सुशोभित-

इंदिरा गांधी को अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में दो बड़े अलगाववादी विद्रोहों का सामना करना पड़ा था और दोनों ही बार उन्होंने निर्णायक सैन्य कार्रवाई करके उनका समाधान किया। पहला विद्रोह, उनके प्रधानमंत्री बनने के चंद ही सप्ताह के बाद हुआ था, दूसरा, उनके जीवन के अंत के चंद ही महीनों पूर्व। 1984 का ऑपरेशन ब्लूस्टार तो बहुत प्रसिद्ध है, जो खालिस्तानी आंदोलन को कुचलने के लिए अमृतसर में चलाया गया था (प्रसंगवश, “सरकार स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना को क्यों नहीं भेज रही है”, इस बात को लेकर तत्कालीन भाजपा नेताओं- अटल-आडवाणी सहित- ने एक प्रोटेस्ट-मार्च निकाला था!), लेकिन 1966 में मिज़ो नेशनल फ्रंट के विद्रोह की इतनी चर्चा नहीं होती, जिसके दमन के लिए नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ने भारतीय वायुसेना को आइजोल में हवाई हमला करने के आदेश दिए थे। वह स्वतंत्र भारत का इकलौता ऐसा उदाहरण है, जब भारतीय वायुसेना ने अपने ही नागरिक क्षेत्र के भीतर आक्रमण किए हों। 1966 और 1984 : इन दोनों ही सैन्य कार्रवाइयों ने बग़ावत को कुचल दिया था। लौह महिला में राजनीतिक इच्छाशक्ति की किल्लत क़तई नहीं थी।
लेकिन इन सैन्य कार्रवाइयों के अलावा इंदिरा गांधी ने राजनीतिक इच्छाशक्ति का एक और बड़ा उदाहरण 1980 के दशक में तब पेश किया था, जब पंजाब में अलगाववाद चरम पर पहुँच गया था और इसे नियंत्रित करने में नाकाम रहने पर प्रधानमंत्री ने अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करते हुए अपनी ही पार्टी की सरकार और मुख्यमंत्री को बर्ख़ास्त करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था!
अब यह साल 2023 है और मणिपुर में राजनीतिक इच्छाशक्ति का ‘चीरहरण’ हो चुका है! सरकार को बर्ख़ास्त करना तो दूर, भाजपा नेतृत्व अपने नाकारा मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह से इस्तीफ़ा तक नहीं ले पाया है। विश्वयात्रा से लौटे प्रधानमंत्री एक बार भी मणिपुर का दौरा करने नहीं गए हैं, न ही उन्होंने अपनी ओर से उस राज्य की विस्फोटक स्थिति पर कोई बयान जारी किया है। और जब गृहमंत्री अमित शाह मणिपुर में कुछ दिन ‘छुटि्टयाँ’ बिताने गए थे, तो ‘पूर्व फ़ुटबॉलर’ एन. बीरेन सिंह ने उनके साथ जनजातीय इलाक़ों का दौरा करने से इनकार कर दिया था। आलम यह है कि कुकी समुदाय के भाजपा विधायक दिल्ली जाकर गुहार लगा रहे हैं कि हमें हमारी ही राज्य-सरकार से मुक्त किया जाए!
बीरेन का गृहमंत्री के साथ दौरे पर न जाना, राज्य में व्याप्त अराजकता को नियंत्रित नहीं कर पाना, उलटे स्वयं संघर्षरत समुदायों में से एक (मैतेई) का पक्षधर बन बैठना और इसके बावजूद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा नहीं देना- यह भाजपा नेतृत्व के कथित दबदबे की कलई तो खोलता ही है, यह भी बताता है कि सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहने वाला यह आलाकमान मणिपुर जैसे छोटे राज्य को भी अपने हाथ से नहीं जाने देने के लिए चाहे जितने ही लोगों की बलि चढ़ाने को तत्पर है!
