विश्व दीपक-
अब जबकि भारत के माओवादी आंदोलन की औपचारिक तौर पर मृत्यु हो चुकी है. कुछ लोग इस विचार [माओवाद] की अमरता का दावा पेश कर रहे हैं. इस विचार पर इतना भरोसा तो अब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भी नहीं जताती जितना भारत के चंद लोग जता रहे हैं.
बहरहाल, माओवादी नेता बसवराजू की मौत के बाद ज्यादातर सहमी हुई प्रतिक्रियाएं ही सामने आईं. सबने मानवाधिकार की दुहाई देते हुए राज्य की बर्बरता का जिक्र किया. इनमें मुख्यधारा की कम्युनिस्ट पार्टियां – सीपीआई, सीपीएम, सीपीआईएमल भी शामिल हैं.
इन सबने शोक संदेश टाइप के वक्तव्य जारी किये. हालांकि इन वक्तव्यों के जरिए ये पार्टियां क्या संदेश देना चाहती थीं – स्पष्ट नहीं.

अरूंधति रॉय की अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है जिसका मुझे इंतज़ार है. अरूंधति रॉय का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि भारत के उस माओवादी आंदोलन को जिसे कानू सान्याल ने लुटेरों का गिरोह कहा था, अरूंधति ने अंतर्राष्ट्रीय फलक पर स्थापित किया. उसी तरह से जैसे उन्होंने कश्मीर के जिहाद को आज़ादी का नाम देकर उसका अंतर्राष्ट्रीयकरण किया.
अब वो माओवाद की मृत्यु पर क्या सोचती हैं – पता नहीं.
एक दौर था जब उन्होंने माओवादियों की तुलना गांधी से की थी. दिलचस्प यह है कि उसी अरूंधति ने गांधी को देश का पहला एनजीओ भी कहा था. अरुंधति के ही दोनों वक्तव्यों को एक दूसरे के सामने रख दिया जाय तो स्पष्ट होता है कि दंडकारण्य का माओवाद शहरों में आकर एनजीओवाद में बदल जाता था. माओवादियों और एनजीओवादियों के बीच का यह अन्योन्याश्रित संबंध दशकों तक चलता रहा.
इस बीच एनजीओवादी माल बनाते रहे. माओवादी कथित अधिकार क्षेत्र का विस्तार करते रहे. फ्रॉड मानवाधिकार कार्यकर्ता नए नवेले चीनी उपनिवेश हांगकांग से लेकर पेरिस, लंडन शिफ्ट होते रहे. निर्दोष लोग खेत होते रहे. गांधीवाद कहीं सेतु बना, कहीं शील्ड. पर यह रणनीति ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाई. नये निजाम में जब गांधी ही सुरक्षित नहीं तो ‘गांधियन विद गन’ कैसे बचते?
अंतत: भारत के माओवादी आंदोलन का वही हश्र हुआ, जो होना था.
दुनिया की उस विचारधारा का नाम बताइए जिससे जुड़ा हुआ बौद्धिक वर्ग इतना अनैतिक और साहस विहीन हो कि वह अपनी विचारधारा को खुलकर स्वीकार भी न करता हो लेकिन प्रचार का दंभ भी रखता हो? और वह विचारधारा सफल भी साबित हुई हो? विश्व इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता मुझे.
भारत में माओवाद की मृत्यु पर मर्सिया लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं था लेकिन पिछली पोस्ट के जवाब में आई प्रतिक्रियाओं ने मेरे उस यकीन को और पुख्ता कर दिया जिसके तहत मैं मानता हूं कि भारत का माओवादी आंदोलन एक आयातित विचार, हिंसा और डर पर आधारित था. इसीलिए अपने चरम विकास के दौर में भी कुछ जिलों और जंगल की सीमाओं के बाहर नहीं पहुंच सका.
पिछली पोस्ट में मैंने जो लिखा वह नक्सलवादी आंदोलन के जनक कानू सान्याल ने 2010 में फांसी लगाकर आत्महत्या करने से पहले ही कह दिया था. कोबाड गांधी ने जेल छूटने के बाद वही बात 2019 में कही. कोबाड को नजदीक से फॉलो किया है. इसीलिए यहां उनका नाम लिखा.
इस ‘आंदोलन’ को 2004 से ठीक से देख रहा हूं. कम से कम 20 साल हो गए लेकिन आज तक मुझे एक ऐसा आदमी [मतलब बौद्धिक] नहीं मिला जिसने खुलकर स्वीकार किया हो कि : हां, मैं माओवादी हूं या मैं माओवादी विचारधारा का समर्थन करता हूं.
अरुंधति रॉय को भी जब माओवादियों के बारे में बात करनी हुई तो उन्होंने कारपोरेट लूट की बात करते हुए गांधी नाम का सहारा लिया. गांधी को नष्ट-भ्रष्ट करने की ऐसी खतरनाक कोशिश शायद ही किसी ने की हो. बाकी लोगों ने हमेशा या तो आदिवासियों की या मानवाधिकार की आड़ लेकर माओवाद की बात की है.
सोचिए जिस ‘आंदोलन’ के बारे में बात करने के लिये भी प्रॉप का सहारा लेना पडे – उसकी वैचारिकी कितनी खोखली होगी. भारत में माओवादी आंदोलन की उम्र उतनी ही थी जितनी कि इंडियन स्टेट ने उसे बख्श रखी थी.
कांग्रेस के दौर में स्टेट, माओवाद का संपूर्ण सफाया नहीं करना चाहता था तो माओवाद जिंदा रहा. अरुंधति दंडकारण्य से आने के बाद भी सुरक्षित रहीं. उनके लेख ‘आउटलुक’ और ‘द गार्डियन’ में छपते रहे. हेम पांडेय का शव जंतर-मंतर पर स्वामी अग्निवेश के दफ्तर तक लाया जा सका. माओवादी प्रवक्ता आज़ाद के एनकाउंटर के विरोध में रैली हुई. आज स्टेट ऐसा नहीं चाहता इसीलिए माओवाद की औपचारिक तौर पर मृत्यु हो गई.
आप स्वीकार करें या न करें पर सच यही है. बिना जनाधार के हिंसा पर आधारित एक आयातित विचार,चाहे कितना ही क्रांतिकारी क्यों न हो-सर्वाइव नहीं कर सकता.


