जी न्यूज करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहा है

Sheel Shukla : ज़ी न्यूज़ से एक सवाल… आपको को कैसा लग रहा है जब आप अपनी बेइज्जती खुद ही कर रहे हैं? आजकल ज़ी न्यूज़ पर राम मंदिर निर्माण के सन्दर्भ में एक कार्यक्रम चल रहा है “ग्रेट डिबेट शो”. इसमें आम जनता के साथ कुछ राम मंदिर समर्थित राजनेता एवं कुछ राम मंदिर विरोधी राजनेता के साथ साथ प्रतीकात्मक तौर कोई व्यक्ति श्री रामचंद्र भगवान कोई सीता तो कोई हनुमान बनकर बैठा है। करोड़ों लोगो की श्रद्धा के ये भगवन बोलते भी हैं।

जब कोई राम मंदिर विरोधी नेता मंदिर निर्माण का विरोध करता है तो ये भगवन श्री राम याचना एवं शिकायत भरे स्वर में कहते हैं कि आप लोग तो अच्छे घरों में रहते हैं और मैं तो अभी तक टाट पट्टी की चादरों में ही बैठा हूँ। जब राम जी की बात को कोई विरोधी नेता जैसे ही दरकिनार करता है तब तक सीता जी अपना त्याग बताने लगती हैं और मंदिर क्यों बने, इसका तर्क भी देती हैं।

इतने बड़े राष्ट्रीय समाचार चैनल ज़ी न्यूज़ को क्या इतनी भी समझ नहीं है कि वो क्या कर रहे हैं? अरे भगवान राम को इससे क्या कि आप उनकी मूर्ति को टाट पट्टी में रख कर पूजा करें या फिर आलीशान भव्य मंदिर में। ये कितने शर्म की बात है कि क्या हमारे भगवन खुद आकर अपना मंदिर मांगेंगे? या भगवान राम की आड़ में मंदिर समर्थक भगवान राम के नाम पर मंदिर बनाने की याचना करेंगे ?

ज़ी न्यूज़! मत लाइए भगवन राम, सीता, हनुमान को इस लड़ाई में, मंदिर बने या न बने… इससे हमारे भगवन पर कोई असर नहीं है… वो सर्व व्यापी हैं, सर्व शक्तिमान हैं। मंदिर तो सिर्फ हमारी आस्था का प्रतीक है। मंदिर बने अच्छी बात है, लेकिन भगवन श्री राम सीता एवं हनुमान की भावनात्मक नीलामी बंद हो। ये करोड़ो हिन्दुओ की शान के खिलाफ है!

दैनिक समाचार पत्र विजडम इंडिया के संपादक शील शुक्ला की एफबी वॉल से.

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रामलला तक पहुंचने पर जो दृश्य देखा, वह हृदय विदारक था

आज लगभग 40 साल बाद मैं फिर से अयोध्या की राम जन्मभूमि पर गया जहां रामलला विराजमान हैं, उस जगह तक पहुंचने में लगभग आधा घंटा पैदल चलना पड़ा। जब पहली बार यहां आया था तो शायद पांच मिनिट भी नहीं चलना पड़ा था। पैदल चलना मेरे लिए आनंद की बात है लेकिन रामलला तक पहुंचने पर जो दृश्य मैंने देखा, वह हृदय-विदारक था। लोहे के पाइपों से घिरा रास्ता ऐसा लग रहा था, जैसे हम हिटलर के किसी यातना-शिविर में से गुजर रहे हैं। ऐसे कई शिविर मैंने यूरोपीय देशों में देखे हैं लेकिन यह दृश्य तो उससे भी भयंकर था।

सुरक्षाकर्मियों ने कलम, घड़ी, बटुआ वगैरह भी नाके पर रखवा लिया। ऐसी सुरक्षा तो मैंने कभी रुस के क्रेमलिन, अमेरिका के व्हाइट हाउस और भारत के राष्ट्रपति भवन में भी नहीं देखी। अनेक सम्राटों और बादशाहों से मिलते हुए भी मुझे अपनी घड़ी और पेन निकालकर जमा नहीं कराने पड़े। बड़ी बेइज्जती महसूस हो रही थी लेकिन क्या करते ? वैसे मैं मूर्तिपूजक भी नहीं हूं लेकिन मेरे साथ देश के जाने-माने 30 लोग थे, जिनमें नालंदा वि.वि. के कुलपति और विख्यात वैज्ञानिक डाॅ. विजय भाटकर, एमआईटी पुणे के डाॅ. वि.ना. कराड़, स्वनामधन्य पूर्व मंत्री आरिफ खान, डाॅ. शहाबुदीन पठान आदि भी थे।

