मुकेश नेमा-
कुत्ते पाले हैं मैंने। बारी-बारी लगभग दस-दस साल एक फीमेल डाबरमेन और एक पामेरियन डॉग घर में रहे और फिर कुछ महीनों तक एक बच्चा बीगल साथ में रहा। कुत्तों की इतने दिन की संगत के बाद मेरी राय यह कि आदमी को कुत्ते पालने से परहेज करना चाहिए।
इस बात से इनकार नहीं कि वो आपसे प्यार करते है पर इनका प्यार अग्निसाक्षी के नाना पाटेकर टाईप का होता है। तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगा जैसा। आप किसी और से प्यार जताएँगे तो ये गुर्राएँगे। कोई आप के नज़दीक आना चाहेगा तो ये नाराज़ होंगे। ये हों तो आपका कहीं आना जाना मुश्किल। आप कहीं गए तो ये देवदास के रोल में घुस जाएँगे। खाना पीना छोड़ देगें। टसुए बहाएँगे। आप जिनके भरोसे छोड़ आएँ है उसे, उसका खाना खराब कर देगें। और कुत्ते से दूर रहकर आपके हाल भी बेहाल होंगे, चाहे आप रामेश्वर में मोक्ष की कामना कर रहे हों या गोवा मे सुंदरियाँ ताड़ रहे हों, कुत्ता आपके मन में घुसा रहेगा और आप कुछ नहीं कर पाएंगे।
और आप इस गलतफहमी में मत रहिए कि आपने कुत्ता पाला है। दरअसल उसने आपको पाला हुआ होता है। सुबह शाम टहलना होता है उसे। सुबह तेज बारिश हो रही है। खतरनाक किस्म की ठंड है। कोहरा छाया हुआ है। आप रात को देर से सोए हैं। तबीयत ठीक नहीं लग रही आपको, आप बिस्तर में घुसे रहना चाहते है। पर आपका कुत्ता सुबह सूरज निकलते ही आपकी छाती पर चढ़ बैठेगा। आप चाहे या न चाहे आपको उसकी बेल्ट पकड़कर कॉलोनी पार्क सड़कों पर टहलना ही पड़ेगा। आप नहीं टहलाते कुत्ते को फिर, वो आपको टहलाता है, वो जिधर जाना चाहे जाता है और आप उसके पीछे-पीछे घिसटते है। फिर कुत्ते को नहलाना धुलाना, मना मना कर खाना खिलाना ऐसे काम जैसे आपने एक और बच्चा पैदा कर लिया हो और मुश्किल यह भी कि यह बच्चा कभी बड़ा नहीं होता।

और फीमेल डॉग पालना तो और बवाल ए जान। उसके बड़े होते ही मोहल्ले शहर के तमाम कुत्ते, लार टपकाते हुए आपके घर के आसपास मंडराने लगते है। फीमेल डॉग को हर कुत्ता पसंद आ जाता है और उसकी चरित्र रक्षा के प्रबंध करने में आपकी नींदे हराम हो जाती हैं। आप झुंझलाते है। नाराज़ होते है, पैर पटकते है और फिर हार जाते है। आपकी डॉगी आपके हर पहरेदार को मात दे देती है। हर चारदीवारी फलांग जाती है। माँ बनती है। दस बारह छोटे-छोटे पिल्लों के नाना बनते है आप और उन्हें ठिकाने लगाने में आपकी अपनी नानी मर जाती है।
और फिर कुत्ता किसी को न काटे तो वो काहे का कुत्ता। आपका कुत्ता किसी को काट ले। खरोंच दे तो इससे बड़ी आफत कोई दूसरी नहीं। जिसे काटा खरोंचा हो आपके कुत्ते ने उससे विनती कीजिए आप। लड़िये झगड़िए मनाइए उसे। उसका इलाज करवाइए। और जब ये सब करते है आप तो और कुछ करने लायक़ नहीं रह जाते। कुत्ता यदि पड़ोसी के लॉन में पेशाब न करे तो उसका कुत्ता होना गिना नहीं जाता। ऐसे में कुत्ते पालने वाले को पड़ोसी गालियाँ देते ही है चाहे वो मन ही मन दी गई हो।
कुत्ता पालने वाला आदमी कुत्ते का बंधक होता है, कुत्ता उसकी दिनचर्या निर्धारित करता है और जब तक जिंदा रहता है आदमी को उसका गुलाम होकर रहना पड़ता है। उससे कुत्तों की गंध आने लगती है, दूसरों के कुत्ते भी उसे देख पूंछ हिलाने लगते हैं। वो फिर कुत्तों की ही दुनिया में रहता है और दूसरे लोग उससे मिलने में कतराते हैं।
