राकेश कायस्थ-
भारत की नई पीढ़ी बीमार मीडिया की जहरीली खुराक पर पली-बढ़ी है। उसके पास ना तो अपनी कोई राजनीतिक स्मृति है, ना सामाजिक चेतना। फिर ऐसा विवेक कहां से होगा कि वो खबरों को फिल्टर करके समझ पाये कि सही क्या है और गलत क्या?
इस राष्ट्रीय आपदा के समय जिस तरह का कवरेज हो रहा है, उसने पहली बार सरकार समर्थकों तक को मीडिया की आलोचना करने को विवश किया है।
एक आम भारतीय को यह पता नहीं है कि वह कितना इनकम टैक्स और जीएसटी देता है। उसे पता नहीं है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों में सीट क्यों घट रही हैं और उसके बच्चों को किसी निजी संस्थान से ग्रेजुएशन स्तर की सामान्य सी डिग्री हासिल करने के लिए लाखों खर्च क्यों करने पड़ रहे हैं..?
लेकिन इसी आम भारतीय को यह जरूर पता है कि अगर युद्ध हुआ तो पाकिस्तान तीन दिन भी नहीं टिक पाएगा। एक औसत भारतीय की बुद्धि के इस परिमार्जन का पूरा श्रेय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को है।
7 तारीख की पूरी रात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने जिस तरह चरस बोया उससे देश की एक बड़ी आबादी को यकीन हो गया कि उसकी अगली छुट्टी लाहौर या कराची में ही मनेगी। सोशल मीडिया के युद्धोन्मादी इस तरह जोश में आये जैसे लगा कि अपने उस पड़ोसी या रिश्तेदार का गला काट देंगे, जो उनके हिसाब से `देशभक्त’ नहीं है।
यह मास हीस्टीरिया एक दिन में पैदा नहीं हुआ है बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसके लिए बरसों तक रात-दिन मेहनत की है। इसकी सबसे बड़ी लाभार्थी बीजेपी पब्लिक ओपिनियन से इस कदर आह्रलादित थी कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बयान दे दिया कि आप जिस तरह का सबक चाहते हैं, हम पाकिस्तान को वैसा ही सबक सिखाएंगे। गोया युद्ध ना हो फरमाइशी गीतों का कोई कार्यक्रम हो।
ये बात अब तक समझ नहीं आई है कि इस सैनिक अभियान से हमारी सरकार हासिल क्या करना चाहती है? 6 तारीख की रात की कार्रवाई के बाद मैं अंतरराष्ट्रीय मीडिया गौर से देख रहा था। कई विशेषज्ञ कह रहे थे कि अगर भारत अपनी आज की कार्रवाई से संतुष्ट हो जाये तो मामला यही खत्म हो सकता है। राजनीतिक कौशल इसी बात में होता है कि सरकार किसी भी टकराव को इस तरह से खत्म करे कि देश का सम्मान बना रहे और नुकसान कम से कम हो।
बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद भी ऐसा ही हुआ था। सरकार को अपने नागरिकों को यह संदेश देना होता है कि हमने जवाबी कार्रवाई कर दी है यानी उसके बाद बात खत्म।
पाकिस्तान की तरफ से बयान आया था कि भारत कार्रवाई रोक देगा तो पाकिस्तान भी संयम बरतेगा। लेकिन 7 तारीख की दोपहर तक हमारी तरफ से कई बयान आये जिनमें कहा गया कि ये तो बस शुरुआत है। पिक्चर अभी बाकी है, जैसे फिल्मी डायलॉग उछाले गये।
आगे की पिक्चर हम देख ही रहे हैं। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले हमारे नागरिक रोजाना मारे जा रहे हैं। अगर मकसद कश्मीर में हुए नरसंहार का बदला था तो फिर अगला मकसद जम्मू-कश्मीर और पंजाब के सीमावर्ती इलाकों में हुए पाकिस्तानी हमले का बदला क्यों नहीं होना चाहिए, जिसमें स्कूली बच्चों से लेकर गुरुद्वारे के सेवादार और कई निरीह औरतें मारी गईं।
तो क्या बदले का खेल इसी तरह चलता रहेगा और भारत के सीमावर्ती इलाके सीरिया या यमन की तरह स्थायी युद्ध क्षेत्र बन जाएंगे। मारे मासूम नागरिक जाएंगे और बलिया और जौनपुर में बैठकर बाकी लोग नारे लगाएंगे और देशभक्ति के प्रमाण पत्र बाटेंगे। क्या ये देश ऐसे चलेगा?
