पत्रकार दुर्गसिंह राजपुरोहित पर लगा केस फर्जी निकला, दैनिक भास्कर ने सच ला दिया सामने

बाड़मेर के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित के खिलाफ दर्ज शिकायत अदालत के बाहर फर्जी साबित हो गई है. जिस दलित व्यक्ति की तरफ से मुकदमा दर्ज करवाया गया है, उसने कह दिया है कि वह कभी बाड़मेर गया ही नहीं, ना ही वह दुर्ग सिंह राजपुरोहित अथवा दुर्गेश सिंह नाम के किसी बाड़मेर निवासी को जानता है.

पटना की अदालत में एससी-एसटी एक्ट के तहत दुर्गेश सिंह नामक व्यक्ति के खिलाफ परिवाद दायर हुआ था. इसी पर बाड़मेर पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को किसी आतंकवादी की तरह पकड़ कर रातों-रात पटना पहुंचा दिया. कथित शिकायतकर्ता तो फर्जी साबित हो ही रहा है, घटना जिस दिन की बताई गयी है उस दिन दुर्ग सिंह बाड़मेर में ही एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मौजूद थे.

वरिष्ठ पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित बाड़मेर में रहते हैं. रविवार को उन्हें बाड़मेर के एसपी ने अपने पास बुलाकर गिरफ्तार करवाया था. बताया गया कि उनके खिलाफ बिहार एससी- एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज है. इस पर वहां की अदालत ने गिरफ्तारी वारंट जारी कर रखा है. बाड़मेर पुलिस के तीन सिपाही टैक्सी से राजपुरोहित को लेकर आनन-फानन में पटना के लिए रवाना हो गए. वो सोमवार को रात भर पटना पुलिस की कस्टडी में रहे और कल अदालत में पेश किया गया.

इस मामले में शिकायतकर्ता का नाम राकेश पासवान है. खास बात यह है कि शिकायत दुर्ग सिंह राजपुरोहित के नाम नहीं बल्कि दुर्गेश सिंह के खिलाफ है. आरोप लगाया गया है कि दुर्गेश का बाड़मेर में पत्थरों समेत कई तरह का कारोबार है. आरोप के मुताबिक पासवान बाड़मेर में आरोपी के यहां पत्थर तोड़ने की मजदूरी करता था. पिता की बीमारी के चलते छह महीने काम करके बिना मजदूरी लिए वो बिहार वापस लौट गया. दुर्गेश 15 अप्रैल को पासवान को लेने पटना उसके घर गए. वादी ने माता पिता की बीमारी का हवाला देकर बिहार से बाड़मेर जाने से मना कर दिया.

आरोप के मुताबिक इसके बाद दुर्गेश बीती 7 मई को 3-4 अज्ञात लोगों को लेकर एक बार फिर राकेश पासवान के घर बिहार पहुंचे. बाड़मेर जबरन ले जाने के लिए धमकाया. घर से घसीटकर पासवान को बाहर ले कर आए. नीच जाति का बोलकर उसके साथ मारपीट की. आस पास के लोग इकट्ठा हुए तो अपने साथियों के साथ एक बोलेरो गाडी में बैठकर भाग गए. अर्जी में कहा गया है कि 75 हजार बकाया मज़दूरी भी नहीं दी है.

बाड़मेर के पत्रकारों ने कई सुबूत फेसबुक पर पोस्ट किए जिसके मुताबिक़ दुर्ग सिंह 7 मई को एक बुक लांच कार्यक्रम में मौजूद थे. दुर्ग सिंह ने उस दिन अपनी फेसबुक वॉल पर कार्यक्रम के फोटो पोस्ट किए थे. फेसबुक लाइव भी किया था. पटना के दैनिक भास्कर संस्करण ने आज विस्तार से छापकर बता दिया कि पत्रकार पर झूठा आरोप लगा है.

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स्पष्ट है कि यह मामला प्रभावशाली लोगों के दबाव का नतीजा भर है. दुर्ग सिंह राजपुरोहित का कहना है कि वे ज़िन्दगी में कभी पटना नहीं गए, लिहाजा वहां जाकर किसी उत्पीड़न का सवाल ही नहीं उठता. दैनिक भास्कर की खबर में बताया गया है कि शिकायतकर्ता कभी राजस्थान बाड़मेर गया ही नहीं. पटना में किन्हीं संजय सिंह की जेसीबी मशीन पर काम जरूर करता था. इसी संजय सिंह ने उसे एससी-एसटी एक्ट के तहत एक मुकदमा लिखवाने के लिए कहा था. लेकिन उसने फर्जी मुकदमा लिखवाने से मना कर दिया. उसके बाद क्या हुआ नहीं जानता.

संजय सिंह ने मुकदमें में खुद को घटना का गवाह दिखाया है. संजय भाजपा का नेता है और सभासद रह चुका है. संजय सिंह ने किसे खुश करने के लिए फर्जी शिकायत की साजिश रची इसकी जांच होनी चाहिए. पूरे मामले में बाड़मेर के एसपी की भूमिका भी जांच का विषय है. दुर्गेश सिंह के नाम पर दायर परिवाद में दुर्ग सिंह राजपुरोहित को गिरफ्तार करने में इतनी तत्परता किसके कहने पर दिखाई. वो भी पटना पुलिस द्वारा व्हाट्स एप पर भेजे गए वारंट पर. बाड़मेर के एसपी ने दुर्ग सिंह राजपुरोहित को गिरफ्तार करा कर अपने सिपाहियों के साथ टैक्सी से तत्काल रवाना कर दिया.

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