश मिश्रा कर्मचारियों को एनआरएचम घोटाले में झोंकता रहा है। इस क्रम में दैनिक जागरण के कुछ बंदे देश के इस बड़े घोटाले में फंस भी चुके हैं। याद रहे, यदि आप दैनिक जागरण पढ़ते हैं अथवा उसे विज्ञापन देते हैं तो जाने-अनजाने आप देश के एक सबल अपराधी संजय गुप्‍ता और उसके चचा महेंद्र मोहन गुप्‍ता को समाज विरोधी काम करने की संजीवनी दे रहे हैं। आप दैनिक जागरण अखबार को बाइकाट करेंगे तो उसके कर्मचारी अतुल सक्‍सेना की आत्‍मा को शांति मिलेगी।

दैनिक जागरण में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत सिंह द्वारा संचालित फेसबुक पेज फोर्थ पिलर से साभार.

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निकल गयी जागरण की हेकड़ी, रामगोपाल बोले- साथ काम करना है, निपटाओ मामला

पिछले कई दिनों से सरकारी सब्सिडी के अखबारी कागज पर क्रांति की चिंगारी सुलगाने का दावा करने वाले दैनिक जागरण की हेकड़ी गुरूवार को उस वक्त निकल गयी जब मेरठ में प्रोफेसर रामगोपाल पहुँचे थे। सरकार का मुँह टाप रहे जागरणी पत्रकारों को उम्मीद थी कि रामगोपाल यादव उनके कहने भर से डीएम बी0 चन्द्रकला को कालापानी दे देंगे। लेकिन कागज पुर्जे पर ज्ञापन रूपी चार लाइनें लिखकर ज्योंही पत्रकारों ने प्रोफेसर रामगोपाल के सामने पेश की, उन्होने झट से कहा निपटाते क्यों नही..बस छापे जा रहे हो।

दरअसल, मेरठ के जागरणी पत्रकारों ने कई दिनों पहले प्रोफेसर साहब का कार्यक्रम आते ही बुलंदशहर डीएम बी0 चन्द्रकला के सेल्फी प्रकरण पर उन्हें घेरने की योजना बनाई थी। किसी विशाल रैली के आयोजन की तरह कैम्पेन चल रहा था। जागरण ने पिछले दिनों इस मामले पर बुरी तरह मुँह की खाई है। प्रायोजित प्रदर्शनों के फर्जी फोटो छापते-छापते स्याही खत्म होने के कगार पर है। लाला गरिया रहा है और हिम्मत व हौसला लगातार टूट रहा है। उधर, जागरण की इम्पोर्टिड फर्जी खबरों का सत्य जान चुके पाठकों ने जागरण को मोर्निग-टी के वक्त विदा कर दिया है और जागरण की इस हार से नारी शक्ति और मजबूत हो रही है। शायद इसी वजह से मेरठ के सर्किट हाउस में पत्रकारों के जमावड़े में फूट दिखी। कोई जागरण को कोस रहा था..तो कोई बुलंदशहर के ब्यूरोचीफ सुमनलाल कर्ण को।

बड़ी मुश्किलों से प्रेस क्लब के पदाधिकारियों ने सामान्य रणनीति के तहत प्रोफेसर रामगोपाल से मिलने की कोशिश की। लेकिन जिलाध्यक्ष ने पत्रकारों के लिए कोई पहल नही की। नाकामी मिलने पर केवल 4 लोगो के मिलने का प्रस्ताव भेजा गया। हाँ हुई …तो कुहनियों तक हाथ जोड़े जागरणी क्राइमवीर प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के साथ प्रो0 रामगोपाल से मिले। ज्ञापन पकड़ाने के बाद कुछ बोल पाते उससे पहले ही प्रोफेसर साहब बोल पड़े, “मिल-बैठकर मामले को खत्म क्यों नही करते। क्या मिल रहा है बेमतलब का अभियान चलाकर। अफसर है, काम करने दो और आप भी काम करो। जनता के लिए। गलत मामले पर किसी को घेरना गलत है।”