और फिर जब कुत्ता मरता है तो ऐसा लगता है कि घर का कोई मेंबर मर गया हो। सन्नाटा छा जाता है घर में। आप उदास होते है, मातम मनाते है और फिर खुद से, अपनी बीबी से, बच्चों से, आने जाने वालों से बस कुत्ते की बात करते है। कसम खाते है कि अब कभी कुत्ता नहीं पालेंगे और फिर कुछ दिनों महीनों बाद एक दूसरा कुत्ता आपके घर में होता है।
कुत्ता पालना आफत है। जी का जंजाल है। कुत्ते पालने से बचना चाहिए आदमी को। कुत्तों से प्यार करना अपने अपहरणकर्ता के प्रेम में पड़ जाने जैसा है। कुत्तों से प्यार करने का बहुत मन हो तो पड़ोसी या किसी दोस्त के कुत्ते से बतिया कर, सहला कर संतोष कर लेना चाहिए। यह सलाह इसलिए क्योंकि हम अपने भूतकाल में कुत्ता पाल चुके और अब कुत्तों से दूर रहते है।
बतौर ज़िला आबकारी अधिकारी मेरी पहली पोस्टिंग हुई दमोह में। तीस बत्तीस साल पहले का जमाना। बुंदेलखंड का हिस्सा है दमोह। उस वक्त तो लगभग देहात ही था यह शहर। सुविधा विहीन लेकिन शांत और हरा भरा। दमोह मेरे लिए बहुत वजहों से बहुत खास है और अब भी जब तब मैं उसे याद करता हूँ।
ब्याह हुआ नहीं था तब तक। मैं पच्चीस बरस का कुंवारा सरकारी अफ़सर। सरकारी मकान में अकेला। दो ऐसे नौकर, जो बस ख़ूब घी भरे, कड़क कुरकुरे पराठे और आलू प्याज़ की, तेज मिर्च वाली रसीली सब्ज़ी बनाना जानते थे। दोस्त थे, मैं था और जलवेदार अफ़सरी थी। ऐसे में मेरे जीवन में संयोगवश एक खूबसूरत प्राणी का प्रवेश हुआ। मेरे अकेलेपन की साथी बनी वो। डॉबरमेन नस्ल एक नन्ही कुतिया थी वो जो मुझे बहुत बहुत पसंद थी।

ओपी श्रीवास्तव और राजीव शर्मा जैसे शरीफ़ और पढ़े लिखे दोस्तों से गहन विचार उपरान्त, साहित्य का नोबल पुरस्कार जीते ब्लादीमीर नावाकोव के मशहूर विवादित और अश्लील कहे जाने उपन्यास लोलिता की नायिका का नाम मिला उसे। लोलिता। कटी पूँछ की वो डॉबरमेन नस्ल की नन्ही कुतिया बहुत जल्दी बड़ी हुई। छरहरा शरीर। स्याह काला रंग, चमकती त्वचा, निर्दोष आँखें, ऐसी मादक सौंदर्य, जिसे देख कर उसके प्यार में पड़ने से खुद को रोकना किसी के लिए भी मुश्किल था।
दमोह के बुंदेलखंडी सेवकों के लाड़ प्यार दुलार से वो पहले ललिता हुई, और फिर लौली कही जाने लगी। दमोह में रहने का, नौकरों की संगत का गहरा असर हुआ उस पर। प्रमाणित शुद्ध जर्मन नस्ल की वह डॉबरमेन, जिसके ख़ानदान और रक्त की शुद्धता का सर्टिफिकेट था मेरे पास, बुंदेलखंडी हुई और फिर ज़िंदगी भर बुंदेलखंडी ही समझती रही।
वो मेरे आगे पीछे घूमती। मेरे ऑफिस जाने पर अनमनी होती और घर लौटने पर ख़ुशी जताती। घर में उसका राज था। वो तर माल उड़ाती। बिना पट्टे के घर भर में विचरती। नौकरों, सिपाहियों और आबकारी के इंस्पेक्टरो की संगत में मिलनसार हुई। महँगी चॉकलेटों के चक्कर में भौंकना भूल गई। परम दयालु लौलिता सभी से ऐसे प्यार से मिलती जैसे मदर टेरेसा हो। बहुत जल्दी उसमें कुत्तों का कोई गुण शेष नहीं रहा। ऐसे में उससे की जा सकने वाली, चोर भगाने जैसी इकलौती उम्मीद भी जाती रही। चूँकि में प्यार करता था उससे, इस वजह से वो घर की महारानी बनी रही और सभी उसकी चाकरी करते रहे।
सब कुछ ठीक था उसके और मेरे जीवन में। फिर मेरी शादी हुई और मेरा और लौलिता दोनों के जीवन अप्रत्याशित तेज़ी से बदले। वो पहले बेडरूम से बाहर हुई। ड्राइंगरूम में पहुँची और फिर बरामदे में जाकर बसी। इसके बावजूद वो बदस्तूर मुझसे प्यार करती रही।
