नाकामी छुपाने के लिए 2019 चुनाव में राम मंदिर कार्ड खेलेगी भाजपा

राम मंदिर मुद्दे पर मोदी की गंभीरता को समझने में भारी भूल कर रहा मीडिया!  2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से मीडिया में राम मंदिर पर चर्चा होती रही है। यूपी में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये चर्चा आम हो गई है। अक्सर टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर, पत्रकार, मुस्लिम धर्मगुरू, बुद्धिजीवी जब खुले तौर पर  मंदिर कब बनेगा या निर्माण की तारीख बताने जैसे असहज सवालों पर सरकार के प्रवक्ताओ को घेरने की कोशिश करते हैं तो शायद इन सभी महानुभावों को ये समझ मे नहीं आता कि अगर वाकई में इन्हें तारीख बता दी गयी तो इन्हें न्यूज़रूम से सीधे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ेगा।

जो नेता  नोटबन्दी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे दुस्साहसी निर्णय लेने की हिम्मत रखता है और उसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर सकता हो तो उसे  मंदिर बनाने में क्या दिक्कत हो सकती है। नोटबन्दी के नकारात्मक परिणामों को लेकर विपक्ष 8 नवम्बर से  आज तक मोदी को कभी घेर नहीं पाया क्योंकि देश की जनता मोदी के लिए ढाल बनकर खड़ी थी। मोदी को इस बात का आकलन जरूर था कि नोटबन्दी जैसे फैसले अपनी लोकप्रियता के चरम पर ही लिए जा सकते हैं अन्यथा इसके परिणाम वेनेजुएला या इमरजेंसी जैसे हो सकते थे।
वर्तमान परिस्थितियों में इस मुद्दे पर मोदी बहुत सावधानी से एक-एक कदम बढ़ा रहे है।

केंद्र राज्य दोनों में ही उनकी सरकार होने से उन पर मंदिर निर्माण के वादे का भारी दबाव है इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार है। एक ठोस आधार के जरिये वे 2019 चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे कि अगर उन्हें अगला कार्यकाल मिलता है तो मंदिर निर्माण के वादे को वो अंजाम तक पहुचाएंगे। सभी को विदित है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले को भी एक पक्ष या दोनों ही पक्ष कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यानी इस मुद्दे को लंबे समय तक लटकाने की कवायद आगे भी जारी करने का भरपूर प्रयास होगा। लेकिन अगर सरकार मुखर एवं प्रतिबद्ध हो तो इस मामले को लटकाना बिल्कुल आसान नहीं होगा।

देश का मीडिया मोदी के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी उनके निर्णयों को समझने में नाकाम रहा है। उनके निर्णय लगातार मीडिया के आकलन के बिल्कुल उलट साबित होते रहते हैं। शायद 2019 चुनाव तक मीडिया का सिर चकरा जाए। मोदी का योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उनके गूढ़ निहितार्थ है। वे गुजरात की तरह यूपी को भी हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना  चाहते हैं। उनके कार्यकाल में अगर अनेक बाधाओं के बाद भी अगर राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रशस्त होता  है तो वे सीधे-सीधे देश के 80% हिन्दू जनमानस के दिलों पर स्थायी तौर पर राज करेंगे। बंगाल, केरल जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में जहाँ लम्बे समय से बीजेपी सत्ता पाने का ख्वाब देख रही है, वहाँ उसका आधार बनाना  बेहद आसान होगा। बेरोजगारी, महंगाई, गिरती विकास दर जैसे अनेक मुद्दों पर घिरी सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए 2019 चुनाव में 2014 की तरह ध्रुवीकरण के लिए  हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने के लिए राम मंदिर का मुद्दा सबसे  उपयुक्त मानती है।

अभय सिंह
abhays170@gmail.com

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जयंत सिन्हा, ईबे, पियरे ओमिडयार, नरेंद्र मोदी और बाहरी पूंजी का भारतीय चुनाव में खुला खेल!

ओमिडयार नेटवर्क को लेकर पांडो डॉट कॉम पर प्रकाशित खबर के जयंत सिन्हा वाले हिस्से का पूरा हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह के सौजन्य से पढ़ें…

केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद pando.com पर Mark Ames ने 26 मई 2014 को लिखा था- “भारत में चुनाव के बाद एक कट्टरपंथी हिन्दू सुपरमैसिस्ट (हिन्दुत्व की सर्वोच्चता चाहने वाले) जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है, को सत्ता मिल गई है। इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता जय कारने (यहां भी जय) ने कहा है कि ओबामा प्रशासन एक ऐसे व्यक्ति के साथ “मिलकर काम करने का इंतजार कर रहा है” जो अल्पसंख्यक मुसलमानों (और अल्पसंख्यक ईसाइयों) के घिनौने जनसंहार में भूमिका के लिए 2005 से अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट (विदेश विभाग) के वीजा ब्लैकलिस्ट में है।

इस शुरुआती पैरा ग्राफ से आपको लेखक, पांडो डॉट कॉम के तेवर और लेख का अंदाजा हो जाएगा। इसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल पूर्व वित्त मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा के बारे में लिखा था, पांडो के पाठक जानते हैं कि ओमिडयार (Omidyar Network) नेटवर्क ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार की लोकोपकारी शाखा है। 2009 से ओमिडयार नेटवर्क ने भारत में अपने पोर्टफोलियो के किसी अन्य देश की तुलना में ज्यादा निवेश किया है। ये निवेश मुख्य रूप से जयंत सिन्हा की बदौलत हैं जो मैकिन्जी के पूर्व साझेदार और हावर्ड के एमबीए हैं जिसे अक्तूबर 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स को चलाने के लिए नौकरी पर रखा गया था।

सिन्हा के कार्यकाल में ओमिडयार नेटवर्क ने अपने निवेश का बड़ा हिस्सा भारत की ओर घुमा दिया। इस तरह 2013 तक भारत में निवेश ओमिडयार नेटवर्क के प्रतिबद्ध कोष का 18 प्रतिशत जो 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा था हो चुका था। इसमें इसके पोर्टफोलियो की कुल कंपनियों का 36 प्रतिशत शामिल था। इस साल श्री सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की नौकरी छोड़ दी ताकि मोदी के चुनाव अभियान में सलाह दे सकें और भाजपा के टिकट पर एक संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ सकें। सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने 1998 से 2002 तक पिछली भाजपा सरकार में वित्त मंत्री के रूप में काम किया था जब उनकी सरकार ने परमाणु बम का परीक्षण किया था। इस साल सिन्हा के पिता ने अपनी संसदीय सीट छोड़ दी और बेटे जयंत सिन्हा को अपनी जगह लेने दी।

चुनाव प्रचार के दौरान जयंत सिन्हा के पिता यशवंत सिन्हा ने गुजरात दंगों के लिए नरेन्द्र मोदी द्वारा माफी मांगने से मना किए जाने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था। तब उन्होंने कहा था, “मोदी सही हैं … वे माफी क्यों मांगें?”  ओमिडयार के पूर्व कर्मचारी उनके बेटे जयंत सिन्हा ने (जब लेख लिखा गया था उससे कुछ सप्ताह पहले) दावा किया कि उनके पिता की भाजपा सरकार ने 1998 में अंतरराष्ट्रीय नाराजगी को नजरअंदाज कर परमाणु बम का परीक्षण किया जिसे पोखरण के नाम से जाना जाता है। मोदी को चुनाव जीतने में सहायता करने के लिए जयंत सिन्हा के ओमिडयार नेटवर्क छोड़ने के कुछ ही समय बाद मोदी ने एक भाषण दिया जिसमें भारत के ई कामर्स बाजार को ई-बे जैसी विदेशी कंपनियों के लिए खोलने की मांग की। ईबे के सबसे बड़े शेयरधारक पियरे ओमिडयार हैं।

संदेश स्पष्ट था- मोदी हाईटेक इंडिया के उम्मीदवार हैं, हिंसक अतिराष्ट्रवाद के बावजूद। इसी समय सिन्हा ने मोदी और बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों जैसे जेपी मोरगन, मोरगन स्टैनली और नोमुरा बैंक के बीच एक समिट मीटिंग का आयोजन करने में सहायता की। संभवत: इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है कि मोदी के अति राष्ट्रवादी प्रयासों की सवारी करके पिछले सप्ताहांत (लेख पुराना है, उसके हिसाब से) जब जयंत सिन्हा चुनाव जीत गए तो ओमिडयार नेटवर्क ने उन्हें बधाई दी।  इसके कुछ ही समय बाद ओमिडयार के पूर्व कर्मी (पुराने आदमी भी कह सकते हैं) ने जोर देकर कहा कि, “श्री मोदी एक महान लोकतांत्रिक (हस्ती) हैं।”

इसके बाद pando.com पर Mark Ames ने ही 9 नवंबर  2014 को (नोटबंदी के बाद) एक और दिलचस्प पीस लिखा था। इसका शीर्षक था, भारत में पियरे ओमिडयार का आदमी मोदी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दूसरा शीर्षक था, ईबे के अरबपति पियरे ओमिडयार के ग्लोबल इंपैक्ट फंड में लंबे समय तक सीनियर एक्जीक्यूटिव रहे जयंत सिन्हा को भारतीय अतिराष्ट्रवादी नेता नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।  बोल्ड अक्षर में अपडेट के साथ शुरू होने वाली कहानी इस प्रकार थी – सिन्हा (जयंत) का नया पद स्पष्ट बता दिया गया है – वो अब भारत के जूनियर वित्त मंत्री हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली के तहत काम कर रहे हैं। लंबे समय तक ओमिडयार का आदमी रहा व्यक्ति अब इस स्थिति में है कि 2015 का बजट तैयार करने में सहायता करेगा जिसके बारे में (प्रधानमंत्री) नरेन्द्र मोदी ने (हिन्दुस्तान टाइम्स के मुताबिक) संकेत दिया है कि “बदलाव लाने वाला” होगा। 

जयंत सिन्हा ने 2009 में ओमिडयार नेटवर्क इंडिया एडवाइजर्स की स्थापना की थी और फर्स्ट लुक मीडिया पब्लिशर्स इंपैक्ट फंड में साझेदार और प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। सिन्हा ने ओमिडयार नेटवर्क की पांच सदस्यों वाली ग्लोबल एक्जीक्यूटिव कमेटी में भी काम किया था तथा ओमिडयार नेटवर्क के 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा के फंड को भारत की ओर मोड़ दिया था। इस तरह इसे दुनिया के सबसे बड़े, 700 मिलिय़न डॉलर के इंपैक्ट फंड के लिए सबसे सक्रिय अकेले देश का निवेश बनाया था।  इस साल के शुरू में ओमिडयार नेटवर्क के साझेदार और प्रबंध निदेशक का पद छोड़ दिया था ताकि धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपने पिता की संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकें।

अब मोदी मंत्रिमंडल में सिन्हा की नियुक्ति ने उन्हें पिछले दो सप्ताह में किसी दक्षिण पंथी, कारोबार समर्थक सरकार में सत्ता तक पहुंचने वाली दूसरी ओमिडयार हस्ती बना दिया है।  
पांडो डॉट कॉम ने आगे लिखा है, जैसा पांडो डेली पूरे साल सूचित करता रहा है, जयंत सिन्हा और उनके बॉस, ओमिडयार भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक अस्वाभाविक दोहरी भूमिका निभाते रहे हैं और लोकोपकारी दिखने वाले काम सोच-समझ कर राजनीतिक निवेश के रूप में किए गए हैं जो सिन्हा के राजनैतिक अभियान का हिस्सा रहा है।

ओमिडयार के ऐसे ग्रांट में से कुछ लाभ के लिए किए गए निवेश थे। जैसे एसकेएस माइक्रोफाइनेंस जैसी माइक्रोफाइनेंस फर्म में ओमिडयार निवेश जिसका समापन बहुत ही घातक ढंग से हुआ जब एसकेएस के कर्ज वसूलने वालों ने जोर लगाया और उनपर सैकड़ों गरीब ग्रामीणों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप लगा। इन लोगों ने कीटनाशक पीकर, डूबकर और अन्य तरीकों से आत्महत्या कर ली थी। ओमिडयार सिन्हा का एक और निवेश गैर सरकारी संगठनों में गया जिसने धुर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर अच्छी तरह काम किया जब वह विपक्ष में थी और यह काम खासतौर से पिछली (सेंटर-लेफ्ट) सरकार के भ्रष्टाचार पर ध्यान केंद्रित करने का था  जो 2007 से इस साल तक लगातार सत्ता में बनी रही।

भाजपा ने इस साल का चुनाव भ्रष्टाचार के विरोध के दम पर जीता और ओमिडयार सरकार ने भारत के सबसे प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी गैर सरकारी संगठनों के अभियान, “आई पेड अ ब्राइब” के लिए धन मुहैया कराया।  2010 में सिन्हा और ओंमिडयार नेटवर्क ने एक भारतीय गैरसरकारी संगठन, जनाग्रह को तीन मिलियन डॉलर दिए ताकि वह  “आई पेड अ ब्राइब” अभियान चला सके। इस खबर में भी जयंत सिन्हा ओमिडयार नेटवर्क की मिलीभगत का जिक्र है तथा गैर सरकारी संगठनों को आर्थिक सहायता तथा उसकी शैली का विवरण है। इसमें अजीत डोभाल के साथ मिलकर इंडिया फाउंडेशन चलाना शामिल है। 

इसी खबर में आगे बताया गया है कि सिन्हा और ओमिडयार से धन पाने वाला एक और गैर सरकारी संगठन 2012 में सांसदों को देश के सख्त ई कामर्स कानून के संबंध में अवैध रूप से प्रभावित करता पकड़ा गया था। उस समय भारत की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसी ने इस एनजीओ की निन्दा की थी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक कहा था तथा विदेशी खुफिया एजेंसी को छिपकर काम करने और भारत सरकार में घुसपैठ करने में सहायता करने का आरोप लगाया था और इसका पंजीकरण रद्द कर दिया था (इस एनजीओ का नाम नहीं है)।

इस मामले के पकड़े जाने के बाद संबंधित एनजीओ के सह-संस्थापक सीवी मधुकर को ओमिडयार ने नौकरी पर रख लिया। अब वे “सरकारी पारदर्शिता” में  ओमिडयार नेटवर्क इंडिया के डायरेक्टर ऑफ इनवेस्टमेंट हैं। इस बीच सिन्हा अपना काम करते रहे हैं … जिससे ओमिडयार को प्रत्यक्ष लाभ होता है जो अभी भी ईबे के चेयरमैन हैं। … जून (2014 में) के शुरू में मोदी और सिन्हा के चुनाव जीतने के बाद, मोदी की नई सरकार ने ईबे साथ-साथ अमैजन और गूगल के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया था ताकि भारत के ई कामर्स कानून लिखने में सहायता की जा सके।

अनुवादक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय लंबे समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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2019 के अंत तक बंद होंगे 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे!

आज़ादी के 70 साल बाद अभी वर्तमान का यह समय छोटे और मध्यम अखबारो के लिए सबसे कठिन है। यदि सरकार के DAVP पॉलिसी को देखा जाय तो लघु समचार पत्रों को न्यूनतम १५ प्रतिशत रुपये के रूप में तथा मध्यम समाचार पत्रों को न्यूनतम ३५ प्रतिशत रुपये के रूप में विज्ञापन देने का निर्देश है। गौरतलब है कि भारत विविधताओं का देश है यहां विभिन्न भाषाएं हैं। ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। बड़े अखबार समूह की पहुंच वहां तक नहीं है। यदि विज्ञापन के आवंटन में भाषा और मूल्य वर्ग का ध्यान नहीं रखा गया तो निश्चित ही उस विज्ञापन की पहुंच विस्तृत तथा व्यापक नहीं होगी और विज्ञापन में वर्णित संदेश का प्रसार पूरे देश के समस्त क्षेत्रों तक नहीं हो पायेगा। पूर्व मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक प्रश्र के उत्तर में नीति के पालन की बात कही गयी थी। परन्तु आज वह बयान झूठ साबित हो रहा है।

गांव का सरपंच यदि मजदूरी का भुगतान नहीं करता। पटवारी खसरे की नकल देने में रिश्वत मांगता है। दफ्तर का बाबू हर काम के लिए गरीब को दौड़ाता है। शुद्ध पानी नहीं मिल रहा। बिजली नहीं है। ठेकेदार ने मजदूरी हड़प ली। सड़के टूटी हैं। गन्दगी है। तो ऐसे सवालों के लिए आम जनता बड़े अखबारों के दफ्तर में नहीं पहुंचती है। वह जिंदगी की जद्दोजहद से परेशान अपने गांवों तथा कस्बों से छपने वाले अखबारों के दफ्तरों में पहुंचता है। लेकिन मोदी सरकार तो पूंजीपतियों के इशारे पर चल रही है। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक बार फिर इमरजेन्सी की तलवार लटक रही है। कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो रही है। आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अखबारों को जगह जगह जमीनें दिया था। अखबारी कागज पर सब्सिडी मिलती थी ताकि चौथा खम्भा जीवित रहे। परन्तु वर्तमान सरकार को ना जाने कौन सलाह दे रहा है कि सिर्फ बड़े मीडिया हाउस पर मेहरबान है यह।

सरकार की डीएवीपी पालिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने के कगार पर हैं, या फिर बंद हो रहे हैं। इसका दूसरा बड़ा कारण कारण है बड़े अखबारों का लागत से 90% कम पर अखबार बेचना या कहें कि एक तरह से फ्री में देना। आज अखबार के सिर्फ एक पेज के कागज का दाम 30 पैसे पड़ता है। इस तरह 12 पेज के अखबार के कागज की कीमत 3.60 रुपये होती है। इसके बाद प्रिंटिंग, सैलरी तथा अन्य खर्च कम से कम प्रति अखबार रु 2.40 आता है। कुल मिलाकर 6 रुपये होता है। इसके बाद हॉकर तथा एजेंट कमीशन, टांसपोर्टशन 50%, यानी 3 रुपये। टोटल 9 रुपये खर्च पर एक पेज की लागत 75 पैसे आती है। इस प्रकार 20 पेज का अखबार का 15 रुपये होता है। जितना ज्यादा पेज उतना ज्यादा दाम होने चाहिए। तब छोटे औऱ मध्यम अखबार बिक सकते हैं और तभी प्रसार बढ़ेगा, नहीं तो असम्भव है।

जैसे छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की पॉलिसी है, एन्टी डंपिंग डयूटी, विदेशी कंपनियों से यहां के उद्योग धंधों को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी लगाया जाता है, उसी तरह लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, मोनोपोली कमीशन भी इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। जबतक ये नहीं होता है, तबतक कभी भी छोटे और मध्यम अखबार नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि इन्हें प्राइवेट विज्ञापन नहीं मिलता है। इसलिए लागत से कम बेचना सम्भव नहीं है। बड़े अखबारों का फर्जी प्रसार सबसे ज्यादा है। अखबार फ्री देकर प्रसार बढ़ाते हैं। सिर्फ इतना ही दाम रखते हैं कि हॉकर रद्दी में बेचे तो उसे नुकसान हो। बड़े अखबारों का ज्यादातर प्रसार बुकिंग के द्वारा होता है। घर की महिलाएं बुकिंग से मिलने वाले गिफ्ट के लिए स्कीम वाले अखबार खरीदती हैं। बुकिंग के बाद हर महीने हॉकर को जो कुछ राशि देनी पड़ती है वो भी अखबार का रद्दी बेचकर निकल जाता है। इस तरह अखबार फ्री में मिलता है। सभी बड़े अखबारों के मालिक बड़े उद्योगपति हैं या बड़े उद्योगपतियों ने इनके शेयर खरीद रखे हैं। उनके प्राइवेट विज्ञापन एक तरह से उनके ही अखबारो में आते हैं। एक तरह से एक जेब से अपना पैसा दूसरे जेब में डालते हैं।

सभी बड़े अखबार एक होकर छोटे और मध्यम अखबार को सरकार की नीतियों में बदलाव करवा कर निबटाने में लगे हैं। इसी का नतीजा है नई डीएवीपी पालिसी और जीएसटी। जो हालात दिख रहा है, उसके मुताबिक 2019 तक 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे। उसके बाद सिर्फ बड़े अखबार रहेंगे और सरकार के गुणगान में लगे रहेंगे। सभी सरकारी विज्ञापन भी उनकी झोली में जायेंगे और उसके मालिक लोग अपने उद्योगों की दलाली करते रहेंगे।

अखबार को विज्ञापन लेने का हक है क्योंकि सिर्फ अखबार ही ऐसा माध्यम है जिससे रोजाना 2 से 4 पेज सिर्फ सरकार और उसके सभी अंगों की खबरें, चाहे प्यून से PM या चपरासी से CM, मुखिया से लेकर सभी नेताओं तक, की छपती है। यह किसी अन्य माध्यम में नहीं होता है। फिर भी आज इस चौथे खंभा की आज़ादी पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं। अखबार को विज्ञापन लेने का हक है। कम से कम दो पेज रोजाना। जितना एरिया न्यूज का, उतना कम से कम विज्ञापन का होना चाहिए। पहले सरकार अखबार को प्राइम जगहों पर जमीन देती थी, सब्सिडी पर कागज, अब GST लगाकर वसूली के साथ-साथ इंस्पेक्टर राज। कोई भी आकर लेखा जोखा चेक करने लगेगा।

सरकारें कहती हैं कि सरकार के फेवर में लिखो, विरोध में लिखोगे तो विज्ञापन बंद। जज का वेतन सरकार देती है लेकिन क्या सरकार कहती है कि सरकार के विरोध में जजमेंट दोगे तो वेतन और सुविधा बंद कर दिया जाएगा? यही नहीं, समय समय पर इनके वेतन इत्यादि में वृद्धि होती है। परन्तु आज अखबार के विज्ञापन में कमी की गई और अब इसे खत्म करने की साजिश हो रही है। आज देश में एक दूसरे तरह का संकटकाल है।  बड़े बड़े उद्योगों के मालिक मीडिया के शेयर खरीद रहे हैं और मीडिया उनका गुलाम बनता जा रहा है। अमेरिका की तरह भारत में भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति एक व्यापारी बन सकता है या फिर पाकिस्तान की तरह सेना का कठपुतली प्रधानमंत्री बन सकता है। पाकिस्तान में पहले सेना तख्ता पलट कर देती थी। अब कठपुतली प्रधानमंत्री और सरकार के सभी बड़े पदों के लोग सेना के कठपुतली हैं।

छोटे और मध्यम अखबार से जुड़े लोग सड़क पर आ जायेंगे और बड़े मीडिया हाउस के जुड़े पत्रकार भी परेशान होंगे क्योंकि जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार बेरोजगार होंगे तो वो TV ईत्यादि हर जगह नौकरी की लाइन में लगेगा। ऊपर से सरकार पेनाल्टी का केस डाल कर वसूली करने की तैयारी में है। हमें मिलकर सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, इसके लिए दबाव बनाना होगा। अमेरिका में 1 डॉलर (70रु) ब्रिटेन में 1 पौंड (80रु) और पड़ोसी पाकिस्तान में 20 रुपये में अखबार बिक सकता है तो भारत में क्यों नहीं? पाकिस्तान के लोग ज्यादा अमीर हैं? ज्यादा पढ़े लिखे हैं? करांची की आबादी 2 करोड़ है पर उस शहर में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार की प्रसार संख्या कितनी है? पाकिस्तान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार ‘जंग’ है जिसका पूरे पाकिस्तान में प्रसार 8.5 लाख है। हमारे यहां तो Metro Cities के कुछ अखबार 10 लाख से ज्यादा ABC सर्कुलेशन दिखाते हैं। जब 15-20 या ज्यादा पेज के कारण ज्यादा दाम होगा तब दस लाख सर्कुलेशन दिखाने वाला अखबार एक लाख भी नहीं बिक पायेगा।

दूसरी बात अगर सरकार सचमुच में छोटे और मध्यम अखबार को बचाना चाहती है तो 5000 कॉपी सर्कुलेशन तक के लिए कम से कम 25 रुपये डीएवीपी दर दे और इससे ज्यादा सर्कुलेशन के लिए आरएनआई चेकिंग का नियम बना दे। हर 5000 सर्कुलेशन बढ़ने पर 10% दर बढ़े। साथ ही बिग कैटेगरी के स्लैब की दर में कोई बदलाव नहीं हो, क्योंकि बड़े अखबारो को प्राइवेट विज्ञापन बहुत मिलते हैं।

सरकार ये नियम भी बनाये कि जो भी व्यक्ति अखबार या कोई मीडिया हाऊस चलाता हो, वो कोई धंधा नहीं करे या दूसरा बड़ा काम नहीं करे या छोटे-छोटे धंधे जो पूर्व से संचालित है, उसे 75 लाख टर्नओवर की लिमिट कर दे क्योंकि इससे कोई अखबार किसी का सपोर्ट या विरोध नहीं करेगा, उसका हित प्रभावित नहीं होगा। जज जिस कोर्ट से रिटायर होता है उसे उस कोर्ट में वकील के रुप मे प्रैक्टिस करने की मनाही होती है। समाचार पत्र अब जीएसटी के चलते बन्द हो जायेंगे। पं. दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के कथनी करनी में अन्तर स्पष्ट दिख रहा है।

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मोदी पर मिमिक्री दिखाने में क्यों फटती है टीवी चैनलों की?