लोहे के पाइपों से घिरे इस रास्ते के चारों तरफ गंदगी फैली हुई थी और भूखे बंदर प्रसाद की बाट जोह रहे थे। उसके बाद हम लोग उस स्थाान पर गए जहां राम मंदिर के लिए शिलाएं तराशी जा रही थीं और राम मंदिर के लिए देश भर से ईंटे इकट्ठी की गई थी। बड़ी-बड़ी शिलाओं पर कारीगरी तो मनोहारी थी लेकिन लाल शिलाएं अजीब-सी लग रही थीं। उस मंदिर में तो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ शिलाएं लगानी चाहिए। फिर हम सब गए सरयू के किनारे। बहती हुई मनोरम सरिता को देखकर याद आया कि राम ने यही प्राण त्यागे थे।

यह यात्रा अविस्मरणीय रही, क्योंकि यहां की 70 एकड़ भूमि में हम विश्व-तीर्थ बना हुआ देखना चाहते हैं, चाहे राम जन्म-स्थल पर तो मंदिर ही बने लेकिन शेष 60-65 एकड़ में दुनिया के कम से कम दस मजहबों के पवित्र-स्थल बनें। अयोध्या विश्व की आध्यात्मिक राजधानी बन जाए। यहां करोड़ों लोग हर साल धार्मिक पर्यटन के लिए आएं। उसके साथ-साथ यहां एक ऐसा विश्वविद्यालय भी कायम हो, जिसकी पढ़ाई में अध्यात्म और विज्ञान का संगम हो। अयोध्या अपने नाम को सार्थक करे। युद्ध की वृत्ति का निषेध करे। सारा विवाद खत्म हो। मामला अदालत के बाहर सुलझे। जब जीतें, कोई न हारे।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक देश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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नाकामी छुपाने के लिए 2019 चुनाव में राम मंदिर कार्ड खेलेगी भाजपा

राम मंदिर मुद्दे पर मोदी की गंभीरता को समझने में भारी भूल कर रहा मीडिया!  2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से मीडिया में राम मंदिर पर चर्चा होती रही है। यूपी में बीजेपी की भारी जीत के बाद ये चर्चा आम हो गई है। अक्सर टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर, पत्रकार, मुस्लिम धर्मगुरू, बुद्धिजीवी जब खुले तौर पर  मंदिर कब बनेगा या निर्माण की तारीख बताने जैसे असहज सवालों पर सरकार के प्रवक्ताओ को घेरने की कोशिश करते हैं तो शायद इन सभी महानुभावों को ये समझ मे नहीं आता कि अगर वाकई में इन्हें तारीख बता दी गयी तो इन्हें न्यूज़रूम से सीधे आईसीयू में भर्ती कराना पड़ेगा।

जो नेता  नोटबन्दी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे दुस्साहसी निर्णय लेने की हिम्मत रखता है और उसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर सकता हो तो उसे  मंदिर बनाने में क्या दिक्कत हो सकती है। नोटबन्दी के नकारात्मक परिणामों को लेकर विपक्ष 8 नवम्बर से  आज तक मोदी को कभी घेर नहीं पाया क्योंकि देश की जनता मोदी के लिए ढाल बनकर खड़ी थी। मोदी को इस बात का आकलन जरूर था कि नोटबन्दी जैसे फैसले अपनी लोकप्रियता के चरम पर ही लिए जा सकते हैं अन्यथा इसके परिणाम वेनेजुएला या इमरजेंसी जैसे हो सकते थे।
वर्तमान परिस्थितियों में इस मुद्दे पर मोदी बहुत सावधानी से एक-एक कदम बढ़ा रहे है।

केंद्र राज्य दोनों में ही उनकी सरकार होने से उन पर मंदिर निर्माण के वादे का भारी दबाव है इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेसब्री से इंतजार है। एक ठोस आधार के जरिये वे 2019 चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे कि अगर उन्हें अगला कार्यकाल मिलता है तो मंदिर निर्माण के वादे को वो अंजाम तक पहुचाएंगे। सभी को विदित है कि सुप्रीमकोर्ट के फैसले को भी एक पक्ष या दोनों ही पक्ष कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यानी इस मुद्दे को लंबे समय तक लटकाने की कवायद आगे भी जारी करने का भरपूर प्रयास होगा। लेकिन अगर सरकार मुखर एवं प्रतिबद्ध हो तो इस मामले को लटकाना बिल्कुल आसान नहीं होगा।