फिर सच में बड़ी हुई वो। उसकी कुंडली में शुक्र की महादशा प्रारंभ हुई। उसके रूप यौवन की गंध ने चारों दिशाओं मे कुकुरमुत्तों की तरह मौजूद आवारा कुत्तों को निमंत्रण दिया। अब वो अपना नाम सार्थक करने के लिए व्याकुल थी। उस चपल धाविका को रोकना न घर की बाड़ के बस में था, न मेरे। लाचार हुआ मैं। ऐसे में अब शुद्ध जर्मन नस्ल के डॉबरमेन नस्ल के कुत्ते की तलाश की गई। लोलिता भाग्यशाली थी। जल्दी ही एक सुयोग्य सुदर्शन डाबरमेन कुत्ते से मुलाक़ात हुई उसकी। उसका भी घर बसा। वो दो बार में इक्कीस खूबसूरत बच्चों की माँ बनी। उसके बच्चे माँगने वाले याचकों की भीड़ लगी मेरे दरवाज़े पर। परख-परख कर, खाते पीते लोगों को, मन मार कर बाँटे गए उसके बच्चे, अब तो ख़ैर उन बच्चों के बच्चों के भी बच्चे हो ही चुके होगे। और यह पता करना नामुमकिन है कि लौलिता का वंश कहाँ-कहाँ और कितनी दूर तक फैला हुआ है।
क़रीब दस ग्यारह साल वो बेमिसाल, शिकारी नस्ल की होने के बावजूद प्रेमिल और दयालु कुतिया मेरे जीवन का हिस्सा बनी रही। फिर एक दिन अचानक चली गई वो और मैं तीसरी कसम के हीरामन की तरह दुखी हुआ और उसकी ही तरह तीसरी कसम खाई मैंने कि अब ज़िंदगी में दोबारा कुत्ता नहीं पालूंगा। ये बात अलग है कि उस कसम पर कायम नहीं रह सका मैं और मुझे लगता है कि हीरामन भी अपनी कसम का निबाह नहीं कर पाया होगा।
बहुत वक्त बीत गया अब तो। पर उसका निश्छल भोलापन, उसका दोस्ताना स्वभाव अब भी, कभी-कभार याद आता है मुझे, और जब भी ऐसा होता है मेरा मन भीग जाता है।
स्नूपी था एक बीगल। बीगल दुनिया के सबसे समझदार मिलनसार और उर्जावान कुत्तों की फ़ेहरिस्त में शामिल। वैसे तो स्नूपी के पहले दो कुत्ते भुगत चुके थे हम लोग। कसम खा चुके थे कि अब ताजिंदगी कुत्तों से दूर रहेंगे ,पर रोहित की जिद पर इस बीगल का गृह प्रवेश हुआ। महीने भर के इस चुलबुले पिल्ले का अनचाहे ही स्वागत करना पड़ा हम सभी को और उसके घर में आते ही हम लोगों की दुनिया एकदम उलट पुलट हो गई।

सफेद भूरा रंग। चौड़ा सर। शरारती आँखे। चेहरे से बड़े लंबे लटकते कान। हल्की मुड़ी हुई पूँछ। हद से ज्यादा मिलनसार ये कुत्ता इतना खूबसूरत था कि उसे देखते ही गले लगाने का जी चाहता था। पर उसने बहुत जल्द हम लोगों की गलतफहमी दूर कर दी। प्यारी शकल वाला ये कुत्ता आफत का परकाला था।
ये बालक उम्मीद से ज्यादा ख़तरनाक निकला। जब तक रहा सभी उससे घबराये हुए बने रहे। सावधान रहे हर मिनट। वो कब चुपके से आकर पाँवों में दांत गड़ा देगा, इसका कोई ठिकाना था नहीं। भीषण उर्जा से भरा ये पिल्ला कब कौन सा नुक़सान कर दें अंदाज़ा नहीं लगाना मुश्किल था। उसने आनन-फानन में मेरे मोबाईल के चार्जर का वायर काटा और संग साथ रोहित के लैपटॉप के तार भी निपटा दिए। अख़बार, किताबें, पत्रिकाएँ, जूते चप्पलें, सोफ़ासेट के कुशन, कपड़े, पर्दे कुछ भी उसकी पहुँच से बाहर नहीं थे। वो पूरी शिद्दत से हम लोगों की पूरी दुनिया चिथड़े-चिथड़े करने में जुटा रहा और हम सभी बचाव की मुद्रा में सकपकाए और डरे-डरे बने रहे।
एकदम तानाशाह टाईप के इस कुत्ते से कुछ भी कहने सुनना मुहाल था। वो बिजली की तरह तेज था। फुदकने में ख़रगोशों को मात करता था ऐसे में उसे सुबह शाम टहलाना और सही सलामत घर लौटा लाना नामुमकिन जैसा काम था। छोटा था बहुत इसलिए पट्टा लगाया नहीं जा सकता था। बिना पट्टे का ये पिल्ला देवी के नाम पर छोड़े गए सांड की तरह था जो किसी का कुछ भी बिगाड़ सकता था और उससे कुछ भी कहना धर्म विरुद्ध आचरण था।
