लव यू मनोज, निराश मत होना, ये दिन भी गुजर जाएंगे

जब 2008 में दिल्ली आया, दैनिक जागरण की नौकरी करने तो मयूर विहार फेज 3 में किराए पर मकान मुझे आम आदमी पार्टी के आज गिरफ्तार हुए एमएलए मनोज कुमार ने दिलवाया था. मनोज तब विधायक नहीं थे, उनसे कोई परिचय नहीं था और तब उन दिनों वो दो जून की रोटी के लिए किराए पर मकान दिलवाने से लेकर मकान बिकवाने और होली में रंग बेचने से लेकर दिवाली में पटाखा बेचने तक का काम किया करते थे. 

मनोज एक छोटे से प्रापर्टी रिलेटेड आफिस में बैठा करते थे. मैं बिना परिचय यूं ही उस आफिस में घुसा और बताया कि मुझे दो कमरे का एक मकान किराए पर चाहिए. मनोज ने मेरे और मेरे परिवार को लेकर जरूरी जानकारियां लीं. उसके बाद अपनी बाइक पर बिठाकर मकान दिखाने चल दिए. पहली ही नजर में मुझे मकान पसंद आ गया. संयोग से यह मकान मनोज के घर वाली गली में ही उनके खुद के मकान से बस दो चार कदम आगे था. उसके बाद मनोज भाई से मिलने बैठने दुआ सलाम का सिलसिला शुरू हुआ और यह सब होते होते हम दोनों एक दूसरे के अच्छे दोस्त व प्रशंसक बन बैठे. मनोज बेहद गरीब परिवार से आते हैं. उम्र में कई भाई बहनों से सबसे बड़े होने के नाते पूरे घर की जिम्मेदारी उन पर थी.

मनोज से तबसे चली आ रही दोस्ती अब भी जारी है. मनोज का मैं प्रशंसक रहा और रहूंगा क्योंकि यह डाउन टु अर्थ आदमी अपने जीवन में सरवाइवल के लिए किसी भी काम को छोटा नहीं मानता था. पानी के बाटल बेचने से लेकर रंग व पटाखा बेचने तक का काम किया करता था. मैं होली पर सारे रंग मनोज की दुकान से खरीदता. दिवाली के सारे पटाखे मनोज की दुकान से खरीदता. घर में पानी कम पड़ने पर मनोज को फोन कर उससे पानी के बाटल भिजवाने को कहता. मनोज ने कभी अपना फोन स्विच आफ नहीं किया और कभी किसी काम को मना नहीं किया. यह इसलिए नहीं कि मैं पत्रकार था. यह इसलिए कि मनोज को लगता है कि हर फोन उसके लिए दो पैसे का इंतजाम करने के वास्ते हो सकता है ताकि वह अपने लंबे चौड़े संयुक्त परिवार का भरण पोषण कर सके.

आम आदमी पार्टी का टिकट मिलने से लेकर विधायक बनने तक मैं मनोज के संपर्क में रहा. या यूं कहूं कि मनोज मुझसे लगातार संपर्क में रहे, तो गलत न होगा. मेरी फितरत है कि मैं जब जगह छोड़ देता हूं तो उस जगह के लोगों से अपनी तरफ से ज्यादा संपर्क में नहीं रहता, इसलिए क्योंकि मैं भी अपनी रोजी रोटी पेट के वास्ते फंसा रहता, लड़ा करता. सो, जब कई बरस पहले मयूर विहार फेज 3 छोड़ा तो मनोज से मिलने बतियाने का सिलसिला भी छूट गया, सिवाय इसके कि कभी कभार उनका फोन आ गया या मैंने कभी यूं ही याद आने चर्चा चलने पर गपियाने के वास्ते फोन कर लिया. मनोज बनारस भी मिले थे, केजरीवाल बनाम मोदी के लोकसभा चुनाव के दौरान. वो केजरीवाल के सिपाही बनकर बनारस गए थे और मैं पत्रकार के वास्ते बनारस चुनाव का रंग ढंग जांचने. तब मनोज मुझसे भोजपुरी में बतिया रहे थे और मैं यह देखकर प्रसन्न था का दिल्ली का यह छोरा कितना जल्दी भोजपुरी सीख गया. अस्सी पर हम दोनों ने देर तक बात की, गले मिले, गपियाये.