देश का मीडिया मोदी के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी उनके निर्णयों को समझने में नाकाम रहा है। उनके निर्णय लगातार मीडिया के आकलन के बिल्कुल उलट साबित होते रहते हैं। शायद 2019 चुनाव तक मीडिया का सिर चकरा जाए। मोदी का योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उनके गूढ़ निहितार्थ है। वे गुजरात की तरह यूपी को भी हिंदुत्व की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना  चाहते हैं। उनके कार्यकाल में अगर अनेक बाधाओं के बाद भी अगर राम मंदिर का निर्माण कार्य प्रशस्त होता  है तो वे सीधे-सीधे देश के 80% हिन्दू जनमानस के दिलों पर स्थायी तौर पर राज करेंगे। बंगाल, केरल जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में जहाँ लम्बे समय से बीजेपी सत्ता पाने का ख्वाब देख रही है, वहाँ उसका आधार बनाना  बेहद आसान होगा। बेरोजगारी, महंगाई, गिरती विकास दर जैसे अनेक मुद्दों पर घिरी सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए 2019 चुनाव में 2014 की तरह ध्रुवीकरण के लिए  हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने के लिए राम मंदिर का मुद्दा सबसे  उपयुक्त मानती है।

अभय सिंह
abhays170@gmail.com

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अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसले की घड़ी!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद (बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद) फिर सुर्खिंया बटोर रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत कल (11 अगस्त 2017) से इस एतिहासिक विवाद का हल निकालने के लिये नियमित सुनवाई करने जा रही है। अदालत जो भी फैसला करेगा उसे दोंनो ही पक्षों को मानना होगा, लेकिन देश में मोदी और प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद ऐसा लगने लगा है कि अब इस मसले पर सियासत बंद होगी और कोई फैसला सामने आयेगा। उक्त विवाद करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ मसला है तो कुछ मुस्लिम संगठन इस पर अपनी दावेदारी ठोेक रहे हैं। करीब पांच सौ वर्ष पुराने इस विवाद ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में गत दिनों उस समय एक नया मोड़ आ गया,जब यूपी के शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करके अपना पक्ष रखते हुए दावा किया,‘ विवाद खत्म करने के लिए बोर्ड का मत है कि अयोध्या में विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है।’ अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में कल (11 अगस्त 2017) से सुनवाई होनी है। शिया बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट में एक पार्टी है। ऐसे में यह हलफनामा अहम माना जा रहा है।

यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन की ओर से दाखिल 30 पेज के हलफनामे में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद मीर बकी ने बनवाई थी। वह शिया थे और शिया वक्फ बोर्ड की स्थापना उन्होंने की थी। ऐसे में मस्जिद की प्रॉपर्टी शिया वक्फ बोर्ड की है। मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड की नहीं है। ऐसे में मस्जिद के बारे में शिया वक्फ बोर्ड ही बातचीत कर सकता है। इस मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के स्टैंड पर ऐतराज जताते हुए शिया बोर्ड ने यह भी कहा कि तमाम मुद्दों पर समझौते के लिए एक कमिटी बनाए जाने के लिए वक्त दिया जाए।

गौरतलब हो बीते मार्च महीने में सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि मंदिर-मस्जिद विवाद का कोर्ट के बाहर निपटारा होना चाहिए। इस पर सभी संबंधित पक्ष मिलकर बैठें और आम राय बनाएं। बातचीत नाकाम रहती है तो हम दखल देंगे,लेकिन इस पर दोनों ही पक्षों की तरफ से कोई सार्थक शुरूआत नहीं की गई,जिस कारण से सुप्रीम कोर्ट अब इस विवाद की नियमित सुनवाई करने जा रहा है।

अभी तक बाबरी मस्जिद के सबसे बड़े पैरोकार हाशिम अंसारी (अब मृत) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ही विवादित स्थल पर अपनी दावेदारी ठोक रही थी।उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड ने अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हलफनामा देकर मुस्लिम सियासत को और गरमा दिया है। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का मानना है कि शिया वक्फ को इसका अधिकार ही नहीं है। शिया वक्फ बोर्ड के हलफनामें पर मुस्लिम पक्ष के कुछ पैरोकारों का यह भी मानना है कि इससे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे विवाद पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