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने प्रेस क्लब आफ इंडिया में पत्रकार विनोद वर्मा की छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा की गई अवैधानिक गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते हुए खुलासा किया कि टीवी चैनलों पर मोदी की मिमिक्री दिखाने पर पाबंदी है. इस वीडियो को सुनिए विस्तार से, जानिए पूरा प्रकरण क्या है…

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चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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मोदी को भगवान न बनाओ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मंदिर बनाने की घोषणा क्रांति की जमीन मेरठ में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने की है। सिचाई विभाग से रिटायर इंजीनियर जेपी सिंह की माने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में उनके नाम का मंदिर बनना चाहिए। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इस ऐलान के पीछे किसी की व्यक्तिगत इच्छा और भावना ही दिखाई देती है। पर रिटायर इंजीनियर की घोषणा एक लोकतांत्रिक देश में किसी नेता को भगवान बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

ऐसा नहीं है कि ऐसी घोषणा कोई पहली दफा देश में हुई है। प्रायः दक्षिण भारत से नेताओं और फिल्मी सितारों के मंदिर बनाने और पूजा करने की खबरे आती रही हैं। देश के कई राज्यों में कई लोगों ने अपने पंसदीदा नेताओं, फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों के मंदिर बनाये हैं। वहीं अपने पंसदीदा सितारों और नेताओं की तस्वीर की पूजा करने वाले भी बढ़ी संख्या में है।

समर्थकों की ओर से अपने नेताओं के प्रति प्रेम दर्शाने के कइ्र्र मामले प्रकाश में आये हैं। लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ऐसी नेता हैं जिन्होंने खुद ही अपनी मूर्तियां लगवाई हैं। यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य के पार्कों, स्मारकों में दलित नेताओं, चिंतकों, और सुधारकों के साथ-साथ अपनी प्रतिमाएं भी लगवाई हैं। इन प्रतिमाओं को लेकर यूपी की सियासत भी कई बार गर्मा चुकी है। लेकिन मूर्तियां वहीं की वहीं हैं। मायावती की शान में ‘माया पुराण’ की रचना भी की गई है। जिसमें मायावती को समता मूलक समाज की आराध्य देवी कहा गया है।

मोदी संघर्ष के नेता हैं। स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली पद तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। एक गरीब परिवार का लड़का आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का ध्वजवाहक है। मोदी का जीवन चरित्र और संघर्ष देश के लाखों-लाख देशवासियों के लिये प्रेरणादायी है। उनका जीवन अभाव और गरीबी में बीता। ऐसे में समाज का वंचित, पिछड़ा, गरीब, मजदूर, किसान और अभाव में जीवन यापन करने वाला हिस्सा मोदी को अपना रोल माडल मानता है। आबादी का यह बड़ा हिस्सा मोदी केे जीवन से किसी न किसी तरीके से प्रेरणा पाता है। विधार्थी और युवा विशेषकर बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को अपना रोल माडल मानते हैं।

भारत में फिल्मी सितारों के नाम पर मंदिर बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। पहले इस तरह की खबरें केवल दक्षिण भारत से ही आती थीं। लेकिन अब देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सुनने में आती हैं। अभिनेत्री खुशबू के नाम का मंदिर तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली में मौजूद है और वो इस पर आश्चर्य व्यक्त कर चुकी हैं। खुशबू के अलावा ममता कुलकर्णी, नमीता, पूजा उमाशंकर के नाम पर भी मंदिर बातें की जाती हैं लेकिन अब तक उनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। अमिताभ को पसंद करने वालों ने कुछ समय पहले कोलकाता में उनके नाम पर एक मंदिर बनाया था जहां उनकी पूजा होती है। शिवसेवा के संस्थापक बाल ठाकरे का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है। चंद्रपुर जिले के भद्रावती में इस मंदिर के निर्माण के लिए भद्रावती नगर परिषद ने करीब पांच एकड़ जमीन दी है।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि का मंदिर राज्य के वैलूर जिले में उनके समर्थको ने स्थापित किया है। डॉक्टर येदुगुड़ी सनदिंति राजशेखर रेड्डी को वाईएसआर के रूप में जाना जाता रहा. वे आंध्र प्रदेश के एक करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की इकाई ने विशाखापटनम में उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण कराया। राजगोपालापुरम गांव में बने इस मंदिर को राजशेखरा रेड्डी अलायम नाम दिया गया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में 15 साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी का मंदिर बनवाया गया था। सत्यनारायण टेकरी नाम की पहाड़ी पर बने इस मंदिर में बाकायदा एक पुजारी भी रखा गया हैै। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के एक गांव में मोदी की मूर्ति की रोज पूजा-अर्चना की जाती है। आरएसएस के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी रह चुके बृजेंद्र मिश्र ने भगवानपुर गांव के शिव मंदिर में मोदी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद मंदिर को नाम दिया गया था ‘नमो नमो मंदिर’। इस मंदिर में रोज सुबह और शाम मोदी की आरती और पूजा की जाती है. जिसमें गांव के लोग भी भाग लेते हैं।

आंध्र प्रदेश के महबूब नगर में एक कांग्रेसी नेता ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक बड़ी मूर्ति बनवाई। नौ फीट की इस मूर्ति को तेलंगाना टाल्ली नाम दिया गया। जिसका अर्थ होता है तेलंगाना की माता। इस काम को अंजाम दिया कांग्रेस नेता पी. शंकर राव ने. अलग तेलंगाना राज्य बनाने के पार्टी के फैसले के बाद सोनिया गांधी की यह मूर्ति स्थापित की गई। इसके अलावा कई बार सोनिया के देवी रूप वाले पोस्टर भी चर्चाओं में रहे हैं। बिहार के भभुआ जिले में भोजपुरी फिल्मों अभिनेता मनोज तिवारी ने पूजा-पाठ के साथ साल 2013 में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर की मूर्ति का अनावरण किया था। उनका मंदिर कैमूर जिले में बनवाया गया है। राजस्थान में बीजपी नेता और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पूजा करने वाले भी बहुत हैं। जोधपुर जिले में एक भाजपा नेता ने शहर के एक मंदिर में राजे का बड़ा सा पोस्टर लगाकर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। उस पोस्टर में वसुंधरा राजे को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाया गया है।

गुजरात के राजकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर एक स्थानीय संगठन ओम युवा समूह ने बनवाया है। करीब 300 लोगों के इस संगठन ने आपस में चंदा एकत्र कर मंदिर बनाने का सारा खर्च उठाया। मंदिर बनाने में 4-5 लाख रुपये का खर्च आया है। मंदिर का उद्घाटन एक केंद्रीय मंत्री को करना था लेकिन मोदी की नाराजगी के बाद कार्यक्रम रद्द हो गया।
मीडिया खबरों के मुताबिक यह मंदिर मेरठ के सरधना क्षेत्र में मेरठ-करनाल हाईवे पर बनेगा। इसके लिए पांच 5 एकड़ की जमीन भी तय कर ली गई है। इसमें मोदी की 100 फीट ऊंची मूर्ति लगेगी। मंदिर निर्माण में दस करोड़ का खर्च आएगा। मंदिर बनाने में आने वाली लागत मोदी भक्तों से चंदे के रूप में लिया जाएगा। मंदिर का भूमि पूजन 23 अक्टूबर को होगा। इसको बनने में करीब 2 वर्ष का समय लगेगा। इस मंदिर के उद्घाटन के लिए बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को बुलाने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में भी पुष्पराज सिंह यादव नाम के एक व्यक्ति ने जलालपुर में मोदी का मंदिर बनाने का काम शुरू किया था। करुणानिधि का भक्त कहने वाले एक व्यक्ति ने वेल्लूर में उनका मंदिर बनाया है।

किसी की पसंद-नापंसद और भावनाओं को रोका नहीं जा सकता। पर सवाल यह है कि इस सबसे क्या होगा, क्या देश का कुछ भला होगा? मोदी समर्थकों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि मोदी खुद कभी ऐसा नहीं चाहेंगे। जिस देश में आज भी करीब 20 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर हैं, करोड़ों लोगों को सिर ढकने के लिए एक अदद छत का सहारा नसीब नहीं है, न जाने कितने ही लोग भूखे पेट सोते हैं, वहां ऐसे मंदिरों की क्यों जरूरत पड़ने लगी।

इससे पूर्व भी गुजरात के राजकोट में 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंदिर बनवाने की कोशिश की गई थी। ये कोशिश प्रधानमंत्री के समर्थकों की ओर से की गई थी। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने नाखुशी जताते हुए खबर को ‘स्तब्धकारी’ और ‘भारत की महान परंपराओं’ के खिलाफ बताया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि ‘किसी इंसान का मंदिर बनाना हमारी सभ्यता नहीं है, मंदिर बनाने से मुझे दुख हुआ है। मैं लोगों से ऐसा नहीं करने का आग्रह करता हूं।’ प्रधानमंत्री के ट्वीट के बाद राजकोट प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वहां से मोदी की मूर्ति को हटवा दिया था। लेकिन उस प्रकरण से भी कोई सीख ना लेते हुए अब उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य मंदिर बनाने की बात कही जा रही है। हालांकि अभी तक मेरठ में मंदिर बनाए जाने के ऐलान पर पीएम मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि प्रधानमंत्री जल्द ही इस पर पिछली बार की तरह कोई ठोस कदम उठाएंगे।

लोकतंत्र में किसी नेता को भगवान का दर्जा देना उसका सम्मान बढ़ाना कतई नहीं हो सकता। जनप्रिय नेता तो प्रत्येक देशवासी के दिल में बसता है। उसके लिये किसी मंदिर या पूजा स्थल की जरूरत नहीं होती है। जब जनता अपने प्रिय नेता के कंधे से कंधा मिलाकर देश विकास के कार्यों में जुटती है तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम हासिल होते हैं। पीएम मोदी का मंदिर बनाने वाला रिटायर अधिकारी अगर उनका मंदिर बनाने की बजाय गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने के लिये विधालय, भूखों के लिये अन्न सेवा, पर्यावरण बचाने की मुहिम, नदियों की सफाई, स्वच्छता अभियान या विभिन्न सामाजिक कुरीतियों की दिशा में काम करे तो देशवासियों व प्रधानमंत्री को ज्यादा खुशी होगी।

मोदी पहले से ही 15 लाख वाले कोट के कारण काफी आलोचना झेल चुके हैं और अब यह मंदिर। ऐसे शगूफे वे नेता, समर्थक या प्रशंसक छोड़ते हैं जो जनता की सेवा करने में तो विफल रहते हैं, लेकिन अपने आकाओं की सेवा करना और चापलूसी का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते हैं। मोदी को भगवान बनाने से बेहतर है कि उन्हें सुशासन देने में ये नेता मदद करें। स्वयं प्रधानमंत्री खुद को प्रधान सेवक बता चुके हैं। इससे पूर्व जिन नेताओं या अभिनेताओं की मूर्तियां लगी या मंदिर उनके चाहने वालों न बनाएं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि किसी गलत परिपाटी को लगातार आगे बढ़ाया जाए। समाज में इस चेतना का संचार भी जरूरी है। ऐसी प्रवृति पर रोक लगनी चाहिए, किसी लोकतांत्रिक देश में किसी नेता का मंदिर बनना शुभ लक्ष्ण नहीं है। क्योंकि इससे नेता या लोकतंत्र दोनों में से किसी एक का नुकसान होना लाजिमी है।

डॉ. आशीष वशिष्ठ
स्वतंत्र  पत्रकार
लखनऊ, उ0प्र0, (भारत)
मोबाइल: (+91) 94 5100 5200  
E-mail : avjournalist@gmail.com

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अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने ‘द वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही

‘द वायर’ की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है

Nitin Thakur : अमित शाह के बेटे की कमाई का हिसाब किताब जान लीजिए। जब आपकी नौकरियां जा रही थीं, तब कोई घाटे से 16 हज़ार गुना मुनाफे में जा रहा था। द वायर की पड़ताल ने कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को हिला दिया है।

Nitesh Tripathi : जब लगभग अधिकांश मीडिया हाउस सरकार के चरणों में लोट रही हैं ऐसे में ‘द वायर’ की एक स्टोरी ने सरकार के नाक में दम कर दिया. हालांकि इस खबर पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन सरकार इतना तो जाने ले कि सब कुछ पक्ष में होने के बाद भी कोई तो ऐसा है जो अब भी धारा के विपरीत चलने का माद्दा रखता है. अमित शाह की ओर से पीयूष गोयल ने प्रेस कांफ्रेंस कर ‘वायर’ पर 100 करोड़ का आपराधिक मुकदमा ठोकने की बात कही है.

Abhishek Parashar : भक्तों ने मोटा भाई के बेटे की कंपनी में रातों रात हुई बेतहाशा बढ़ोतरी की खबर सामने लाने वाली रोहिणी सिंह के खिलाफ अपना काम शुरू कर दिया है. अभी कुछ लंपट यह कह रहे हैं कि उन्होंने ईटी से निकाल दिया गया, हो सकता है कल को यह बात कहीं और पहुंच जाए. लेकिन इन मूर्खों को यह समझ में नहीं आएगा, यह वही रोहिणी सिंह हैं, जिन्होंने वाड्रा के खिलाफ भी स्टोरी की थी. वही स्टोरी, जिसकी दम पर सवार होकर बीजेपी सत्ता में आई. भक्त भूलते बहुत तेजी से हैं, उन्हें याद नहीं रहता कुछ भी.

Manish Shandilya : न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की ख़बर में दावा किया गया कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अमित शाह के बेटे जय अमितभाई शाह की कंपनी का टर्न-ओवर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और उनके पिता के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद बेतहाशा बढ़ा है. ये ख़बर सोशल मीडिया में बहुत तेज़ी से फैली और ट्विटर और फ़ेसबुक पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो गई. @ishar_adv नाम के हैंडल ने लिखा, ”बीजेपी ने अपना स्लोगन बदल लिया है. विकास की जय के बजाय जय का विकास. कोई ज्यादा अंतर नहीं है. अब हमें समझ आया कि आख़िर विकास कहां छिपा बैठा है.”

पत्रकार नितिन ठाकुर, नीतेश त्रिपाठी, अभिषेक पराशर और मनीष शांडिल्य की एफबी वॉल से.

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‘भक्तों’ से जान का खतरा बताते हुए पीएम को लिखा गया रवीश कुमार का पत्र फेसबुक पर हुआ वायरल, आप भी पढ़ें

Ravish Kumar : भारत के प्रधानमंत्री को मेरा पत्र…

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आप सकुशल होंगे। मैं हमेशा आपके स्वास्थ्य की मंगल कामना करता हूं। आप असीम ऊर्जा के धनी बने रहें, इसकी दुआ करता हूं। पत्र का प्रयोजन सीमित है। विदित है कि सोशल मीडिया के मंचों पर भाषाई शालीनता कुचली जा रही है। इसमें आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के सदस्यों, समर्थकों के अलावा विरोधियों के संगठन और सदस्य भी शामिल हैं। इस विचलन और पतन में शामिल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।

दुख की बात है कि अभद्र भाषा और धमकी देने वाले कुछ लोगों को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं। सार्वजनिक रूप से उजागर होने, विवाद होने के बाद भी फोलो करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री की सोहबत में ऐसे लोग हों, यह न तो आपको शोभा देता है और न ही आपके पद की गरिमा को। किन्हीं ख़ास योग्यताओं के कारण ही आप किसी को फोलो करते होंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि धमकाने, गाली देने और घोर सांप्रदायिक बातें करने को आप फोलो करने की योग्यता नहीं मानते होंगे।

आपकी व्यस्तता समझ सकता हूं मगर आपकी टीम यह सुनिश्चित कर सकती है कि आप ऐसे किसी शख्स को ट्वीटर पर फोलो न करें। ये लोग आपकी गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। भारत की जनता ने आपको असीम प्यार दिया है, कोई कमी रह गई हो, तो आप उससे मांग सकते हैं, वो खुशी खुशी दे देगी। मगर यह शोभा नहीं देता कि भारत के प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को फोलो करें जो आलोचकों के जीवित होने पर दुख जताता हो।

आज जबसे altnews.in पर पढ़ा है कि ऊं धर्म रक्षति रक्षित: नाम के व्हाट्स ग्रुप में जो लोग मुझे कुछ महीनों से भद्दी गालियां दे रहे थे, धमकी दे रहे थे, सांप्रदायिक बातें कर रहे थे, मुझ जैसे सर्वोच्च देशभक्त व दूसरे पत्रकारों को आतंकवादी बता रहे थे, उनमें से कुछ को आप ट्वीटर पर फोलो करते हैं, मैं सहम गया हूं। प्रधानमंत्री जी, इस व्हाट्स अप ग्रुप में मुझे और कुछ पत्रकारों को लेकर जिस स्तरहीन भाषा का इस्तमाल किया गया वो अगर मैं पढ़ दूं तो सुनने वाले कान बंद कर लेंगे। मेरा दायित्व बनता है कि मैं अपनी सख़्त आलोचनाओं में भी आपका लिहाज़ करूं। महिला पत्रकारों के सम्मान में जिस भाषा का इस्तमाल किया गया है वो शर्मनाक है।

सोशल मीडिया पर आपके प्रति भी अभद्र भाषा का इस्तमाल किया जाता है। जिसका मुझे वाक़ई अफसोस है। लेकिन यहां मामला आपकी तरफ से ऐसे लोगों का है, जो मुझे जैसे अकेले पत्रकार को धमकियां देते रहे हैं। जब भी इस व्हाट्स अप ग्रुप से अलग होने का प्रयास किया, पकड़ इसे, भाग रहा है, मार इसे, टाइप की भाषा का इस्तमाल कर वापस जोड़ दिया गया।

राजनीति ने सोशल मीडिया और सड़क पर जो यह भीड़ तैयार की है, एक दिन समाज के लिए ख़ासकर महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगी। इनकी गालियां महिला विरोधी होती हैं। इतनी सांप्रदायिक होती हैं कि आप तो बिल्कुल बर्दाश्त न करें। वैसे भी 2022 तक भारत से सांप्रदायिकता मिटा देना चाहते हैं। 15 अगस्त के आपके भाषण का भी इन पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हाल हाल तक मुझे धमकियां देते रहे हैं।

अब मेरा आपसे एक सवाल है। क्या आप वाक़ई नीरज दवे और निखिल दधीच को फोलो करते हैं? क्यों करते हैं? कुछ दिन पहले मैंने इनके व्हाट्स अप ग्रुप का कुछ स्क्रीन शाट अपने फेसबुक पेज @RavishKaPage पर ज़ाहिर कर दिया था। altnews.in के प्रतीक सिन्हा और नीलेश पुरोहित की पड़ताल बताती है कि ग्रुप का सदस्य नीरज दवे राजकोट का रहने वाला है और एक एक्सपोर्ट कंपनी का प्रबंध निदेशक है। नीरज दवे को आप फोलो करते हैं। जब मैंने लिखा कि इतनी अभद्र भाषा का इस्तमाल मत कीजिए तो लिखता है कि मुझे दुख है कि तू अभी तक जीवित है।

व्हाट्स अप ग्रुप का एक और सदस्य निखिल दधीच के बारे में कितना कुछ लिखा गया। पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई तब निखिल दधीच ने उनके बारे में जो कहा, वो आप कभी पसंद नहीं करेंगे, ये और बात है कि आप उस शख़्स को अभी तक फोलो कर रहे हैं। अगर मेरी जानकारी सही है तो। हाल ही में बीजेपी के आई टी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग़लत तरीके से एडिट की हुई मेरे भाषण का वीडियो शेयर किया था। इससे भ्रम फैला। altnews.in ने उसे भी उजागर किया मगर अमित मालवीय ने अफसोस तक प्रकट नहीं किया।

पर सर, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ये निखिल दधीच मेरे मोबाइल फोन में आ बैठा है। घोर सांप्रदायिक व्हाट्स अप ग्रुप का सदस्य है जिससे मुझे ज़बरन जोड़ा जाता है। जहां मेरे बारे में हिंसक शब्दों का इस्तमाल किया जाता है। वाकई मैंने नहीं सोचा था कि इस ग्रुप के सदस्यों के तार आप तक पहुंचेंगे। काश altnews.in की यह पड़ताल ग़लत हो। निखिल दधीच की तो आपके कई मंत्रियों के साथ तस्वीरें हैं।

यही नहीं ऊं धर्म रक्षति रक्षित: ग्रुप के कई एडमिन हैं। कई एडमिन के नाम RSS, RSS-2 रखे गए हैं। एक एडमिन का नाम आकाश सोनी है। भारत की दूसरी महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जी, स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा जी और दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी के साथ आकाश सोनी की तस्वीर है। तस्वीर किसी की भी किसी के साथ हो सकती है लेकिन यह तो किसी को धमकाने या सांप्रदायिक बातें करने का ग्रुप चलाता था। आपके बारे में कोई लिख देता है तो उसके व्हाट्स अप ग्रुप के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मैंने ऐसी कई ख़बरें पढ़ी हैं।

क्या आकाश सोनी RSS का प्रमुख पदाधिकारी है? आकाश सोनी ने मेरे सहित अभिसार शर्मा, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त के फोन नंबर को अपने पेज पर सार्वजनिक किया है। altnews.in की रिपोर्ट में यह बात बताई गई है।

पहले भी आपके नेतृत्व में चलने वाले संगठन के नेताओं ने मेरा नंबर सार्वजनिक किया है और धमकियां मिली हैं। मैं परेशान तो हुआ परंतु आपको पत्र लिखने नहीं बैठा। इस बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं जानना चाहता हूं और आप भी पता करवाएं कि क्या इस व्हाट्स ग्रुप के लोग मेरी जान लेने की हद तक जा सकते हैं? क्या मेरी जान को ख़तरा है?
मैं एक सामान्य नागरिक हूं और अदना सा परंतु सजग पत्रकार हूं। जिसके बारे में आज कल हर दूसरा कहकर निकल जाता है कि जल्दी ही आपकी कृपा से सड़क पर आने वाला हूं। सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इसका उत्सव भी मनाया गया कि अब मेरी नौकरी जाएगी। कइयों ने कहा और कहते हैं कि सरकार मेरे पीछे पड़ी है। हाल ही में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को आपकी नापसंदगी के कारण चलता कर दिया गया। इसकी ख़बर मैंने thewire.in में पढ़ी। कहते हैं कि अब मेरी बारी है। यह सब सुनकर हंसी तो आती है पर चिन्तित होता हूं। मुझे यकीन करने का जी नहीं करता कि भारत का एक सशक्त प्रधानमंत्री एक पत्रकार की नौकरी ले सकता है। तब लोग कहते हैं कि थोड़े दिनों की बात है, देख लेना, तुम्हारा इंतज़ाम हो गया है। ऐसा है क्या सर?