बेचारों ने इतना सुनकर जी सर…जी सर करते हुए प्रोफेसर साहब को धन्यवाद किया और बाहर चले आये। बाहर आकर किसी ने कोसा। क्यों मिट्टी पलीत कराने ले गये यार..किसने सलाह दी थी। साला मामला ऐसा है कि किसी से ठीक से कह भी नही पाते। क्राइमवीर बोले, “क्या करे भाई। मालिक का फरमान था, सो हर हाल में पूरा करना था। बड़े मुश्किल दिनों से गुजर रहे हैं। संपादक ने नौसिखिये को ब्यूरोचीफ बना दिया और उसने बवाल खड़ा करके अखबार का कबाड़ा कर डाला। सालों ने इज्जत मिट्टी में मिला दी। इतनी बेइज्जती पूरे कैरियर में कभी नहीं हुई। अब तो कोई अधिकारी सीधे बात तक नहीं करता। कोर्ट और प्रेस काउंसिंल में फँसेगे सो अलग।”

इतना कहकर सबने एक दूसरे से विदा ली और अपने-अपने गंतव्य को चले गये।

मेरठ से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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जागरण के पत्रकार पर फोन टेपिंग का आरोप, वकील ने थाने में दी तहरीर

बुलंदशहर में डीएम संग जबरन सेल्फी प्रकरण में जागरण की 10 दिन की इम्पोर्टिड पत्रकारिता पर खतरे के बादल मँडरा रहे है। एक वकील ने बुलंदशहर के अनूपशहर थाने में जागरण के ब्यूरो चीफ सुमनलाल कर्ण और उनके संपादकों के खिलाफ साइबर क्राइम के तहत केस दर्ज किये जाने की तहरीर दी है। वकील का आरोप है कि ब्यूरो चीफ सुमनलाल ने बिना बताये डीएम का फोन टेप किया और उसका इस्तेमाल अपने स्वार्थवश करके उनकी निजता का हनन किया है।

पांच बार अनूपशहर बार एसोसिएशन के सचिव रह चुके अधिवक्त कमल बंसल ने 11 फरवरी को अनूपशहर थाने में तहरीर दी है। श्री बंसल के आरोप है कि खबर छापने के बहाने दैनिक जागरण के पत्रकार सुमनलाल कर्ण ने डीएम की फोनकॉल टेप की। आईटी एक्ट के अनुसार ऐसा करना कानूनी अपराध है जो साइबर क्राइम की श्रेणी में आता है।

इसके अलावा पत्रकार ने जिस खबर के लिए डीएम से बात की थी, उसका अपनी खबर में उल्लेख नहीं किया। इस घटना के कई दिन बाद टेप की गयी फोन कॉल के किसी साजिश के तहत डीएम की निजी बातों को सार्वजनिक करते हुए दैनिक जागरण की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया और खुद के किये गये अपराध से उपजे विवाद का लाभ लेने की नीयत से डीएम को बदनाम किया गया।

श्री बंसल का आरोप है कि इस मामले में जागरण द्वारा कई दिनों से की जा रही पत्रकारिता निजी रंजिश की श्रेणी में आती है। अपने अपराध को छुपाने की नीयत से ऐसा किया जा रहा है। आरोपी पत्रकार के अलावा उनके संपादकों के खिलाफ भी सुसंगत धाराओं में केस दर्ज किये जाने की मांग की गयी है।

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दैनिक जागरण के मालिकानों ने दिखाया अखिलेश सरकार को ठेंगा

नई दिल्ली/ नोएडा। हुआ वही जिसका अंदाजा था। तानाशाह दैनिक जागरण के मालिकानों ने उत्तर प्रदेश की समाजवादी अखिलेश यादव सरकार को ठेंगा दिखा दिया। अखिलेश सरकार ने गत 25 जनवरी को प्रदेश के मीडियाकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए हेल्पलाइन सेवा का शुभारम्भ किया था। खुद मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने सेवा की शुरुआत करते हुए उत्तर प्रदेश के तमाम मीडियाकर्मियों को इस बात का विश्वास दिलाया था कि हेल्पलाइन निश्चित रूप से मीडियाकर्मियों के मसलों को सुलझाएगी और उन्हें इन्साफ दिलाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।

इससे उत्साहित मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने की मांग कर रहे दैनिक जागरण के आंदोलित कर्मचारियों ने भी इस सेवा के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज कराई। शासन के सीधे हस्तक्षेप के बाद 5 फरवरी को वार्ता की तिथि निश्चित हुई। लेकिन दैनिक जागरण के मालिकानों के इशारे पर वार्ता के लिए आये प्रतिनिधियों ने वार्ता करने से ही इनकार कर दिया। जागरण के प्रतिनिधियों ने वर्षों से संस्थान में सेवा दे रहे कर्मचारियों को कर्मचारी मानने से ही इनकार कर दिया।