शिया वक्फ बोर्ड ने यह हलफनामा ऐसे समय में दिया है जबकि वह सपा सरकार में संपत्तियों के दुरुपयोग जैसे कई आरोपों से घिरा हुआ है। हालांकि वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ऐसे आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कह रह हैं,‘हम न्यायालय में चल रहे मुकदमे में पक्षकार हैं और अन्य पार्टियों की तरह अपना जवाब रखने का हमें हक है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कब अपना पक्ष रखा। यह सुप्रीम कोर्ट देखेगा कि हमने हलफनामा देर में रखा या समय से। दूसरी ओर इस मुकदमे में पैरोकार पूर्व अपर महाधिवक्ता जफरयाब जीलानी मानते हैं कि इस हलफनामे का मुकदमे की सुनवाई पर असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य सियासी है और यह भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारुकी कहते हैं कि 1946 में यह तय हो चुका है कि मस्जिद पर शिया का हक नहीं है। 71 साल बाद इस मामले को अदालती लड़ाई में उठाना गलत है।

बताते चलें कि 30 सितंबर 2010 को हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन में से निर्मोही अखाड़े को राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह, रामलला विराजमान को मूर्ति वाली जगह और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बचा हुआ तिहाई हिस्सा देने को कहा था,जिस पर कोई भी पक्ष राजी नहीं हुआ जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया था।

किसने क्या कहा–

यह मस्जिद मीरबाकी ने बनवाई थी, जो शिया था। 1946 तक मस्जिद उनके पास थी लेकिन, अंग्रेजों ने गलत कानूनी प्रक्रिया से इसे सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया। मस्जिद और मंदिर पास-पास नहीं होने चाहिए क्योंकि दोनों समुदाय के लोग लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते हैं। हम चाहते हैं कि राम जन्मभूमि स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम इलाके में मस्जिद बनवाई जाए। -शिया वक्फ बोर्ड

अयोध्या में विवाद मस्जिद का नहीं, बल्कि भूमि का है। इसे शिया-सुन्नी के विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। शिया वक्फ बोर्ड का हलफनामा औचित्य से परे है। इसका कोई अर्थ नहीं है। -वरिष्ठ सदस्य आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड खालिद रशीद फरंगी महली

मंदिर और मस्जिद दोनों बनें। मंदिर वहीं बने, जहां वह है। मस्जिद सरयू नदी के दूसरी तरफ बननी चाहिए। -बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी

शिया वक्फ बोर्ड का हलफनामा झूठ के सिवा कुछ नहीं है। चंद बिके लोगों की यह करतूत है। इससे सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। -हाजी महबूब, सुन्नी सेंट्रल बोर्ड

इस हलफनामे से दुनिया भर में बड़ा संदेश गया है। देश में रहने वाला हर राष्ट्रप्रेमी मुसलमान चाहता है कि राममंदिर जन्मभूमि पर बने। -महंत रामदास, निर्मोही अखाड़ा

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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त्रयंबकेश्वर मंदिर : 200 रुपये डोनेशन देकर वीआईपी दर्शन करने की बात लिखा देख मन बिदक गया

Yashwant Singh : आजकल नासिक में डेरा है. यहां चाचाजी की ओपन हॉर्ट सर्जरी हुई है. सब कुछ सकुशल रहा. वे अपने सुपुत्र और मेरे छोटे भाई Rudra Singh के यहां रहकर स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. चाचाजी के कहने पर आज नासिक से कुछ दूर स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर गया, जिसकी हिंदू धर्म में बहुत महिमा है. पर मंदिर के गेट पर 200 रुपये डोनेशन देकर वीआईपी दर्शन करने की बात लिखा देख मन बिदक गया. भीतर नहीं गया. पूछा तो पता चला कि आम जनता लंबी लाइन लगाकर काफी समय गुजारने के बाद दर्शन लाभ पाती है लेकिन जो दो सौ रुपये दे देते हैं उन्हें तुरंत डायरेक्ट दर्शन करा दिया जाता है.

