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सुख-दुख

अंग्रेजी वालों की मार्केट वैल्यू हिंदी वालों से ज्यादा क्यों है?

विवेक सत्य मित्रम-

ब ऐसे पब्लिकली भीख माँगते रहेंगे हिंदी के सो कॉल्ड साहित्यकार तो कौन ही सीरियसली लेगा “हिंदी वालों” को? अंग्रेज़ीवाले उठा उठा के स्क्रीनशॉट भेजेंगे -“पूअर हिंदीवालाज़!”

आई रिफ्यूज़ टू बी कॉल्ड पूअर हिंदीवाला। आई चार्ज मोर दैन एनी इंग्लिशवाला कैन इन मॉय स्पेस। बट सिन्स आई बिलॉंग टू – “कैटल क्लास एंड गोबर पट्टी” दे अज्यूम दैट आई एम द सेम। बट व्हाइ डज दिस हैपेन?

क्योंकि हिंदीवाले घूम-घूमकर भीखमंगई करते हैं। जैसे कि साहित्य आज तक के इस विज्ञापन पर कमेंट देख लीजिए। भाई, अपने चक्कर में हमारा जीना क्यों हराम कर रहे। खेल समझो- किसी को यहाँ तुम्हारे टैलेंट की नहीं पड़ी, हर चीज़ के केन्द्र में है पैसा। तुम्हे बुलाने से कौन आएगा 1500 रुपये का टिकट लेकर साहित्य तक में?

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ये है कि हिंदीवाले पैसे की बात सुनते ही भड़क जाते हैं। उनके भीतर ठूँस ठूँसकर इतनी “छद्म नैतिकता”, “सामाजिक सरोकार”, “जन कल्याण” की भावना (सिर्फ़ दिखावे के लिए) भरी है कि कोई कुछ सिखाने के लिए पैसा माँग ले तो उसे प्रवचन दे आते हैं।

गिल्ट में डाल देते हैं ये व्यावसायिक सोच वालों को। क्यों भाई? क्या दिक़्क़त है, अगर कोई कुछ सिखाने के लिए उसकी फ़ीस ले ले? ट्रस्ट मी! सिखानेवाला पैसा लेगा तो सिखाता रहेगा, तुम जैसों के चक्कर में मुफ़्त में सिखाएगा तो कुछ दिनों में ना सीखने वाले रहेंगे ना सिखानेवाला। अपने ज्ञान, अपनी मेहनत और सेवा के बदले पैसे चार्ज करने में कैसी शर्म? लेकिन बुद्धिखोर हिंदीवाले ऐसे लोगों को अपराध बोध की तरफ़ धकेलते रहते हैं। हद है।

और ऐसा ये इसलिए करते हैं क्योंकि इनके भीतर एक विचार घोल दिया गया है – “पैसे के बारे में सोचना ख़राब होता है”! और यही वजह है कि ये 50 पैसा प्रति शब्द अनुवाद करने को तैयार हो जाते हैं (जबकि अंग्रेज़ी वाले 5-10 रुपये लेते हैं)। ये मुफ़्त में अख़बारों के लिए आर्टिकल लिखने को तैयार हो जाते हैं। मुफ्त में कविता पढ़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। और फिर जब ये टेबल के दूसरी तरफ़ होते हैं तो दूसरों से भी यही उम्मीद पालते हैं। सो पथेटिक इट इज़।

अंग्रेज़ी वाले हिंदी वालों से ज़्यादा पैसे क्यों चार्ज करते हैं? उनकी मार्केट वैल्यू क्यों ज़्यादा है हिंदी वालों से? उन्हें ज्यादा सम्मान क्यों मिलता है? एक ही पद पर दोनों की सैलरी में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ क्यों होता है? इसकी तमाम वजहें हो सकती हैं लेकिन उनमें से एक अहम वजह ये है कि हिंदी वाले अपनी वैल्यू नहीं समझते, उन्हें खुलकर पैसा माँगने में झेंप होती है या फिर उनमें ये आत्मविश्वास ही नहीं कि वो जो माँग रहे हैं, वो डिजर्व करते हैं।

अपनी आर्थिक विपन्नता और दोयम दर्जे के ट्रीटमेंट के लिए हिंदी वाले खुद ज़िम्मेदार हैं ना कि ये समाज या फिर सिस्टम जिसे ये गरियाकर अपनी पीठ ठोंकते रहते हैं। ये देखकर कितना ख़राब लगता है कि फ़ाइव स्टार के इवेंट में आनेवाले ज्यादातर हिंदी वाले इस तरह से खाते हैं जैसे उन्होंने जीवन में पहली बार भोजन का दर्शन किया हो। दारू पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे ये आख़िरी मौक़ा है। इसके बाद दारू पृथ्वी से विलुप्त होने वाली है।

अगर जीवन में आगे बढ़ना है। इंसान बनना है। भेदभाव से निजात पाना है तो अपनी प्रतिभा, अपनी मेहनत, अपने काम, अपने योगदान, अपनी सेवा, अपने समय के लिए “उचित पैसा” माँगने में शर्म करने से बचना होगा। और हाँ, जो तुम्हें इसके लिए धिक्कारे उसको सीरियसली लेना बंद करना होगा। वो ऐसा अपनी ब्रांडिंग के लिए कर रहा है। उसे कोई उसकी औक़ात से ज़्यादा पैसा अगर कोई देगा तो वो चूँ भी नहीं करेगा। इसलिए इस माइंड सेट से बाहर निकलो, ताकि भीखमंगई ना करनी पड़े!

गुजरात के लोग यूपी/ बिहार/ एमपी से ज्यादा टैलेंटेड हैं क्या? लेकिन दुनिया के हर कोने में मिल जाएँगे। उन्हें आप बेइज़्ज़त करते रहिए “मनी माइंडेड” कहकर, सच ये है कि लाखों की संख्या में यूपी/ बिहार के लोग सूरत, अहमदाबाद में उनकी नौकरी करते मिल जाएँगे। कोई एक भी गुजराती मिला है क्या आपको बनारस, ग़ाज़ीपुर, पटना या आरा में सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हुए?

अर्थ ही जीवन का सच है। उचित पैसा मांगना कतई कोई अश्लीलता नहीं है। आपका हक़ है। इसमें शर्मिंदगी की कोई बात नहीं। जिस दिन हिंदीवाले फर्जी शर्म और संकोच से बाहर निकल आएंगे। उनका शोषण बंद हो जाएगा। उनको बराबरी की दृष्टि से देखा जाने लगेगा। इसलिए मुफ़्त में समाज सेवा करने वालों से दूर रहिये, वो आपके किसी काम के नहीं। फर्जी हैं। दोमुंहे। ख़ुद के लिए और आपके लिए अलग-अलग मानदंड हैं उनके।

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