था मिलनसार। अकेला रहना नहीं चाहता था। मोहब्बत की दुकान था। उससे मिलो न तुम तो हम घबराएँ, मिलो तो आँख चुराए वाला रिश्ता था हम लोगों का। दिन भर बस उसकी शिकायतें होती थी और दिन भर उससे लाड़ लड़ाया जाता धा। एकदम किंकर्तव्यविमूढ़ वाली स्थिति थी की इससे कैसे जूझे, कैसे बचें और कैसे निपटे।
फिर बात वही आई जो आना ही थी। एक दिन सुबह रोहित की मम्मी ने घोषणा की कि अब या तो ये कुत्ता घर में रहेगा या मैं रहूँगी। जाहिर है ये स्नूपी के घर से निकाल दिए जाने का फरमान था। स्नूपी के प्यार में बंधे रोहित राधा के लिए ये भारी धर्म संकट की स्थिति थी। सो सब सर जोड़ कर बैठे और बीच का रास्ता ये निकला कि इस आफत ने रोहित की वजह से घर का रास्ता देखा है। सो इसकी हर तरह की ज़िम्मेदारी अब वही ले। उसे खिलाए पिलाए घुमाए और सुलाए। और यह देखे कि वो किसी के सामने किसी किस्म की दिक़्क़तें पेश न कर पाए। रोहित खुशी-खुशी राजी हुआ और महीने भर में ही समझ गया कि नौकरी और बीगल दोनों को एकसाथ सँभालना उसके बस की बात है नहीं।
स्नूपी बस के बाहर बना रहा। उन्हीं दिनों रोहित की शादी तय हुई और घर शादी वाला घर हो गया। अब रोहित शादी करे या स्नूपी को देखे। अब रोहित ने भी हाथ खड़े कर दिए। स्नूपी की दादागिरी का कोई ओर छोर नहीं था। सो दिल पर पत्थर रख कर सभी एक राय हुए कि इस बदमाश कुत्ते के साथ निभाह करना अब मुश्किल है और उसे जाना ही होगा।
अब स्नूपी को गोद देना था। अपने जिगर के टुकड़े को ऐसे ही किसी और के हवाले किया नहीं जा सकता था। राधा ने अपनी एक अमीर सहेली को मनाया इसके लिए। स्नूपी की विदाई हुई भी। मायूस हुए सभी। सभी ने राहत की सांस ली। पर होनी को ये मंजूर नहीं था। आठ दिन बीतते-बीतते राधा की सहेली फूट फूट कर रोती हुई पधारी और स्नूपी एक बार फिर घर के अंदर थे।
हम लोगों ने एक बार फिर हिम्मत जुटाई। एक बार फिर स्नूपी के लिए ,कुत्तों से प्यार करने वाले किसी भले आदमी की तलाश की गई। किस्मत अच्छी थी हम लोगों की। ऐसा आदमी मिल भी गया। स्नूपी को राजमहल टाईप नया घर मिला। अब वो एक अरबपति की गोद में खेल रहा है। लंबे हरे लॉन मे दौड़ता है और लंच डिनर मे चिकन खाता है। भोपाल में ही रहते स्नूपी से अब भी कभी कभार मुलाकात हो जाती है हमारी और उसे हम अब भी याद हैं।
कुत्ता न पालने की सलाह दी थी कुछ दिनों पहले आपको मैंने। यदि फिर भी आप आमादा हो कुत्ता पालने के लिए तो बीगल से बचे। बीगल से ज्यादा उत्पाती कुत्ता दुनिया में और कोई नहीं। आप उसके प्यार में पड़ जाएंगे और वो आपका खाना खराब कर देगा। आपके दिन का चैन और रातों की नींद छीन लेगा वो आपसे। आप किसी दीन के नहीं रहेंगे और उससे पीछा छुड़ाने के अलावा और कुछ सोच नहीं पाएंगे। आपके खैरख्वाह हैं, इसलिए बता दिया है आपको। अब आगे आपकी मर्जी।



Jaya
August 22, 2025 at 1:41 pm
Teri soch tere pas rakh ghtiya insaan.tune kutte ka pyar uski vafadari ko samjha hi nhi.logo ko mislead Krna band kr.
Sandeep Kumar
August 27, 2025 at 7:38 pm
Jaya,very well put across. These clowns who can’t handle dogs are the first ones to advise people.