 

मैं वैसे भी कर्मकांड और दुनियावी किस्म के पूजापाठ को लेकर बेहद अधार्मिक रहा हूं, सो यहां इस भेदभाव पूर्ण पद्धति से दर्शन करने का मतलब ही नहीं. बाकी जिन मंदिरों वगैरह में जाता हूं वहां दर्शन भाव से कम, उत्सुकता भाव से ज्यादा जाता हूं कि आखिर वो मूर्ति पत्थर जगह स्थल पीठ क्या कैसी है, जिसके लिए इतने लोग आते हैं और जिसकी इतनी मान्यता है, इसी टाइप की फील ज्यादा खींच ले जाती है. त्रयंबकेश्वर मंदिर के आसपास के इलाके में घूमा. पहाड़ से घिरा यह स्थान उस समय कितना अदभुत रहा होगा जब यहां इतनी भीड़भाड़ व बसावट न रही होगी. तब सच में यहां उर्जा पुंज चारों तरफ रहा होगा, वाइब्रेशन फील होती रही होगी. लेकिन अब तक इतने मकान, इतनी दुकान और इतने सारे लोग हैं कि भगवान खुद भी चले आएं तो अफना के कुछ देर या कुछ दिनों में भाग जाएं.

उपर एक तस्वीर में देख सकते हैं डोनेशन वाली बात कितनी साफ साफ ढंग से मंदिर के मुख्य गेट पर दर्ज है.
एक तस्वीर में मेरे अनुज रुद्र और मैं लैपटाप पर काम करते और टीवी पर डिस्कवरी साइंस चैनल देखते नजर आ रहे हैं.
एक तस्वीर में पहाड़ कुंड और प्रकृति का नजारा है.
एक तस्वीर में दूर से दिख रहे त्रयंबकेश्वर मंदिर की प्रतिलिपि पानी में दिख रही है.

आप लोग भी यहीं से दर्शन कर लें. आने की जरूरत नहीं है. मन चंगा तो कठौती में गंगा.

मुंबई से नासिक की कार यात्रा के दौरान सोचता रहा कि कितना हरा भरा ये इलाका है. उत्तर भारत वाली चेंचें कोंकों पोंपों वाली चिरकुटई पूरी यात्रा में कहीं न दिखी. सब कुछ मानों किसी चित्रकार ने बेहद कुशलता से संयोजित कर रखा हो. बेहद उदात्त और अनुशासित सा सब कुछ. बेहद हरा भरा और चटक सा सब कुछ.

दूसरा पहलू ये कि पानी बिना ये पूरा इलाका मरणासन्न होने की ओर बढ़ रहा है. विदर्भ के संकट की एक झलक यहां यूं दिखी कि पीने के पानी का काफी रायता फैला हुआ है. कोई कह रहा था कि अगर वाटर लेवल ठीक करने की बड़ी कोशिशें न की गईं तो सौ पचास साल में यहां मरघट हो जाएगा और सारे लोग उन इलाकों की तरफ विस्थापित हो जाएंगे जहां पीने का पानी जमीन में ठीक मात्रा में उपलब्ध है.

नाशिक में बरसाती पानी को रोककर उसी पानी को साल भर घरों में सप्लाई किया जाता है. लोग इसे पीते नहीं. पीने का पानी बाहर से मंगाते हैं. यानि यहां पानी का कारोबार खूब है. वैसे, यहां पेड़ पौधे पहाड़ियां व हरियाली खूब है लेकिन यह सब कितने दिनों तक रहेगा जब हर साल बारिश कम से कमतर होती जा रही है और वाटर लेवल का कहीं अता पता नहीं है. इन दिनों जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंढी पड़ रही है तो नाशिक में हम लोग पंखा चलाकर सो रहे हैं. जैकेट पहनकर बाहर निकलने की भूल कर गया मैं तो इसका पश्चाताप पूरे रास्ते रहा कि हाय इस भार को क्यों डाल लिया शरीर पर.

सोचिए, जब कड़ाके की ठंढ में इधर ये हाल है तो गर्मी में ये पूरा इलाका कैसा होता होगा. हालांकि समुद्र किनारे वाले शहरों में ठंढी गर्मी दोनों कम पड़ती है लेकिन इतनी भी कम सर्दी नहीं पड़ती जैसी नाशिक में पड़ रही. बेहद खतरनाक बात तो बारिश का न्यूनतम होते जाना है.

कोढ़ में खाज सरकार की नीतियां हैं. पूरा इलाका अब मकान फ्लैट बनाने के लिए लगातार उलीच कर समतल किया जा रहा है. पहाड़ काट डाले गए. पेड़ काटे डाले गए. पानी लील लिया गया. तालाब नाले पोखरे पाट डाले गए. हर तरफ बड़े बड़े मकान दुकान रंगरोगन से सजे ईंट पत्थरों के आलीशान मानवी ठिकाने उग चुके हैं. इस तरह के विकास का नतीजा यही दिख रहा है कि यहां आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर लोग ही रह पाएंगे. गरीब या तो विस्थापित होगा या आत्महत्या करेगा, जिसका ट्रेंड विदर्भ के जरिए हम लोगों को बखूबी इंडिकेट कर रहा है.