और यह पहली बार नहीं हो रहा है! 2002 में गुजरात में भी पूर्ण-अराजकता व्याप्त हो गई थी। 2021 में कोविड की मारक-लहर के आगे समूचा सिस्टम कॅलैप्स कर गया था और आशाएँ केवल इस बात से थीं कि वेव का ‘पीक’ कब आएगा। भारत-देश एक अदृश्य विषाणु के रहमो-करम पर था। तब भाजपा नेतृत्व बंगाल में भीड़ जुटाने में व्यस्त था। अब मणिपुर में जंगलराज क़ायम हो चुका है। यह सीमावर्ती राज्य म्याँमार से सटा हुआ है और चीन के क़रीब है। लेकिन मुख्यधारा के राजनीतिक-समाचारों में पहले कर्नाटक और फिर महाराष्ट्र छाए रहे हैं। अखण्ड भारत के नाम पर भारत से पृथक हो चुके देशों को भी अपने में समो लेने की इच्छा रखने वालों में भारत के मौजूदा एक राज्य के लिए ही कोई संवेदना या रुचि नहीं है।
इंदिरा गांधी की प्रचण्ड राजनीतिक इच्छाशक्ति के बरअक़्स भारत ने ऐसा कमज़ोर नेतृत्व इससे पहले शायद ही कभी देखा हो, जिसमें सरकार के नेता ने दस सालों से पत्रकारों से मुक्त-संवाद नहीं किया है और संकट के हर क्षण में मौन साधा है, मानो चीज़ों को नज़रंदाज़ करने भर से वे हल हो जाएँगी? या केवल ब्रांडिंग, मार्केटिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, जीडीपी के दम पर राष्ट्र-निर्माण हो जावेगा?
मणिपुर में विवाद के मूल में है हिंदू बहुल मैतेई और ईसाई बहुल कुकी समुदाय के बीच हिंसक टकराव, जिसमें अनुसूचित जनजाति की मान्यता के लिए होड़ है। कुकियों को यह मान्यता पहले ही प्राप्त है, अब मैतेई भी अजजा कहलाना चाहते हैं। इसका कारण यह है कि मणिपुर में विधानसभा की 60 सीटों में से 19 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं, जिन पर नगा और कुकी जीतकर आते हैं। शेष 41 में से 39 सीटों पर मैतेई विधायक काबिज़ हैं। यानी जम्मू और कश्मीर में जैसा घाटी और जम्मू की सीटों का प्रतिनिधित्व करने वालों का स्पष्ट जातीय-विभाजन है, वैसी ही स्थिति है। अजजा मान्यता मिलने पर मैतेई लोग इन शेष 19 सीटों को भी हथिया सकेंगे, जो कुकियों को मंज़ूर नहीं। कुकी लोग वैसी स्थिति में एक पृथक राज्य की माँग कर रहे हैं। मणिपुर की भाजपा सरकार मैतेई-बहुल इम्फाल घाटी पर दिल-खोलकर ख़र्च करती है, जबकि जनजातीय क्षेत्र उपेक्षित हैं। सरकार में मैतेई लोगों का दबदबा है। मुख्यमंत्री, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, राज्य के पारम्परिक महाराजा से लेकर प्रशासन में प्रभावी पदों पर बैठे तमाम लोग मैतेई हैं। वहाँ के पुलिस महानिदेशक भर ही कुकी हैं और वे पूरी तरह से असहाय हैं।
मणिपुर में हालात इतने विस्फोटक हैं कि उग्रवादियों ने पुलिस के शस्त्रागारों को लूट लिया है और अब वे स्नाइपर राइफ़लों से लैस हैं। लुटेरों को अपनी सरकार पर इतना भरोसा है कि वे पुलिस शस्त्रागार में अपने आधार कार्ड छोड़ जा रहे हैं, ताकि कल को कोई जाँच-वग़ैरा हो तो सरकार उनका ‘ध्यान’ रख सके। कहने वाले कह रहे हैं कि यह वही ‘मॉडेस ऑपरेन्डी’ (कार्यप्रणाली) है, जिसे गुजरात में 2002 में अमल में लाया गया था। कुकी जनजाति मिज़ो लोगों से सम्बद्ध है। ये वही मिज़ो लोग हैं, जिन्होंने 1966 में अलगाववादी आंदोलन चलाया था। अगर वो अपने कुकी बंधुओं की रक्षा के लिए मैतेइयों के विरुद्ध मैदान में उतर पड़े तो कल्पना करें क्या होगा?