बता दें कि आंदोलित कर्मचारियों ने ही शासन से दैनिक जागरण के तानाशाह रवैये की शिकायत की थी। लेकिन गौतमबुद्ध नगर जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया कि वार्ता से बचा नहीं जा सकता। जागरण प्रतिनिधियों के इस तानाशाही रवैये से वहां मौजूद आंदोलित कर्मचारी व जिले के प्रशासनिक अधिकारी भी बेहद नाराज दिखे। ऐसे में यह तो स्पष्ट है कि जागरण के मालिकानों ने मुख्यमंत्री की इस योजना का मजाक बना दिया। वार्ता के दौरान दैनिक जागरण के कर्मचारियों के प्रतिनिधियों ने कर्मचारियों के मसलों को रखा जिन पर जागरण के प्रतिनिधि जवाब देने में पूरी तरह विफल रहे।

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दैनिक जागरण की कुत्सित मानसिकता पर बुलंदशहर के सफाईकर्मियों का प्रहार, आफिस को कचरे से पाटा (देखें वीडियो)

बुलंदशहर में डीएम संग जबरन सेल्फी खिचाने वाले आरोपी की वकालत करने वाले दैनिक जागरण को अब समाज के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पिछले 5 दिनों से महिला विरोधी मानसिकता से की जा रही पत्रकारिता पर जिले के सफाईकर्मियों ने प्रहार कर दिया है। महिला सम्मान की इज्जत उतारने वाले दैनिक जागरण का आफिस कूड़े से पाट दिया गया है और सफाईकर्मियों ने ऐलान किया है कि अगर अपनी बदतमीजियां जागरण ने बंद नही की तो पूरे शहर का कचरा जागरण के आफिस पर डाला जायेगा।

आज सुबह दैनिक जागरण के चॉदपुर क्रासिंग पर स्थित आफिस के बाहर कई ट्राली कचरा भरा हुआ मिला। आफिस के बाहर के रास्ते में इतनी भी गुन्जाइश नही बची थी कि कोई दूसरी ओर जा सके। दैनिक जागरण के पत्रकारों ने अधिकारियों को जब इस बाबत बताया तो नगरपालिका के सफाईकर्मियों ने वहाँ से कूड़ा हटाने से मना कर दिया। साथ ही अफसरों को चेतावनी दी है कि पत्रकारिता की आड़ में छुपे ऐसी मानसिकता वाले अपराधियों का वह खुलकर विरोध करेंगे।

आज दोपहर को सफाईकर्मी इस बाबत सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपेगे। ज्ञापन में यह अल्टीमेटम भी जारी किया जा रहा है कि अगर दैनिक जागरण के पत्रकारों ने अपनी दिमागी सोच नहीं बदली तो अंजाम और बुरा होगा। सफाईकर्मियों ने शहर में हड़ताल करने और पूरे शहर का कूड़ा जागरण के आफिस में भरने की धमकी भी दी है।

ज्ञातव्य है कि पिछले कई दिनों से सेल्फी प्रकरण में दैनिक जागरण द्वारा सामाजिक सरोकारों को दरकिनार करके महिला सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले आरोपी के पक्ष में पत्रकारिता की जा रही है। जागरण की इस हरकत का पूरे समाज में विरोध हो रहा है। पेड न्यूज का सबसे बड़ा सौदागर दैनिक जागरण वैसे तो बड़े नेताओं और बड़े अफसरों के तलवे चाटता है लेकिन बुलंदशहर की महिला डीएम को कमजोर समझकर जो पीत पत्रकारिता शुरू की, उसका खामियाजा उसे अब खुद भुगतना पड़ रहा है।

दैनिक जागरण के बुलंदशहर आफिस को कूड़े से पाटे जाने का वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: https://youtu.be/kYVgY4D7qzc


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मानवाधिकारों का हनन कर रहा दैनिक जागरण, अहंकार त्यागने को तैयार नहीं मालिकान

नई दिल्ली/ नोएडा। मानवाधिकारों का हनन और कर्मचारियों का शोषण करने में नंबर एक संस्थान है दैनिक जागरण। ये अखबार खुद को विश्व में सबसे अधिक पढ़े जाने का दावा करता है। लेकिन इसे इस मुकाम तक पहुँचाने वाले कर्मचारियों का शोषण करने में इसने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। आप अखबार उठाकर देखिये पूरा अखबार सदाचार, संस्कार और नैतिकता के बारे में भाषणों से भरा हुआ मिलेगा।

