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सुख-दुख

महिला IAS ने कहा कि वे ‘यौन हमले’ के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार रखती हैं!

रंगनाथ सिंह-

महिलाएँ जाएँ तो जाएँ कहाँ?

पिछले साल मेरे एक IAS मित्र ने बताया कि उनकी एक सहकर्मी IAS महिला कहती हैं कि वो इस बात के लिए मानसिक रूप से रेडी रहती हैं कि उन पर कभी भी “यौन हमला” हो सकता है! यह छोटी सी बात मेरे लिए इतनी शॉकिंग थी कि आज तक दिमाग में नाचती रहती है।

वेंटीलेटर पर इलाज करा रही मॉडल से लेकर स्पोर्टस वुमेन बनने के लिए रोज ग्राउण्ड जाने वाली महिला से लेकर अन्य तमाम तरह की महिलाओं के केस पूरे देश में जिस तरह आते जा रहे हैं, उसे देखकर मुझे अब खुद लगने लगा है कि हर औरत “सेक्सुअल असाल्ट” और मर्दों की मूक गुलामी के साये के तहत जी रही है!

देश की बहुत सारी फर्जी और दोगली नारीवादियाँ राजनीतिक दलों और अन्य संगठनों की तन-मन-धन से गुलाम बन चुकी हैं। उनकी देह वहीं विरोध प्रदर्शन के लिए खड़ी होती है जहाँ के लिए उन्हें आदेश मिलता है। उनका मन वहीं बगावत में मुट्ठी उठाता है जहाँ के लिए उन्हें अनुमति मिली हुई है। उनका धन वहीं खर्च होता है जहाँ उनके निजी सुख निहित हैं।

पिछले तीन-चार साल में महिलाओं के संग अपराध के जितने भी मामले मेरी नजर में आए हैं उनमें सबसे अलग एंगल है सोशल मीडिया के माध्यम से लड़कियों से दोस्ती करना और फिर उन्हें अपराध का शिकार बनाना। टीनएज में यौन आकर्षण स्वाभाविक है मगर अब ये आकर्षण गली-मोहल्ले-स्कूल के लड़कों के प्रति होने के बजाय सोशल मीडिया से विकसित हो रहा है। यानी पीड़िताएँ इन लड़कों को ठीक से जानती तक नहीं थीं। उनकी पृष्ठभूमि इत्यादि जानने का सवाल ही नहीं उठता है। न ही लड़कों पर अपने परिवार, पड़ोस और समाज का दबाव रहता है। वरना ऐसे कैसे हो सकता है कि कोई लड़का किसी लड़की को पसन्द करता है और उसे किसी लूट के सामान की तरह अपने साथियों के बीच बाँट सकता है! ऐसी सोच बर्बर कबीलाई कही जाती थी मगर ये लड़के हजार साल पहले के किसी बर्बर पिछड़े कबीले के सदस्य नहीं हैं बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक देश के निवासी हैं।

सिनेमा, वेबसीरीज, मीडिया और साहित्य ने यौनिकता को लेकर देश की एक बड़ी आबादी की सोच बदल दी है। सम्बन्धों को लेकर 1990 से पहले पैदा हुई और उसके बाद पैदा हुई पीढ़ी के नजरिए में युगांतकारी परिवर्तन देखा जा सकता है। नई पीढ़ी के लिए यौन सुख और शराब की बोतल में ज्यादा अन्तर नहीं रहा! एक-दो केस की बात होती तो इसे अपवाद माना जा सकता था मगर देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी वारदात लगातार सामने आ रही हैं जिसमें लड़कों ने लड़कियों को फुसलाकर फँसाया और उसे उसी तरह अपने बर्बर साथियों के साथ शेयर किया जैसे वे शराब या सिगरेट करते होंगे!

ऐसा नहीं है कि महिला को सिगरेट या शराब की तरह ट्रीट करने वाले नई उम्र के लड़के हैं। अधेड़ और बूढ़े भी घटिया साहित्य और सिनेमा पढ़-पढ़ कर अपने आसपास की महिलाओं को मानसिक संत्रास में जीने के मजबूर कर रहे हैं। यहाँ संत्रास का मतलब “घूरना”, “असहज तरीके से देखना” या हल्के बैड टच से उपजी असहजता की बात नहीं कर रहा। मैं गम्भीर किस्म के यौन अपराधों से उपजे संत्रास की बात कर रहा हूँ। मसलन, एंकर बनना है तो एडिटर के संग सोना होगा! असिस्टेंट प्रोफेसर बनना है तो फलाना के संग सोना होगा, या ऐसी ही अन्य शर्तें! आप समझ सकते हैं कि यह स्थितियाँ सामान्य वेश्यावृत्ति से भी ज्यादा अपमानजनक होती होंगी क्योंकि उसमें वनटाइम की डील है। पीड़िता अपने शोषत को अगले दिन देखने को मजबूर नहीं होती और उसमें पीड़िता की अन्य योग्यताओं के प्रति अविश्वास नहीं पैदा होता। न उसके आसपास के लोग लम्बे समय तक उसे याद दिलाते होंगे कि तुम इस योग्य नहीं हो मगर तुम्हें इसलिए यह पद मिला है!