महाराष्ट्र में हरित आंदोलन या यूं कहिए प्रकृति आंदोलन चलाने की जरूरत है. रीयल इस्टेट माफियाओं पर लगाम कसने के लिए सरकारी नीति बदलने को लेकर पढ़े लिखे संवेदनशील तबके को चौतरफा दबाव बनाने बनवाने की जरूरत है. अगर आज हमारी पीढ़ी के लोगों ने यह सब नहीं किया तो भविष्य के नौनिहालों के लिए महाराष्ट्र किसी मौत के राष्ट्र सरीखा होगा.

मराठी मानुष की राजनीति करने वाली पार्टियां अगर वाकई क्षेत्रीय विशिष्टता और क्षेत्रीय ताकत को बढ़ावा देने के लिए चिंता करें तो उन्हें सबसे पहले पानी-प्रकृति बचाने बढ़ाने का महाअभियान शुरू करना चाहिए. लेकिन हमको मालूम है इनकी नीयत ठीक नहीं. इसलिए ये शार्टकट वाली राजनीति करने पर आमादा रहेंगे, मराठी – गैर मराठी टाइप की लड़ाई बार बार नए नए तरीके से छेड़कर. पर क्या अब ऐसे जांबाज मराठे नहीं जो अपनी पार्टियों को आइना दिखाएं या फिर नई पार्टी बनाकर वाकई महाराष्ट्र बचाने की मुहिम को आगे बढ़ाएं.

जैजै.

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नाशिक रेलवे स्टेशन पर एक अंधे लेकिन हस्ट-पुष्ट भिखारी को एक साहब टाइप सज्जन ने पैसे देने के बदले रोटी सब्ज़ी ऑफर किया तो उसने तुरंत मान लिया और उन्हीं के सामने लाठी बिछा धरती पर पालथी मार बैठ गया। उनने अपने बैग से खाना निकाला और सम्मान के साथ दे दिया। टांय टांय बोलने वाला अँधा भिखारी जब दो तीन कौर खा गया तो साहब बोले- ये सब्ज़ी आंवले की है, इससे डायबटीज़ की बीमारी नहीं होगी।

भिखारी खाना मुंह में कूँचते चबाते बोला- साहब, डायबटीज़ की बीमारी चोरों झुट्ठों को होती है। मुंझे काहें को होगी।

बेचारे साहब। उनका मुंह देखने लायक था। सामने मैं बैठा था। वे मुझे देखने लगे तो मैं ठठा के हंस पड़ा। वो बहुत झेंप गए। वो अँधा भिखारी भी देख रहा था साहब के चेहरे पर डायबटीज़ का उभर आना। खाना ख़त्म कर भिखारी ने मिनरल वाटर की बोतल झोले से निकाल गड़गड़ा कर पिया और लाठी ठोंकते टांय टांय बोलते-मांगते आगे बढ गया।

लर्निंग- भिखारी का पेट भरने के दौरान डायबटीज़ और डेमोक्रेसी बतियाएंगे तो लात खाएंगे ही 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सोमवार तड़के झारखंड के देवघर मंदिर में भगदड़, 11 कावंड़ियों की मौत

रांची. सोमवार सुबह 5.45 के करीब देवघर शिव मंदिर परिसर में भगदड़ से 11 कावंड़ियों की मौत हो गई। 50 से अधिक लोग घायल हो गए। हादसा हुआ था जिस वक्त सावन के दूसरे सोमवार के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी थी। देवघर एसपी ने 10 लोगों की मौत की पुष्टि की है। इसी मंदिर परिसर में पिछली भगदड़ में 12 लोगों की जान चली गई थी।

देवघर के इस मंदिर में हर रोज भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। सावन सोमवार में भक्तों की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। मंदिर में जल चढ़ाने के लिए सोमवार सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ लगी थी। इसी दौरान दस किलोमीटर पहले ही श्रद्धालुओं की लाइन लगनी शुरू हो गई थी। कुछ श्रद्धालुओं का पैर रस्सी में फंस गए और उसके बाद पीछे से सब एक दूसरे पर गिर गए। आज सुबह जल चढ़ाने के लिए करीब डेढ़ लाख श्रद्धालु पहुंचे थे। देवघर के डिप्टी कमिश्नर अमित कुमार ने बताया कि कावड़िए जलाभिषेक के लिए लाइन में लगे हुए थे। लाइन करीब 10 किलोमीटर लंबी थी। श्रद्धालुओं के बीच आगे जाने की होड़ लगी थी, तभी ये हादसा हो गया। 2012 में भी यहां भगदड़ में 9 लोगों की मौत हो गई थी। 