ऐसा होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। परंतु ऐसा मत होने दीजिएगा। मेरे लिए नहीं, भारत के महान लोकतंत्र की शान के लिए वरना लोग कहेंगे कि अगर मेरी आवाज़ अलग भी है, तल्ख़ भी है तो भी क्या इस महान लोकतंत्र में मेरे लिए कोई जगह नहीं बची है? एक पत्रकार की नौकरी लेने का इंतज़ाम प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के स्तर से होगा? ऐसी अटकलों को मैं व्हाट्स अप ग्रुप में दी जाने वाली धमकियों से जोड़कर देखता हूं। अगर आप इन लोगों को फोलो नहीं करते तो मैं सही में यह पत्र नहीं लिखता।

मेरे पास अल्युमिनियम का एक बक्सा है जिसे लेकर दिल्ली आया था। इन 27 वर्षों में ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया मगर वो बक्सा आज भी है। मैं उस बक्से के साथ मोतिहारी लौट सकता हूं, लेकिन परिवार का दायित्व भी है। रोज़गार की चिन्ता किसे नहीं होती है। बड़े बड़े कलाकार सत्तर पचहत्तर साल के होकर विज्ञापन करते रहते हैं ताकि पैसे कमा सकें। जब इतने पैसे वालों को घर चलाने की चिन्ता होती है तो मैं कैसे उस चिन्ता से अलग हो सकता हूं। मुझे भी है।

आप मेरे बच्चों को तो सड़क पर नहीं देखना चाहेंगे। चाहेंगे ? मुझसे इतनी नफ़रत? मेरे बच्चे तब भी आपको दुआ देंगे। मुझे सड़क से प्यार है। मैं सड़क पर आकर भी सवाल करता रहूंगा। चंपारण आकर बापू ने यही तो मिसाल दी कि सत्ता कितनी बड़ी हो, जगह कितना भी अनजान हो, नैतिक बल से कोई भी उसके सामने खड़ा हो सकता है। मैं उस महान मिट्टी का छोटा सा अंश हूं।

मैं किसी को डराने के लिए सच नहीं बोलता। बापू कहते थे कि जिस सच में अहंकार आ जाए वो सच नहीं रह जाता। मैं ख़ुद को और अधिक विनम्र बनाने और अपने भीतर के अंतर्विरोधों को लेकर प्रायश्चित करने के लिए बोलता हूं। जब मैं बोल नहीं पाता, लिख नहीं पाता तब उस सच को लेकर जूझता रहता हूं। मैं अपनी तमाम कमज़ोरियों से आज़ाद होने के संघर्ष में ही वो बात कह देता हूं जिसे सुनकर लोग कहते हैं कि तुम्हें सरकार से डर नहीं लगता। मुझे अपनी कमज़ोरियों से डर लगता है। अपनी कमज़ोरियों से लड़ने के लिए ही बोलता हूं। लिखता हूं। कई बार हार जाता हूं। तब ख़ुद को यही दिलासा देता कि इस बार फेल हो गया, अगली बार पास होने की कोशिश करूंगा। सत्ता के सामने बोलना उस साहस का प्रदर्शन है जिसका अधिकार संविधान देता है और जिसके संरक्षक आप हैं।

मैं यह पत्र सार्वजनिक रूप से भी प्रकाशित कर रहा हूं और आपको डाक द्वारा भी भेज रहा हूं। अगर आप निखिल दधीज, नीरज दवे और आकाश सोनी को जानते हैं तो उनसे बस इतना पूछ लीजिए कि कहीं इनका या इनके किसी ग्रुप का मुझे मारने का प्लान तो नहीं है। altnews.in का लिंक भी संलग्न कर रहा हूं। पत्र लिखने के क्रम में अगर मैंने आपका अनादर किया हो, तो माफ़ी मांगना चाहूंगा।

आपका शुभचिंतक

रवीश कुमार

पत्रकार

एनडीटीवी इंडिया

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क्या वाकई नरेंद्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है?

Dilip Khan : हार्ड वर्क वाले अर्थशास्त्री मोदी जी जब सत्ता में आए तो इन्होंने आर्थिक सलाह परिषद को ख़त्म कर दिया। जब अर्थव्यवस्था की बैंड बजने लगी तो दो दिन पहले यूटर्न लेते हुए परिषद को फिर से बहाल कर दिया। अर्थशास्त्री नरेन्द्र मोदी ने आंकड़ों को ‘खुशनुमा’ बनाने के लिए GDP गणना के पुराने नियम ही ख़त्म कर दिए। लेकिन गणना के नए नियमों के मुताबिक़ भी GDP दर तीन साल के न्यूनतम पर आ गई है। पुराना नियम लागू करे तो 3% का आंकड़ा रह जाता है।

अनुपम खेर समेत कई सहिष्णु अर्थशास्त्रियों ने जब नोटबंदी का समर्थन किया तो मोदी-जेटली फूलकर कुप्पा हो गए। अब ख़ुद सरकारी एजेंसियां दावा कर रही है कि इससे अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई है। अमित शाह भले ही ‘तकनीकी कारण’ का जुमला फेंके, देश का सबसे बड़ा बैंक SBI परेशान है। खुलेआम अपना दयनीय हाल बता रहा है। निर्यात गिर गया, विनिर्माण क्षेत्र बैठ गया, रोज़गार पांच साल के निचले स्तर पर है। लघु-मध्यम उद्योग वाले रो रहे हैं। छोटे कारोबारी खस्ताहाल हैं। जो नोटबंदी से रह गई थी, वो कसर जीएसटी ने पूरी कर दी।

RBI में लगभग 100% नोट जमा हो गए। इसका क्या मतलब निकाला जाएगा? अनुमान के मुताबिक़ देश में क़रीब 6% कालाधन कैश में था। ज़्यादातर बड़े नोटों में। अब, जब क़रीब-क़रीब सारा पैसा जमा होकर एक्सचेंज हो गया है तो ज़ाहिर है कि ये कालाधन वैध धन बन गया। यानी नोटबंदी ने बाक़ी नुकसानों के साथ-साथ सबसे बड़ा काम ये किया कि कालेधन को वैध बना दिया। जो चालाक थे, उन्होंने सेटिंग कर कई खातों में पैसे जमा करवाए, कई लोगों के मार्फ़त पैसे बदले। जो कच्चे थे, उन्होंने अपने खाते में पैसे डाल लिए। पैसे से यहां मेरा मतलब कालाधन से है। अब क्या हो रहा है? ऐसे कई लोग आयकर विभाग की निगरानी में हैं। आयकर इंस्पेक्टर इनसे मिलकर घूस खाकर ओके कर दे रहा है। यानी कालाधन तो सफ़ेद हुआ ही, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया। और मोदी जी ने जो इंस्पेक्टर राज ख़त्म करने की बात कही थी, वो वादा अरब सागर में डूब गया।

इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने का जुमला फेंकने वाले प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद आयकर इंस्पेक्टरों को सांढ़ बना दिया है। जिसके खाते में हेर-फेर है, सब आयकर अधिकारियों से सेटिंग कर रहे हैं। नोटबंदी से भ्रष्टाचार रोकने की बात कही गई थी, देख लीजिए बढ़ गया है। काला धन ख़त्म करने की बात कही गई थी। लगभग 100% पुराने नोट बैंक पहुंचकर अब वैध करेंसी बन गए हैं। मोदी जी, और डुबोइए देश को। काम पूरा नहीं हुआ है।

Chandan Srivastava : इंडियन एक्सप्रेस में आज यशवंत सिन्हा का जो आर्टिकल छपा है, वह पढ़ा जाना चाहिए। रोहिंग्या, बीएचयू, जेएनयू आदि तो ठीक है लेकिन अर्थव्यवस्था ही दम तोड़ देगी तो क्या बचेगा? अरूण जेटली को लेकर भाजपा का कोर वोटर कभी कम्फर्टेबल नहीं रहा। लेकिन उन्होंने मोदी को भाजपा का चेहरा बनने में सहयोग किया था, यही वजह है कि उनका हर पाप मोदी जी गले लगाने को तैयार हैं। लेकिन पापी को किसी भी प्रकार का समर्थन करने वाला और यहां तक कि उसके कृत्यों से नजरें फेर लेने वाला भी बराबर का पापी होता है। कुछ ऐसा ही कृष्ण ने गीता में भी कहा था जब अर्जुन भीष्म, द्रोण आदि के प्रति आसक्त हो रहे थे।

यशवंत सिन्हा से कांग्रेस जैसी पार्टियों को सीखना चाहिए कि आलोचना कैसे की जाती है। रोहिंग्या और भारत तेरे टुकड़े होंगे का समर्थन करके वे कभी मोदी से पार नहीं पा सकते। इतनी साधारण सी बात न जाने क्यों कांग्रेस के पल्ले नहीं पड़ रही। बहरहाल बात यशवंत सिन्हा के लेख की। पूर्व वित्त मंत्री लिखते हैं कि निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई। औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी संकट में है। नोटबंदी फेल रही है, गलत तरीके से GST लागू किए जाने से आज कारोबारियों के बीच खौफ का माहौल है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

वह आगे लिखते हैं, पहली तिमाही में विकास दर गिरकर 5.7 पर पहुंच गई जो तीन साल में सबसे कम है। सरकार के प्रवक्ता कहते हैं कि नोटबंदी की वजह से मंदी नहीं आई, वो सही हैं क्योंकि इस मंदी की शुरुआत पहले हो गई थी। नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया। आर्टिकल के अंत में वह एक पंच लाइन देते हैं, ‘pm claims dat he has seen poverty from close quarters. His fm is working over time to make sure dat all indians also see itfrom equally close quarters.’ माने- ‘प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है। अब उनके वित्त मंत्री यह सुनिश्चित करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी करीब से गरीबी देखे।’

Vikas Mishra : 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था- ”मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली।” उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी। घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था। फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी। जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है।
मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे। देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए। एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया। पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है।

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा। हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया। दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा। देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा। कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा। ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया।

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे। तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा। मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी। उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा। उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा। मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया। राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था।

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’। वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे। तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी। देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी। महंगाई चरम सीमा पर थी। मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा। विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे। मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था। जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं। नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे। देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया। अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी। 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई। उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी।

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली। कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची। मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई। लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया।ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था। लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए। बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए।

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया। घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी। पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए। चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया। मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई। तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे। ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे। जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली।

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए। मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है। इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा। उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी। वैसे बता दें कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जन्मदिन है।

तीन पत्रकारों दिलीप खान, चंदन श्रीवास्तव और विकास मिश्र की एफबी वॉल से. दिलीप खान राज्यसभा टीवी में लंबे समय तक कार्यरत रहे हैं. चंदन श्रीवास्तव लखनऊ में पहले पत्रकार थे और अब वकालत कर रहे हैं. विकास मिश्र आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर हैं.

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मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

मंहगाई नियंत्रण करने की नाकामी मोदी सरकार पर भारी पड़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि अब तो जनता ने भी यह मान लिया हैकि कम से कम मंहगाई के मोर्चे पर मोदी और मनमोहन सरकार में ज्यादा अंतर नहीं हैं। बस, फर्क है तो इतना भर कि मनमोहन सरकार की नाकामी का ढ़िढोरा बीजेपी वालों ने ढोल-नगाड़े के साथ पीटा था, जबकि कांग्रेस और विपक्ष मंहगाई को मुद्दा ही नहीं बना पा रहा है।

शायद यही वजह है, जनता के बीच अब मंहगाई पर चर्चा कम हो रही है। एक समय था जब प्याज या टमाटर के दाम में जरा सी भी वृद्धि होती थी तो बीजेपी वाले पूरे देश में हाहाकार मचा देते थे, लेकिन आज हमारे नेतागण और तमाम बुद्धिजीवी मोदी सरकार को घेरने के लिये मंहगाई को मुद्दा बनाने की बजाये साम्प्रदायिकता, विचारधारा की लड़ाई, राष्ट्रवाद की बहस में ही उलझे हुए हैं।

हाल ही में टमाटर सौ रूपये किलो तक बिक गया, मगर यह सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन पाया। इसी प्रकार आजकल प्याज भी गृहणियों को रूला रहा है। पिछले वर्ष दाल के भाव आसमान छूने लगे थे, उरद सहित कुछ अन्य दालें तो 200 रूपये किलो तक बिक गई। गरीब की थाली से दाल गायब हुई, मगर विपक्ष गरीबों का दर्द नहीं बांट सका।
इन दिनों सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि पर एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस के समय जब रसोई गैस के दाम बढ़ते थे तो किस तरह से बीजेपी के नेता अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज आदि धरने पर बैठ जातै थें।

अभी, रसोई गैस के दाम बढ़ते ही स्‍मृति ईरानी की पुरानी तस्वीर और ट्विट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी थी,जिसमें वह मनमोहन सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने पर सिलेंडर को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं,लेकिन कांग्रेस की तरफ से ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है।

बीते अगस्त महीने की बात है केंद्र की मोदी सरकार ने बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम में 86 रुपये की बढ़ोतरी कर दी थी। सरकार ने इसके पीछे अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में एलपीजी के दाम बढ़ना वजह बताया। जो बिना-सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 466.50 रुपए का था। उसके बाद से छह किस्तों में यह 271 रुपए यानी 58 प्रतिशत महंगा हो चुका है। तेल कंपनियों ने सब्सिडीशुदा रसोई गैस सिलेंडर का दाम भी मामूली 13 पैसे बढ़ाकर 434.93 रुपए प्रति सिलेंडर कर दिया। इससे पहले इसमें 9 पैसे की वृद्धि की गई। दो मामूली वृद्धि से पहले सब्सिडीशुदा गैस के दाम आठ बार बढ़े हैं और हर बार करीब दो रुपए की इसमें वृद्धि की गई। मगर कहीं कोई हाय-तौबा नहीे हुई।

बात 2014 से आज तक बढ़ती मंहगाई की कि जाये तो 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। अरहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है. बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी। 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है। दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है. यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है।

हालांकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा मनमोहन सरकार के मुकाबले राहत भरा है। मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी तो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत रहा। इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 पर आ गई। दिल्ली में सब्सिडी वाला रसोई गैस का सिलिंडर मई 2014 के 414 रुपये के मुकाबले अब 442.77 रुपये में मिल रहा है। जबकि डीजल और पेट्रोल के दामों में अंतर नहीं आया है, लेकिन विरोधियों की दलील है कि दुनिया के बाजार में तेल-डीजल बनाने का कच्चा माल पहले की अपेक्षा जितना सस्ता हुआ है मोदी सरकार उस अनुपात में पेट्रोल डीजल सस्ता नहीं कर रही है।

अगस्त में खुदरा महंगाई दर भी थोक महंगाई दर की तरह चार महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई। अगस्त में थोक महंगाई की दर जुलाई के 1.88 फीसद से बढ़कर 3.24 फीसदी के स्तर पर पहुंच गयी। अगस्त 2016 में थोक महंगाई सूचकांक में 1.09 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। अगस्त में थोक महंगाई में आई इस तेजी की वजह खाद्य पदार्थो और ईंधन की कीमतों में आई तेजी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई में और इजाफा हो सकता है, ऐसे में ब्याज दरों में कटौती के लिए अभी इंतजार करना पड़ सकता है। थोक महंगाई सूचकांक में आई तेजी की सबसे बड़ी वजह सब्जियों के दामों में हुई बढ़ोतरी रही है। जुलाई में सब्जियों की महंगाई दर्शाने वाले सूचकांक में 21.95 फीसद की वृद्धि हुई थी। लेकिन अगस्त में यह वृद्धि 44.91 फीसद के स्तर पर पहुंच गयी। इसके पीछे बड़ी वजह प्याज की कीमतों में आई तेजी रही।

प्याज की कीमत अगस्त महीने में 88.46 फीसद की दर से बढ़ी जो जुलाई में 9.50 फीसद के स्तर पर थी। इसके अलावा फल, सब्जियों, मीट, मछली की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईधन जनित महंगाई भी अगस्त में दोगुनी हो गई। जुलाई में फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में महंगाई दर 9.99 फीसद रही जो जुलाई 1016 में 4.37 फीसद पर थी। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ रहीं कीमतें और पावर टैरिफ में की गई बढ़ोतरी ही फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में आई तेजी का असली कारण है।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मोदी और जेटली के ‘कुशल’ नेतृत्व के कारण विनिर्माण क्षेत्र भयंकर मंदी का शिकार!

Ashwini Kumar Srivastava : आठ साल पहले…यानी जब दुनियाभर में मंदी के कारण आर्थिक तबाही मची थी और भारत भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में वैश्विक मंदी से जूझ रहा था… हालांकि उस मंदी में कई देश रसातल में पहुंच गए थे लेकिन भारत बड़ी मजबूती से न सिर्फ बाहर आया था बल्कि दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका और चीन से लोहा लेने लगा….

