नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने द हिंदू में पहले काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार महेश लांगा को धोखाधड़ी से जुड़ी दो एफआईआर के आधार पर दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अंतरिम जमानत दे दी है। लांगा को इससे पहले 7 अक्टूबर 2024 को जीएसटी धोखाधड़ी के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था, जबकि 20 फरवरी 2025 को उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार किया था।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ लांगा की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
अंतरिम जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर कई शर्तें लगाईं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि—
- लांगा PMLA के तहत विशेष अदालत के निर्देशानुसार जमानत बांड जमा करेंगे।
- विशेष अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह नौ गवाहों के बयान दिन-प्रतिदिन के आधार पर दर्ज करे।
- याचिकाकर्ता और उनके वकील को ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में पूरा सहयोग करना होगा। इस आधार पर स्थगन नहीं दिया जाएगा कि मामला रद्द करने की याचिका हाईकोर्ट में लंबित है।
- याचिकाकर्ता, अहमदाबाद स्थित स्पेशल जज के समक्ष लंबित आरोपों से जुड़े किसी भी मामले पर, अखबार में असिस्टेंट एडिटर के पद पर रहते हुए कोई लेख प्रकाशित या लेखन नहीं करेंगे। हालांकि, उन्हें अपनी आपत्तियां या अतिरिक्त सामग्री रिकॉर्ड पर रखने की स्वतंत्रता होगी।
- प्रवर्तन निदेशालय को इन शर्तों के अनुपालन को लेकर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
पीठ ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि अंतरिम राहत का दुरुपयोग हुआ, तो जमानत आदेश वापस लिया जा सकता है।
पत्रकार महेश लांगा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा, जबकि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने मुकदमे में देरी के लिए लांगा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वह आरोप तय करने की प्रक्रिया को यह कहकर टालना चाहते हैं कि कार्यवाही रद्द करने की उनकी याचिका हाईकोर्ट में लंबित है।
इसका खंडन करते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि ED आरोपी द्वारा मांगे गए आवश्यक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं करा रही है। उन्होंने अदालत के समक्ष उन दस्तावेज़ों की सूची भी पेश की, जो अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल ने इस दावे से असहमति जताई।
सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि PMLA की धारा 45 की दोहरी जमानत शर्तें लागू नहीं होतीं, क्योंकि कथित धनराशि एक करोड़ रुपये की सीमा से कम है। इसके जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने दावा किया कि मामले में शामिल रकम एक करोड़ रुपये से अधिक है।
इस पर सिब्बल ने कहा कि ED ने इससे संबंधित कोई ठोस दस्तावेज़ रिकॉर्ड पर नहीं रखे हैं और शिकायत केवल 68 लाख रुपये की राशि को लेकर दायर की गई है, जिसमें कोई स्पष्ट प्रेडिकेट ऑफेंस भी नहीं दिखाया गया है। ED ने जवाब में कहा कि सभी दस्तावेज़ शिकायत के साथ संलग्न हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने स्पष्ट किया कि वह इस पहलू पर टिप्पणी नहीं करेगी, क्योंकि यह ट्रायल का विषय है। कोर्ट ने कहा कि सच सामने आने का एकमात्र तरीका मुकदमे की कार्यवाही है, इसलिए दिन-प्रतिदिन सुनवाई के निर्देश दिए गए हैं।
अंतरिम जमानत दिए जाने का सॉलिसिटर जनरल ने विरोध किया और कहा कि “पत्रकारों द्वारा पैसे की उगाही एक गंभीर अपराध है।” इस पर कपिल सिब्बल ने पलटवार करते हुए कहा कि “उद्योगपतियों द्वारा पत्रकारों को निशाना बनाना भी उतना ही गंभीर है।”
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत देते हुए मामला जनवरी में आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।