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राम मंदिर नहीं, राम राज्य की बात हो

हिन्दुस्तान में मंडल-कमंडल की सियासत ने कई सरकारों की आहूति ली तो कई नेताओं को बुलंदियों पर पहुंचा दिया।मंडल के सहारे वीपी सिंह ने अपनी सियासी जमीन मजूबत की।समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव,राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव ने भी इस मुद्दे से खूब राजनैतिक रोटियां सेंकीं।राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद में मुलायम ने खुल कर मुसलमानों की पैरोकारी की जिसकी सहारे लम्बे समय तक मुलायम उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज रहे आज भी अगर सपा का जनाधार मजबूत है तो इसके पीछे अयोध्या आंदोलन की जड़े ही हैं। उधर कमंडल(राम मंदिर आंदोलन) के सहारे भाजपा भी लगातार बढ़ती गई।कमंडल के सहारे ही लाल कृष्ण आडवाणी,कल्याण सिंह,उमा भारती,विनय कटियार, जैसे नेता उभर कर सामने आये।1992 में जब तक विवादित ढांचा गिरा नहीं दिया गया तब तक यह नेता लगातार चमकते रहे,लेकिन विवादित ढांचा गिरते ही इन नेताओं की सियासत पर भी ग्रहण लग गया।विवादित ढ़ांचा गिरते ही इन नेताओं के ही नहीं भारतीय जनता पार्टी के भी बुरे दिन आ गये।

खैर,भाजपा में एक तरफ गरमपंथी नेताओं का गुट था जिसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भी आशीर्वाद मिला था तो दूसरी तरफ नरमपंथी कहलाये जाने वाले नेता अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी में अपनी जड़े मजबूती से जमाये हुए थे,यहां तक की आरएसएस भी अटल के प्रति श्रद्धा का भाव रखता था।आडवाणी और अटल दोनों के तेवरों में काफी फर्क था,फिर भी दोनों की नजदीकियां काफी थीं।कहा तो यहां तक जाता है कि अटल जी प्रधानमंत्री बने तो इसमें लाल कृष्ण आडवाणी का सबसे बड़ा योगदान था।अटल जी की पार्टी के भीतर तो चलती ही थी अन्य दलों के नेता भी उनका आदर करते थे।

यह सब बातें अब इतिहास बन चुकी हैं।भारतीय जनता पार्टी में सियासत की नई इबारत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे के साथ लिख रहे हैं।उनकी सबको साथ लेकर चलने की सोच को धीरे-धीरे बल भी मिल रहा है।मोदी ने विकास की खातिर राम मंदिर निर्माण और धारा 370, समान नागरिक संहिता जैसे मसलों से अपने आप को किनारे कर लिया है,जिसको लेकर संघ हमेशा से गंभीर रहा है। इतना ही नहीं राम मंदिर आंदोलन के नेताओं को भी मोदी सरकार में जगह नहीं मिल पाई,सिवाय उमा भारती के,लेकिन उन्हें भी गंगा अभियान तक ही सीमित कर दिया गया है।आडवाणी जी अब भाजपा के मार्ग दर्शक बन कर रह गये हैं।पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को राजस्थान का राज्यपाल बना कर सियासी पिच से किनारे कर दिया गया है।राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी रहने वाले राज्यसभा सांसद विनय कटियार को भी मोदी ने कोई जिम्मेदारी नहीं दी है।यह बात कटियार शायद पचा नहीं पा रहे हैं और इसी लिये वह मंदिर मुद्दे को हवा देकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में हैं।