अखबार में लोकतंत्र की रक्षा की बड़ी-बड़ी बातें लिखी होंगी। लेकिन माननीय उच्चतम न्यायालय का आदेश मानने से इसके मालिकानों ने साफ़ इनकार कर दिया। जब कर्मचारियों ने ऐसा करने का अनुरोध किया तो उनकी 20-25 साल की सेवा को इसके मालिकानों ने एक झटके में भुला दिया। इस अत्याचारी अखबार के मालिकों ने अपना हक़ मांगने पर 350 से अधिक कर्मचारियों को संस्थान से निकाल दिया है।

इन कर्मचारियों का कसूर बस इतना था कि इन्होंने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने का अनुरोध जागरण के मालिकों से किया था। गौरतलब है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2014 में अखबार संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन औए एरियर देने का अनुरोध किया था। लेकिन कर्मचारियों के चार माह तक सड़क पर उतरकर आंदोलन करने के बावजूद इसके मालिकान अहंकार त्यागने को तैयार नहीं हैं।

जागरण प्रबंधन बेवजह की गुंडागर्दी करते हुए कर्मचारियों को न तो संस्थान के अंदर काम करने दे रहा है और न ही मामले को सुलझाने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में अखबार जबरदस्त नुकसान में है और इससे उसे उबरने में लंबा समय लगेगा। लेकिन इस सबके बाद भी पहाड़ सरीखे अहंकार के चलते जागरण प्रबंधन कर्मचारियों को उनका वाजिब हक़ देने को तैयार नहीं है।

पस्त हुआ जागरण प्रबंधन, कर्मचारियों के हौसले बुलंद

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने की मांग को लेकर पिछले दो वर्ष से संघर्ष कर रहे दैनिक जागरण के कर्मचारियों का संघर्ष अब रंग लाने लगा है। जागरण प्रबंधन से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि अखबार मालिकानों के सारे दांव विफल साबित हो गए हैं और उनके साथ साथ प्रबंधन से जुड़े अन्य लोगों में बेहद हताशा का माहौल है। विश्वस्त सूत्रों ने बताया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट में पिछले महीने हुई सुनवाई में माननीय अदालत का रुख स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के पक्ष में होने के बाद जागरण के मालिकान पूरी तरह बैकफुट पर हैं।

इसके अलावा कर्मचारियों द्वारा संयुक्त रूप से लगभग 100 करोड़ की रिकवरी भी डाली जा चुकी है। कर्मचारियों ने इससे पूर्व में अपने अधिवक्ता के माध्यम से मालिकानों को नोटिस भी भिजवा दिया था। बताया जा रहा है कि कर्मचारियों के बुलंद हौसलों के कारण ही अखबार मालिकान और प्रबंधन अब कर्मचारियों के साथ समझौता करने को विवश हो गए हैं। अब यह पूरी तरह स्पष्ट है कि अखबार मालिकानों के पास कर्मचारियों से समझौते के अलावा कोई रास्ता नहीं है।

इस संबंध में जागरण एम्प्लाइज यूनियन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप कुमार सिंह कहते हैं कि अखबार मालिकानों ने पिछले दो साल में कर्मचारियों पर अत्याचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अखबार मालिकानों के अत्याचार के कारण ही कर्मचारियों को सड़क पर उतरना पड़ा। आंदोलित कर्मचारियों का स्पष्ट कहना है कि वे अखबार मालिकानों के झांसे में नहीं आएंगे और मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतन और एरियर से कम पर बिलकुल समझौता नहीं करेंगे।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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जागरण कर्मचारियों से सीखो हक़ के लिए लड़ना

नई दिल्ली : मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य राज्यों में विभिन्न प्रिंट मीडिया समूहों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म है। देश भर के मीडियाकर्मियों की नजर माननीय अदालत में होने वाली अगली सुनवाई पर है। लेकिन अत्याचारी अखबार मालिकानों से भिड़कर आंदोलन को इस मुकाम तक पहुँचाने वाले दैनिक जागरण के कर्मचारियों की हिम्मत की जितनी प्रशंसा की जाये, कम है।

