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नाकामी छुपाने के लिए 2019 चुनाव में राम मंदिर कार्ड खेलेगी भाजपा

राम मंदिर मुद्दे पर मोदी की गंभीरता को समझने में भारी भूल कर रहा मीडिया!  2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से मीडिया में राम मंदिर पर चर्चा होती रही है। यूपी में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये चर्चा आम हो गई है। अक्सर टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर, पत्रकार, मुस्लिम धर्मगुरू, बुद्धिजीवी जब खुले तौर पर  मंदिर कब बनेगा या निर्माण की तारीख बताने जैसे असहज सवालों पर सरकार के प्रवक्ताओ को घेरने की कोशिश करते हैं तो शायद इन सभी महानुभावों को ये समझ मे नहीं आता कि अगर वाकई में इन्हें तारीख बता दी गयी तो इन्हें न्यूज़रूम से सीधे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ेगा।

राम मंदिर मुद्दे पर मोदी की गंभीरता को समझने में भारी भूल कर रहा मीडिया!  2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से मीडिया में राम मंदिर पर चर्चा होती रही है। यूपी में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये चर्चा आम हो गई है। अक्सर टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर, पत्रकार, मुस्लिम धर्मगुरू, बुद्धिजीवी जब खुले तौर पर  मंदिर कब बनेगा या निर्माण की तारीख बताने जैसे असहज सवालों पर सरकार के प्रवक्ताओ को घेरने की कोशिश करते हैं तो शायद इन सभी महानुभावों को ये समझ मे नहीं आता कि अगर वाकई में इन्हें तारीख बता दी गयी तो इन्हें न्यूज़रूम से सीधे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ेगा।

जो नेता  नोटबन्दी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे दुस्साहसी निर्णय लेने की हिम्मत रखता है और उसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर सकता हो तो उसे  मंदिर बनाने में क्या दिक्कत हो सकती है। नोटबन्दी के नकारात्मक परिणामों को लेकर विपक्ष 8 नवम्बर से  आज तक मोदी को कभी घेर नहीं पाया क्योंकि देश की जनता मोदी के लिए ढाल बनकर खड़ी थी। मोदी को इस बात का आकलन जरूर था कि नोटबन्दी जैसे फैसले अपनी लोकप्रियता के चरम पर ही लिए जा सकते हैं अन्यथा इसके परिणाम वेनेजुएला या इमरजेंसी जैसे हो सकते थे।
वर्तमान परिस्थितियों में इस मुद्दे पर मोदी बहुत सावधानी से एक-एक कदम बढ़ा रहे है।

केंद्र राज्य दोनों में ही उनकी सरकार होने से उन पर मंदिर निर्माण के वादे का भारी दबाव है इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार है। एक ठोस आधार के जरिये वे 2019 चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे कि अगर उन्हें अगला कार्यकाल मिलता है तो मंदिर निर्माण के वादे को वो अंजाम तक पहुचाएंगे। सभी को विदित है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले को भी एक पक्ष या दोनों ही पक्ष कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यानी इस मुद्दे को लंबे समय तक लटकाने की कवायद आगे भी जारी करने का भरपूर प्रयास होगा। लेकिन अगर सरकार मुखर एवं प्रतिबद्ध हो तो इस मामले को लटकाना बिल्कुल आसान नहीं होगा।

देश का मीडिया मोदी के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी उनके निर्णयों को समझने में नाकाम रहा है। उनके निर्णय लगातार मीडिया के आकलन के बिल्कुल उलट साबित होते रहते हैं। शायद 2019 चुनाव तक मीडिया का सिर चकरा जाए। मोदी का योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उनके गूढ़ निहितार्थ है। वे गुजरात की तरह यूपी को भी हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना  चाहते हैं। उनके कार्यकाल में अगर अनेक बाधाओं के बाद भी अगर राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रशस्त होता  है तो वे सीधे-सीधे देश के 80% हिन्दू जनमानस के दिलों पर स्थायी तौर पर राज करेंगे। बंगाल, केरल जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में जहाँ लम्बे समय से बीजेपी सत्ता पाने का ख्वाब देख रही है, वहाँ उसका आधार बनाना  बेहद आसान होगा। बेरोजगारी, महंगाई, गिरती विकास दर जैसे अनेक मुद्दों पर घिरी सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए 2019 चुनाव में 2014 की तरह ध्रुवीकरण के लिए  हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने के लिए राम मंदिर का मुद्दा सबसे  उपयुक्त मानती है।

अभय सिंह
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