मनोज मेरे भी मुश्किल वक्त में कई दफे बेहद काम आए. जब मेरे पर छेड़़छाड़ का आरोप लगा तब मनोज चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ा रहा. मेरे पर लगा आरोप कोर्ट ने खारिज कर दिया लेकिन तब मैं जितना मुश्किल मानसिक दौर में था, उस वक्त मनोज का साथ होना मेरे लिए बड़े संबल की बात थी. मनोज को लेकर जब जब मैं सोचता देखता हूं तो महसूस करने लगता हूं कि इतना सरल सहज यारबाज इंसान होना वाकई मुश्किल होता है. मनोज के पिता जी यूपी पुलिस में सिपाही हुआ करते थे. उन्हें हार्ट की प्राब्लम हुई और घर बैठ गए. मनोज और हमने मिल कर यूपी पुलिस के फंड से कैसे इलाज के लिए पैसे जुटाए, ये एक अलग कहानी है. हम गरीब लोग कई दफे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के वास्ते और भाई बहनों समेत सबकी गाड़ी पटरी पर लाने के वास्ते कुछ ऐसा काम अनजाने में कर बैठते हैं जो भविष्य में मुश्किल साबित हो जाता है.

दलित जाति के मनोज कुमार को कभी ये सपना भी नहीं आया होगा कि वह विधायक बन जाएगा. अपने और अपने परिवार के मान सम्मान के वास्ते मनोज ने कई लोगों को मारा पीटा भी था और कई दफे पिटा भी था. मैं खुद गवाह हूं इसका. लेकिन मैं जानता हूं कि मनोज के भीतर बेहद प्यारा और सरल इंसान का दिल धड़कता है. मनोज जानबूझ कर फ्राड नहीं कर सकता, मुझे यकीन है. उसके किसी साथी ने उसे बरगलाया होगा, उसके किसी प्रापर्टी वाले पार्टनर ने झूठे डाक्यूमेंट को सही बताकर उसे दिया होगा, ये संभव है.

मनोज, यार तुम्हारी गिरफ्तारी की खबर देखकर मुझे सदमा पहुंचा. इसलिए नहीं कि तुम फ्राड हो. तुम फ्राड होगे भी तो मैं तुम्हें प्यार करूंगा क्योंकि जिससे मैं प्यार करता हूं उसकी कमी या अच्छाई नहीं देखता, बस, उसे संपूर्णता में प्यार करता हूं. सदमा इसलिए पहुंचा कि तुम्हें बहुत आगे जाना था, तुम्हें अचानक ये नई राह दिखा दी गई. उम्मीद करता हूं तुम भी मेरी तरह एक दिन फिर आजाद होगे और ज्यादा ताकत व सच्चाई के साथ बेहद आम आदमियों की लड़ाई लड़ोंगे. लव यू मनोज. निराश मत होना. ये दिन भी गुजर जाएंगे. 

मैंने तुमसे ज्यादा अपने जीवन में फ्राडगिरी और चूतियापे किए हैं, लेकिन अब तक अरेस्ट नहीं हुआ. अरेस्ट तब हुआ जब कुछ भी नहीं किया था, सिवाय दारू पीकर रात में बकचोदी करने के और उस बकचोदी को जस्टीफाई करने के लिए दिन में भाईचारा के मैसेज करने के. तब मेरे खिलाफ पूरा मीडिया खड़ा था. अब तुम्हारे खिलाफ पूरी केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस. चलो, मेरी तरह तुम्हारे भी ये मुश्किल दिन गुजर जाएंगे और तुम आगे ज्यादा मजबूत और ज्यादा सच्चे इंसान बनकर राजनीति करोगे. और हां, अब से ज्यादा बड़ा कद पद हासिल करोगे. लव यू अगेन मनोज भाई.

भड़ास4मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह के एफबी वाल से

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Comments on “लव यू मनोज, निराश मत होना, ये दिन भी गुजर जाएंगे

  • संजीव चौहान says:

    यशवंत ठाकुर तुम्हारा हर चुतियापा, मीडिया और समाज के हकीकत में चूतिया मठाधीशों के लिए आने वाले वक्त में नजीर बन जायेगा….यह अलग बात है कि तब क चूतिया ज़मींदोज हो चुके होंगे…

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