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आज के अखबार : ममता बनर्जी के आरोप, भाजपा भय और विभाजन की राजनीति करती है को महत्व नहीं

संजय कुमार सिंह

एसआईआर की घोषणा और कल उसे लीड बनाने वाले कई अखबारों ने आज प्रभावित राज्यों तथा विपक्ष की नेताओं में एक, ममता बनर्जी के बयान को महत्व नहीं दिया है। कायदे से आज एसआईआर की घोषणा पर नेताओं-जनता की प्रतिक्रिया प्रकाशित की जानी चाहिए थी। मेरा मानना है कि एसआईआर के साथ बिहार में जो सब हुआ उसके बाद उसे देश भर में जारी करने का कोई कारण नहीं है। जबरदस्ती जारी रखने के लिए आवश्यक प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है और लोगों की सलाह-सुझाव के लिए कोई कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। जिसी लाठी उसकी भैंस जैसी स्थिति हो गई है। ऐसे में एसआईआर की घोषणा के बाद पश्चिम बंगाल के खरदा में एक व्यक्ति, प्रदीप कार की मौत (आत्महत्या) की खबर (द टेलीग्राफ) भी महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी के बयान, भय और विभाजन की राजनीति करती है भाजपा (देशबन्धु)  पर्याप्त महत्वपूर्ण है और आबादी के जिस वर्ग का वे प्रतिनिधित्व कर रही हैं उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वह वोट नहीं हो तब भी। अभी तो उसका वोटर होना ही तय किया जाना है और आत्महत्या की शुरुआत हो चुकी है। इससे पहले की खबरों के अनुसार गुड़गांव से सभी बांग्लाभाषियों को खदेड़ दिया गया है, बांगला बोलने के कारण उन्हें गलत ढंग से बांग्लादेशी कहा गया और एक गर्भवती महिला को जबरन बांग्लादेश भेज दिया गया है जबकि वह भारत की नागरिक है। अदालत ने सरकार को उसे वापस लाने का आदेश दिया है और यह सब तब है जब बांग्लादेशियों या घुसपैठियों को वापस भेजने का भाजपा सरकार का रिकार्ड इससे पहले की मनमोहन सरकार के मुकाबले बहुत खराब है। इसलिए ममता बनर्जी के इस आरोप में भी दम है कि एसआईआर असल में पिछले दरवाजे का एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) है। दूसरी ओर, कथित बांग्लादेशियों को वापस भेजने से यहां वे जिनके लिए जो काम करते थे उसके लिए काम करने वाले नहीं मिलेंगे और वे बेरोजगारी की मुश्किलें झेलेंगे सो अलग।  

कहने की जरूरत नहीं है कि यह बड़ा मामला है। देश भर के नागरिकों के बड़े वर्ग को प्रभावित करेगा और जनता के पैसे तो खर्च होंगे ही। ऐसे में इसे नोटबंदी या जीएसटी की तरह एक व्यक्ति की इच्छा या उपयोगी मानने से चालू अंदाज में लागू नहीं किया जा सकता है। खासकर पुराने अनुभवों के बाद और अब इस खुलासे के बावजूद कि यह व्यक्ति जो देश का प्रधानमंत्री भी है, संभवतः वोट चोरी से कुर्सी पर है और चुनाव आयोग को काबू में रखने का मकसद न सिर्फ वोट चोरी के आरोपों की जांच नहीं होने देना हो बल्कि एसआईआर और ऐसी दूसरी कार्रवाई से भाजपा की मदद करना भी हो सकता है। चुनाव आयोग इन सब बातों को नहीं मान या समझ रहा है तो सरकार में प्रधानमंत्री के सहयोगियों का काम है कि वे उन्हें समझाएं कि जनता को प्रभावित करने वाले ऐसे निर्णयों पर विचार की जरूरत है। चुनाव आयोग ‘स्वतंत्र’ होगा पर एसआईआर के लिए खर्च तो भारत सरकार को ही देना है और भारत सरकार हमेशा इसके लाभ या उद्देश्य के बारे में पूछ सकती है। पैसे देने की प्राथमिकता तो तय कर ही सकती है। इसलिए स्थिति बिगड़ भी गई हो तो अखबारों में कायदे की खबरों से सरकार पर दबाव बन सकता है और उसे सोच समझ कर निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जा सकता है। वैसे भी अब ‘बहुमत’ पहले जैसा नहीं है और यह सरकार के सहयोगियों, बैसाखी बनी पार्टियों तथा उसके नेताओं को भी पूछना चाहिए। यह सब हो इसके लिए जरूरी है कि मीडिया अपना काम ठीक से करे। पर वह सब होता नजर नहीं आ रहा है।  