मगर आज यह विनिर्माण क्षेत्र वापस उस वैश्विक मंदी वाले रसातल में कैसे पहुंच गया? आज तो दुनिया में कहीं मंदी भी नहीं है…फिर मोदी जी के कुशल नेतृत्व और अरुण जेटली जैसे मेधावी वित्त मंत्री के निर्देशन में भारत की अर्थव्यवस्था तो अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर रही है।

हो न हो, ये आंकड़े ही गलत हैं। सब साले मोदी के दुश्मन, मुस्लिमपरस्त और राष्ट्रद्रोही हैं। इन फर्जी आंकड़ों को आज के अखबार में छाप कर वे यह समझ रहे हैं कि मैं मोदी या जेटली पर संदेह करूँगा? मूर्ख हैं ऐसे लोग।

खुद मोदी के सबसे बड़े आर्थिक सूरमा पनगढ़िया भले ही मोदी और जेटली के डूबते हुए आर्थिक जहाज से भाग खड़े हुए हों लेकिन मैं किसी भी हालत में मोदी का समर्थन करना नहीं छोडूंगा। कभी सपने में भी मोदी के किसी फैसले पर उंगली नहीं उठाऊंगा।

दुनिया भले ही इस तरह के आंकड़े देकर हमें भारत की आर्थिक बदहाली का डर दिखाती रहे, मैं तो वही देखूंगा, सुनूंगा और मानूँगा, जो मोदी चाहते हैं।

हटा दो इस तरह की सारी नकारात्मक खबरें मेरे सामने से। मुझे तो वह खबर दिखाओ, जिसमें लिखा हुआ है कि महाराणा प्रताप ने अकबर को हरा दिया था, डोभाल ने पाकिस्तान को घुटने टिकवा दिए थे और चीन हमारी ताकत से थर थर कांप रहा है…

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी जी! कब सुनोगे ‘बेरोजगारों’ के मन की बात

बेरोजगारों को रोजगार का सपना दिखाकर भारी बहुमत से सत्ता में आये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अच्छे दिन के वादे शिक्षित बेरोजगारों के लिये शेखचिल्ली के ख्वाब साबित हुए हैं। चपरासी की 5 पास नौकरी के लिये जहां एमबीए, बीटेक, एमटेक, ग्रेजुएट युवा लाइनों में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट में मोदी सरकार को तो कटघरे में खड़ा ही किया गया है बल्कि भारत में बढ़ती बेरोजगारों की संख्या ने भी भयावह कहानी बयां की है। जो आने वाले दिनों में बड़े विवादों का कारण बन सकती है।

पिछले दिनों मोदी की बीजेपी सरकार को आए तीन साल पूरे हो गए हैं, लेकिन मोदी के वादे अभी भी अधूरे पड़े हैं। मोदी ने सरकार बनने से पहले युवाओं से वादा किया था कि जैसे ही उनकी सरकार आती है, वे सबसे पहले देश के 1 करोड़ युवाओं को नौकरी देने का काम करेंगे, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद अभी भी देश में करोड़ों की संख्या में युवा बेरोजगार बैठे है। बेरोजगारों का सपना था कि अगर मोदी जी की सरकार बनी तो उनके अच्छे दिन आ जायेंगे और उन्होंने मोदी जी की रैलियांे में तो जय-जयकार की ही बल्कि गांव की गलियों से लेकर महानगरों तक घूम-घूमकर मोदी के पक्ष में जमकर वोटिंग भी कराई। उस समय युवाओं में मोदी के प्रति जो जोश और जुनून था वह सरकार बनने के बाद ठण्डा होता नजर आ रहा है। बल्कि सरकार के प्रति आक्रोश की झलक भी दिखाई दे रही है, जो कभी भी लावा के रूप में उभर सकती है। आखिर हो भी क्यों ना, जब आज तीन साल बाद भी ना तो बेरोजगारों के चेहरों पर चमक दिखाई दे रही है और न ही उनके सपने साकार होते नजर आ रहे हैं।

कहने को तो आजादी के बाद ही रोजगार की गंभीर समस्या रही है लेकिन 1991 से 2013 के बीच भारत में करीब 30 करोड़ लोगों को नौकरी की जरूरत थी. इस दौरान केवल 14 करोड़ लोगों को रोजगार मिल सका। बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और उनके आक्रोश को देखते हुए मोदी जी ने अच्छे दिनों का सपना दिखाकर उनका दिल तो जीता ही बल्कि प्रधानमंत्री की कुर्सी भी हासिल कर ली। मोदी सरकार ने युवाओं के सपनों को साकार करने के लिये स्किल इंडिया के तहत 2 अक्टूबर 2016 को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक और दो शुरू की। जिसके माध्यम से 2016 से लेकर 2020 तक यानी चार साल में 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी है, का पूरे देश में संचालन किया जा रहा है। लेकिन यह योजना जमीन पर कम कागजों पर ज्यादा दौड़ रही है। जिसमें एक तरफ सरकार ने हर साल 5 लाख युवाओं को ट्रेनिंग देने का दावा कर रही है वहीं पिछले दिनों आयी एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि 29 जून 2017 तक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना दो के तहत एक लाख 70,000 लोगों को ट्रेनिंग दी गई है। जबकि इस योजना के तहत हर साल पांच लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जानी थी यानी इस साल यह योजना काफी पीछे चल रही है।

छः जून की प्रेस काॅन्फ्रेंस में कौशल विकास मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कहा था कि जुलाई 2015 में लॉन्च हुई प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक के तहत साढ़े छब्बीस लाख लोगों को ट्रेनिंग दी चुकी है, जबकि कौशल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर लिखा है कि इस योजना के तहत करीब-करीब 20 लाख लोगों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है। लेकिन इस रिपोर्ट में मंत्री और मंत्रालय के बयान में साढ़े छह लाख काअंतर साफ नजर आता है। कौशल विकास योजना से जुड़े प्रशिक्षिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता दीपक गोस्वामी कहते हैं कि भारत सरकार प्रशिक्षण के नाम पर एनजीओ को 16 हजार रुपये का भुगतान कर रही है। जिसमें सांसद द्वारा सर्टिफिकेट के माध्यम से बेरोजगारों को शिक्षित करने का दावा किया जा रहा है। जबकि जमीनी धरातल पर इस योजना में बड़े पैमाने पर घोटाला और भ्रष्टाचार हो रहा है। जिससे बेरोजगारों के लिए यह योजना मात्र छलावा साबित हो रही है और एनजीओ मालामाल हो रहे हैं। जबकि भारतीय मजदूर संघ के मुताबिक नोटबंदी की वजह से 20 लाख नौकरियां चली गईं।

एक ओर प्रधानमंत्री मोदी देश और युवाओं की तकदीर बदलने का दावा कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट उनके दावांे और भाषणों को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में इजाफा होने के पूरे आसार हैं। नया रोजगार भी पैदा होने में कई अड़चनें आ सकती है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक बेरोजगारी दर और स्तर अल्पकालिक तौर पर उच्च बने रह सकते हैं क्योंकि वैश्विक श्रम बल में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। विशेषकर वैश्विक बेरोजगारी दर में 2016 के 5.7 प्रतिशत की तुलना में 2017 में 5.8 प्रतिशत की मामूली बढ़त की संभावना है।

आईएलओ के महानिदेशक गाइ राइडर के मुताबिक इस वक्त हमलोग वैश्विक अर्थव्यवस्था के कारण उत्पन्न क्षति एवं सामाजिक संकट में सुधार लाने और हर साल श्रम बाजार में आने वाले लाखों नवआगंतुकों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों के निर्माण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। आईएलओ के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और रिपोर्ट के मुख्य लेखक स्टीवेन टॉबिन ने कहा कि उभरते देशों में हर दो कामगारों में से एक जबकि विकासशील देशों में हर पांच में से चार कामगारों को रोजगार की बेहतर स्थितियों की आवश्यकता है।
मोदी सरकार के तीन साल से अधिक के कार्यकाल में तमाम योजनाओं की घोषणाएं की गईं लेकिन जमीनी धरातल पर कोई भी एक योजना साकार रूप लेती नजर नहीं आ रही है। जिसमें उच्च शिक्षित बेरोजगार सफाई कर्मचारी, चपरासी, होमगार्ड, चैकीदार, सिपाही, कांस्टेबल जैसे पदों के लिये आवेदन कर बेरोजगारी का खौफनाक सच उजागर कर रहे हैं।

लेखक मफतलाल अग्रवाल मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संपर्क : 08865808521 , mafatlalmathura@gmail.com

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हिंदू और यहूदी सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है!

Rajeev Mishra : प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा एक सरकारी दौरा नहीं है…एक राष्ट्र प्रमुख की दूसरे राष्ट्राध्यक्ष से मुलाक़ात भर नहीं है…यह दो प्राचीन सभ्यताओं का मिलन है… दो सभ्यताएं जिनमें बहुत कुछ कॉमन है…एक समय, इस्लाम की आपदा से पहले दोनों की सीमाएं मिलती थीं, पर दोनों में किसी तरह के टकराव की कहानी हमने नहीं सुनी. दोनों में से किसी को भी किसी और को अपने धर्म में शामिल करने की, अपने धर्म प्रचार की, मार्केटिंग की खुजली नहीं थी…

पर इतिहास में दोनों ने कुछ कॉमन गलतियाँ भी की हैं…सबसे बड़ी गलती की है; अपने काम से काम रखा है…हमने अपनी रोजी रोटी कमाने पर ध्यान दिया है…अपने बच्चे पाले हैं, अपने खेत जोते हैं, अपनी फसल काटी है, अपना सौदा बेचा खरीदा है. हिंदुओं और यहूदियों, दोनों सभ्यताओं ने विज्ञान, कला और संस्कृति को बहुमूल्य योगदान दिया है…पर दोनों में किसी को भी दुनिया जीतने का शौक कभी नहीं चढ़ा. दोनों के लिए धर्म का मतलब रहा, अपनी आत्मा का उत्थान…अपने बच्चों के संस्कार….

पर मानें या ना मानें, दोनों सभ्यताओं ने अपने काम से काम रखने की बहुत कीमत चुकाई है. दोनों को अपने घर में घुसे आ रहे आक्रांताओं को झेलना पड़ा है. यहूदियों को डेढ़ हजार साल तक बिना घर के रहना पड़ा है. लेकिन दुनिया भर में फैले यहूदियों ने कभी कोई शिकायत नहीं की. जहाँ रहे, कुछ दिया ही है. कोई आतंकवादी नहीं बना…किसी ने बदला लेने की नहीं सोची…किसी ने कड़वाहट और घृणा नहीं बाँटी… लेकिन हमेशा सबकी घृणा का शिकार हुए.

कुछ ऐसे ही आज हिन्दू हैं, पूरी दुनिया में फैले हुए…अपने काम से काम रखने वाले, अपने बच्चों को स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी भेजने वाले, उन्हें डॉक्टर-इंजीनियर-अकाउंटेंट बनाने के फिक्रमंद…दुनिया से बेखबर…अपने हाथ से अपना देश निकलता जा रहा है…कोई बात नहीं, कहीं भी रोटी कमा लेंगे… पर एक दिन यहूदियों की नींद खुली, जब उन्होंने अपने आप को कंसंट्रेशन कैम्प्स में पाया…अपने बिस्तर पर सोये थे, गैस चैंबरों में जागे…लाखों जीवन गँवाने के बाद एक सबक सीखा…अपना एक देश बनाने के लिए लड़े, जीते, जिये…

आज हिन्दू अपने ऐतिहासिक गंतव्य पर यहूदियों से सिर्फ कुछ पीढ़ी पीछे-पीछे चल रहे हैं. जो खो रहा है उसकी समझ नहीं है. जो आने वाला है उसकी खबर नहीं है. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उलझे हैं. 70 साल बाद देश ने हिन्दू जनमत वाला एक नेतृत्व चुना है. उसे भी अपने इस ऐतिहासिक दायित्व का बोध है कि नहीं पता नहीं…सड़क, बिजली-पानी, नोट बदलने और टैक्स के गणित में उलझे हैं. पूरा देश, पूरी सभ्यता ही इसी गणित में उलझी है…

नानी पालकीवाला का एक लेख पढ़ा था इजराइल के बारे में. लिखते हैं…भारत और इजराइल को एक दूसरे से बहुत कुछ सीखना है….भारत को इजराइल से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे चलाना चाहिए…इजराइल को भारत से सीखना है कि एक गणतंत्र को कैसे “नहीं” चलाना चाहिए…

मोदी जी इजराइल जाएंगे, यह एक ऐतिहासिक क्षण है. 70 सालों में किसी भी भारतीय नेता को यह नहीं सूझा…अब जब वो गए हैं तो सवाल उठता है कि वे वहाँ से क्या लेकर आएंगे. सिर्फ मेक इन इंडिया के एमओयू, रक्षा समझौते, नई तकनीक ले कर आएंगे…या वो सबक भी लेकर आएंगे जो यहूदियों ने औस्विज़ के गैस चैंबरों में सीखा था…

लंदन में मेडिकल फील्ड में कार्यरत राजीव मिश्रा की एफबी वॉल से.

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का सवाल- कोई भारतीय प्रधानमंत्री इससे पहले इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाया?

नजदीक होकर भी दूर क्यों रहा इजरायल… दो बरस पहले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इजरायल के एयरपोर्ट पर उतरे जरुर लेकिन पहले फिलीस्तीन गए फिर इजरायल दौरे पर गये। पिछले बरस जनवरी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज फिर पहले फिलिस्तीन गईं उसके बाद इजरायल गईं। लेकिन पीएम मोदी तो तीन दिन इजरायल में ही गुजारेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री इजराइल को लेकर संबंधों की नयी इबारत लिखने जा रहे हैं और भारत के उस एतिहासिक रुख को हमेशा के लिए खत्म कर रहे हैं, जिसकी छांव में गांधी से लेकर नेहरु तक की सोच अलग रही। महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में कई यहूदियों को अपना दोस्त बताते हुए लिखा, “यहूदियों के लिए धर्म के आधार पर अलग देश की मांग मुझे ज्यादा अपील नहीं करती। फिलीस्तीन अरबों का है, जिस तरह इंग्लैंड ब्रिटिश का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का है और अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय है”।

इतना ही नहीं, 21 जुलाई 1946 को लिखे अपने एक और लेख में महात्मा गांधी ने लिखा, “दुनिया ने यहूदियों के साथ बहुत क्रूरता की है। अगर उनके साथ क्रूरता नहीं हुई होती तो उनके फिलिस्तीन जाने का सवाल ही नहीं उठता।” लेकिन महात्मा गांधी के विचार भारत की आजादी से पहले के थे। भारत की आजादी के बाद 29 नवंबर 1947 के बाद संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के मुद्दे पर वोटिंग होनी थी। उससे पहले भारत का समर्थन जुटाने के लिए इजराइल ने उस वक्त के सबसे बड़े यहूदी चेहरों में एक दुनिया के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन को मैदान में उतारा। आइंस्टाइन नेहरु के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे। नेहरु भी उनका बहुत सम्मान करते थे। 13 जून 1947 को अपने चार पेज के खत में आइंस्टान ने नेहरु को लिखा, “प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में हैं, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं। उन्हें न्याय और समानता चाहिए।”

इस खत में यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विस्तार से जिक्र था। इसके अलावा कई तर्क थे कि क्यों यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र चाहिए। नेहरु ने करीब एक महीने तक खत का जवाब नहीं दिया। फिर 11 जुलाई 1947 को जवाब देते हुए लिखा, “मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे यहूदियों के प्रति बहुत सहानूभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है। मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और उन्होंने वहां के लोगों का जीवनस्तर सुधारने में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है। आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद वो अरब का दिल जीतने में क्यों कामयाब नहीं हुए। वो अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ क्यों अपनी मांगे मानने के लिए विवश करना चाहते हैं।”

दरअसल गांधी नेहरु की सोच 1992 तक जारी रही। लेकिन 1991 में यूएसएसआर का ढहना, खाडी युद्ध और भारत के आर्थिक सुधार ने अमेरिका के साथ संबंधों के दरवाजे खोले और उसमें इजरायल से करीबी अमेरिकी संबंधों तले जरुरत बनी। 29 जनवरी 1992 को फिलिस्तीन राष्ट्रपति यासिर अराफात की सहमति के बाद भारत ने इजरायल के साथ डिप्लामेटिक संबंध को पूर्ण रुप से बहाल किया। लेकिन जिस दौर में इजरायल से संबंध नहीं भी थे तो उसका दूसरा चेहरा युद्ध के दौर में नजर आया। इतिहास के पन्ने बताते है कि 62, 71 और 99 के कारगिल युद्ध के वक्त इजरायल ने गुपचुप तरीके से भारत की मदद की थी और भारत ने बिना राजनयिक संबंधों के इजरायल से मदद मांगी भी थी।

1962 का युद्ध तो चीन का भारत की पीठ में छुरा भोंकने जैसा था। भारत युद्ध के मैदान में जा पहुंचा तब भारत की हालत ठीक नहीं थी। जिस नेहरु की अगुवाई में इजराइल गठन के विरोध में भारत ने 1950 में संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग की थी, उन्हीं नेहरु ने 1962 युद्ध के वक्त इजराइल से मदद मांगी। इजराइल फौरन तैयार हो गया। लेकिन नेहरु ने इजराइल के सामने एक शर्त रख दी। शर्त यह कि जिस शिप से हथियार भेजे जाएं, उस पर इजराइल का झंडा न हो और हथियारों पर इजराइल की मार्किंग न हो”। इजराइल के पीएम को बगैर झंडे वाली बात हजम नहीं हुई। उन्होंने हथियार देने से मना कर दिया। बाद में इजराइल के झंडे लगे जहाज को भारत ने मंजूर कर लिया तो इजराइली मदद भारत पहुंची। फिर 1971 के युद्ध में तो अमेरिका ने भारत के खिलाफ ही अपने सातवें बेड़े को भेज दिया लेकिन तब भी इजराइल ने भारत को गुपचुप तरीके से हथियार भेजे और उन्हें चलाने वाले लोग भी।

अमेरिकी पत्रकार गैरी बैस की किताब ‘द ब्लड टेलीग्राम’ में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पी एन हक्सर के दस्तावेजों के हवाले से कहा गया है कि “जुलाई 1971 में इस्राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने गुप्त तरीके से एक इस्राइली हथियार निर्माता से कहा कि वह भारत को कुछ मोर्टार और हथियार मुहैया कराए और साथ ही उन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने वाले कुछ लोग भी दे। जब हक्सर ने समर्थन के लिए इस्राइल पर जोर डाला तो गोल्डा मायर ने मदद जारी रखने का वादा किया।” जाहिर है इजराइल ने भारत से दोस्ती निभायी। 1999 में कारगिल युद्ध तो नयी पीढ़ी के जेहन में भी ताजा है। इस युद्ध से महज सात साल पहले ही भारत ने इजराइल के साथ पूर्ण रुप से राजनयिक रिश्ते के तार जोडे थे। लेकिन महज सात साल की औपचारिक दोस्ती को इजराइल ने युद्ध में ऐसे निभाया कि हेरॉन और सर्चर यूएवी दिए। जिनकी मदद से कारगिल की तस्वीरें ली गईं थीं वह इजरायल से आई। इजरायल ने भारत को मानवरहित विमान उपलब्‍ध कराए। सैटेलाइट से ली गई उन तस्वीरों को भी भारत से साझा किया, जिसमें दुश्मन के सैन्य ठिकाने दिख रहे थे। इतना ही नहीं, इजरायल ने बोफोर्स तोप के लिए गोला बारुद मुहैया कराया। भारतीय वायु सेना को मिराज 2000 एच युद्धक विमानों के लिए लेजर गाइडेड मिसाइल भी उपलब्‍ध कराए। यानी जिस दौर में इजरायल से कोई रक्षा समझौता भारत ने किया ही नहीं, उस दौर में इजरायल ने भारत को हथियार दिये।

अब इजरायल के साथ खुले तौर पर रक्षा संबंधों का दायरा इतना बडा हो चला है कि प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ही रक्षा क्षेत्र में एकमुश्त कई बड़े डील की तैयारी हो चुकी है और 17 हजार करोड़ की मिसाइल डील को भारत मंजूरी भी दे चुका है। तो आखिरी सवाल, इन सबके बावजूद इससे पहले कोई प्रधानमंत्री इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाए। सच यही है कि एक तरफ देश में वोट बैंक की राजनीति है जो मानती है कि मुस्लिमों के मन में इजरायल को लेकर कड़वाहट है तो इजरायल के साथ खडे कैसे हुआ जाये। दूसरी तरफ 80 लाख भारतीय श्रमिक अरब देशो में काम कर रहे हैं। कही 70 के दशक की तर्ज पर इजरायल का साथ देने वालों के खिलाफ अरब वर्ल्ड ना खड़ा हो जाये। ये जहन में रहता जरुर है। वजह भी यही रही कि कांग्रेस को हमेशा लगा कि इजरायल से संबंध बढ़ाने का मतलब अरब देशों को खफा करना होगा, और इजरायल से संबंध भारत में रह रहे मुसलमानों को भी पार्टी से दूर करेगा। यानी राजनयिक संबंधों की डोर का एक सिरा भी घरेलू राजनीति के वोट बैंक से जुड़ गया। तो दूसरी तरफ बीजेपी के लिये मुस्लिम वोट बैक कोई मायने नही रखता है ये भी दूसरा सच है । क्योकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को महज 44 लोकसभा सीट मिली तब भी पार्टी को 37.60 मुस्लिम वोट मिला। वहीं बीजेपी को 282 सीटों पर जीत मिली लेकिन बीजेपी को 8.4 फीसदी मुस्लिम वोट मिला। तो सवाल कई है। लेकिन संबंधों की नई लकीर अगर पुरानी लकीर को मिटा रही है तो इंतजार करना होगा। रास्ता आगे का ही निकलना चाहिये।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी आजतक न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखने की मोदी की दोगली नीति पर भाजपाई चुप क्यों हैं?

Yashwant Singh : ये तो सरासर मोदी की दोगली नीती है. देश को एक कर ढांचे में लाने की वकालत करने वाले मोदी आखिर पेट्रोल डीजल को जीएसटी से क्यों बाहर रखे हुए हैं. ये तर्क बेमानी है कि राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल से भारी टैक्स से काफी पैसा पाती हैं, जिसे वह खोना नहीं चाहतीं.

भाजपा की केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें अगर अपना अपना हिस्सा खत्म करते हुए पेट्रोल डीजल को जीएसटी के दायरे में ले आएं तो जनता को भारी राहत मिलती. पर ऐसा नहीं करेंगे ये लोग क्योंकि थोक में फायदा तो ये बड़े लोगों को देते हैं. माल्य से लेकर अडानी तक. अंबानी से लेकर टाटा-बिड़ला तक. पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने से इनका दाम आधा हो जाता. यही कारण है कि केंद्र सरकार इसे तो जीएसटी से बाहर रखे हुए है ताकि इससे भारी मात्रा में जनता से पैसा वसूला जाता रहे और बाकी सामान को जीएसटी में लाकर महंगाई बढ़ाने की कवायद कर रहे हैं.

नारा दे रहे हैं एक देश और एक कर का. लेकिन ये नारा बेकार साबित हो जाता है पेट्रो प्रोडक्ट्स को जीएसटी से बार रखने के फैसले से. आजकल ह्वाट्सअप पर ये वाला मैसेज खूब भेजा जा रहा है, आप भी पढिए-

Why petrol and diesel prices are not brought under GST. Now for petrol and diesel the central exise duty is 23% and state VAT is 34%. Total tax is 57%. If these essential products are brought under GST , the maximum tax will be only 28%, which means the prices of petrol and diesel can come down by almost 50%. The public at large will be benefited.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. इस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं–

Harshendra Singh Verdhan : Dada, It’s somehow difficult in Fertiliser sector too..18% for processed complex on raw materials & 12% on Imported. So; nothing for homemade indigenous Fertilisers. An easy way to Chinese poor quality fertilisers.

Care Naman : यदि जीएसटी सब पर तो पेट्रोल और दारु दोनों पर भी लागू करें… ये तो वही हुआ कड़ुआ कड़ुआ थू थू… मीठा मीठा गप गप…

Vijayshankar Chaturvedi : Larger public interest will not be bothering to them until 2019.

Divakar Singh : State governments opposed centre’s move to bring petroleum under gst. As you mentioned, state govts earn huge money from it, so they don’t want to bring it under gst. Centre wants to bring everything under gst. So we should ask respective state govts.

Yashwant Singh : जो बुरा है, वो दूसरों का है। जो अच्छा है, वो सब मेरा है। 🙂

Divakar Singh : बुरा भी अपना हो सकता है, पर इस केस में नही है। बेचारे जेटली जी बहस करते रह गए पर कोई राज्य तैयार नही हुआ पेट्रो उत्पादों के लिए gst लागू करने के लिए। ऐसे में केंद्र सरकार को दोषी बताना तथ्यात्मक नही है। देखें इस लिंक को : Petroleum products to be under GST if states agree: Minister

Yashwant Singh सेंटर को अपना हिस्सा छोड़ देना चाहिए था ताकि मोदी जी की नीयत तो साफ सही दिखती. साथ ही जिन स्टेट्स में बीजेपी है, वहां भी हटवा सकती थी. इसके बाद बीजेपी के लोग गैर बीजेपी राज्यों की सरकारों को एक्सपोज कर सकते थे. पर ऐसा नहीं, क्योंकि पेट्रोल डीजल बहुत ज्यादा सस्ता हो जाने से गरीबों को फायदा होता, महंगाई कम होती. बड़े उद्यमी घरानों को लाभ पहुंचाने वाले मोदी भला बल्क में यानि थोक में गरीबों को राहत कैसे दे सकते थे.

