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सुख-दुख

जब मैं ‘हंस’ का सहायक संपादक था…

गौरी नाथ –

‘हंस’ में सहायक संपादक के रूप में काम करते हुए, वहाँ संपादक के नाम आने वाली चिट्ठियों को पढ़ते हुए, 1997-98 में ही यह जान गया था कि इस पेशे में गालियाँ सुनने की आदत डालकर ही रहा जा सकता है। सैकड़ों चिट्ठियों के बीच दो-चार गालियों वाली चिट्ठियों का होना सामान्य बात थी।

फिर 1999 में ‘अंतिका’ और 2006 में ‘बया’ का संपादन शुरू करने के बाद सीधे मेरे नाम भी ऐसे पत्र मिलने लगे जिनमें स्त्री जननेंद्रिय अंगों के साथ पत्र-लेखक मर्दानगी दिखाते होते। बाद के दिनों में ऐसे पत्र ईमेल और मैसेज के शक्ल अख्तियार कर लिए थे।

अब ऐसे पत्र अधिकतर मैसेंजर पर धड़ल्ले से आते हैं और उसके थोड़े ‘संस्कारित वर्जन’ झूठ और अफ़वाह के रूप धरकर फ़ेसबुक पोस्ट और कॉमेंट्स के बतौर भी जब-तब दिख जाते हैं। ऐसे व्यवहार के धनी अजनबी मात्र नहीं, कुछ पुराने मित्र और स्वनामधन्य लेखक भी होते हैं।

पहले ऐसे बेचारे प्राणियों के मनो-विकार विचलित करते थे, लेकिन अब उनकी कुंठाओं को समझने लगा हूँ। प्रसिद्ध मनोचिकित्सक और शायर सलमान अख्तर के कुछ इन्टरव्यू के वीडियो ऑनलाइन हैं, ऐसे पत्र-लेखक इनको सुनें तो शायद उनका दुख कुछ कम हो।

जहाँ तक ‘बया’ के लिए मेरे संपादन-कार्य में रचना पढ़ने और रचनाकारों को याद रखने की बात है, तो स्पष्ट कर दूँ कि सीमित संसाधन के कारण निर्णय में कई बार देर होती है और कुछ मेल नीचे चले जाने के कारण पढ़ने का क्रम रचना के आने के क्रम के अनुसार नहीं रह पाता। कभी-कभार मेल स्पैम में भी चले जाते हैं इसलिए रचनाकारों से मेरा आग्रह रहता है कि मेल करने के बाद एक मैसेज या कॉल कर वे सूचित कर दे सकते हैं।

स्वीकृति या अस्वीकृति जानने के लिए ई-मेल या मैसेज बेहतर उपाय है, कॉल पर सारी जानकारी देने में कई बार मैं इसलिए भी असमर्थ होता हूँ क्योंकि सब कुछ याद नहीं रहता।

बाक़ी आप पर है कि स्थिति को मानवीय तरीक़े से समझें या गाली देने वाले बेचारे प्राणियों की संख्या में बढ़ोतरी करें।

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