दूसरी ओर, भाजपा सरकार का सहयोग और उसका प्रचार साफ-साफ दिख रहा है। यह विज्ञापनों में भी है। जीएसटी कम होने का प्रचार कॉरपोरेट भारत ने कैसे किया – हम सबने हाल में देखा है। विज्ञापन और प्रचार के बाद जो होता है उसकी खबर नहीं छपती है या बहुत कम छपती है। जैसे, हाल में खबर थी कि उत्तर प्रदेश में सात एयरपोर्ट उद्घाटन के बाद बंद हो गए हैं। जाहिर है इन पर खर्च हुआ पैसा बेकार गया। जरूरत का पूर्वानुमान सही नहीं था और प्रचार तो किया ही गया था। दैनिक भास्कर की एक खबर के अनुसार इनमें से छह का उद्घाटन प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव से पहले किया था। इनमें कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी है। लेकिन यहां से कोई फ्लाइट विदेश नहीं गई और हवाई अड्डा बंद हो गया। ऐसे में हरेक नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह सरकार के काम पर नजर रखे और सरकारी धन की बर्बादी रोके। खुद प्रधानमंत्री ने ऐसे इतने काम कर रखे हैं कि उन्हें सजा अधिकतम ही होनी है और इसीलिए वे, ‘झोला उठाकर चल दूंगा’ के बावजूद कुर्सी से चिपक गए हैं और चुनाव आयुक्त को कानून के रूप में ऐसा कवच दिया है कि वे अपने कार्यों के लिए अपराधी नहीं ठहराए जा सकते हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि देश की स्थिति कैसी है और फिर भी सरकार का प्रचार चल रहा है। उदाहरण के लिए आज क्लाउड सीडिंग की खबर लगभग सभी अखबारों में है। अमर उजाला में तो यह छह कॉलम में फैला हुआ है। मैं इस तकनीक के बारे में नहीं जानता था। कृत्रिम बारिश के बारे में सुन रखा था पर वह सब यज्ञ आदि से होता है। वैज्ञानिक तरीकों पर इस सरकार में कुछ सुना नहीं। इसलिए नवोदय टाइम्स ने टॉप की फोटो और खबर के साथ यह भी बताया है कैसे होती है कृत्रिम बारिश। मुझे लगता है कि जब कामयाबी नहीं मिली तो यह बताया जाना चाहिए था कामयाबी क्यों नहीं मिली, कितने पैसे बेकार गए या क्या अनुभव हासिल हुआ आदि। पर आलोचनात्मक होने के अपने संकट हैं और पद्म विजेताओं में शामिल होने वालों से नाम कट जाएगा वह अलग मुद्दा है।