Rajeev Verma : पेट्रोल डीजल यदि gst के दायरे में कर देते तो input credit देने में सरकार का धुंआ निकल जाता. चीजें आश्चर्य जनक रूप से सस्ती हो जातीं.

Rajeev Pandey : Modi dhongi pakhandi hai uske maalik Ambani ki kamayi kam ho jayega jo Modiya kabhi nahi chahta.

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मोदी सरकार की नीतियों से देश का बहुत कुछ बर्बाद हो गया

तीन साल पहले उन दिनों जब ‘अच्छे दिन’ का नारा दिया गया था, किसान, नौजवान सब खुश थे क्योंकि घोटालेबाज कांग्रेस सरकार के जाने और नई मोदी सरकार के आने की उम्मीद सबको लगने लगी थी। लेकिन मोदी सरकार ने जो कुछ था ठीकठाक उसे भी तबाह कर डाला। सवाल यह उठता है कि ये देश सिर्फ कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं या भक्तों भर का है जो क्षण क्षण में देशद्रोही, उपद्रवी का प्रमाण पत्र बांटते फिरते हैं या ये सवा सौ करोड़ वासियों का देश है जहाँ 80 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। 60 करोड़ लोग भूखे हैं। लेकिन भक्त मण्डली ये भजन करती है कि गरीब निक्कमे हैं, काम नहीं करते। फ्री में खाना चाहते हैं। अरे भैय्या आपके पास ऐसा कौन सा काम है जो सवा सौ करोड़ वासियों को रोजग़ार देने का वादा करते हैं। जो वादा सरकार नहीं कर पा रही है वह भक्त मंडली कर रही है।

कितना भयावह है भविष्य : देश में ब्लैक मनी का कारोबार ढाई लाख करोड़ से ज्यादा था। जब यह बंद हुआ तो 4 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए। इन्हें रोजगार देने के कोई विकल्प तैयार नहीं किये गए। बल्कि हायर एंड फायर को क़ानूनी मान्यता देने के प्रयास किये जाने लगे। नतीजन लोग खेती की तरफ भागे। नोटबंदी के बाद जो नीतियां बनी वह भी गला घोंटने वाली थी।

देश में चौतरफा घाटा : अब सरकार की नीतियों के कारण जीडीपी में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है। 15 लाख करोड़ रुपये टैक्स के रूप में पाने वाली भारत सरकार इस साल 12 से 13 लाख करोड़ ही पा सकती है। अब इसे 15 लाख करोड़ करने के प्रयास में कानून का शिकंजा कसेगा, पुलिस की अवैध उगाही बढ़ेगी। नतीजन जनता में आक्रोश फैलेगा। ऊपर से 10 लाख करोड़ का npa एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा वाली कहावत चरितार्थ करेगा। इसके बावजूद भी भारत सरकार को दूसरे देश में बसे लोगों के पेट की चिंता सता रही है। नतीजन पड़ोसियों को सस्ता कर्ज, विदेशों से हथियार खरीदी पर फ़ोकस किया जा रहा है। और विदेशी भारत को बड़ी दुकान के रूप में देख रहे हैं। तो हथियारों की अवैध तस्करी तेज हो सकती है। एक अव्यवस्था की खीझ हर तरफ पड़ती है। और इसका असर सीमा पर जवानों पर भी पड़ने की आशंका है। जो भयावह हो सकता है।

महंगाई नहीं बढ़ेगी : चूँकि गैर कानूनी तरीके से की गई नोटबंदी के बाद लोग कृषि की तरफ पलायन कर गए हैं इसलिए खूब पैदावार होने की संभावना है। इसलिए महंगाई तो नहीं बढ़ेगी। लेकिन व्यापारी एक गणित लगा रहे हैं कि किसी तरह ऐसे जिंसों को एक साथ खरीद लिया जाये। जिससे बाजार में इसकी भारी कमी हो जाये। और सरकार उनसे यही फसल दोगुने दाम पर खरीदने को मजबूर हो।

समाधान क्या है : समाधान एक ही है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम लागू की जाय जिसके तहत हर माह हर नागरिक को न्यूनतम 3 हजार की इनकम निश्चित की जा सके। तभी इस भयावह महामारी पर काबू पाया जा सकता है नहीं तो गृह युद्ध से कोई नहीं रोक सकता है।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
maheshwari_mishra@yahoo.com
पत्रकार

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किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

ये किसान चाहते हैं कि उन्हें सूखे में खराब हुई फसलों का मुआवजा मिले। साथ ही उनके कर्जे माफ़ कर दिए जाएं। और बुजुर्गों के लिए सरकार पेंशन की व्यवस्था करे। पीएम आवास की तरफ मार्च कर रहे इन किसानों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। और फिर इन्हें जंतर-मंतर पर लाकर पटक दिया। इनका कहना है कि अब ये लौटकर जाने से रहे। क्योंकि इनके पास वहां खाने के लिए कुछ नहीं बचा है। भले उन्हें यहां भीख ही क्यों न मांगनी पड़े ये यहीं रहेंगे।

देश के लोगों का पेट भरने वाले किसान के हाथ में अगर भीख का कटोरा आ गया है। तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि हालात किस कदर बदतर हो गए हैं। ऊपर से अपनी बदहाली दिखाने के लिए अगर उसे अपने परिजनों की कब्रें खोदकर उनकी खोपड़ियां हाथ में लेनी पड़े तो समझिए सरकारी संवेदना पाताल के किस हिस्से में पहुंच गई है। कहां तो हम दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहे हैं। लेकिन सामाने की हकीकत है कि उसे देखना ही नहीं चाहते। या फिर देखकर भी अनदेखा कर देना चाहते हैं।

महेंद्र मिश्रा सहारा समय, न्यूज एक्सप्रेस समेत कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.


Satyendra PS : ये​ हरियाणा के किसान हैं,खेतों के लिए पानी मांग रहे थे। नहर का काम पूरा कराए जाने का वादा था वही पूरा कराना चाहते थे ! इस चेहरे में अपना चेहरा देखें, पिता, चाचा, भाई का चेहरा देखें। उन सबका चेहरा देखें जो सरकार से कुछ उम्मीद करते हैं, जो सरकार से कुछ छोटी मोटी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। लोकतंत्र लहूलुहान है। अपने रक्त में नहाया यह देश का किसान है!

सत्येंद्र प्रताप सिंह बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी अखबार के दिल्ली एडिशन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.


उपरोक्त तस्वीरों पर कुछ टिप्पणियां…

Anil Mishra पानी मांग रहे थे तो सिर्फ लाठी खाये। अगर सरकार इनकी जमीन मांगती तो गोली खाते। इसमें कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा का कोई लेना देना नहीं। यही परम्परा है। लोकतंत्र धोखा है। असल लड़ाई पूँजीवाद वर्सेस सर्वहारा है। गरीब को मार ही खाना है। सरकार किसी की भी हो।

Mahendra K. Singh लोग इस समय “राष्ट्रवाद” की अफीम खाकर मस्त हैं, वे इस तस्वीर में अपने पिता, चाचा, भाई का चेहरा तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक उन के चाचा, पिता, भाई खुद इस जुल्म का शिकार न हो जाएँ। वैसे राष्ट्रभक्तों का यह मानना है कि खेती बारी आम लोगों के बस की बात नहीं है, इन लोगों को अपने खेत “राष्ट्रभक्त कॉर्पोरेट” जैसे अम्बानी और अडानियों को सौंप देने चाहिए, वे सेठ लोग फिर इन्ही गरीब लोगों को अपना मज़दूर बना कर उन्ही के खेतों में खेती करवाएंगे, फिर नफे-नुक्सान की कोई चिंता नहीं रह जायेगी, इन सब लोगों को एक निश्चित तनख्वाहें मिलेंगी और फिर सब खुश। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यही किया, छोटे-छोटे किसानों के खेत खरीद लिए अब उन पर बड़े पैमाने पर खेती करवाते हैं – जैसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां लाखों एकड़ बड़े खेतों में आलू के खेती, ब्रेड बनाने वाली कंपनियां ऐसे ही मीलों तक फैले खेतों में गेहूं की खेती। वही मॉडल भारत में लाकर मोदी जी देश का विकास करना चाहते हैं और इस किसान जैसे कुछ “राष्ट्रद्रोही” मोदी की योजना पर पानी फेरना चाहते हैं – कपार तो फूटना ही चाहिए ऐसे “राष्ट्रद्रोहियों” का।

Shaukat Ali Chechi मैं तहे दिल से लानत भेजता हूं ऐसी सरकारों पर अगर इस देश में ईमानदार है खून पसीने की खाता है गरीब है 70 परसेंट देश को चला रहा है देश की सरहदों की रक्षा करने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जिनको सरकार के मंत्री कायर कहते हैं वह है किसान हमारे पूर्वजों ने नारा दिया था जय जवान जय किसान आज उनकी यह हालत उनकी दुर्गति उनका अपमान जो देश का भी पेट भरता है पशु पक्षियों का भी पेट भरता है उसके पैदा करे हुए माल से देश की पहचान व तरक्की है आखिर इनका कौन सा गुनाह है कोई देशवासी तो बताएं

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नोट बदलने का खेल एक शुद्ध राजनैतिक छलावा!

काला धन, काला धन, काला धन … ये संकल्पना ही सिरे से गलत है . दरअसल राजनैतिक पैतरे बाज़ी का यही कमाल है और बाबु किस्म के जीव इस पैतरे बाज़ी में अपना करियर चुनते हैं जिसे प्रोफेशन कहते हैं और उन बाबुओं को प्रोफेशनल . साफ़ और सच बात ये है कि पैसा घोषित होता है या अघोषित होता है ..काला या सफेद नहीं होता . लेकिन सारे के सारे जनता को काले पैसे के नाम पर गुमराह कर रहे हैं और बहुमत वाली सरकार उस काले धन को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध और देश भक्त है ..बाकी सब इस बहुमत वाली सरकार की नज़र में क्या है? ये अब कहने की जरूरत नहीं …

दरसल बहुमत वाली सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत ये है की वो “कुछ” करते हुए दिखना चाहती है पर असल में “कुछ” करना नहीं चाहती  और उपर से उद्घोषणा का ग्रांड स्टाइल व्यक्तिवादी तरीका …जैसे गोया एक तानाशाह की सरकार हो .. ना मंत्री मंडल .. ना सलाहकार ना कोई मन्त्रणा ..बस एक सनक की उठे और  त्यौहार में विलुत्प होती अपनी चर्चा को धमाके से सुर्ख़ियों में लाना … और ऐलान करना देखो मैं हूँ और … अब से मेरे हिसाब से चलो ..सुबह लाइन लगाना ..दूध ..सब्जी ..दवाई .. आटा यानी रोज़मर्रा की सारी चीज़ें खरीदते हुए मेरे नाम की माला जपना …  ऐलान में कहा गया किसी को पता नहीं है की ये निर्णय लिया जा रहा है .. पर पूंजीपतियों ने तो पहले ही 30 दिसम्बर तक का ऐलान कर रखा है अपने मोबाइल और इन्टरनेट नेटवर्क का जिसकी पब्लिसिटी स्वयं “उद्घोषक” कर रहे हैं .

दावा “काला धन” खत्म ..बहुमत वाली सरकार के मुखिया ने कहा “बहनों , भाइयो .. बोरों में पैसे भरके रखें  हैं ..बात सही है ..ख़बरों में ..बोल चाल में .. सामान्य व्यवहार में ये देखने , सुनने में आता है कि राजनेताओं और  सरकारी बाबुओं के घर में … “बोरों और बक्सों में नोट मिलते हैं”  .. अब इन बक्सों में नोट रखने वाले चंद लोगों के लिए 125 करोड़ जनता की फजीहत . क्योंकि गुड गवर्नेंस , आयकर विभाग , एमनेस्टी स्कीम सब टांय टांय फिस्स ! जरा विश्लेष्ण करें की ये बक्सों में नोट भरकर रखने वाले … इतने नोट लाते कहाँ से हैं ..उनके पास वो कौन से तरीके हैं जिससे इतना धन उनके पास आता है ? क्या सरकर ने उन तरीकों को बंद किया ? मात्र नोट बदलने से क्या इन बक्सों वालों को फर्क पड़ेगा . जिन लोगों ने पहले वाले नोट दिए थे वही लोग इनको बड़े आराम से नये ‘वाले नोट” पुराने नोटों के बदले दे देंगें . इन अकूत नोट रखने वालों को जल्दबाजी तो है नहीं .. रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए तो उन्होंने ये ‘अकूत’ नोट रखे नहीं हैं . और जैसे ही ‘नोट’ बदलने की घोषणा हुई ..इन ‘अकूत’ नोट रखने वालों ने तुरंत ‘सोना’ खरीद लिया .. रातों रात सोने की और गहनों की दुकान खुली रहे ..बड़े आराम से ‘अकूत’ नोट सोने में बदल गया और बीमार व्यक्ति के लिए दवाई लेने वाली महिला दुकानदार से रात भर झगडती रही .. सरे आम  दलालों के वारे न्यारे .. बस्तियों में, स्टेशन पर .. टोल नाकों पर 500 रुपये के पुराने नोट के बदले ब्लैक में 400 रूपये देने का काम खुलम खुल्ला चला और जिनके पास खाते नहीं है उनके  साथ चल रहा है .. ये आम लोग फिर ठगे गये …  बहुमत सरकार के गृह राज्य में सरे आम 1500 ( तीन पुराने 500 के नोट)  रूपये के बदले 1000 ( सौ रूपये के 10 नोट) देने का कारबार चला …दलालों की चांदी ही चांदी…अब आप समझ गए .. आज सुबह बैंक का कर्मचारी अपने ग्राहक से कह रहा था , साहब ये सब चोर चोर मौसेरे भाई हैं ..नोट भी बदल गए और उनकी कीमत भी  ‘सोने’ से और बढ़ गयी .. और आप लोग भीड़ में एक दुसरे पर लाल – पीले हो रहे हो !

ये ‘अकूत’ नोट वाले ‘मेंढक’ की तरह है यानी विषम परिस्थतियों में  हाइबरनेशन में चले जाते हैं . ये नई सरकार आने तक या इसी सरकार की नीति बदलने तक पुराने नोटों को दबा के रख सकते हैं . मज़े की बात ये है कि… बात नोट बदलने की थी तो उसके लिए ‘आपात कालीन’ घोषणा करने की क्या ज़रूरत थी? ये काम तो पहले भी होता रहा है और बैंक करते रहे हैं ! ‘अकूत नोट वालों के पास बेनामी या नामी कारें , बंगलो , फ्लैट , आदि सम्पति होती है उसका क्या? जब नोट बंद करने हैं तो 500 और 2000 के नोट पुनः जारी करने की क्या ज़रूरत है .क्योंकि ऐलान में तर्क दिया गया कि आज 500 और 1000 के नोट का उपयोग 85 प्रतिशत लेन  देन  में हो रहा है . अरे  भाई जान लेना मंहगाई में जहाँ 500 रूपये में दाल और दूध नहीं आता ..वहां 100 रूपये के नोट की क्या औकात ? और दो महीने के बाद 2000 के नोट रखने में ‘बक्से’ कम लगेगें ! सरकार को जब 500 और 1000 के नोट बंद करने थे तो हमेशा के लिए करने थे ..नए नोट ज़ारी करने की क्या ज़रूरत .. अपने ही तर्क को अपने आप सरकार ने खारिज कर दिया है नए 500 और 2000 के नोट जारी कर ! दरअसल ‘कुछ” लोग अर्थ व्यवस्था को ‘आयकर नियमों’ के आईने में  समझ रहे हैं . वो ये भूल गए हैं की ‘अर्थ व्यवस्था’ के व्यापक आयाम हैं और उसमें मनोविज्ञान एवम सामजिक संरचना भी अहम है .

असल बात ये है की बहुमत वाली सरकार के मुखिया ‘अल्प ज्ञान , सतही समझ , गैर समझ , आधी अधूरी समझ और जनता में फैले कनफूजन को बड़ी कुशलता से अपने राजनैतिक फायदे के लिए उपयोग करने में माहिर है . उसने देश भक्ति के नाम पर यही किया है . जैसे जनता में ये आम समझ है की जो पैसा बैंक में है वो सफेद .. और जो हाथ में है वो काला.. अब सारे आम नागरिकों ने अपने 500 और 1000 रुपये के नोटों को  बाकयदा धक्का मुक्की करके ..पसीना बहाकर .. घंटों लाइन में खड़े होकर बैंक से ‘सफेद’ कर लिया . देश वासियों ने बड़ा त्याग किया और बहुमत वाली सरकार के मुखिया ने छलावा ! बहुत जल्द यूपी की चुनाव सभा में ये कहा जाएगा  “ भाइयो , बहनों .. हमने काले धन को बदल दिया .. आप सब ने साथ दिया .. आप सब खुद शामिल हुए … वैगहरा वैगहरा” जबकि हकीक़त में बदला ‘कुछ’ नहीं ! ये है जुमले बाज़ी !

अब थोडा बात करें की पैसा काला या सफेद नहीं होता .. वो घोषित या अघोषित होता है .. और जनता ये भी समझ ले की नकद पैसा भी सफेद है और बैंक में रखा भी … क्योंकि एक योग को हथियाए बाबा ‘स्विस बैंक’ में जमा काले धन को लाने की बात कर रहे थे पिछले लोकसभा चुनाव में .. बैंक में भी होता है काला धन .. यानी सरकार के नियमों के अनुसार अघोषित पैसा .. चाहे  वो बैंक में हो या नकद हाथ में .. अब इस नव उदारवाद काल में जब स्वयं ‘विश्व बैंक” एक लुटेरे की तरह काम कर रहा हो .. हमारे अपने बैंक घाटे में चल रहे हों .. बैंकों से अरबो रूपये का  क़र्ज़ लेकर पूंजीपति सरकार के सामने विदेशों में फ़रार हो रहे हों तो क्या जनता को बैंकों पर विश्वास करना चाहिए ? क्या ‘जनता’ को ये बात नहीं समझनी चाहिए की ये सिर्फ राजनैतिक चालबाज़ी है और उसको परेशान करने का एक सरकारी मुखिया का आदेश !

लेखक मंजुल भारद्वाज थिएटर एक्टिविस्ट हैं. वे अपने रंग विचार “थिएटर आफ रेलेवेंस” के सर्जक हैं. मंजुल मुंबई में रहते हैं और उनसे 09820391859 पर संपर्क किया जा सकता है.

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जस्टिस काटजू का मोदी के नाम खुला खत- 500 और 1000 के नोट रद्द करने वाले पागलपन भरे आदेश को निरस्त करें

My appeal to the Central Govt. regarding demonetization of Rs. 500 and 1000 notes.

Dear Mr. Modi,

Please immediately revoke this harebrained, asinine, madcap and reckless order of yours.

 

Do you realize how much chaos and problems it has created for the ordinary people throughout India? At first many witless people were praising you, without realizing its practical implications, thinking you have by one stroke solved the problem of corruption and black money, but as they are now experiencing the follow out of this scatterbrained idea of yours and are feeling the pinch they have begun cursing you. Your chamchas will of course not tell you this, and instead applaud you for this ‘masterstroke’, but being your ‘shubh chintak’ i am taking the liberty of telling you the truth.

Nowadays everyone deals with 500 1000 rupee notes, because its purchasing power is the same as that of a 100 rupee note or so only a few years ago ( because of rapid inflation )..Because of your nitwit order, hawala dealers have been created in large numbers, who are doing flourishing business. These people will take a 500 rupee note and give 4 hundred rupee notes.

Long queues have been formed before banks, people cannot get taxis, shopkeepers are in distress, there are traffic jams etc. One person spoke to me from Mumbai and said he wanted some bottles of bisleri water for 200 rupees for drinking purpose, but could not get it because he had no hundred rupee notes, only a 500 rupee one.

The big sharks who have a huge amount of black money have stacked it in foreign banks, but you have done nothing serious to retrieve it despite your election promise, and are instead harrassing the common man in India.

End this madness, Modiji

Markandey Katju

जाने माने न्यायाधीश रहे जस्टिस मार्कंडेय काटजू की एफबी वॉल से.

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मोदी को पता है 57 लोग देश का 85 हज़ार करोड़ डकारे हैं लेकिन इन्हें पकड़ने की हिम्मत नहीं

Dilip Khan : रिजर्व बैंक ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 57 लोगों ने बैंकों के 85 हज़ार करोड़ रुपए दबा रखा है। सरकार को इन 57 लोगों की गर्दन मरोड़नी चाहिए। हल्ला भी कम मचता। 30-40 हज़ार करोड़ रुपए के लिए हल्ला मचा दिया। दो नोटों को ख़त्म करके देश भर में लोगों को परेशान कर दिया। ब्लैक मनी ज़ब्त कीजिए। लेकिन जो कदम आसान था पहले वो उठाइए। आप इकोनॉमी को दुरुस्त करने के लिए काम कर रहे हैं कि हल्ला मचाने के लिए?

मोरारजी देसाई ने जब पांच और दस हज़ार रुपए के नोट को ख़त्म किया था, तो ये नोट्स सिर्फ़ धनिकों के पास होते थे। यानी ब्लैक मनी के सबसे बड़े संदिग्धों के पास। कितना बरामद हुआ था? घंटा। 500, 1000 इन दिनों तक़रीबन सबके पास होते हैं। बंद होने की ख़बर सुनकर एक महिला की मौत हो गई। चौतरफ़ा कोहराम मच गया है। कितने रुपए की बात है? 30-40 हज़ार करोड़ रुपए की। सरकार को पता है कि सिर्फ़ 57 लोग देश का 85 हज़ार करोड़ रुपए डकारे हुए है। हिम्मत है तो पकड़े उन्हें। ये ऐसा फैसला है जिससे कालाधन बरामद जितना भी हो, प्रभावित हर कोई हो रहा है। ज़ाहिर है सरकार की ये पहली स्कीम है जिसपर पूरा देश चर्चा कर रहा है। चर्चा कराना लक्ष्य है या ब्लैक मनी लाना? ब्लैक मनी लाना लक्ष्य है तो पकड़ो स्वीस और पनामा वालों को। सबसे पहले देश से ही शुरू करो। पकड़ो 57 लोगों को।

राज्यसभा टीवी में कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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मोदी तो बेचारे ऐसे फंसे कि पलटी भी नहीं मार सकते… जनता जमकर गरिया रही है गुरु… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : केजरीवाल का आड इवन और मोदी का करेंसी रद्द फैसला इतिहास याद करेगा. दोनों में बड़े लोगों / बड़े चोरों को कोई नुकसान नहीं था. दोनों में आम जन को मुश्किलों का सामना करना पड़ा… केजरीवाल ने तो समय रहते जनता को मूड समझ लिया और आड इवन को रद्दी की टोकरी में डाल दिया.. लेकिन मोदी तो बेचारे ऐसे फंसे कि अब पलटी भी नहीं मार सकते…. जनता जमकर गरिया रही है गुरु… जरा फेसबुक ट्वीटर छोड़ो और बैंकों की तरफ निकलो… उनसे पूछो जिनके घरों में बेटियों की शादियां हैं अगले कुछ दिनों में… उनसे पूछो जो मजदूरी करते थे दुकानों, मकानों, कांस्ट्रक्शन कंपनियों में.. सब ठप पड़ा है… भूखों मरने की नौबत आने वाली है..