जागरण की नोएडा, धर्मशाला, हिसार, जालंधर और लुधियाना यूनिट के आंदोलनकारी सिपाहियों ने यह तो दिखा दिया कि हक़-हुकूक के लिए संघर्ष कैसे किया जाता है। अखबार मालिकानों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि बरसों तक उनकी तानाशाही को बर्दाश्त करते रहे ये कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर सड़कों पर उतरकर संघर्ष करेंगे। चर्चा यह भी है कि दैनिक जागरण के नोएडा प्रबंधन में बैठे कुछ कथित महान लोग कर्मचारियों की बरसों की मेहनत से खड़ी की गई इस यूनिट को बर्बाद करने पर तुले हुए हैं। ऐसे में निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि इनकी धूर्तता की वजह से ही कर्मचारियों को संगठित होने का मौका मिला और वर्तमान में कर्मचारियों के आंदोलन को 4 महीने पूरे हो चुके हैं। अदालती कार्यवाही से लेकर एरियर की रिकवरी डालने का काम भी कर्मचारी पूरा कर चुके हैं।

जागरण एम्प्लाइज यूनियन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप कुमार सिंह कहते हैं कि जागरण कर्मचारी जिस जोश के साथ आंदोलन में उतरे थे वह अब कई गुना बढ़ चुका है और यह कहा जा सकता है कि कर्मचारी इतिहास लिखने जा रहे हैं। ऐसे में दिल्ली- एनसीआर के मीडिया संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों और इन संस्थानों के प्रबंधनों के बीच जागरण कर्मचारियों की हिम्मत के बारे में जमकर चर्चाएं हो रही हैं। अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ने के भगवान् कृष्ण के सिद्धान्त को आधार मानकर अपने हक़ की लड़ाई लड़ने वाले जागरण कर्मचारियों को सलाम।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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आंदोलन के चार माह पूरे, जागरण कर्मचारियों के हौसले बुलंद

नई दिल्ली/ नोएडा। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे दैनिक जागरण के कर्मचारियों के आंदोलन को चार माह का समय पूरा हो चुका है। इस दौरान कर्मचारियों ने नई दिल्ली स्थित जंतर मंतर से लेकर इंडिया गेट और नोएडा तक अपनी आवाज़ बुलंद की। लेकिन सबका साथ- सबका विकास की बात करने वालों तक उनकी आवाज़ नहीं पहुंची। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि ऐसे लोगों के लिए शायद मेहनतकशों का दर्द कोई मायने नहीं रखता और दूसरा यह कि कर्मचारी जिन दैनिक जागरण के मालिकानों के खिलाफ लड़ रहे हैं उनसे उनकी काफी निकटता है।

कई मौकों पर दैनिक जागरण के मालिकान सबका साथ-सबका विकास की बात कहकर सत्ता में आने वालों के साथ बड़ी शान से फ़ोटो खिंचाते और उसके बाद चौड़ी छाती कर कहते दिखाई देते हैं कि हम नहीं करते माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन। चार महीने बाद लाजिमी तौर पर मेहनतकश कर्मचारियों के सामने भी आर्थिक दिक्कतें आने लगी हैं। अपने हक़-हुकूक के लिए शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे दैनिक जागरण के कर्मचारियों ने अपनी आधी जिंदगी तो दिल्ली-एनसीआर में जागरण को स्थापित करने में लगा दी। 20-25 साल तक बेहद ईमानदारी और निष्ठा से काम करने के बाद जब कर्मचारियों ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2014 में आये फैसले को लागू करने की मांग की तो अखबार मालिकानों ने अत्याचार शुरू कर दिए।

ग़ौरतलब है कि अखबार में कार्यरत कर्मचारियों की ख़राब माली हालत को देखते हुए ही पूर्ववर्ती केंद्र सरकार ने मजीठिया वेज बोर्ड का गठन किया था। अखबार मालिकों ने गत अक्टूबर में नोएडा, लुधियाना, जालंधर, धर्मशाला और हिसार में 400 कर्मचारियों को अपना हक़ मांगने पर निलंबित कर दिया। कर्मचारियों ने सैकड़ों की संख्या में सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा लेकिन शायद सबका साथ- सबका विकास में जागरण कर्मचारी नहीं आते। वर्तमान में कई कर्मचारियों के बच्चों के स्कूल से नाम कट चुके हैं। इसके अलावा कर्मचारी मकान के किराये से लेकर दैनिक आवश्यकताओं के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। कई कर्मचारियों का कहना है कि वे जागरण के मालिकानों के अत्याचार के कारण बेशक एक वक़्त की रोटी खा रहे हों लेकिन इतना तय है कि वे अपने अधिकार के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करेंगे। आंदोलित कर्मचारियों का कहना है कि वे जागरण के मालिकानों का असली चेहरा दुनिया के सामने उजागर करेंगे।