आज़ाद भारत के इतिहास में जनचेतना और जनमत का ऐसा डिसएम्पॉवरमेंट कभी नहीं हुआ था कि जनता मानसिक रूप से लगभग सरकार की बंधक बन चुकी है और उससे कोई प्रश्न नहीं करती है। जनता को धर्म और राष्ट्र के घमंड का झुनझुना थमा दिया गया है। थोथे गौरव से भर दिया गया है। वह अपने मोबाइल फ़ोन में व्यस्त है और हर घटना को ‘अस-वर्सेस-देम’ की आँख से देखती है। बहुसंख्यजन के लिए मणिपुर अव्वल तो मायने नहीं रखता और अगर रखता भी है तो उसकी संवेदनाएँ मैतेइयों के साथ है, क्योंकि मैतेई हिंदू हैं और कुकी ईसाई हैं। यह घोर अंधकार का समय है।
ऊपर मैंने इंदिरा की राजनीतिक इच्छाशक्ति की बात की, उसे छोड़ें और एक बार नैतिक आत्मबल की ही बात कर लें। 1946 और 1947 में जब बिहार, बंगाल, दिल्ली में दंगे छिड़े तो महात्मा गाँधी वहाँ राहत-कार्यों और शांति की अपील के लिए दौड़े चले गए। वे नंगे पाँव, निहत्थे गाँव-गाँव घूमते और लोगों से हथियार फेंक देने की प्रार्थना करते। जब दिल्ली आज़ादी का जश्न मना रही थी, तब गांधी कलकत्ते में अनशन पर बैठे थे। 78 साल के एक कृशकाय बूढ़े में जब इतना आत्मबल था तो 56 इंची सर्वशक्तिमान सत्ताधीश में उसका लेशमात्र भी क्यों नहीं हो सकता, जो अपने देशवासियों के पास जाकर एक बार उनकी ख़बर तक ले सकें?
प्रधान को लगता है कि मैंने राम मंदिर बनवा दिया, अब तो मेरी जीत सुनिश्चित है। जबकि यह पाँसा उलटा भी पड़ सकता है। जनता कह सकती है कि मंदिर बन गया, काम पूरा हो गया, अब परे हटो!
कल्याण के विष्णोई– बीच की कुछ कड़ियां मिसिंग है। हिंसक प्रदर्शन की शुरुआत कुकी और नगा समुदाय ने उच्च न्यायालय के आदेश के बाद की और साथ ही ये लोग 2008 के एक समझौते से भी पीछे हट गए। हिंसा के बीच कुकी विद्रोही संगठनों ने भी 2008 में हुए केंद्र सरकार के साथ समझौते को तोड़ दिया। दरअसल, कुकी जनजाति के कई संगठन 2005 तक सैन्य विद्रोह में शामिल रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार के समय, 2008 में तकरीबन सभी कुकी विद्रोही संगठनों से केंद्र सरकार ने उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन यानी SoS एग्रीमेंट किया। इसका मकसद राजनीतिक बातचीत को बढ़ावा देना था। तब समय-समय पर इस समझौते का कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा, लेकिन इसी साल 10 मार्च को मणिपुर सरकार कुकी समुदाय के दो संगठनों के लिए इस समझौते से पीछे हट गई। ये संगठन हैं जोमी रेवुलुशनरी आर्मी और कुकी नेशनल आर्मी। ये दोनों संगठन हथियारबंद हैं। हथियारबंद इन संगठनो के लोग भी मणिपुर की हिंसा में शामिल हो गए और सेना और पुलिस पर हमले करने लगे।
सुशोभित– मैंने लेख में स्पष्ट लिखा है दोनों समुदायों के बीच हिंसक टकराव। यह भी लिखा है कि कुकी लोग अलग प्रांत की माँग कर रहे हैं। न ही मैंने यह कहा कि हिंसा पूरी तरह से एकतरफ़ा है और एक ही समुदाय दोषी है। पर राज्य सरकार में मैतेई लोग भरे हैं, वो राज्य में वर्चस्व की स्थिति में हैं, वो हिंदू बहुल हैं, और इस वजह से सरकार का संरक्षण उनको प्राप्त है, मुख्यमंत्री ने इस्तीफ़ा नहीं दिया है और प्रधानमंत्री ने दौरा नहीं किया है, न राष्ट्रपति शासन लगाया है, जबकि गृहमंत्री की रुचि एनसीपी को तोड़ने में अधिक है। ये मेरे मुख्य प्रश्न हैं। आप चाहें तो कथानक में चाहे जितनी कड़ियाँ जोड़ सकते हैं। पर इस लेख का सरोकार कुकी और मैतेई से नहीं, भाजपा के नेतृत्व से है।



Dr s r Singh
July 26, 2023 at 9:59 am
Good in formative and analytical
Ramchandra Prasad
July 26, 2023 at 8:23 pm
इसमें चर्च की भूमिका की कोई उल्लेख ही नहीं करता, मानो वे कोई holy cow हैं। North east में पृथकतावाद की जड में चर्च और मिशनरियां ही हैं।