‘अच्छे दिन’ का ‘आदर्श’ उदाहरण : एक पत्रकार और उसके पिता की यह तस्वीर भाजपाइयों का पीछा न छोड़ेगी!

Sanjaya Kumar Singh : पत्रकार की फर्जी गिरफ्तारी… शिकायतकर्ता तो मारा जाएगा… ‘अच्छे दिन’ का बढ़िया उदाहरण है। बाड़मेर के एक निर्दोष पत्रकार को पटना की अदालत में एससी-एसटी मामले में फंसा दिया गया। पहले पत्रकार और उसके करीबी परेशान। बचे तो शिकायतकर्ता फंसे। इस मामले की तह तक जाने के लिए बाड़मेर का पत्रकार कहां पटना में रहकर आगे की कार्रवाई कर पाएगा। मीडिया की भूमिका ऐसे ही मामलों में होती है पर इस मामले में मीडिया ऐसा कुछ करेगा इसकी कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि मीडिया में खबर भले छप रही है, तेवर सच बताने वाली नहीं, सूचना देने की है।

बाड़मेर के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित के खिलाफ पटना में दर्ज शिकायत अदालत के बाहर ही फर्जी साबित हो गई है। जिस दलित व्यक्ति की तरफ से मुकदमा दर्ज करवाया गया है, उसने कह दिया है कि वह कभी बाड़मेर गया ही नहीं, ना ही वह दुर्ग सिंह राजपुरोहित अथवा दुर्गेश सिंह नाम के किसी बाड़मेर निवासी को जानता है। इसके बावजूद पत्रकार को एक सितंबर तक के लिए जेल भेज दिया गया है। इससे पत्रकार और उसके करीबियों को होने वाली परेशानी तथा खर्चों का अनुमान लगाया जा सकता है। मामला सीधे-सीधे सत्ता के दुरुपयोग का है। अब तो साफ लग रहा है कि इसमें कानून का दुरुपयोग कर फर्जी मामला लिखवाया गया है और दबाव डालकर कार्रवाई कराई गई है।

कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में निर्दोष पत्रकार के पिता और अन्य परिजन पटना में हैं। जमानत के लिए याचिका दायर की गई है। प्रकाशित खबरों के मुताबिक पटना के एसएसपी मनुमहाराज ने कहा है कि यह मामला पटना के किसी थाने में दर्ज नहीं हुआ है बल्कि कोर्ट में केस किया गया है और अदालत ने ही गिरफ्तारी वारंट निकाला है। अदालत में शिकायतकर्ता के बयान के मद्देनजर एसएसपी ने कहा है कि वे अपनी ओर से जांच नहीं करेंगे, अगर कोर्ट जांच करने का आदेश देगा तो इसकी तफ्तीश की जाएगी।

पहले ही दिन से इस मामले में बिहार के पूर्व राज्यपाल का नाम जुड़ा हुआ है और अब तो यह सही भी लग रहा है। एक तरफ राज्यपाल की लगभग तरक्की हुई है दूसरी ओर, शिकायतकर्ता की पोल खुलती लग रही है। पत्रकार के साथ समस्या यह है कि वह छूट भी जाए तो शिकायतकर्ता के खिलाफ शिकायत का मतलब होगा एक गरीब और कमजोर के व्यक्ति को परेशान करना जबकि जिसकी वजह से सब कुछ हो रहा है उसका कहीं नाम भी नहीं है। इस मामले में दैनिक भास्कर ने विस्तार से खबर छापी है। पटना संस्करण में यह खबर रूटीन खबर की तरह है और पढ़कर ही लग रहा है कि पत्रकार के बाद शिकायतकर्ता की बारी है।

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Yashwant Singh : ये तस्वीर भाजपाइयों का पीछा न छोड़ेगी… केंद्र से लेकर राजस्थान और बिहार तक में सत्ता में हैं… बात कुछ अलग, कुछ बेहतर करने की कहे थे… लेकिन असल में ये कर क्या रहे हैं… देखिए कैसे एक राजस्थानी पत्रकार को डंके की चोट पर एससी-एसटी कानून के तहत फर्जी केस में फंसाकर बिहार ले जाया गया और अब जेल भिजवा दिया गया…

तस्वीर में देखिए उस अभागे बाप को भी जो जेल गेट तक अपने बेटे का साथ निभाने जा रहा है… यह बाप बाड़मेर में अपने बेटे के पकड़े जाने की खबर सुनते ही साथ हो लिया और पुलिस जीप में किसी तरह लदकर साथ-साथ पटना पहुंचा, बेटे को संबल देते हुए…

आप भी अगर एक पिता हैं, एक पत्रकार हैं, एक युवा हैं, एक समझदार नागरिक हैं तो तय कर लीजिए आज… बीजेपी को लेकर… ये ससुरे फर्जी कानून का खुद ही इस्तेमाल कर रहे हैं और डायरेक्ट पत्रकारों को ही जेल भिजवा रहे हैं.. सोचिए, इनकी देखादेखी जाने कितने नेता और अफसर अब इस कानून का दुरुपयोग कर अपने खिलाफ आवाज उठाने वालों को निपटाने की सोच रहे होंगे या निपटा रहे होंगे…

इस राजस्थानी पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को जेल भिजवाने वाले भाजपा के एक बुजुर्ग मेल और एक युवा फीमेल की जोड़ी के चर्चे-किस्से इसी बहाने जग-जाहिर हो गए हैं… साथ ही सबको पता चल गया है भाजपाइयों की हिप्पोक्रेसी…सबको पता चल गया है भाजपाइयों का असली ‘काम’ और उनका ‘चिंतन’ व ‘चरित्र’…

सत्ता पाते ही चर्बी उचित जगहों पर फौरन चढ़ जाती है.. उसके बाद ये खुद को खुदा से कम कहां समझते हैं… लात पड़ेगी चिरकुटों… पिघलेगी चर्बी भी..

पत्रकार गजेंद्र सिंह हत्याकांड के बाद का यह सबसे बड़ा घटनाक्रम है. जिस पत्रकार ने इस पर लिखा या शेयर नहीं किया तो समझो वह कमीना किस्म का है… गजेंद्र की आत्मा सदा सपाइयों को दौड़ाती रहेगी… दुर्ग का श्राप सदा भाजपाइयों को बेचैन रखेगा…

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह और यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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