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क्या लंदन के लोग अखबार नहीं पढ़ते हैं?

अजय शर्मा-

भागते वक्त के साथ जब आप अपनी निजी और कारोबारी ज़िंदगी से जुड़ी बहुत सी बातें भूलने लगते हैं तो बड़े होते बच्चे आपको बहुत कुछ याद दिलाते हैं। अखबारी दुनिया से बाहर हुए 23 साल होने को आए लेकिन बेटी से उस दिन फोन पर हुई बातचीत में बहुत कुछ याद आ गया। उसने कहीं सोशल मीडिया पर लिखा तो मैंने सोचा अनुवाद करके मैं भी कहीं इस्तेमाल कर लूं –

“क्या लंदन के लोग अखबार नहीं पढ़ते हैं?

अगले हफ्ते जब सालाना छुट्टियों पर भारत पहुंचुंगी तो हर साल की तरह घर में काफी कुछ बदला-बदला सा मिलेगा, सिवाय अखबारों के ढेर के जो हमेशा की तरह घर के किसी कोने में लगा होगा। जब से होश संभाला है घर में अखबारों का कब्ज़ा देखा है। कोरोना के बाद ढेर में कुछ कमी तो आई है लेकिन अखबार जगत की कहानियां अब भी घर के हर कोने में फैली रहती हैं। हो सकता है कि ये महज़ संयोग हो लेकिन यहां लंदन में तो पिछले तकरीबन 2 बरसों में मैंने सार्वजनिक तौर पर किसी को अखबार खरीदते या पढ़ते ही नहीं देखा है।

वैसे कुछ लोगों के घरों में तो अवश्य ही आता होगा, लेकिन वेस्ट लंदन में अपने घर की बालकनी से हर सुबह देखती हूं तो मुझे कभी कोई अखबार वाला हॉकर नज़र ही नहीं आता है। एक-दो ऑफिसों में जाना हुआ तो वहां अखबार दिखे थे टेबल पर रखे। 2-3 बार बीबीसी गई इंटरव्यू देने तो हर बार लगा था कि वहां तो अखबार फैले होंगे लेकिन ऐसा नहीं दिखा। मेरे जितने भी अंग्रेज दोस्त हैं उनमें किसी के घर नियमित अखबार आता नहीं दिखता है और ना ही वो लोग कभी अखबारों की बात करते हैं। जबकि मेरे जेहन में तो लंदन की जो पहली तस्वीर है वो एक बस स्टॉप की है जहां बस का इंतज़ार कर रहे कुछ लोगों के चेहरे अखबार के पीछे छुपे हुए हैं।

टाइम्स, गार्डियन, टेलीग्राफ, डेली मेल, डेली एक्सप्रेस, स्कॉट्समैन ना जाने क्या-क्या नाम सुना करते थे। मेरे जन्म से पहले पापा अखबार में काम करते थे और बहादुर शाह ज़फर मार्ग पर कोने वाली बड़ी सी बिल्डिंग में उनका दफ्तर होता था। अखबारी ज़िंदगी के उनके तमाम किस्से मैंने भी सुने हैं। किस तरह रात 2 बजे आखिरी संस्करण छोड़ने के बाद पूरी टीम बाहर आ जाती थी जहां खाने-पीने के ठेलों का बाज़ार सजा होता था। चाय, मट्ठी, बिस्कुट, बटर टोस्ट, ऑमलेट, तरह-तरह के पराठे वगैरह। पान वाले अंकल भी तकरीबन उसी वक्त डीटीसी की आखिरी बस से घर लौट गये होते थे, पान के कुछ छोटे-बड़े पैकेट किसी भी ठेले वाले के पास छोड़कर। लोग आते थे और अपने पैकेट ले लेते थे।

ढाई पौने 3 बजे के आसपास पत्रकारों की टोली घर के लिए निकलती तो अखबार के सर्कुलेशन विभाग वाले आ जाते, अखबार ले जाने वाली गाड़ियां आ जाती, उनके चालक-परिचालक आ जाते और बाज़ार और ज़ोर पकड़ लेता। 24 घंटे आबाद रहने वाली उस सड़क के पराठे वाले एक सरदारजी तो आजकल दिल्ली के फूड ब्लॉगरों को काफी व्यूज़ देते हैं।

पापा बड़ी शान से आज भी बहादुर शाह ज़फर मार्ग की तुलना लंदन की फ्लीट स्ट्रीट से करते हैं। लेकिन मुझे तो लंदन के बहादुर शाह ज़फर मार्ग में ऐसा कुछ दिखा नहीं, हां हो सकता है कि उसकी कहानियां भी मेरे पापा की तरह तमाम लोगों के दिलों में ज़िंदा हों। काश उस वक्त का कोई पत्रकार मुझे मिले और बताए उस वक्त का हाल जो मैं पापा को बताऊं बाद में।

लंदन में अखबारों-पत्रिकाओं की कुछ दुकानें अब भी दिख जाती हैं लेकिन उनके अखबारों के स्टैंड शाम तक भी पूरे खाली नहीं होते हैं। शाम के कुछ अखबार मुफ्त में मिल जाते हैं जो आम तौर पर बस स्टॉप्स के पास रखे होते हैं। लेकिन मैंने कई बार उनको भी रात तक जस का तस रखे ही देखा है, कोई मुफ्त में भी नहीं लेता क्या। क्या पढ़ने का रिवाज़ खत्म हो गया है। लेकिन इस साल जनवरी-फरवरी में जब कई अखबारों और पत्रिकाओं में मेरे इंटरव्यू छपे थे तो मुझे कई लोगों ने सोशल मीडिया पर संपर्क किया। यानी अखबार पढ़े तो जाते हैं लेकिन पढ़ने वाले कम हो रहे हैं। वैसे मुझे तो लंदन की ट्यूब रेल में किसी गड़बड़ी या किसी क्राइम की खबर कई बार भारत के किसी हैंडल से ही मिलती है। अच्छी बात ये है कि सारे अखबारों के डिजिटल संस्करण मौजूद हैं लेकिन उनके शुल्क बहुत ही ज़्यादा है।

चलो मुझे तो घर पहुंचकर एक ही दिन में इतने अखबार दिख जाएंगे जितने लंदन में साल भर में नहीं देखे। और जब मैं पापा के साथ बहादुर शाह ज़फर मार्ग वाले उडुपी रेस्टोरेंट जाउंगी तो हो सकता है कि इस बार भी वहां फिर कुछ और नई कहानियां सुनने को मिलें अखबारों की।”

वरिष्ठ पत्रकार अजय शर्मा जी जनसत्ता में कार्यरत रहे हैं। यह लेख उनकी बेटी अनन्या ने लिखा है, जिसका यह हिंदी अनुवाद है।

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