Mohd Zahid-
दरअसल कुमार विश्वास एक ढंग के कवि भी नहीं हैं। वह ज़िन्दगी भर एक ही कविता सुनाते रहे “कोई दिवाना कहता है कोई पागल समझता है।”
कविता के शौकीन लोगों को उनकी कोई दूसरी कविता याद भी नहीं होगी, गुमनामी के उस दौर में कुमार विश्वास मरहूम राहत इंदौरी और मुनव्वर राना की शरण में गए तो यह लोग कुमार विश्वास को मुशायरे के मंच पर ले गए। कभी भारत में तो कभी UAE और कभी Saudi…मगर यहां भी वह फ्लाप रहे।
दरअसल, दुबई में बाराबंकी उत्तर प्रदेश की शाज़िया किदवई और लखनऊ के रेहान सिद्दीकी ने मिडिल ईस्ट में उर्दू अदब के लिए अपने बैनर ‘अंदाज़ ए बयां और’ के तहत मुशायरों का आयोजन शुरू किया।
कांग्रेसी बैकग्राउंड वाले परिवार की बेटी शाज़िया किदवई मिडिल ईस्ट देशों की चर्चित “वित्तीय सलाहकार” हैं और सिटी बैंक, HSBC समेत दुबई के तमाम बैंकों में ऊंचे पदों पर रहीं हैं जिसके कारण मिडिल ईस्ट के अरबपति शेखों से अपने संबंधों के कारण अपने बैनर “अंदाज़ ए बयां और” के तहत होने वाले मुशायरों की फंडिंग कराती रहीं हैं।

मुनव्वर राना और राहत इंदौरी उनके हर मुशायरों के खास शायर हुआ करते थे तब कुमार विश्वास को यह दोनों शायर शाजिया किदवई से शिफारिश करके वहां मंच और मोटी फीस दिलाते थे।
मगर काबिलियत भी कोई चीज होती है।
यूएई के मुशायरों की महफ़िल पाकिस्तान के शायर तहज़ीब हाफी लूट लेते तो भारत में होने वाले मुशायरों में लोगों का जुनून इमरान प्रतापगढ़ी हो गये। मैंने स्टेज पर बैठकर कुमार विश्वास के कविता पढ़ते वक्त मौजूद श्रोताओं की हूटिंग देखी है और उसी स्टेज पर इमरान प्रतापगढ़ी के प्रति दिवानगी देखी है।
पाकिस्तान के तहज़ीब हाफी ने मिडिल ईस्ट में और इमरान प्रतापगढ़ी ने भारत में इनसे वह मंच भी छीन लिया और इनकी दुकान बंद हो गई।
दोनों जगह दुकान बंद होने पर यही राहत इंदौरी और मुनव्वर राना इसी कुमार विश्वास को मीडिल ईस्ट में एंकर के रूप में मंच संचालन करने के लिए ले गए और इसे मोटी रकम दिलाई।
दुबई में आयोजित तमाम मुशायरों में यह कुमार विश्वास पाकिस्तान के शायर तहज़ीब हाफी के शेरों पर बिछते हुए मोटा माल कमाते रहे।
अब ना राहत इंदौरी रहे ना मुनव्वर राना, इसे घर भी तो चलाना है तो यह राजनीतिक रूप से केजरीवाल द्वारा भगाए जाने के बाद कथावाचक बन गये और अब सांप्रदायिकता बेचते हुए छोटे से बच्चे तक पर आक्रमण कर रहा है।
दिनेशराय द्विवेदी-
कुमार विश्वास या अविश्वास जो भी है, मुझे कभी पसंद नहीं आया। यह अन्ना के आंदोलन में घुसा, फिर राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को लिए आप में चला गया। वहाँ जब महत्वाकांक्षाएँ पूरी होती नहीं दिखीं, तब वहाँ से अलग हुआ और कवि से आँदोलनकारी, फिर राजनेता बना अब कथावाचक बन गया है।
वही घिसी पिटी रामकथा जिसके लाखों वाचक और उतने ही अर्थ हैं उसे सुनाते हुए अपनी घृणा को पब्लिक को परोसता रहा। वह जानता था कि मोईभक्त यही सुनना चाहते हैं। घृणा उत्पादन जोरों पर है, उसकी महत्वाकांक्षाओं के सिर ऑक्टोपस की बाहों की तरह झूम रहे हैं। उसकी करनी ने उसकी बेटियों तक को रील्स का हिस्सा बना डाला है।
एक दिवंगत मित्र इसी कुमार का भक्त था। मैं उससे कहता था भक्त मत बनो। मित्र इस दुनिया में नहीं है वर्ना बहुत दुःखी होता।