ऐसे मसलों को उठाने पर कुछ लोग उन महिलाओं का सवाल उठाते हैं जो इस तरह की मर्दाना व्यवस्था की लाभार्थी हैं या वे मर्दों को छिछली यौनिकता का इस्तेमाल करना सीख जाती हैं। ऐसी किसी महिला को मैं बहुत ज्यादा दोषी नहीं मानता क्योंकि ऐसी ज्यादातर महिलाएं पॉवर पोजिशन में नहीं होती हैं बल्कि उनके सामने कोई ऐसा मर्द होता है जो उनसे ज्यादा उम्रदराज और समर्थ और उच्च पदासीन होते हैं। मसलन मोनिका लेविंस्की 20-22 साल की वल्नरेबल युवती थी मगर उसके सामने पैंट उतारना बिल क्लिंटन तो अमेरिका का राष्ट्रपति था! अमेरिका कैसा देश है जो ऐसे लंपटों को राष्ट्रपति बना देती है जो देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचकर भी अपने आसपास की महिलाओं को सेक्स टॉय समझते हैं! और अब तो अमेरिका इस मामले में क्लिंटन लेवल से काफी आगे बढ़ चुका है। मगर सवाल ये है कि क्या हिलेरी क्लिंटन की आत्मा मर गयी थी! जो इतने बड़े खुलासे के बाद भी उसी क्लिंटन के साथ चुनाव में हाथ हिलाती रही क्योंकि उसे राष्ट्रपति बनना है! उप-राष्ट्रपति तो वह बन भी गईं!

अगर महिला को Consumerr Goods समझने वाली सोच नीचे से ऊपर तक व्याप्त नहीं होती तो एक IAS महिला ऐसा न कहती कि वह यौन हमले के लिए मानसिक रूप से तैयार रहती है! यह समस्या का एक साइड है। इसका दूसरा साइड ये है कि दुनिया में महिलाओं को पालतू गाय-बकरी जैसा पालूत जानवर समझने की मानसिकता भी बढ़ती जा रही है। इस सिस्टम में महिला का जन्मजात उद्देश्य “मर्द को खुश करना है” तभी उसे जन्नत मिलेगी! अभी कुछ समय पहले पश्चिमी एशिया के एक देश में यह व्यवस्था लायी गयी कि 9 साल की बच्चियों को भी मर्दों को खुश करने की स्लेवरी में झोंका जा सकता है! मर्द चाहे तो एक नहीं चार बकरी पाल सकता है और उसका जैसे चाहे वैसे इस्तेमाल कर सकता है।

इस व्यवस्था की विडम्बना ये है कि इसे अब भारत समेत तमाम देशों में वामपंथियों और लिबरलों का केस टू केस बेसिस मौन या मुखर समर्थन हासिल है। इनका घटिया डिफेंस ये है कि ये उनके “रिलीजन का इंटर्नल मैटर” है! इंटर्नल मैटर माई फुट। मर्दों की बनायी ऐसी इनटर्नल मैटर की जेलों को देखकर मुझे देवी काली का प्रतीक रिलेवेंट और आज भी अप्लीकेबल प्रतीत होता है। मेरे ख्याल से दुनिया भर की महिलाओं को सारे रिलीजन छोड़कर खुद को शक्ति का उपासक घोषित कर देना चाहिए। जो मर्द गॉड महिलाओं को भेड़-बकरी समझता हो उसे देवलोक में जाकर देवी काली ही सबक सिखा सकती हैं। शायद यही कारण है कि ज्यादातर हिन्दू देवी-देवता बिना पत्नी के कहीं नहीं जाते! भगवान के मन में भी पत्नी का भय होना जरूरी है नहीं तो वे ऐसी दुनिया बना देंगे जिसमें महिलाएँ असुरक्षित रहेंगी!

एक समय था कि मैं मृत्युदण्ड को लेकर संशय में रहता था मगर अब मैं इसका समर्थक हूँ चुका हूँ। जो व्यक्ति दूसरों के जीने के अधिकार का सम्मान नहीं करता वह अपने जीवन का अधिकार उसी वक्त खो देता है। दुष्ट व्यक्ति अच्छे व्यक्ति की अच्छाई का अपने अपराध को अंजाम देने के लिए करने से कभी नहीं हिचकता। कल ही एक वीडियो वायरल था जिसमें एक दुष्ट किसी लड़की को कह रहा था कि वह जेल काटकर आया है इसलिए पुलिस से नहीं डरता! इतिहास गवाह है कि बर्बर सोच वाले अपराधी केवल और केवल डर की भाषा समझते हैं! अगर उनके मन में डर न हो तो वे अन्य लोगों को दिन-रात डर के साये में जीने को मजबूर करते रहेंगे!

एक बार फिर महिलाओं से अपील करूँगा कि वे महिला मुद्दों पर पोलिटिकल पार्टी, जाति, रिलीजन, प्रदेश इत्यादि की छोटी बाउंड्री से ऊपर उठकर एक महिला की तरह सोचें। मर्दों से अपील है कि वे कृपया कमेंट बॉक्स में उन महिलाओं की सूची न दें जो कानून इत्यादि का दुरुपयोग करके पुरुषों को प्रताड़ित कर रही हैं। निस्संदेह ऐसी महिलाएँ अपराधी हैं मगर उनको सजा देने के प्रावधान हमारे पास पहले से हैं मगर बिके हुए जज-वकील-पेशकार-सिपाही-थानेदार इत्यादि पीड़ित का खून पीने की अपनी गन्दी आदत छोड़ नहीं पाते हैं इसलिए कई पुरुष अमानवीय हद तक पीड़ित हो जाते हैं। अतः एक अपराध को दूसरे अपराध को छिपाने का जरिया न बनाएँ। यह आपराधिक मानसिकता के लक्षण हैं।

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