मोदिया तो गया विदेश रे…

पांच सौ और हजार की करेंसी बंद होने से बैंकों के बाहर अराजकता का आलम है. ये वीडियो आज सुबह दिल्ली के एक बैंक के आगे का है. जनता का रेला धन बदलवाने के लिए तत्पर है और बैंक के दरवाजे बंद हैं. पूरा देश सब कुछ छोड़कर सिर्फ नोट बचाने बदलने की चिंता में डूबा है. विदेशों में, प्रापर्टी में और सोने में काला धन रखने वाले असली लुटेरे मौज में हैं, उन पर कोई असर नहीं. मोदी राज में देश क्या खूब तरक्की कर रहा है 🙂

देखें वीडियो : https://youtu.be/jtQYT8xc-dY

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को ठीक से समझने के लिए इन्हें भी पढ़ना जरूरी है…

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देश में आर्थिक आपातकाल लगा जनता को बुरे हाल में छोड़ कर विदेश निकल लिए प्रधानमंत्री जी (देखें वीडियो)

Abhishek Sharma : मोदी जी, झांसा किसे? बहुत बड़ा अर्थशास्त्री नही हूँ, जितना आम आदमी को अर्थ की जानकारी है, हां, उससे थोड़ा 19-20 होगा ही। 24 घंटे का ड्रामा बहुत हो गया। अब आप जापान निकल लिए। ठीक है। जरुरी दौरे करें। देश तरक्की करे। आपके दौरों से इससे ज्यादा न मुझे न किसी और को कुछ चाहिए। बात अचानक नोट बंद करने की है। इतना तो मैं क्या आम आदमी भी जानता है कि देश के कुल धन का आधा टॉप 100 उद्योगपतियों के पास है। इनको सरकार नये इन्वेस्टमेंट में छूट देती है, लोन देती है, उनको कागजी मदद भी।

मगर मोदी जी उन सौ लोगों को छोड़ (देश में मौजूद) कुल रकम की आधी ब्लैक मनी के लिए पूरी जनता (सवा अरब) को आपने परेशान किया। जिनके पास देश की कुल रकम का आधा हिस्सा है क्या वह सौ लोग ईमानदार हैं? आंकड़े गवाह हैं कि सरकार भी उन्हीं सौ लोगों को पाल पोस रही है जिनके पास देश की आधी रकम है। अब बात सवा अरब लोगों की करूँ… आपने तय समय में ब्लैक मनी घोषित करने पर छूट दी। मतलब जो लुटेरे रहे हैं उनको आपने डिस्काउंट ऑफर दिया, इन लुटेरों में वह आईएएस बंसल भी हैं जिसने बेटे संग सुसाइड कर लिया आपके तोते और अध्यक्ष पर आरोप लगाकर।

मोदी जी अब सुनिए खरी खरी… आपको आधी रकम के मालिक टॉप सौ लोग पालने पड़ रहे हैं। देश के दस हजार ब्लैक मनी वालों को आप डिस्काउंट ऑफर दे रहे हैं और वह मध्यम वर्ग जो दो जून की रोटी के लिए जी रही है उसको आप बैंक में लाइन लगवा रहे हैं? कितने मासूमो की गुल्लक फूटी, कितने गृहणियों (गृह लक्ष्मियों) की पैसे बचाने की आदत पर आपने पानी फेरा, कितने सराफा वालों ने इस रकम का सोना बेच डाला, कितने पेट्रोल पम्प वालों ने जबरन 500 का पेट्रोल डाला, काशी में चिताएं जलाना दूभर हुआ, शादी ब्याह के सीजन में परिवारों को चुनौती दी।

मेरे कहने का अर्थ यही कि आर्थिक आतंकवादियों और धन पशुओ को आप डिस्काउंट ऑफर दे रहे हैं उनकी जांच तक नही कर रहे और ड्रामा इतना कि देश भक्ति उबालें मारने लगी आपकी और हां उन लोगों की भी जो आज छुट्टा कराने को दर दर भटके। क्या आपके नये 2000₹ और 500₹ को पाकिस्तान कॉपी कर नकली करेंसी नही बना पायेगा? आपकी दिल्ली में बैठकर दस रूपये के अवैध सिक्के ढाले जा रहे थे और आर्थिक आतंकवाद बाहर से आने का रोना रो रहे हैं। माना कि उत्तरप्रदेश में चुनाव सर पर हैं सपा, बसपा को आर्थिक दिक्कतें होंगी मगर यह ख्याल आपको आया कि यहाँ छुट्टा के लिए भटक रहा वोटर भी है? नोट- यह पोस्ट भक्तों के लिए नही है।

दैनिक जागरण में कार्यरत सीनियर सब एडिटर अभिषेक शर्मा की एफबी वॉल से.

दिल्ली में जनता का बुरा हाल जानने देखने के लिए इस वीडियो को जरूर देखें :  https://youtu.be/jtQYT8xc-dY

मजीठिया मंच : इमरजेंसी में भी प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर… देश में इमरजेंसी जैसी स्थिति है और हमारे प्रधानमंत्री चले जापान। पूराी आथ्र्ज्ञिक व्‍यवस्‍था दो दिन से ठप है। आम लोग परेशान हैं । 8 तारीख की घोषणाओं पर कहीं से काम नहीं हो रहा है। हर बार इस तरह के बदलाव को सह कह कर कि कुछ पेशनियां आम आदमी को झेलान हेााग। राष्‍ट्र हित में यह जरूरी है। लेकिन इस इमरजेंसी की हालत में व्‍यवस्‍था भी तो इमरजेंसी जैसी होनी चाहिए। बैंककों का दिन रात क्‍यों नहीं खोला जा सकता और आवश्‍यक स्‍थानों पर सरकार की ओर से लोगों की मदद की व्‍यवस्‍था क्‍यों नहीं है। इस पूरे प्रकारण में प्रधानमंत्री और सरकार की जिम्‍मेदारी क्‍या है। व्‍यवस्‍था को दुरुस्‍त है ही नहीं कहीं। दो दिन के बाद भी करेंसी की कोर्ठ ठोस व्‍यवसथा नहीं है। और यह मान लेना कि काला धन केवल करेंसी के रूप में है हम सबकी समझ से परे है।

फेसबुक पर बने मजीठिया मंच नामक पेज से.

इसे भी पढ़ें :

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करेंसी यूं रद्द करने से देश कैसे आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकता है, समझा रहे हैं भड़ास एडिटर यशवंत सिंह

Yashwant Singh : एक बड़ी आर्थिक मंदी की चपेट में देश आ सकता है. नोट करेंसी रद्द / बंद करने का एक साइडइफेक्ट यह भी आशंकित है. क्या आप बताएंगे या मैं समझाऊं? ध्यान रखिए, मेरी आशंका अंध मोदी विरोध टाइप कतई नहीं है. विशुद्ध आर्थिक कारणों पर आधारित है. नोट बदलने, करेंसी रद्द करने से आर्थिक मंदी की चपेट में देश क्यों आ सकता है, इसके बारे में बताने से पहले कहना चाहूंगा कि आपको दिल दिमाग खोलकर पढ़ना समझना पड़ेगा. थोड़ी देर के लिए मोदी विरोध या समर्थन किनारे कर दीजिए. 

यूपी में चुनाव करीब है और नेताओं ने पांच साल में जो सैकड़ों करोड़ कैश इकट्ठा किया है ऐन केन प्रकारेण, वह रद्दी हो गया. ये वो पैसा था जिसे जनता तक जाना था, वोट खरीदने के लिए, एक एक वोटर को पांच पांच सौ या हजार हजार रुपये. वोटरों तक गया यह पैसा मार्केट में लगता, खरीद फरोख्त होती, राशन से लेकर फूड प्रोडेक्ट और दवा आदि जो भी इससे हासिल होता या इकट्ठा किए मूल धन में मिलाकर जो भी टीवी फ्रिज मोबाइल खरीदा जाता, वह नहीं होगा. इससे प्रोडक्शन बढ़ता, सामान बिकता तो नया सामान बाजार में भेजने के लिए प्रोडक्शन का काम होता जिससे इंप्लायमेंट मिलता और औद्योगिक ग्रोथ होती. इस हजारों करोड़ के नोट के रद्दी हो जाने से ये पैसा अब आम जन के हाथ नहीं पहुंच पाएगा. प्लीज, वोट खरीदना गलत है या सही, इस नैतिकता को अभी किनारे कर दीजिए और सिर्फ आर्थिक हिसाब से सोचिए. 

नेताओं का यह पैसा बैनर पोस्टर लाउडस्पीकर कार आदि का प्रोडक्शन करने वालों के पास जाना था. नेताओं का यह पैसा मीडिया वालों कर्मियों के पास भी जाना था, नैतिक अनैतिक रूप में. 

यानि यह पैसा मार्केट में घूमता, देश के मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास और बेहद गरीब लोगों तक जाता. औद्योगिक उत्पादन करने वालों से लेकर छोटे कारोबारियों तक जाता. अब यह पैसा कहीं नहीं जाएगा. मार्केट की मोबिलिटी बाधित होगी. खरीदारी कम होगी. लेन देन कम होगा. खपत न होने से प्रोडक्शन कम होगा. प्रोडक्शन कम होगा तो औद्योगिक इकाइयां छंटनी करेगी. छंटनी करेगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी. 

यही काला धन जो रियल इस्टेट वालों के पास था, डाक्टरों के पास था वह नए मकान भवन बनाने में लगता. मजदूर काम करते. वे पैसे को बाजार में ले जाकर खरीद करते. सीमेंट, ईंट, सरिया, बालू के कारोबारियों के पास पैसा जाता. यह सब धंधा मंदा हो जाएगा. इनके यहां काम करने वाले छंटनी के शिकार होंगे. डाक्टर उस काले धन से अस्पताल बनवाते, नर्सिंग होम बनाते, ढेर सारे नर्सिंग स्टाफ भर्ती होते, हेल्थ इंस्ट्रुमेंट खरीदे जाते. अब यह सब न होगा क्योंकि वह पैसा रद्दी हो गया. 

नेता, रियल इस्टेट वाले और डाक्टरों का उदाहरण केवल समझाने के लिए दिया है. इन्हीं काले धनों से स्कूल कालेज विश्वविद्यालय खोले जाते हैं. इन्हीं काले धनों से नए प्रोजेक्ट्स में निवेश किए जाते हैं. अब ये सब ठप हो जाएगा. ढेर सारे जो नए काम होने थे. रुक जाएगा क्योंकि जो जो काला धन रखा था, वह रद्दी हो गया. मार्केट में लंबे समय तक खरीदारी न होगी. निजी स्तर के नए प्रोजक्टस न शुरू होंगे. बिक्री कम हो जाएगी. 

समझदार के लिए इशारा काफी है. 

अंबानी जो सबसे बड़े आदमी हैं भारत के, इसलिए नहीं कि उनके पास खूब सारा कैश है. बल्कि उनके पास तो कैश जो होगा सब एकाउंटेड होगा. उनका धन एसेट में है, शेयर में है, प्रोडेक्ट में है, सर्विस में है. वह तो जनता से मुनाफा खींचते रहेंगे. उनका जो काला धन होगा वह स्विटरलैंड से लेकर दुनिया के ढेर सारे ब्लैक मनी फ्रेंडली देशों में होगा. उस पर कोई असर न पड़ेगा. पड़ेगा हमारे आप जैसे छोटे बड़े जिलों के रहने वाले आम लोगों को जिनको इस पैसे से रोजगारा पाना था, या प्रोडक्ट खरीदना था, या घूमना था. सब कुछ ठप हो जाएगा धीरे धीरे. नई मुद्रा के आने और उसे आम जन तक पहुंचने में जो लंबा वक्त लगेगा, उस दौरान आए बाजार के ठहराव से पूरी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है. 

मंदी का एक नियम है कि जब यह आती है तो जल्दी जाती नहीं, अपना चक्र पूरा करने के बाद ही टलती है. 

ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले. 

हां, लेकिन जो असली काले धन वाले हैं, जिनका जमीन, सोना और विदेशों में काला धन गड़ा है, उन्हें कोई फरक नहीं पड़ने वाला. क्योंकि वह धन न तो भारत के मार्केट में, भारत की इकोनामी में चलायमान था और न चलायमान होना था. वह अर्थव्यस्था से बाहर का धन था, जिसे सरकार ले आती तो भारतीय अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त मोबिलिटी आती. उसके उलट जो भारत की इकानामी में इस्तेमाल होने के लिए रखा काला धन, वह रद्दी हो गया जिससे बाजार का रुख मंदी की ओर जा सकता है. 

अगर नोट करेंसी बदलने रद्द करने से अर्थव्यस्था दुरुस्त हो जाया करती तो वह पहले ही हो जाती क्योंकि भारत में पहले भी नोट करेंसी बदले रद्द किए गए हैं. 

यह केवल एक सस्ती लोकप्रियता का तरीका है. नया धन नया नोट नया करेंसी जो आएगा, वह आम जन तक न पहुंचेगा. वह सरकार, अफसर, कर्मचारी, कारोबारी आदि के एक दस परसेंट वाले छोटे समूह के बीच लंबे समय तक दौड़ेगा. बहुत देर बाद वह नीचे आम जन, सबसे गरीब आदमी के पास पहुंचेगा. तब तक लोग सौ रुपये के नोट से लेकर एक रुपये के सिक्के तक में किसी तरह जीवन यापन करेंगे और बाजार को मोदी सरकार के भरोसे छोड़कर घर बैठे रहेंगे. देखिएगा, जनता से बहिष्कृति बाजार (भले ही मजबूरी अभाव में बहिष्कार को मजबूर किया गया हो) कितने दिन हंसी खुशी नार्मल रह सकता है. टें बोलना ही पड़ेग. 

ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले. 

मेरा लिखा इसके पहले वाला पार्ट भी पढ़िए ताकि पिक्चर क्लीयर रहे :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त फेसबुक पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashwini Kumar Srivastava बेहतरीन और सरल भाषा में किया गया विश्लेषण

Manudev Bhardwaj नायाब आकलन

Dinesh Choudhary गज़ब!!

Sunil Kumar बाज़ार की हालात अभी से ही खराब होने लगी हैं

Robin Singh यही तो देखना है.. फैसला तो अच्छा है.. मैं समर्थन में भी हूँ पर क्रियान्वन कितने अच्छे से होता है आपूर्ति कितने अच्छे से होती है और साइड इफेक्ट्स जैसे रिसेसन जो पैदा होगा व्यापर में उससे निपटने की कितनी तयारी है अब यही देखना है.. अगर इसमें सफल रहते हैं तो सरकार को 100 में से 200 मार्क्स.. कोई गधा ही कैश का बिस्तर बना के सोता रहा होगा.. बेवकूफाना फैसला राजस्व की छति .. आम आदमी के लिए मुसीबत अलग.. जिनके घर शादी है उनको रोने आंसू नहीं आ रहा..

Vivek Dutt Mathuria सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं। एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की। उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है। चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है। पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं। वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं। हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है। -हरिशंकर परसाई
डॉ. अजित तार्किक विश्लेषण आपसे असहमति की कोई वजह ही नही बचती।

Kamal Kumar Singh बेहतरीन।

पवन उपाध्याय राजस्व सचिव ने दी जानकारी… बिना हिसाब का पैसा जमा करने पर टैक्स के साथ देनी होगी 200% की पैनाल्टी। बैंको द्वारा ढाई लाख से ऊपर जमा की गई रकम की जानकारी सरकार को देनी होगी। ढाई लाख से ज्यादा जमा पर सरकार की नज़र (अगर पैसा कानूनन वैद्य है तो आपको कोई दिक्कत नहीं होगी)।

Sumit Vaish सब कुछ एक साथ नहीं सुधारा जा सकता। आपने जो शंका व्यक्त की है नए नोटों के आम आदमी तक न पहुँच पाने की और 100, 50 के नोट पर काम चलाते रहने की केवल उसी पॉइंट में दम है। जो अगर झूठ साबित हुआ तो अच्छा होगा। बाकी जो स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सटी नेता जी लोग खोल रहे हैं उनकी उत्तमता तो जग जाहिर है।

Vinay Pandey उम्दा सर

Manmohan Sharma Your assessment is correct but blind supporters of modi are delibraterly misleading people.

Shivam Srivastava चुनाव बहुत से लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में रोज़गार देता है और काला धन का प्रयोग इसमें होता है । लेकिन यह धन आया कहा से ? निश्चित रूप से गरीबों का ही पैसा है । जनता का पैसा है । एनआरएचएम के पैसे का बन्दर बाँट हो गया , इलाज़ के अभाव में अनेकों लोग मर गए । मनरेगा का पैसा है , मिड डे मील का पैसा है , खनन का पैसा है । 05 साल में कुछ दिन चांदनी होती है फ़िर अँधेरी रात । इस अँधेरे को हटाने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया कदम सराहनीय है । आतंकवाद , नक्सलवाद, अपहरण , रंगदारी आदि में कमी संभावित है ।

Yashwant Singh सराहनीय तब होता जब यह विदेशों में बसे कालेधन से होता. देश के काला धन को अचानक खत्म कर देना देश के बाजार को बर्बाद करेगा और देश का बाजार देश की इकानामी को बर्बाद करेगा और देश की इकानामी मंदी के कारण सब कुछ को नष्ट करेगा.

Shivam Srivastava कुछ दिनों तक के लिए कह सकते है कि बाज़ार में मंदी रहेगी । लेकिन तकनीकी तौर पर ऐसा नहीं है । महीने दो महीने में स्थिति सामान्य हो जायेगी । सामानांतर अर्थव्यवस्था किसी भी देश के लिए अच्छी नही होती है । करपावंचन पर कुछ दिनों के लिए विराम लगेगा । देश में विकास की उम्मीद की जा सकती है ।

Arun Srivastava भाजपा नेता प्रवचन दे रहे थे कि इससे कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं रुकेंगी। लोग पत्थर फेंकने वालों को नकली नोट देते थे।

Yashwant L Choudhary सर ये पूरा पोस्ट ही कटाक्ष है | इसमें आपने राजनेताओं और डाक्टारो, इसकी और उसकी खूब धोयी है | इसका कंटेंट देखने में कुछ है और पढने के बाद विचार करने पर कुछ और है | ये आज तक का सर्वकालीन भयानकम पोस्ट है | इसको में सेव कर लेता हु

Ghanshyam Dubey मोदी जी अर्थ और राजनीति दोनो के महान खिलाड़ी हैं । अब तो PM भी हैं । उन तक , उनके खेल को 2014 मे कांग्रेस नहीं समझ पाई और सिमट कर 44 तक आ गयी , तो देश का गरीब – आम जन क्या समझेगा । गरीब आदमी की सारी तकनीक मामूली जीवन को गुजारने मे बिता देता है , उसके लिए यह सब अचरज जैसा, दुःस्वप्न जैसा है । …

Manish Kumar भाई बहुत ही साफ़ सुथरी भाषा और बड़ी ही समझदारी भरा ये पोस्ट लेकिन बहुत देर जो चुकी है जिसको फायदा पहुंचना था पहुँच गया। गरीब को मुसीबत दे गया।

Rajnish Tara Musibat gareeb ko nahi jamakhoro ko de gaya

Manish Kumar हाहाहा रजनीश तारा बहुत से धंधेबाजों को कमाने का मौका दे गए। किसी का एक रुपया नहीं रुकने वाला सब बदल जायेगा। सिर्फ मुसीबत उस गरीब की होती है जो पैसों के आभाव में शिक्षा नहीं पा पाया और अब मजदूरी करके महनत करके अपने बच्चों का लालन पालन कर रहा है। रजनीश तारा अमीर से भी पूँछों और गरीबों से भी। नोट बदलने में ना यशवंत भाई को परेशानी है ना मुझे और ना शायद आपको। परेशानी जिसे है वो आपके आस पास वाले ही हैं।

Anita Gautam आपकी बात सही है पर यह संवैधानिक तरीका नहीं है।

Raghvendra Singh Government has indirectly bailed out the PSU banks with black money as their NPA have risen to double digit. PSU banks needed capital infusion of about 110 b$ otherwise technically they are bankrupt.

DrRakesh Pathak तार्किक आकलन बधाई

Acharya Chandrashekhar Shaastri चुनाव में जनता को पहुंचाने के नाम पर कुछ दलाल नेता से रूपये ऐंठ लेते हैं कि वोट खरीदने हैं। लेकिन उस रकम का 10 प्रतिशत भी ऍम वोटर के पास नहीं जाता। हैं दारु का चक्कर वे लगातार चलाते हैं और मतदाता को पूरा उलझाते भी हैं

Rajnish Tara Yashwant bhaiya pahli baat to ye ki kala dhan rakhna hi gunah hai… barso tak kala dhan daba kar use election me gareebo ko baat kar unke vote kharidna bhi gunah hai… unke kharide hue votes ke adhar par ek giri hui aur ghatia sarkar banana bhi gunah hai….is faisle se mujhe to koi dar nahi… gine chune 5 ya 10 note mere paas honge jo main exchange kar lunga lekin jinke bed ke neeche chatte biche hai 500 aur 1000 ke wo chinta karenge…. ya to tax do ya is sardi me unhe jala ke haath seko….haa 2 4 din ki dikkat to hogi par faisla durgaami hai…. baaki adani ambani to door ki baat hai kisi chote mote builder pe bhi chapa maro to 5 7 crore to mil hi jate hai adani ambani pe to kuch jyada hi joga…. bhai mujhe aaj mera 500 ka note na toot pane ki takleef to jarur hui but mai modi ko salute karta hu

Raghavendra Narayan 2008 की आर्थिक मंदी से भारत को यही बचाया था सिर्फ बैंकिंग आधारित अर्थव्यस्था खतरनाक होती।

Sharad Mishra भाई शाब आप तो नोबल prize के उपयुक्त economic analyst है जो ये बताने का असफल प्रायश कर रहे हैं की काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था क्यूँ ज़रूरी हैं ।। वाह वाह । समश्या ये है की जिन्हें इस तरह की अर्थव्यवस्था मे अपने हित देखने की आदत हो जाती है वो ऐसे ही कुतरक देके लोगों को बरगनाले का प्रायश करते रहते है और किसी भी चीज़ का आर्थिक आकलन अवैध धंधों से कमाए धन के आधार पर तो क़तई नहीं किया जाता। ऐसी काले धन आधारित अर्थव्यवस्था से जितनी जल्दी आज़ादी मिलें उतना अच्छा हैं उससे वस्तुओं के मूल्य भी वास्तविक रहते हैं और ग़ुब्बारे तो फ़ुटना ही हैं और अत्यधिक बाज़ारीकरण पर भी संयम मेन रहेगा इसमें बराई क्या है महाशय।

Rajnish Tara Mujhe umeed hai ki iske baad bahut sa kala dhan sirf isliye bahar niklega ki kahi raddi naa ho jaye aur usse fayda hi hoga …. black ko white karne ke liye sarkari khajane me mota tax bhi jayega aur wohi paisa market me circulate bhi hoga…fir kaha bachi mahangai…. ya to jalao ya fir badlao

Mitra Ranjan और चूँकि आपको भी मालूम है कि ईश्वर कहीं नहीं है…इसलिए आपका कहा तो सच और सिर्फ सच ही निकलेगा

शांति भूषण कुमार यार कभी तुम क्रोनी कैपिटल पर मोदी को गरियाते थे और केजरीवाल की तारीफ करते थे…..यशवन्त सिंह जरा बताना तो कि वैचारिक रूप से दोगला किसे कहते हैं?

