गोरख आया, चेत मछन्दर

-सुभाष राय-

(संयोग से मैं कुछ वर्षों तक नाथपंथ में दीक्षित रहा हूँ। मेरे गुरु थे इलाहाबाद के चंद्रनाथ योगेश्वर । 1978 की बात है। तब मेरा नाम हो गया था सुभाषानंदनाथ। संत साहित्य पर मैंने शोध भी किया है। मेरे निबंधों की पुस्तक ‘जाग मछन्दर जाग’ के शीर्षक पर वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना कहते हैं कि ये मछन्दर कौन हैं, इन्हें लोग जानते नहीं । वैसे मैं उनकी इस बात से सहमत नहीं हूँ फिर भी थोड़ा बहुत जो मैं जानता हूँ, मछन्दरनाथ के बारे में, यहां बताने की कोशिश की है। कोई गलती हो तो मित्र सुधार सकते हैं।)

मत्येन्द्रनाथ, मछन्दरनाथ या मच्छन्द विभु एक ही व्यक्ति के अलग- अलग नाम हैं। वे आदिनाथ के शिष्य और नाथपंथ के प्रवर्तक योगियों में से एक थे। आदिनाथ अपने को शिव भी कहते थे। ऋषभनाथ को भी आदिनाथ कहा गया है। ये दोनों एक ही थे या अलग-अलग, ठीक से पता नहीं। आदिनाध का समय भी ठीक से ज्ञात नहीं है। उनके बारे में तमाम तरह की लोककथाएं भी प्रचलित हैं, जिनका तथ्यों से बहुत लेना-देना नहीं है। इन कथाओं में‌ कई जगह उन्हें भगवान शिव भी कहा गया है। अगर वे मछन्दरनाथ के गुरु थे तो बेशक आठवीं और नवीं शताब्दी के बीच हुए होंगे।

आचार्य अभिनव गुप्त ने अपनी रचनाओं में मच्छन्द विभु का आदरपूर्वक उल्लेख किया है। ये मच्छन्द विभु कोई और नहीं मत्स्येन्द्रनाथ या मछन्दरनाथ ही हैं। आचार्य अभिनव गुप्त के समय को लेकर कोई भ्रांति नहीं है। ईश्वर प्रत्यभिज्ञा सहित उनकी दो प्रख्यात रचनाएं 993 और 1015 ईसवी की मानी गयी हैं। अगर वे मत्स्येन्द्रनाथ को आदरपूर्वक स्मरण करते हैं तो जाहिर है मत्स्येन्द्रनाथ का समय 9वीं या 10वीं शताब्दी के बीच रहा होगा। यही मत्स्येन्द्रनाथ उर्फ मछन्दरनाथ गोरक्षनाथ उर्फ गोरखनाथ के गुरु थे। इस तरह गोरखनाथ का समय 10वीं, 11वीं शताब्दी के बीच कहीं ठहरता है।

कुछ लोगों ने गोरख की कबीर से वार्ता का भी उल्लेख किया है लेकिन यह गल्प के अलावा कुछ और नहीं है। कहते हैं कि मछन्दरनाथ परवर्ती काल में शायद गोरख को शिष्य बनाने के बाद अपनी साधना पद्धति से विचलित हो गये थे या फिर तांत्रिकों के प्रभाव में पंचमकार साधना के रास्ते पर चल पड़े थे।

गोरखनाथ को गुरु का यह विचलन अच्छा नहीं लगा और उन्होंने मछन्दरनाथ को समझाया, चेतावनी भी दी। यह जानकारी ‌नहीं मिलती है कि मछन्दरनाथ पर अपने शिष्य की चेतावनी का कोई असर हुआ था या नहीं लेकिन गोरखनाथ के इस साहस की साहित्य के क्रांतिकाल ( भक्तिकाल के लिए यह नाम मुझे ज्यादा सार्थक लगता है) में बहुत सराहना की गयी। गोरखनाथ का वह पद बहुत मशहूर है। कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं…