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संजय गुप्ता यानि स्वतंत्रता का दुश्मन

Shrikant Singh : देश के इस दुश्‍मन को अच्‍छी तरह पहचान लें… दोस्‍तो, देश के दुश्‍मनों से लड़ने से कहीं ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण उन्‍हें पहचानना है। सीमापार के दुश्‍मनों से कहीं अधिक खतरनाक दुश्‍मन देश के अंदर हैं। आप उन्‍हें पहचान गए तो समझिए हमारी जीत पक्‍की। हम आपका ध्‍यान देश के एक ऐसे दुश्‍मन की ओर दिलाना चाहते हैं, जो पुलिस, प्रशासन, देश की न्‍यायपालिका और यहां तक कि देश की व्‍यवस्‍था तक को प्रभावित कर अपनी मुनाफाखोरी के जरिये इस देश को लूट रहा है। आप पहचान गए होंगे। हम दैनिक जागरण प्रबंधन की बात कर रहे हैं। आज 26 जनवरी है। गणतंत्र दिवस। इस दिन एक वाकया याद आ रहा है।

पहले दैनिक जागरण में स्‍वतंत्रता दिवस को सेलीब्रेट किया जाता था, लेकिन अब 26 जनवरी को सेलीब्रेट किया जाता है। इसके पीछे जन्‍मजात महान पत्रकार संजय गुप्‍ता ने तर्क दिया था कि अब इस देश को स्‍वतंत्रता की जरूरत नहीं है। अब जरूरत है तो नियमों पर चलने की। चूंकि 26 जनवरी को भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था, इसलिए उन्‍होंने इसे नियमों का दिवस मानकर सेलीब्रेट कराना शुरू करा दिया। अब इंसान हर चीज को अपने फायदे के लिए किस प्रकार परिभाषित कर लेता है, उसका उदाहरण संजय गुप्‍ता से बड़ा और कौन हो सकता है। उन्‍होंने स्‍वतंत्रता का अर्थ अपने कर्मचारियों की स्‍वतंत्रता से लगाया और अपने मैनेजर, संपादक से लेकर चपरासी तक की स्‍वतंत्रता छीननी शुरू कर दी।

नियमों का अर्थ उनकी नजर में संविधान के नियम नहीं, बल्कि दैनिक जागरण प्रबंधन की ओर से थोपे जाने वाले संविधान विरोधी नियम थे। अब अपने चापलूसों के साथ बैठकर वह जो नियम बना देते हैं, उसका पालन करना दैनिक जागरण परिवार के हर सदस्‍य की मजबूरी बन जाता है। जो इस मजबूरी को ढोने से तोबा करने को मजबूर हो जाता है, उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है। इसके भुक्‍तभोगी दैनिक जागरण के तमाम कर्मचारी हैं, जिनमें से सैकड़ों संघर्ष के लिए सड़क पर उतर आए हैं। राहत की बात यह है कि कल उत्‍तर प्रदेश सरकार ने एक हेल्‍पलाइन जारी की, जहां शिकायत कर आप दैनिक जागरण प्रबंधन को यह बता सकते हैं कि साहब नियम यह नहीं यह है। मेरी इस देश के पाठकों, विज्ञापनदाताओं और अभिकर्ताओं से गुजारिश है कि देश के इस दुश्‍मन को जितनी जल्‍दी हो सके सबक सिखाएं। नहीं तो बहुत देर हो जाएगी और यह मुनाफाखोर इस देश को पूरी तरह से लूट चुका होगा। अपना खयाल रखें। आज का दिन आपके लिए शुभ हो। गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई।

दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक पद पर कार्यरत क्रांतिकारी पत्रकार श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक जागरण मुरादाबाद में संपादक का आतंक