Bhagwat Shukla Bhai ji apke hisab se black money ko samanantr rup se flow hone dena chahia…. modi ne jo kia wo nhi hona chahia……waaah salute apko

Ripudaman Kaushik आदरणीय यशवंत जी, एक नज़र इधर भी, जितना मेरी समझ में आया उतना लिखा है 170000000000000 के करेंसी नोट इस समय भारत में व्यवहार में हैं जो की नकली हैं और पाकिस्तान या अन्य देश विरोधी माफियाओं द्वारा मार्किट में झोंक दिया गए हैं, जो लोग इस बात को ले कर प्रश्न उठा रहे हैं की, धन बेशक काला हो लेकिन वह भारत की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मार्किट को रोटेट करता है, इस तरह से करेंसी नोट को बंद कर देना बचकाना कदम है जो की भारत को भयंकर आर्थिक मंदी की तरफ धकेल देगा…..उफ़्फ़  … सोशल नेटवर्क्स पर इस अकथित virtual मंदी को प्रोडक्शन, इंप्लायमेंट, औद्योगिक ग्रोथ, औद्योगिक उत्पादन, छोटे कारोबारी, मार्केट की मोबिलिटी, बेरोजगारी बढ़ेगी, औद्योगिक इकाइयां में छंटनी, नए प्रोजेक्ट्स में निवेश बंद, बाजार के ठहराव… आदि-आदि अनेकानेक कारण दे कर समझाया जा रहा है.. लेकिन ये कोई विचार नहीं कर रहा की 170000000000000  ये केवल एक अनुमान मात्र है, इस आधार पर की हाल के कुछ वर्षों में ज़ब्त की गयी नक़ली मुद्रा में हर 10 लाख़ नोट में 250 जाली होते हैं, और जो करेंसी चुनाव जैसे ख़ास मौके के लिए टनों की मात्रा में गोदामों में रखी है वह इस अनुमान से भी कई गुना हो सकती है,  अब प्रश्न ये है की 17 लाख करोड़ रूपये की मुद्रा बाज़ार से बाहर कैसे निकलेगी या निष्क्रिय कैसे होगी। १. कल रात से जब से प्रधानमंत्री ने घोषणा की है, तब से कोई भी आदमी 500 का एक नोट लेने को तैयार नहीं है, अधिक मात्रा तो भूल ही जाओ, मतलब एक भी नया जाली नोट, अब अगले 50 दिनों में चलन में नहीं आने वाला। २. यदि आप के पास है, और आप बैंक चले जाते हैं, तो कैशियर जब्त कर लेगा (हालांकि इस बारे में मुझे कोई सुचना नहीं है की भुगतान होगा या नहीं). ३. अब जिसे पता है की उसके पास जाली नोट का स्टॉक हैं और bulk stock है, मात्र उसका पैसा ही मिट्टी होगा।  ४. जाली नोट की सबसे अधिक चोट बांग्लादेश और नेपाल में बैठे सटोरियों पर पड़ेगी, जो चुनाव जैसे ख़ास मौकों पर या ड्रग्स के लेनदेन में 300-400 की face value पर 1000 का नोट सीमापार के गोदाम से भारत भिजवाते थे.  दरअसल सरकार का मुख्य निशाना असली करेंसी वाला काला-धन नहीं है, बल्कि ये जाली करेंसी वाला नकली धन है. —– इसे दूसरे नज़रिये से देखते हैं की अगले 50 दिन में यदि 17 लाख करोड़ रूपये की कोढ़ रूपी जाली मुद्रा का बाज़ार से जाना, और लगभग 90% काला धन जो की घरों, तिज़ोरियों में कब से बंद था उसका एकदम से बाज़ार में किसी भी माध्यम से परावर्तित हो कर व्यवहार में आना. ये एक बहुत बड़ी घटना है.  17 लाख करोड़ + अचल मुद्रा (काला धन) का आगमन = भारत की अर्थव्यवस्था में इतनी ही value की अपरोक्ष इन्वेस्टमेंट का होना है नैतिक या अनैतिक रूप में. अब मेरे जैसे छोटे लोगों की भी सुन लो : हमारे यहाँ धन को लक्ष्मी रूप में पूजा जाता है, तो असली वाला नोट हिन्दुस्थान में कोई जलाएगा तो कतई नहीं, येन-केन प्रकारेण अगले 50 दिनों में बाहर आएगा ही और बदल दिया जाएगा।

Arif Beg Aarifi 17 lakh karod ki total currency purey india me hai.jisme se 14 lakh karod k 500 wa1000 k note hai………aap k dwara diya gaya aankda durust nahi hai,aap total mudra ko fake mudra samjh baithe hai

राज किशोर उपाध्याय मोदी काले धन को दूर रखने के लिए वाक़ई संकल्पशील हैं तो पार्टी के धन/खर्च का ब्योरा आरटीआइ के तहत देश को देने के मामले में उन्हें स्वेच्छा से आगे नहीं आना चाहिए था?

Sanjay Kumar Singh In economy depression is caused due to lack of demand or excessive supply but this decision ofgovernment will make morecirculation of money in economy. Then how we can say that in future economy of India will suffer depression.

Anurag Khandelwal  अगर नोट करेंसी बदलने रद्द करने से अर्थव्यस्था दुरुस्त हो जाया करती तो वह पहले ही हो जाती क्योंकि भारत में पहले भी नोट करेंसी बदले रद्द किए गए हैं. केवल आप के लिए जनाब. १) पहले जब मुद्रा को बदला गया तब सरकार के पास मुद्रा के विनिमय पर नजर रखने के साधन नही थे….. २) डिजिटल विनिमय नहीं होता था….. ३) प्लास्टिक करेंसी नही थी….. ४) मोबाइल पे वॉलेट नहीं थे….. ५) नगद क्रय विक्रय पर निश्चित सीमा तय नही थी….और शायद आपको ऐसा लगता है की यह सारे बड़े प्रोजेक्ट, कॉलेज, चुनाव, अस्पताल आदि केवल और केवल काले धन से ही संभव है और इसीलिए सरकार को इस समानांतर अर्थव्यवस्था बरक़रार रखना चाहिये….हद्द है भाई…. कसम से बाबू आप जैसे लोग स्वर्ग में भी मीन मेख निकाल सकते हो….. गुड ब्रो….कीप इट अप…. साहब जी, ये जो इतनी सारी छोटी मछलियां गिना रहे हो ना आप ये सब मिलकर कई बड़ी बड़ी मछलीयों के आकार से भी ज्यादा बड़ी हो जाएगी….. रही बात मंदी की तो आपके हिसाब से काला धन ही यदि अर्थव्यवस्था को ऑपरेट करता है तो स्वागत है ऐसी मंदी का जिसमे न्यूनतम काले धन के लिए भी कोई स्थान नहीं हो…. रही बात विदेश में जमा काले धन की तो भविष्य के गर्भ में क्या है यह कोई नहीं बता सकता….सरकार की अपनी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ है….बैंकिंग कानून है हर देश के….और सभी को साध कर चलना पड़ता है…..सरकार की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं है इस विषय पर…. हाँ यह सही बात है की गोल्ड और रियल एस्टेट के अब तक के काले धन पर कोई फर्क नहीं गिरेगा किन्तु इस क़ानूनी करेंसी निरस्ती के बाद कहीं भी काले धन का निवेश मुश्किल होगा और बड़े transaction सरकार की निगरानी में आ जायेंगे…. आप बिल्लोरी कांच लेकर नकारात्मकता खोजना छोडिये भाई सा….थोड़े भोत दुःख आये भी तो मिलजुल कर बाँट लेंगे…. देश को बढ़ाना जो है…..

Roy Tapan Bharati आपके विश्लेषण और तर्क से.सहमत हूं।

Geeta Yadvendu कुछ भी हो मोदी भक्त तो मोदी आरती ही गाएँगे

Prashant Tulsani लेखक लेख लिखते समय , काफी कंफ्यूज जान पड़ते है ,  एक तरफ वो चुनावों में प्रयोग होने वाले काले धन की बात करते हैं , तो दूसरी ओर उसी काले धन को बाजार की मंदी से जोड़ कर देखते है , आशय स्पष्ट नहीं होता , क्या वो मान कर बैठे है के अब भारत में जो है सिर्फ वेसा ही चलेगा ? या वो चाहते है कि थोड़ा मंद ही सही किन्तु बाजार को सफ़ेद धन पर चलना चाहिए? हर छोटा व्यापारी ( मेरा परिवार भी ) इस बात को जनता है की अगले ५० दिन कुछ मुश्किल में गुज़र होने वाले है , और उसके बाद बाजार धीमे ही उठेगा , लेकिन ये भी जानते है कि ऐसा होने से मकान से लेकर भवन निर्माण तक जो प्रीमियम राशि काले धन के रूप में देनी पड़ती थी उस पर लगाम कस सकेगी,  दूसरे चरण में भी लेखक काले धन को ही विकास कार्यों से जोड़ते हुए नज़र आते हैं ,  साथ ही लेख के आरम्भ में लिखते है की “आपको दिल दिमाग खोलकर पढ़ना समझना पड़ेगा. थोड़ी देर के लिए मोदी विरोध या समर्थन किनारे कर दीजिए”  और अंत आते आते स्वयं ही लिखते है “यह केवल एक सस्ती लोकप्रियता का तरीका है.”  और फिर अंत में अपने लेख को काल्पनिक सिद्ध कर लिखते है “ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले” कुल मिलकर इस लेख को देखे तो , तथ्यों, आकँडो , एवं तर्क से दूर एक काल्पनिक लेख ,

Deepak Shweta Singh Kya praksh dala hai Bhaiya…. Ekdam sysska led bulb type

Sudhir Pradhan कुछ तार्किक विश्लेषण

Mayank Pandey अभी तक काली अर्थव्यवस्था में ही तो जीते आये हैं। अब नये वाले को भी देख लिया जाय।

Adv Shivani Kulshrestha bilkul sahmat hu sir…apne sahi likha hai ekdam…ye apne dil se likha hai. koi banwatipan nahi hai..fact or akarne agar sahi hote to deah itna gaddhe me na jata…

Rishi Munjal Vo noor ban ke jamaane mein fail jaayega – Tum aaftaab mein keedey talaash karte rehna ..

Prakash Govind यशवंत भाई बहुत जबर्दस्त और सटीक लिखा है …. पठनीय पोस्ट

Himanshu Priyadarshi Yashwant Singh bhai munhe bahut shiddat se mahsoos hota hai ki aapko abhi economy padhne ke bahut zarroorat hao

Prakash Govind तो आप ही पढ़ा दीजिये न. वैसे आप पहले ही पढ़ा चुके हैं —

Shubh Narayan Pathak सरलीकृत विश्लेषण!

Abhishek Singh Rajput भड़ास मीडिया पर लिखते-लिखते लगता है पुरे भसिया गये हैं…,खुद तो अपनी जवानी में कुछ नही कर पाये, एक बूढ़ा आदमी कुछ अच्छा कर रहा है, उसको तो करने दो भईया… काहे दर्द उखड़ रहा है इतना?

Sudesh Tamrakar वाह रे अर्थशास्त्री! अर्थशास्त्र के ज्ञाता धन्य है आपका ज्ञान! जो कालाबाजारियों और भ्रष्ट नेताओं के द्वारा कमाये गए धन से भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने का ख्वाब देखते और दिखाते हो आप वाकई धन्य हैं । आपको वो करोड़ों जाली नोट भी नहीं दिखते जो भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहे थे आतंकवादियों के हांथों की बंदूकें अलगाववादियों के हांथो की मशाल बन रहे थे जो बच्चों के स्कूलों में आग लगा रहे थे। बात करते हैं कि थोड़ी देर को मोदी विरोध या समर्थन किनारे रख दीजिए। ठीक है आप देशहित की बात तो करिये । बात करते हैं ….। मोदी का ये कदम उनके खुद के लिए सरकार के लिए एक आत्मघाती कदम है लेकिन भ्रस्टाचारियों और कालाबाजारियों के लिए फांसी का फंदा। माना कि अभी भी बहुत से बच जाएंगे जिसके लिए एक और सर्जिकल स्ट्राइक करनी होगी वह है चुन चुन के रेड्स देखते जाइये अभी 2 साल से ज्यादा बाकी है। सलाह देने के लिए मोदी जी ने मोबाइल एप का तोहफा जो दिया है । सो उस पर आप भी सलाह दे सकते हैं । वैसे भी पप्पू तो खुद ही समझदार है आपकी बात मीडिया तक पहुंचा ही देगा।

Gaurav Bisht aap jis money ki baat kr re h wo black money h …beshak wo rotate hota pr ..un logo ki akal thikane ni lgti jo frod krte h …gandhi ji ne kha h …paap mitao… ab se 2 baar pkka sochenge ese log

Rajesh Gupta क्या स्तर है इन बुद्धिजीवियों का कहते तो हैं हम पूंजीपति के लूट के विरोधमें हैं लेकिन असली बात ये लोग विदेशी देशद्रोही के भाड़े के टट्टू हैं

Mohan Chopra कमजोर सोच वालों के लिए जोरदार लेख।

Nand Kishor Jha यसवंत जी, आप के बात में दम है। लेकिन अर्थव्यवस्था में भी स्वच्छता भी जरुरी है।काले धन की सामानांतर व्यवस्था देश के पालिसी इम्प्लीमेंटेशन में बाधक है। अभी यदि सरकार को इससे कुछ लाख करोड़ रुपये मिलते हैं तो जनकल्याण पर ही खर्च होगा। यदि सरकार सख्त रहे तो भ्रस्टाचार पर भी कंट्रोल होगा। नकली नोट पर भी काबू होगा, जिससे आतंकवादी गतिविविधियों पर भी लगाम लग सकता है।

Vishwakarma Harimohan मानता हूँ कि इस बदलाव से अर्थव्यवस्था फिलहाल स्लो होगी और ये बात मोदी से लेकर जेटली और विपक्ष सभी कह रहे हैं। लेकिन आपके सवालों के जवाब आपके सवालों में ही हैं। अंबानी टाइप लोग कितना भी पैसा विदेश में रखे हों लेकिन जब देश की इकॉनमी ठप्प होगी तो न तो उनके पास रिलायंस बीमे की किश्तें पहुंचेगी न टीवी बिकेंगे और न मकान। कहने का आशय कुछ समय के लिए मार्केट या टर्न ओवर उनका भी थमेगा, तब। आप भी जानते हैं कि अम्बानी हो चाहे कोई और सब कर्जे के संजाल में हैं किसी पर देशी कर्ज है किसी पर विदेशी जब कर्ज है तो ब्याज भी जाएगा। अब ब्याज जाएगा और आवक न होगी क्योंकि मार्केट में टर्नओवर घूमने में समय लगना है तो संतुलन बिगडना है। कोई भी उद्योग तभी फलता है जब टर्न ओवर चालू हो। अब दिवाला निकला कि नही। माल्या या सुब्रतो राय को शौक नहीं था दिवालिया होने का किन्तु गलत नीतियों के कारण आवक को लुटाते रहे और लागत लगती रही सो अपनी जान बचाने दिवालिया हुए। इसलिए हे भडासानंद महाराज खुद को संभालिए।

Balwant Singh आपका कहा झूठ ही होगा श्री मान

Umrendra Singh Pahli baar asahmat hu aapke visleshan se

श्री विदेह इन्फ्लेशन के बारे में भी कुछ सुना है यशवंत जी….और इस पर मोदी के फैसले का क्या असर होगा यह भी बताईये

Nidhi Panday 100 % correct..i like ur articke nd view iagre with this..

Navin Kr Roy यह एक व्यंग्यात्मक लेख है जो साफ़-साफ़ झलक रहा है।पर यदि इसे लेखक का विश्लेषण भी मान लिया जाए तो यह कहने में कोई हिचक नही है कि,इनका विश्लेषण अधूरा है।काले धन के नष्ट होने से भी अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है।मैं बहुत विस्तार में नही जाऊँगा।पर कम से कम हजारों करोड़ नकली नोट जो भारतीय बाजारों में फैलकर दीमक की तरह हमारी अर्थव्यवस्था को चाट रहे थे,उस पर तो रोक लगी।क्या यह कम है ? और सम्पूर्ण रूप से शायद ना हो पर, निश्चित रूप से सरकार के इस निर्णय से छुपे काले धन पर चोट पहुंचेगी।

पंडित राकेश कुमार त्रिपाठी कुल मिला कर मूलभूत आवश्यकता रोटी कपडा और मकान पर फोकस रहेगा और किसान की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होने की सम्भावना बढ़ती है …. अतिरिक्त और गलत मार्ग का धन विलासिता को बढ़ावा देता है । आतंक की रीढ़ तोड़ने से कुछ समय देश में शांति की संभावनाएं भी प्रवल होती है

Shahnawaz Qadri आप की बात को नकारा नहीं जा सकता

Drashish Tiwari भाई साहब बड़ा बेहूदा कुतर्क दिया है आपने।आपका कुतर्क कुछ ऐसा है जैसे बीमारी ठीक करने को इंजेक्शन लगाना जरुरी तो है।पर डर इस बात का है की कही इंजेक्शन से स्किन में छेद न हो जाये।या सुई अंदर टूट न जाये इसलिए इंजेक्शन न लगाया जाये। Nonsense post

Rajesh Kumar Singh थेथरलॅाजी…

Irfan Khan देश का आर्थिक शोधन समय समय पर ज़रूरी है। कड़वी दवाई का साइड इफ़ेक्ट तो होता ही है।

Pankaj Chaturvedi अब देखिये जनधन खातों का खेल, सुदूर गांव में खातों में दो लाख के आस पास जमा होगा फिर निकाला जायेगा, कई करोड खाते हें गणित लगा लें . ढाई लाख से ज्यादा कि राशि पर पूछताछ होगी सो उससे कम जमा होगा , दिक्कत हमारे नजरिये का हे, विजय बहुगुणा जब इधर होते हें तो राहत के अरबो रुपये का घोटाला करने वाला खलनायक और इधर आ गए तो देव-तुल्य. , जिस काँग्रे पर आरोप हे काले धन का उसके दर्जनों बड़े नेते इस तरफ आ गए यानि सफ़ेद वाले हो गए, शूट द मेसेंजर वाली थ्योरी हे, काले धन के मूल पर नहीं सोचना शाखाओं पर पानी छिडकना, जमीं जायदाद के सर्किल रेट घटा दें , रियल एस्टेट बाज़ार जमीं पर होगा और काला धन असल में सड़कों पर कूड़े में मिलेगा

Sunita Soni Use less thought… You don’t understand economics

Abdul Samid this step of modi ji is very good bt I think it is not for black money holders bcz they may have money in formats other than cash

Alamgir Khan Perfect analysis

Preeti Dubey आज़ यकीन हुआ तर्क सुतर्क और कुतर्क…..काले धन की इतनी उपयोगिता?//वाह साहेब धन्य आपकी सोच धन्य आपकी लेखनी। लिखना अच्छी बात है।लेकिन जो हम बोल रहे है वो केवल भिन्न विचार के कारण बोल रहे है या ये भी ध्यान रख रहे है के इसका सामान्यजन की मानसिकता पे क्या असर पड़ेगा?आप चोरी को बढ़ावा दे रहे है। गज़ब है ।

Satbeer Singh main to sochta tha ki Kejriwal hi akela tha but i m wrong

Sarwjeet Singh काश आप जेसी बुद्धि और सोच वालों के लिए भी एक सर्जिकल स्ट्राइक होता

Rajendra K. Gautam इस फैसले से साफ हो गया है कि अपनी नाकामी को ढँकने और जनता का ध्यान भटकाने के लिये किया गया है। विदेश से काला धन ला नहीं पाये और देश में काला धन खोजने की मुहिम छेड़ कर यह संकेत दिये हैं कि देश की जनता टेक्स चोर है। जनता अपना टेक्स भी दे रही है और परेशानी भी उठा रही है। उसको न तो सुरक्षा मिल रही है और न ही टेक्स से राहत। इससे सिर्फ और सिर्फ जनता ही कष्ट भोगेगी। मजे मरेंगे सिर्फ और सिर्फ टेक्स चोर।

Vivek Dutt Mathuria अब जन धन योजना खाते करेंगे जुगाड का काम….

Madhukar Singh पैसे की तरलता (liquidity) केवल काला धन बर्बाद होने से ही नहीं प्रभावित हो रही है बल्कि आम लोगों की शुद्ध कमाई को नोट बदलने के नाम पर बैंकों में अनिश्चित समय तक रखने से भी प्रभावित होगी। इस तरह नगद आरक्षण अनुपात (cash reserve ratio – CRR) अघोषित रूप से बढ़ गया। अर्थशास्त्र का सारा व्यवहारिक सिद्धांत दरकिनार हो चुका है। ऐसे दौर में मांग कम पूर्ति ज्यादा होने के बावजूद सोने चांदी और अन्य चीजों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भी संशय का विषय बन गई है। ऐसे ढेरों अनुत्तरित पहेलियां इस बर्बर पूंजीवादी और बाजारवादी समय की पहचान हैं। अन्य विषयों पर ध्यान आकर्षण कराना खतरनाक है इसलिए मेरी तरफ से इतना ही।

Arvind Gupta मोदी जपान उड गये देशवासी को busy कर के मोदी मोदी नमो नमो नमो

Manju Kumari Badlab prakriti ka niyam hai ye hamlog jante hai,Baba Bhimrab ambedker ka bhi to kahna tha ki agar samajh aur duniya ko bhrast mukta rakhna ho to Har Das saal me note ko basal do,to ye subha kam modijee ne hi kar dala
Ratnesh Gupta Jaisi jiski soch. Ek baat aur isko yadi positive le to logo ki niyat me bhi to badlav ayega aur employee bhi salary ko hi apni dharohar samjhenge  Jo hai thode samay ki pareshani but jindgi bhar ki aasani

Arvind Pathik Beshaq mandi aayegi par mahgayi ghategi to kray shakti bhi badhegi.