युद्ध सेना तय नहीं करती है, वह तो अपना फर्ज निभाने के लिए शहादत देती है। नागरिक कितने भी शांतिप्रिय हों, युद्ध में उन्हें देश के साथ खड़ा होना होता है और कुर्बानियां देनी होती हैं। लेकिन सरकार का फर्ज क्या होता है? जवाबदेह सरकार वही होती है जो राजनीतिक लाभ और अपने नेता के अहं को किनारे रखकर यह सोचे कि देश के नागरिकों की भलाई उसके किस निर्णय में है।
प्रधानमंत्री मोदी अपने जीवन की ऐसी ही एक निर्णायक घड़ी में खड़े हैं। वर्तमान उनसे मुश्किल सवाल पूछ रहा है और भविष्य उनके आकलन के लिए तैयार बैठा है।
मनोज अभिज्ञान-
वह शाम को टीवी डिबेट में देशभक्ति की चिल्लाहटों के बीच आपके दिल में पाकिस्तान के खिलाफ आग भरता है। पर क्या आपने कभी सोचा है—उसके हाथ में जो माइक्रोफोन है, वह किसका है? और उसके कान में जो फुसफुसाहट गूंज रही है, वह किसकी भाषा बोलती है? हमारे मीडिया चैनलों में अधिकांश illegals बैठे हैं—जो पत्रकार नहीं, पार्टी के प्रचारक हैं। जो एजेंडा थोपते हैं, सच्चाई नहीं। जो दुश्मनी को टीआरपी की खाद से सींचते हैं, क्योंकि शांति नहीं बिकती, चीख बिकती है।
जब सीमा पर हलचल होती है, तो सबसे पहले एक्सक्लूसिव बनता है “Breaking News: पाकिस्तान की नापाक हरकत!” लेकिन जब वही हरकत नकली निकले, तो माफ़ी नहीं आती—सिर्फ अगला ब्रेकिंग तैयार होता है। उनके लिए दुश्मनी सीरियल है, जिसमें हर हफ्ते नया एपिसोड चाहिए, और हर एपिसोड में पाकिस्तान का कोई नया गुनाह।
जासूस अब सिर्फ सीमा पार से ही नहीं आते, वे यहां भी हैं—हमारे टीवी चैनलों में, हमारी भाषा में, हमारे बीच। जो हमें हर दिन सिखाते हैं कि शांति दुर्बलता है, युद्ध उत्सव है। जो यह नहीं बताते कि कौन जासूस है, बल्कि यह सुनिश्चित करते हैं कि हम सब एक-दूसरे पर शक करें।
और जब पूरा समाज एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगे, तो क्या फर्क रह जाता है दिल्ली और इस्लामाबाद में?
हमें अब पूछना ही होगा— वो जो हर रात टीवी पर चिल्लाता है, वाक़ई देशभक्त है या बस टीआरपी का एजेंट?
हम युद्ध के पक्ष में नहीं हैं। हम जानते हैं कि युद्ध सिर्फ़ सरहदों को नहीं, दिलों और सपनों को भी जला देता है। हर युद्ध में सैनिक की जान जाती है, किसान की फसल सूखती है, और आम आदमी की रोटी महंगी हो जाती है। इसलिए हम शांति के हामी हैं—संवाद, समझदारी और सह-अस्तित्व के समर्थक। लेकिन अगर युद्ध थोपा जाएगा, अगर न्याय और सम्मान पर हमला होगा, अगर हमारे देश की नागरिकता, गरिमा या स्वतंत्रता को ललकारा जाएगा—तो हम चुप नहीं बैठेंगे। हम तब भी नफ़रत के लिए नहीं लड़ेंगे, हम लड़ेंगे न्याय के लिए। हमारा युद्ध, जब भी होगा, तो वह प्रतिक्रियावादी नहीं होगा—वह चेतन, विवेकपूर्ण प्रतिरोध होगा।
Illegals उस ख़ुफ़िया जासूसी प्रणाली का नाम है जिसमें किसी देश के खुफिया एजेंट दूसरे देश में बिना राजनयिक या आधिकारिक पहचान के, आम नागरिक बनकर लंबे समय तक गुप्त रूप से रहते हैं और वहां की राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य जानकारियाँ अपने देश को भेजते हैं। इन्हें deep-cover agents या non-official cover (NOC) spies भी कहा जाता है।
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