ना कोई बारू , ना कोई बँदर, चेत मछन्दर,
आप तरावो आप समंदर, चेत मछन्दर
निरखे तु वो तो है निंदर, चेत मछन्दर चेत !
धूनी धाखे है अंदर, चेत मछन्दर
कामरूपिणी देखे दुनिया देखे रूप अपारा
सुपना जग लागे अति प्यारा चेत मछन्दर !
सूने शिखर के आगे आगे शिखर आपनो,
छोड छटकते काल कंदर , चेत मछन्दर !
साँस अरु उसाँस चला कर देखो आगे,
अहालक आया जगंदर, चेत मछन्दर !
देख दीखावा, सब है, धूर की ढेरी,
ढलता सूरज, ढलता चंदा, चेत मछन्दर !
चढो चाखडी, पवन पाँवडी,जय गिरनारी,
क्या है मेरु, क्या है मंदर, चेत मछन्दर !

गोरखनाथ की परम्परा 16 वीं शताब्दी के सिद्ध योगी पृथ्वीनाथ तक अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ चली आती दिखायी पड़ती है। नाथपंथी आचार्य किसी जगह ठहरकर रहने की जगह निरंतर चलते रहते थे। मन मानै तो संगि फिरै, निहतर फिरै अकेला। वे इस सत्य को जान गये थे कि किसी मंदिर में, मठ में या आश्रम में रुकने पर ऐसे अवसर आ सकते हैं जो नैतिक पतन की संभावनाओं की ओर ढकेल दें।

गोरख से बहुत प्रभावित थे भर्तृहरि। वे अपनी पत्नी के आचरण से क्षुब्ध होकर संन्यासी हो गये थे। गोरखनाथ की निरंतर फिरे अकेला की दृष्टि बाद में एक रूढ़ परम्परा की तरह नाथपंथी मठों में अख्तियार की जाती रही। शायद अब भी सारंगी लिये भगवा जोगी घूम-घूम वैराग्य और योग के गीत गाते रहते हैं। गोरखनाथ से कबीर ने बहुत कुछ लिया है।

गोरखनाथ एक साफ-सुथरे, नैतिक और मानवीय समाज के पक्षधर थे और घूम-घूम ऐसे पाखंडियों, धूर्तों की खबर लेते रहते थे, जो समाज मे जहर बोते हैं, छल करते हैं, लोगों को ठगते हैं। यह काम वे किसी मठ का महंत बनकर नहीं कर पाते, किसी सल्तनत के सुलतान बनकर भी नहीं।

नाथ का मतलब दूसरों का नाथ, दीनानाथ, जगन्नाथ या प्रजानाथ बनने से कतई नहीं है, वह तो अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं, अपने भीतर की बुराइयों का नाथ है, अपना स्वामी है। पर अब वह बात कहां। अब तो अपने नाथ बने न बने, अनाथों के भी नाथ न बने, किसी वैभवसम्पन्न मठ के नाथ बन जायें, किसी सत्तातंत्र के नाथ बन जायें, यह महत्वाकांक्षा ज्यादा महत्वपूर्ण हो गयी है। नाथयोग की परम्परा जहां तक पहुंच गयी है, एक बार फिर गोरखनाध की अपने गुरु को दी गयी चेतावनी याद आती है। गोरखनाथ होते तो अपने शिष्यों को आज भी वैसे ही फटकारते। हलचल मचा देते। कहते…

गोरख आया !
आँगन आँगन अलख जगाया, गोरख आया!
जागो हे जननी के जाये, गोरख आया !
भीतर आके धूम मचाया, गोरख आया !
आदशबाद मृदँग बजाया, गोरख आया !
जटाजूट जागी झटकाया,गोरख आया !
नजर सधी अरु, बिखरी माया,गोरख आया !
नाभि कँवरकी खुली पाँखुरी, धीरे, धीरे,
भोर भई, भैरव सूर गाया, गोरख आया !
एक घरी मेँ रुकी साँस ते अटक्य चरखो,
करम धरमकी सिमटी काया,गोरख आया !
गगन घटामेँ एक कडाको,बिजुरी हुलसी,
घिर आयी गिरनारी छाया,गोरख आया !
लगी लै, लैलीन हुए, सब खो गई खलकत,
बिन माँगे मुक्ताफल पाया, गोरख आया !

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार सुभाष राय की एफबी वॉल से।

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