कटियार अपनी ही सरकार को कटघरें में खड़ा करते हुए यहां तक कहते हैं कि कुछ समय तक अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की पहल करने में केंद्र सरकार के सामने कोई संवैधानिक अड़चन नहीं है। इस दिशा में मौजूदा केंद्र सरकार का मार्ग पूर्व की यूपीए सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथ पत्र से प्रशस्त हो रहा है। इस शपथ पत्र में यूपीए सरकार ने कहा था कि यदि साबित हो जाय कि बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी ढांचे को तोड़कर हुआ था, तो वह हिंदुओं की मांग का समर्थन करते हुए मंदिर निर्माण में सहयोग करेगी।कटियार यहीं नहीं रूकते हैं वह कहते हैं कि हाईकोर्ट के निर्णय से जब स्पष्ट हो गया है कि रामलला जिस भूमि पर विराजमान हैं, वहां पहले से मंदिर था और आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट से भी यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है। ऐसे में सरकार के सामने मंदिर निर्माण की दिशा में सहयोग को लेकर कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने दोहराया कि मंदिर निर्माण की उपेक्षा ठीक नहीं है और इससे जन भावनाएं आहत होंगी।कटियार का मंदिर निर्माण को लेकर  बयान उस समय आया है जबकि एक दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कुछ मुस्लिम धर्मगुरूओं से मुलाकात हुई थी। कटियार का बयान कोई खास मायने नहीं रखता है लेकिन उन्होंने विरोधियों तो हल्ला मचाने का मौका थमा ही दिया है। 

सवाल यह उठता है कि जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ,साधू समाज मंदिर मसले पर शांत है और यहां तक की विश्व हिन्दू परिषद भी इस मुद्दे को ज्यादा हवा नहीं दे रहा है तब विनय कटियार की ऐसी क्या मजबूरी है जो उन्हें अलग लाइन लेकर चलना पड़ रहा है।विनय कटियार भगवान राम की नगर अयोध्या(फैजाबाद)से आते हैं।हो सकता है इस वजह से उनकी कुछ मजबूरियां हों,लेकिन देशहित में तो यही है कि राम मंदिर निर्माण या तो अदालत के फैसल से बने या आम सहमति से।आम सहमति बनना ज्यादा मुश्किल काम नहीं है।क्योंकि हिन्दुस्तान का मुसलमान जानता है कि यह देश बाबर के तौर-तरीके से नहीं चल सकता है।मगर लाठी-डंडे के बल पर यह बात किसी के दिमाग में नहीं बैठायी जा सकती है।कुछ फैसले आवेश में आकर लेने की बजाये समय पर लिये जाये तो उसके नतीजे ज्यादा सार्थक निकलते हैं।राम मंदिर हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा है।भगवान राम हिन्दुओं के कर्ण-कर्ण में विराजमान हैं।राम मंदिर से अच्छा हैं भगवान राम के दिखाये रास्ते पर चलना, जिससे देश में राम राज्य आ सकता है।जहां सभी सुखी रहेंगे।आज की तारीख में राम मंदिर नहीं राम राज्य की बात होनी चाहिए।बात कटियार की कि जाये तो भले ही उन्हें इस बात का मलाल हो कि अयोध्या में राम लला का मंदिर नहीं बन पा रहा है,लेकिन फैजाबाद और अयोध्या की जनता को राम लाल के मंदिर निर्माण से अधिक इस बात का मलाल है कि भगवान राम के प्रति गहरी आस्था रखने वाले विनय कटियार ने अपनी संासदी और विधायिकी के दौरान अयोध्या के विकास की ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया।अगर वह चाहते तो अयोध्या बड़ा धार्मिक पर्यटन स्थल बन सकता था।

कटियार को समझना चाहिए कि अब माहौल बदल गया है।देश की नई पीढ़ी का इस तरह की बातों से कोई सरोकार नहीं रह गया है।जब अटल बिहारी वाजपेयी ने केन्द्र में सरकार बनाई थी तब ही यह बात कह दी जाती की वह तब ही सरकार बनायेंगे जब राम मंदिर निर्माण के लिये 370 सीटें उन्हें मिल जायेंगी। तब संभवताःइतनी सीटें दिलाने के लिये हिन्दू समाज जातिपात भूल कर एकजुट हो भी जाता,लेकिन तब तो भाजपा सरकार बनाने और चलाने की हड़बड़ी में थी।

बहरहाल, बाबरी मस्जिद के बुजुर्ग मुद्दई मो. हाशिम अंसारी ने  अयोध्या में भाजपा नेता विनय कटियार के अयोध्या में शीघ्र राम मंदिर बनाने संबंधी बयान को गैर-जिम्मेदाराना बताया है। उन्होंने कहा कि आज जब अलगाव-दुराव से दूर रहकर देश को एकजुट रखने की जरूरत है, तब कटियार का मंदिर राग समझ से परे है। उन्होंने याद दिलाया कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन रहते इस तरह का बयान कोर्ट की अवमानना भी है।

अजय कुमार से संपर्क : ajaimayanews@gmail.com

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