शैलेश अवस्थी-
दुःखद… ताजिंदगी पत्रकारिता को जीने वाले धुरंधर क्राइम रिपोर्टर मनीष निगम ने आज एक निजी अस्पताल के आईसीयू में अंतिम सांस ली. वह कोई 30 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में मेहनत और ईमानदारी से काम कर रहे थे. वह ख़ामोशी से अपना पत्रकारिता धर्म निभाते थे. लंबे समय तक वह अमर उजाला में मेरे साथी रहे और नित नई ख़बर खोजने को आतुर रहते. वह किडनी रोग से ग्रस्त थे.

हमेशा मुस्कुराने वाला यह शख्स अचानक हताशा में डूब गया. एक सच्चा पत्रकार तो अजीवन ही अभाव में जीता है और यही सच्ची कहानी मनीष की रही. पत्रकारिता के लिए समर्पित इस पत्रकार की जिंदगी भले ही यहीं तक रही, लेकिन कानपुर की अपराध पत्रकारिता की कथा ज़ब भी कही, सुनी और लिखी जाएगी, मनीष का जिक्र ज़रूर आएगा. अलविदा प्यारे दोस्त… विनम्र श्रद्धांजलि
आनंद मिश्रा-
मनीष निगम भइया का आज शाम कानपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में निधन हो गया। कानपुर कार्यालय आते जाते उनसे परिचय हुआ था। वे क्राइम के धुरंधर धनुर्धर थे। परिचय दोस्ती में बदली और फिर बड़े- छोटे भाई का रिश्ता बन गया।
दिसंबर 2021 में संस्थान ने मेरा तबादला जम्मू कर दिया था। नयी व्यवस्था होने तक मनीष भइया को हरदोई भेज दिया था। जनवरी 2022 में ही वह वापस कानपुर चले गए। शायद ही कोई बड़ी खबर रही होगी उनके रहने के दौरान जिस पर उन्होंने चर्चा न की हो मुझसे….कुछ दिन पहले बात हुई थी तो बोले अब तबीयत साथ नहीं देती, पर इतनीं जल्दी साथ छूटेगा ये नहीं सोचा था।
ईश्वर आपको अपने श्री चरणों में स्थान दें..
संजीव मोहन-
क्या कहूं, क्या लिखूं, ये कोई समय था जाने का मनीष…. कई सालों तक मेरे साथ अमर उजाला में काम कर चुके क्राइम रिपोर्टर मनीष निगम की बाइलाइन अब कभी नहीं छपेगी। कंप्यूटर खुलेगा पर मनीष की लॉगइन नहीं होगी। खबर, एंगिल, डिटेल, फोटो सबको पटकने की ललक….सब कुछ छोड़ कर वह खबरों के इस निष्ठुर संसार से विदा हो गया।
क्राइम की सारी खबरें हमेशा से मेरे मत्थे ही आती थीं और मनीष भी रोज हंसते हुए डांट खाने को तैयार। मैं खूब चिल्लाता और वह जी सर, हां भइया, आप जो कहें, इसके आगे नहीं बढ़ा। रोबोट की तरह इधर सुना और उधर जुट गया खबर सही करने में। फिर जब खबर फाइनल हो जाती तो सुकून वाली हंसी के साथ खिलखिलाकर कहता, कल अफसर हमारी ग़टई दबाएंगे पर कभी कोई शिकवा नहीं किया। जो एडिट कर दिया वही सही। न कहना उसने सीखा ही नहीं था।
Crime 360 का स्पेशल पेज शुरू किया तो हर कदम पर हर मैटर उसने दिया और पेज खूब सफल हुआ। सुबह 8 बजे से रात 3,4 बजे तक जागने वाला मनीष कभी खबरें लिखने से थका नहीं, रात 2 बजे तक खबरें आती रहतीं और हम ऊल, जलूल बकते रहते। हम थक जाते थे पर वो कभी खबरों से थका नहीं। बस एक और गुरु जी…. बस एक और गुरु जी….यही उसका हर बार का झूठ रहता और एक एक करके 10 खबरें दे देता। हम भी, मन मन भावे मूड़ हिलावें, की तर्ज पर खबरें लेते रहते और अखबार चमकाते रहते।
पूरा जीवन उसने खबरों में खपा दिया पर उसे उसकी मेहनत का पूरा श्रेय कभी नहीं मिला। सभी संपादक कमियां निकालते रहते और उसकी मेहनत बिसार देते। मायूस होता था। हम इसका उल्टा करते थे और उसको लिखने का खूब मौका देते और स्पेस भी देते। इससे उत्साहित रहता। रिपोर्टरों की सबसे ज्यादा चाहत बाइलाइन की होती है पर उसको इसकी जरा भी चाहत कभी नहीं रही। मुझे याद नहीं कभी उसने अपने मन से बाइलाइन के लिए कहा हो। पूछो तो शर्मा जाता था कि आप जानो। बहुत सी यादें हैं, क्या क्या याद करूं।
यार एक बार और कह देते, कि बस एक और गुरु जी….बस एक और गुरु जी….
निरंकार सिंह चौहान-
मनीष खबरों की तरह तुम अपने जीवन को बढ़ा लेते, मुझे भी मौका देते कि मैं अपना पक्ष रखता, स्नेह को व्यक्त करता!
रात 3:50 बजे हैं. प्रिय भाई मनीष निगम आपके शरीर त्यागने की खबर पड़ रहा हूं. बहुत कोशिश की तुमसे मिलकर पुरानी यादें ताज़ा करने की.
संजीव मोहन भइया, सुहेल खान, शांतनू त्रिपाठी आदि से आपकी खोज खबर ली. बस यही बता चला कि किडनी का इलाज चल रहा है. फोन किया पर आपके द्वारा रिसीव नहीं हुआ. और, ख़ामोशी से दुनिया को छोड़कर चले गए. हमेशा तुम लेट से क्राइम की खबरें फाइल करते थे और सबसे देर तक लिखते थे. खबरों में शब्दों को बढ़ाने के तुम धुनी…हम हसिया से शब्दों को उड़ाने के मतवाले.
काम के अंत में कहना बाबा आज… इतने हजार बाइट लिखी हैं और 15 खबरें फाइल की हैं. एक खबर पर 10-10 बार पूछना, कभी तुमने धैर्य नहीं त्यागा. बस ये कह देते थे बाबा वो भी तो इतनी बड़ी बड़ी खबरें लिखता है. शब्दों के लेखन में त्रुटिया पर ही दूसरों को टोक दिया करों? हम निरुत्तर हो जाते थे. ऐसे बहुत सारे सवालों के जवाब देने थे मनीष ? मैं कभी अपना पक्ष नहीं रख पाया, वह न तुमसे और न अख़बार के दफ्तर में!
संस्था और कार्य के प्रति तुम्हारा समर्पण पर बहुत कुछ लिखने को है… जिस तरह से बड़ी बड़ी खबरें लिखते थे, मनीष क्या तुम अपने जीवन को बड़ा नहीं कर सकते थे. शायद यही हमारे बस में नहीं है. यही अंतिम सत्य है कि मैं अपना पक्ष और तुम्हारे प्रति अपना स्नेह अब कभी नहीं रख पाउँगा. दो दिन पहले अमर उजाला के दफ्तर में गया था तब आपका ख्याल आया था… बस यही सबसे पता चलता था कि आप फोन नहीं उठाते हो. अलविदा