दैनिक जागरण मुरादाबाद में इस समय आतंक का माहौल है। बताया जाता है कि इस समय संपादकीय के सारे साथी संपादक के रवैये से परेशान हैं। इसी वजह से एक के बाद एक आदमी यहां से कम होता जा रहा है। जब से संपादक धर्मेंद्र किशोर त्रिपाठी यहां कार्यभार ग्रहण किए हैं तब से आधा दर्जन से अधिक लोग अखबार छोडकर जा चुके हैं। सबसे पहले यहां से सब एडिटर लवलेश पांडे संपादक की गाली गलौज से त्रस्त होकर अखबार छोडे। उसके बाद मणिकांत शर्मा ने हिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया। इसके बाद डेस्क से सीनीयर साथी रमेश मिश्रा संपादक के रवैये से त्रस्त होकर अखबार छोड गए। इसके बाद अभिषेक आनंद ने अखबार छोडकर हिंदुस्तान हल्द्वानी ज्वाइन कर लिया।

अब हालत ये हैं कि कई और सीनीयर साथी अखबार छोडने का मन बना रहे हैं। बताया जाता है कि सिटी के एक साथी दूसरे अखबार में जगह तलाश रहे हैं। ये पिछले दिनों एक बड़े अखबार में इंटरव्यू देकर आये थे। इसके बाद संपादक ने सारे ब्यूरो चीफ बदल डाले। सबसे सीनीयर सिटी इंचार्ज संजय रूस्तगी को संभल जैसे छोटे और अविकसित जिले में भेज दिया लेकिन वह नहीं गए। अमरोहा के इंजार्ज अजय यादव को भी हटा दिया जिस पर उन्होंने भी अखबार को विदा कर दिया लेकिन संपादक रामपुर के मजबूत माने जाने वाले मुस्लेमीन को नहीं हटा पाये जो करीब दस सालों से रामपुर में टिके हैं और आजम की जी हुजूरी में ही लगे रहते हैं।

इस समय ये हालत है कि संपादक ने अपना एक चेला पाल रखा है जो उनके निजी टाइप ढेर सारे वैध अवैध काम देखता है। ये चेला कुछ काम नहीं करता बस पूरे न्यूज रूम में शेरोशायरी करता रहता है। जिस दिन संपादक अवकाश पर अपने गृह नगर कानपुर जाते हैं उस दिन वह भी साथ जाता है। इसकी पुष्टि संपादक के अवकाश के दिन और उस जूनियर रिपोर्टर चेले के अवकाश के दिनों को टैली करके किया जा सकता है। दोनों के अवकाश के दिन एक ही होते हैं। संपादक ने इस जूनियर रिपोर्टर की प्रेस मान्यता भी दैनिक जागरण से करा दी है। बताया जाता है कि दीपावली पर उपहारों से भरी तीन गाड़ियां कानपुर की ओर गईं जिन पर चेले सवार थे। न्यूज रूम की हालत ये है कि दोपहर में आने के बाद संपादक सहयोगियों को किसी न किसी बहाने गरियाना शुरू कर देते हैं और बुरी बुरी गालियां देते हैं। यदि यही हाल रहा तो कई साथी अखबार को छोडकर जा सकते हैं। मालिक और अधिकारी इस पर ध्यान दें नहीं तो मुरादाबाद की हालत बहुत बुरी हो जाएगी।

एक पीड़ित पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दैनिक जागरण, रांची के आफिस में दो कर्मी आपस में भिड़े, हुई मारपीट

दैनिक जागरण रांची कार्यालय में इस समय अव्यवस्था चरम पर है। यहां मौखिक नियम बनाए जाते हैं और चेहरा देखकर काम कराया जा रहा है। कुछ खास लोगों के लिए खास नियम हैं। इस कारण आए दिन गाली गलौज की घटनाएँ होती रहती हैं। गुरुवार की रात करीब दस बजे इनपुट विभाग के आशीष झा और पेज आपरेटर मनोज ठाकुर के बीच पेज बनाने को लेकर पहले विवाद और फिर जमकर मारपीट हुई।

दस मिनट तक पूरा संपादकीय विभाग युद्ध के मैदान में तब्दील रहा। एक दूसरे से गुत्थम गुत्था मनोज और आशीष को अन्य सहयोगियों ने बड़ी मुश्किल से अलग किया। यह घटना पूरे रांची में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस घटना को लेकर पूरा कार्यालय दो गुटों में बंट गया है। यहाँ आने वाले दिनों में किसी बड़ी घटना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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