इंडियन एक्सप्रेस ने आज पहले पन्ने पर पटना के छठ घाट की चार कॉलम की फोटो छापी है। दिल्ली में नकली यमुना के बारे में पहले पन्ने पर ना कल कुछ था न आज है। वह सोशल मीडिया का मुद्दा ही रह गया और उसी से काम हो गया। इसलिए वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने आम आदमी पार्टी के नेता, सौरभ भारद्वाज को पत्रकारिता का राम नाथ गोयनका पुरस्कार देने की सिफारिश की है। वैसे भी आजकर पुरस्कार वाली पत्रकारिता हो कहां रही है। जो भी हो, आज इंडियन एक्सप्रेस में बिहार चुनाव की खबरें भी एक नहीं, दो हैं। एक के जरिए बताया गया है कि छठ के मौके पर महिला श्रद्धालुओं की नजर अभी भी नीतिश पर है। एक व्रती से बातचीत करके बताया गया है कि (बिहार में) सारा विकास नीतिश के कार्यकाल में हुआ है। दूसरी खबर प्रशांत किशोर से दो जगह वोटर के रूप में नाम होने पर चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण मांगने पर है। तथ्य यह है कि ऐसा नोटिस तेजस्वी को भी दिया गया था, दिल्ली में पवन खेड़ा को भी दिया गया था। दूसरी ओर, कल ही मैंने लिखा था कि मुख्य चुनाव आयु्क्त ने कहा है कि मतदाता सूची में दो जगह नाम होना जांचने वाले सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं है। जाहिर है, आयोग अपना काम ठीक नहीं कर रहा है और मतदाताओं की आपराधिक मानसिकता पर अनुसंधान करता लग रहा है। हालांकि, वह भी वीआईपी मतदाताओं के मामले में ही। नोटिस तो राहुल गांधी को भी था और अनुराग ठाकुर को नहीं था। इसलिए यह खबर भले हो, पहले पन्ने के लायक तभी हो सकती है जब इसपर हाइड्रोजन बम जैसा कुछ हो। इससे इंतजार कर रहे लोगों का मनोरंजन होता रहे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने क्लाउड सीडिंग की खबर को लीड बनाया है और बताया है कि यह सब आईआईटी कानपुर के सेसना विमान से किया गया। दूसरी कोशिश के बाद आईआईटी कानपुर ने इस संबंध में बयान भी जारी किया। यह संयोग है कि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त, इसी शिक्षा संस्थान के पढ़े हुए हैं और हाल में डुपलीकेट वोटर पकड़ने वाले सॉफ्टवेयर की जरूरत न होने की दलील देकर अपने ही संस्थान के एक पूर्व छात्र की शिकायत के पात्र रहे हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने आठवें वेतन आयोग के गठन की खबर को लीड बनाया है। सेकेंड लीड बिहार चुनाव के लिए विपक्ष (या इंडिया गठबंधन) की चुनावी घोषणाओं का जिक्र करते हुए शीर्षक में डोल्स शब्द का उपयोग किया है। अंग्रेजी का डोल्स हिन्दी में खैरात, भीख या दान है। विपक्ष की सरकार ऐसा कुछ दे तो नरेन्द्र मोदी रेवड़ी कहते हैं। खुद देना हो तो यह सम्मान राशि या ऐसा ही कुछ हो सकती है। मुफ्त भोजन तो संघ परिवार की भूतो न भविष्य जैसी योजना के रूप में प्रचारित और स्वीकार्य है। हाल में बिहार की महिलाओं से 75 लाख वोट खरीदने के लिए प्रत्येक को 10 हजार रुपये के अग्रिम भुगतान की खबर छप चुकी है और यह चुनाव आयोग के लिए मुद्दा नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए विपक्ष का डोल्स है तो यह स्वतंत्र पत्रकारिता है। मेरी समझ से इसके लिए सीडिंग 80-90 के दशक में हुई थी जो अब फल दे रहे हैं और इसमें क्लाउड सीडिंग की खबर करना और नहीं करना शामिल है। द हिन्दू की लीड आंध्र प्रदेश में समुन्द्री तूफान मोंथा की खबर है। दि एशियन एज ने दिल्ली के टर्मिनल थ्री पर जेट विमान के पास एक बस में आग लगने की खबर प्रमुखता से छापी है। इससे पहले बसों में आग लगने की भिन्न घटनाओं के मद्देनजर इसका भी महत्व है। इसमें किसी के घायल होने की खबर नहीं है इसलिए इसे आज दूसरे अखबारों में महत्व नहीं मिला होगा। सच्चाई यह है कि बसों में आग लगने की लगातार घट रही घटनाएं इसे महत्वपूर्ण और बड़ी खबर बनाती है। लेकिन किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। इन खबरों में यह नहीं है कि बिहार के लिए इंडिया गठबंधन के चुनावी घोषणापत्र को तेजस्वी प्रण कहा गया है और यह स्विस बैंक से पैसे वापस आएंगे तो सबको 15 लाख मिलेंगे – जैसा जुमला नहीं है। प्रण की तरह ही पेश किया जा रहा है। खबर में दि एशियन एज के फ्लैग शीर्षक में दिखा। घोषणा पत्र जारी करते हुए तेजस्वी का कहा, प्रण को प्राण खोकर भी पूरा करेंगे – इसे द टेलीग्राफ ने खबर में लिखा है। जाहिर है, मैंने सभी खबरें नहीं पढीं लेकिन इटैलिक्स में होने के कारण दिख गई जो दूसरे अखबारों में नहीं दिख रही है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, ‘तेजस्वी प्रण’ : हर परिवार में एक नौकरी का वादा। यह देशबन्धु की लीड का भी शीर्षक है।      

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूलचूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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