इसे भी पढ़ें :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कालेधन पर मोदी के सर्जिकल स्ट्राइक का सच सुनिए भड़ास के एडिटर यशवंत से

Yashwant Singh : नेताओं और अफसरों का जो विदेशों में काला धन जमा है, वह सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा काला धन है, उसे सबसे पहले निकालना चाहिए, उसे रखने वालों का नाम खोलना चाहिए, यह मेरा मत है. उसके बाद सेकेंड फेज में ये करेंसी बदलने वाला काम करना चाहिए.

अब जो सेकेंड लेवल वाला काम पहले लेवल का मान कर किया गया और इसको कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक बोला जा रहा है तो मन करता है कहूं कि हम भारतवासी सच में इमोशनल जीव हैं, रेशनल तो बिलकुल नहीं हैं.

सब जानते हैं कि सबसे बड़े लोगों का काला धन विदेशों में रखा जाता है, उस पर इस नोट रद्द करने, नोट बदलने का कोई असर नहीं पड़ेगा.

सब जानते हैं कि काले धन का सबसे ज्यादा निवेश देश में प्रापर्टी और गोल्ड में किया गया है, उस पर इस नोट रद्द करने, नोट बदलने का कोई असर नहीं पड़ेगा.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां टाइप लोग आएंगे जो वोट खरीदने के लिए सैकड़ों करोड़ कैश जुटा रखे थे.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां टाइप लोग आएंगे जो सिस्टम जनित करप्शन से पैसा बटोरकर घर में रखे थे.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां टाइप लोग आएंगे जो व्यापार कारोबार कर लाभ बनाए पैसे को बटोरकर घर में रखे थे.

हां, ये जो हुआ है अभी, इसकी चपेट में वो छोटी मछलियां आएंगी जो कंपनियां चलाकर उससे हुए मुनाफे का एक हिस्सा इकट्ठा कर घर में छिपाए थे.

फिर भी, कहना चाहूंगा कि जो माहौल है, उसमें अपन फकीरों की तो मौज है. कैश घर में सजाकर खुद को ईमानदार बताने कहने वाले अफसरों व्यापारियों नेताओं पत्रकारों पुलिस वालों क्लर्कों कंपनी मालिकों आदि को तो सांप सूंघ गया है. वो अब तलाश रहे हैं खलिहर किस्म के एकाउंट जिसमें दस बीस परसेंट पर नोट जमा कराकर ह्वाइट किया जाए.

जो हुआ है, ठीक हुआ है, लेकिन इसके पहले बहुत कुछ होना चाहिए था, जिसे करने से ना जाने क्यों ये सरकार बच रही है. यहां तक कि जो बैंक के हजारों करोड़ के लोन गटक गए हैं और लौटाने को तैयार नहीं हैं, उन तक को सुप्रीम कोर्ट में बचाने में लगी है मोदी सरकार. जिनके धन विदेशों में जमा है, उनको राडार पर लेकर पकड़ने और उन धन को वापस लाने से कांग्रेसी सरकारों की तरह बच रही है ये भाजपा सरकार.

कहीं ऐसा तो नहीं कि बड़े कारपोरेट्स, बड़े चोरों पर हाथ न डाल पाने की मजबूरी ही छोटे चोरों पर एक्शन करा रही है? इसमें डबल गेम है. तारीफ की तारीफ हो गई और काला धन खत्म करने के लिए जोरदार एक्शन टाइप का फील वोटरों में दे दिया गया..

देश एक अजीब दौर में जी रहा है जहां ठोस और प्रमुख काम करने की जगह बस काम करते हुए दिखने दिखाने की जल्दी पड़ी है.

फिर भी, हम तो इसलिए खुश हैं कि हमारे आसपास के मिडिल क्लास कैश धारी लोग परेशान हुए पड़े हैं…

कहते हैं न, पड़ोसियों की जले जान, अपनी बढ़े शान.

जियो मोदी जी..

आपके कारण कुछ तो इधर भी एकाउंट में आएगा.

कोई है दस बीस परसेंट देकर वापस लेने वाला…

अपने परिवार, गांव और फकीर टाइप कई दोस्तों के एकाउंट मुंह बाए लाख दो लाख देखने को बेकरार हैं.

बड़े कालाधनियों पर सर्जिकल स्ट्राइक न होने से वादे वाला पंद्रह लाख तो एकाउंट में नहीं आया, हां अब इन छोटे चोरों पर कार्रवाई से बने हालात में दस बीस परसेंट पर ब्लैक ह्वाइट कार्यक्रम चलाकर कम से कम पंद्रह हजार तो आ ही जाएगा अपन गरीब देशवासियों के एकाउंट में.

जय हो

🙂

चाहूंगा कि आप फाइनल राय बनाने से पहले इन्हें भी पढ़ें :

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मोदी के फैसले से आर्थिक आपातकाल, देशभर में हाहाकार

40 प्रतिशत से ज्यादा कालेधन का है बाजार में चलन, सभी तरह का कारोबार पड़ा ठप

राजेश ज्वेल

इंदौर। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मास्टर स्ट्रोक ने जहां आम आदमी को फिलहाल पसंद किया वहीं तमाम कारोबारी माथा पकड़कर बैठे हैं। 500-1000 रुपए के नोट बंद करने की घोषणा के साथ ही देशभर में हाहाकार मच गया और आर्थिक आपातकाल से हालात हो गए, क्योंकि साग-सब्जी वाला भी 500 रुपए का नोट लेने से इनकार कर रहा है और आज से तो वैसे भी ये बड़े नोट कागज के टुकड़े साबित हो गए हैं। देश की 40 प्रतिशत से ज्यादा इकॉनोमी कालेधन से ही चलती रही है। लिहाजा एकाएक इस पर ब्रेक लगा देने से हर तरह का कारोबार ठप पड़ जाएगा।

इसमें कोई शक नहीं कि कालेधन के केंसर ने देश को खोखला करना शुरू कर दिया, लेकिन आजादी के बाद से अभी तक बाजार में कालेधन का ही बोलबाला रहा है। जानकार लाख तर्क दें कि 500 और 1000 रुपए के नोट पहली मर्तबा बंद नहीं हुए हैं और इसके पहले की केन्द्र सरकार भी बड़े नोट बंद कर चुकी है। 38 साल पहले प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने 1978 में 1000 रुपए के नोट बंद किए थे, मगर मैदानी हकीकत यह है कि नि 38 सालों में जहां देश ने जबरदस्त तरक्की की, वहीं कालेधन का प्रतिशत कई गुना बढ़ गया।

रियल इस्टेट में सबसे ज्यादा कालाधन खपा और उसी का परिणाम यह है कि आज इंदौर सहित देशभर में जो बड़ी-बड़ी चमचमाती बिल्डिंगें आधुनिकता और विकास का प्रतीक है, उनकी नीवों में कालाधन ही भरा गया है। 38 साल पहले 1000 रुपए के नोट बंद करने से इतना हाहाकार नहीं मचा, जितना अब मचा है, क्योंकि इन वर्षों में 40 प्रतिशत से अधिक बाजार कालेधन से ही चलने लगा है। एक मामूली ठेले-गुमटी लगाने वाले से लेकर किसानों का भी पूरा कामकाज नकद में ही होता है। यहां तक कि गली-मोहल्ले की किराना दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शोरुमों में होने वाली खरीददारी नकद ही की जाती है। अब देश में जो आर्थिक आपातकाल के हालात निर्मित हो गए हैं उससे सभी तरह का कारोबार ठप पड़ जाएगा, क्योंकि लोग जब खरीदी ही नहीं करेंगे तो धंधा कैसे चलेगा और इसका असर अंतत: बड़े लोगों पर तो पड़ेगा ही, वहीं इससे जुड़े आम आदमी पर भी असर होगा।

आने वाले दिनों में ही इस आर्थिक आपातकाल के असर बाजार में दिखने लगेंगे और जो जगमग इंदौर जैसे बड़े शहरों में नजर आती है वह भी घट जाएगी, क्योंकि आज बड़ी-बड़ी होटल में खाना खाने से लेकर मल्टी फ्लेक्स सिनेमा में जाने और बड़े-बड़े शोरुमों में खरीददारी करने के साथ-साथ पूरी जीवनशैली  जो आधुनिक हो गई है उसमें 40 प्रतिशत से ज्यादा कालेधन का इस्तेमाल ही किया जाता है और यह सब ठप हो जाने के कारण इनसे जुड़े लोग बुरी तरह के प्रभावित होंगे।

गरीब और मध्यम वर्ग पर भी बड़ा असर
आज भले ही गरीब और मध्यम वर्ग इस बात को सोचकर खुश हो रहा है कि बड़े लोगों के काम लग गए। अच्छा हुआ उनके पास 1000 और 500 रुपए के नोट नहीं रहे और इस तरह के तमाम संदेश व्हाट्सएप पर धड़ल्ले से आ भी रहे हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि बाजार में चल रहे इस कालेधन का लाभ गरीब और आम आदमी मध्यम वर्ग तक पहुंचता है। मालिक के पास अगर पैसा होगा और वह उसे खर्च कर सकेगा तो इसका लाभ उसके ड्राइवर से लेकर घर के नौकर या दफ्तर में काम करने वाले कर्मचारी तक को मिलता है। अब अगर कालाधन बंद हो गया तो छोटे लोगों को जो लाभ मिलता है वे उससे भी वंचित हो जाएंगे। जब बाजार में धंधे-पानी ही चौपट होंगे तो उससे नीचला तबका भी प्रभावित तो होगा ही।

इंदौर की मंडी में भी कामकाज रहा ठप
आज सुबह ही इंदौर की अनाज मंडी से लेकर सब्जी और फल-फ्रूट मंडी चोईथराम मंडी में ही कामकाज ठप हो गया। 80 प्रतिशत से ज्यादा कारोबारी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, क्योंकि अधिकांश खरीददारों के पास हजार और 500 रुपए के नोट ही थे, जिसे विक्रेता लेने को तैयार नहीं हुए। मंडी का भी यह पूरा कारोबार नकद ही चलता है और जो व्यापारी अपना माल बेचकर दोपहर 2-3 बजे तक फ्री हो पाता था वह आज सुबह 8-9 बजे ही घर वापस आ गया और हजारों-लाखों किलो सब्जी, फल और अन्य सामग्री मंडी में पड़े-पड़े ही सड़ जाएगी। इस निर्णय से तमाम किसानों को भी बड़ा नुकसान हुआ है, क्योंकि उनकी उपज के दाम भी नकद ही मिलते हैं और कई किसानों के पास तो अपनी फसल को बेचने के बाद बड़ी नकद राशि पड़ी है। अब उन्हें बैंकों में जमा कराने पर कई तरह के जवाब देना पड़ेंगे।

लेखक राजेश ज्वेल से संपर्क jwellrajesh66@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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देश की 86 फीसदी करेंसी रद्दी हो गई… काले धन का 5 प्रतिशत भी बड़े नोट की शक्ल में नहीं है…

Daya Sagar : देश की 86 फीसदी करेंसी रद्दी हो गई। इसमें अगर 50 फीसदी करेंसी को भी अगर हम काला धन मान लें तो वह चलन से बाहर हो गई। यानी आज की तारीख में भ्रष्ट लोगों के पास काले धन के नाम पर अचल सम्पत्ति और सोना बचा होगा। कैश बिलकुल नहीं होगा। बेशक ये एक बड़ी उपलब्धि है। बाकी सारा कैश पैसा जो अब तक अन-आकाउंटेड था। वह सब अकाउंटेड हो जाएगा। बेशक इससे हमारी अर्थव्यवस्‍था मजबूत होगी। मुझे नहीं लगता कि अगले कुछ सालों में किसी के पास रिश्वत देने के लिए भी कोई पैसा होगा। सबके पास अकाउंटेड मनी होगी। यानी रिश्वत खोरी बंद। कोई भी ईमानदार अर्थव्यवस्‍था कैश लैस होती है। उसमें सारे लेनदेन चेक और प्लास्टिक मनी के जरिए होते हैँ। इस प्रयोग का प्रयास यही है कि हमारी अर्थ व्यवस्‍था कैश लैस हो। साफ सुधरा काम हो। तो इसमें दिक्कत क्या है भाई? आपकी समझ में क्या नहीं आ रहा है?

Madan Tiwary : अर्थशास्त्र अगर इतना आसान होता तो गोल्ड पेमेंट बन्द नहीं करना पड़ता। आमलोग समझ रहे हैं कि यह कदम कालाधान रोकने के लिए उठाया गया है। पहली बात 5 प्रतिशत भी काला धन बड़े नोट की शक्ल में नहीं है। यह जमीन, जेवरात, सोना, हीरा, बांड, शेयर में निवेश है। अब जिनके पास 5-10 करोड़ होगा भी वह 10 से 20 प्रतिशत पर बदला जायेगा। किसी को भी अकाउंट में 4-5 लाख जमा कर के उसको निकाल लेगा, नए नोट के रूप में। वह नया नोट कालेधन के रूप में ही होगा। जिसके एकाउंट में जमा होगा उसको कुछ प्रतिशत का फायदा होगा। इस कदम से अब कालेधन के रूप में सोना का लेन-देन होगा, सोने की तस्करी बढ़ेगी।

कालाधान व्यवसाय का हिस्सा बन गया था, अब वह उत्पादक कार्यों में नहीं लगकर सिर्फ अनुत्पादक रूप में यानी सोना हीरा के रूप में जमा रहेगा। उत्पादन घटेगा, मार्केट में रिसेशन आएगा, रोजगार में कटौती होगी, यह कदम उठाने का मतलब कालाधान वगैरह नहीं है बल्कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई है और देश को दिवालिया होने से बचाने के अंतिम प्रयास के रूप में उठाया गया है।

हाँ, जो तेज होंगे वह इस मौके का फायदा उठा सकते है। कालेधन को सफेद करने में कमीशन के रूप में दिसंबर तक बेरोजगार लाख दो लाख कमा ले सकते हैं। इससे ज़्यादा कमाना हो तो फ़ीस दो,  परमानेंट कमाने का उपाय भी बता दूंगा 🙂

संपादक दया शंकर शुक्ल सागर और एडवोकेट मदन तिवारी की एफबी वॉल से.

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देश में एक तरह से आर्थिक आपातकाल लागू हो गया है…

Hareprakash Upadhyay : ”देश में एक तरह से आर्थिक आपातकाल लागू हो गया है। ट्रेन में हूँ, पाँच सौ का नोट है पर्स में पर पीने को पानी नहीं मिल रहा है। ट्रेन से जब उतरूँगा, तो घर कैसे जाऊँगा? दो दिन बैंक व एटीएम भी बंद है। घर में भी अगर सौ-पचास का नोट नहीं होगा तो राशन कैसे आएगा? जो रे मोदिया… बड़े अच्छे दिन लाये बेटा… लोग कह रहे हैं कि कल पेट्रोल पंप वाले बदल देंगे, तो क्या कल पेट्रोल पंपों पर सौ-पचास रुपये का छापाखाना खुलने वाला है? कल पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ उमड़ेगी तो खुदरा मिलना तो छोड़िये पेट्रोल मिलना मुश्किल हो जाएगा।”

मेरे साथ यात्रा कर रहे एक बुजुर्ग ने यह टिप्पणी की और इसे फेसबुक पर डाल देने का अनुरोध किया। मैंने पानी का अपना बोटल उन्हें दे दिया है। पर मेरे साथ भी लगभग वही समस्या है।

बाजार में पाँच सौ और हजार के नोट ही अधिक प्रचलन में थे। उनका कुछ नहीं होगा जिनके पास काला धन होता है, उनके खाते में भी बेशुमार धन पड़ा है। पर जिसकी अंटी में पाँच सौ या हजार के एक या दो नोट ही कुल जमा पूँजी हों, उनका क्या होगा? बैंक और डाकघर इसे बदलने जाइयेगा तो तब पता चलेगा कितनी भीड़ है। लोग अभी से सड़कों पर आ गये हैं।

विजय सिंह ठकुराय : मेरे पास जेब में लगभग 27 हजार रूपए है। मजे की बात है कि एक भी 100 का नोट नही है। कल परसो एटीएम भी बन्द हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि सरकार के फैसले से मेरी तरह कई मित्रो को असुविधा होने वाली है। काले धन पर इस कदम से कितनी रोक लगेगी… ये तो समय के गर्भ में हैं… लेकिन…फिर भी देख के ख़ुशी हुई कि… असुविधा होने के बावजूद मुझे अभी तक एक भी बन्दा ऐसा नही दिखा जो स्वयं की असुविधा के लिए सरकार की आलोचना कर रहा हो। काले धन पे अंकुश लगाने के लिए उठाये गए इस सख्त कदम पर एक आम से आम आदमी सरकार के साथ खड़ा दिख रहा है।

मुझे राजनीति की समझ थोड़ी कम ही है लेकिन माननीय प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी को एक बात का श्रेय मैं अवश्य देता हूँ कि मोदिकाल में भारत देश का एक आम नागरिक अपने देश के हितो के प्रति जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व अवश्य हो गया है। एक सेनानायक के सामर्थ्य की वास्तविक पहचान उसके स्वयं के बाहुबल से नही… बल्कि उसकी सेना के पैदल सिपाहियो के मनोबल और निष्ठा से होती है। देश का आम नागरिक आज जागरूक है… देश के हित में खुद की सुविधा से ऊपर उठ कर सोचता है। यही तो है अच्छे दिन !!! 🙂

Amit Chaturvedi : अच्छा सुनो, एक सीरियस बात, समझना पहले फिर रियेक्ट करना.. मोदी जी ने अपने इस ब्रेव मूव के पीछे जो सबसे बडे कारण बताये वो ये कि बहुत सारी नकली करेंसी सर्कुलेशन में है और वो भ्रष्टाचार पर पाबन्दी लगाना चाहते हैं। अब थोड़ी देर के लिए अपने राष्ट्रवादी अफीम के नशे से बाहर आइये और एक बात समझिये कि क्या ये सरकार की असफलता नहीं है जो वो नकली करेंसी को पकड़ नहीं पा रही है, उसने अपने इस काम में असफल हो जाने पर इस देश के करोड़ों ऐसे लोगों को मुश्किल में नहीं डाल दिया जो भ्रष्ट नहीं हैं लेकिन लापरवाही वश unaccountable money hold करते हैं?

हम और आप एक आम आदमी के बावजूद जानते हैं कि हमारे आसपास कौन लोग हैं जो करप्ट हैं और करोड़ों अरबों की ब्लैक मनी रखते हैं लेकिन सरकार के पास ढेरों एजेंसियां होती हैं, जो सबूत के साथ ये establish कर सकती हैं कि कौन आदमी चोर है। लेकिन सरकार ने एक ऐसा रास्ता चुना जो उन्हें नहीं, आपको मुश्किल में डालने वाला है। क्योंकि जो बड़ा करप्ट होता है वो सिस्टेमेटिक होता है, उसे कानून के वो लूप होल्स पता होते हैं, जहाँ से वो अपना काला धन सफ़ेद बना सकता है।

दूसरी बात, उस देश में करप्शन का सबसे बड़ा कारण है, इस देश की चुनाव व्यवस्था, एक पार्षद और विधायक के चुनाव में करोडो खर्च होते हैं, और वो पैसा ही करप्शन की सबसे बड़ी जड़ है, क्योंकि कोई भी नेता अपने पास से पैसा खर्च नहीं कार्य, ये पैसा करप्ट अधिकारियों और उद्योगपतियों की जेब से ही आता है, जिसे वो जीतने वाले प्रत्याशी से वसूल करते हैं। अगर मोदी जी वास्तव में भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी जांच एजेंसियों के मार्फ़त ऐसे लोगों पर लगाम लगानी चाहिये थी और चुनावों को सरकारी खर्च पर कराने का नियम बनाना था, ये जो हो रहा है, वो सिर्फ एक लोक लुभावन तरीका है और जनता को ही परेशानी में डालेगा।

संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय, विज्ञान लेखक विजय सिंह ठकुराय और चर्चित सोशल मीडिया राइटर अमित चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार का यह मास्टर स्ट्रोक है : गुरदीप सिंह सप्पल

Gurdeep Singh Sappal : मोदी सरकार का यह मास्टर स्ट्रोक है। जिन भी बड़ी कम्पनी, राजनीतिक दल, भ्रष्ट अधिकारियों, बड़े व्यापारियों के पास बड़ा कैश जमा है, वे दिक़्क़त में आ गए हैं। बड़ी रक़म बैंक में जमा नहीं करा सकते, क्यूँकि सवाल उठेगा कि उस धन को पिछली Income Decleration Scheme में घोषित क्यूँ नहीं किया। साथ ही, अब केस भी चल सकेगा।

छोटे और मध्यम वर्गीय लोगों का काला धन आम तौर पर कैश में नहीं, प्रॉपर्टी और सोने में लगा होता है। उस काले धन पर कोई सीधा ख़तरा नहीं है।हाँ, प्रॉपर्टी की क़ीमतें ज़रूर गिर जाएँगी। अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा, ये अनिश्चित है। हालाँकि कुछ समय के लिये तो सब हिल जाएगा।

काला धन सिर्फ़ सरकारी या राजनीतिक भ्रष्टाचार से नहीं उपज रहा था। आम आदमी भी जो भी लेन देन बिना टैक्स अदा किए कर रहा था, वह भी काला धन पैदा कर रहा था। मार्केट से कैश का गायब होना और GST का कुछ ही महीनों में आना, ये मिल कर क्या दिशा देंगे, ये देखना मज़ेदार रहेगा।

वैसे ये वक़्त फिर से इतिहास के पन्ने पलटने का भी है। एक बार पहले भी, जनवरी 1978 में ₹1000, ₹ 5000 और ₹ 10000 के नोट यूँ ही रातों रात अमान्य कर दिए गए थे। तब भी वजह काले धन को नियंत्रित करना ही थी। मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री थे। पहले वित्त मंत्री भी रहे थे। कठोर निर्णय लेने के लिए जाने जाते थे। तब उनके इस क़दम का अर्थव्यवस्था पर तात्कालिक और दीर्घकालिक क्या असर पड़ा था, ये फिर से समझने का वक़्त है।

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल की एफबी वॉल से.

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