सुनील संवेदी-
तुम रहे न तुम, तो हम भी रहे न हम
पिछले दिनों एक सम्मान समारोह में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि यदि किसी देश को लोकतांत्रिक रहना है तो वहां की मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए। प्रेस को उसका वास्तविक काम करने से रोका जाता है तो लोकतंत्र की जीवंतता से समझौता होता है। मीडिया के महत्व को रेखांकित करने वाले वह पहले व्यक्ति नहीं हैं।
हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने एक मलयाली चौनल पर केंद्र सरकार द्वारा लगाये गए बैन को हटाने का निर्णय देते समय तीखी टिप्पणियां की हैं और प्रेस को अपना पक्षधर बनाने से बचने की नसीहत भी दी। मीडिया ने लोकतंत्र को जीवंत रखने, सामाजिक हितों, लोगों को न्याय दिलाने के लिए बहुत काम किया है और इसके लिए कई बार बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है। अपनी कर्तव्यनिष्ठा से लोगों का भरोसा जीता है।
दुर्भाग्य ही कहेंगे कि बीतें दो-तीन दशकों से प्रेस के सामने विश्वसनीयता का भारी संकट खड़ा हो गया है। इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन फौरी तौर पर जो सबसे बड़ा कारण नजर आ रहा है वह है नैतिक आस्थानों, सत्ता प्रतिष्ठानों और आर्थिक जरूरतों के बीच तारतम्य बनाये रखने के लिए खुद को कई हिस्सों में बांट देने की मजबूरी। ये सभी हिस्से पत्रकारीय सिद्धांतों के तानेबाने से बंधे रहने के बजाय अब एक-दूसरे को ही परास्त करने में लगे हैं।
जन-मन की जगह धनः
इसे यूं समझ सकते हैं कि न्याय पाने के लिए परेशान हाल भटकते आम आदमी/समाज की आवाज उठाने वाली पत्रकारीय नैतिकता की आंखें मीडिया प्रतिष्ठानों को पोषित करने वाले सियासी और व्यवसायिक घरानों के सामने अब झुकी दिखाई देती हैं। ऐसे में मीडिया प्रतिष्ठान की आर्थिकी तो मजबूत हो रही है लेकिन पत्रकारीय नैतिकता का लोप होता जा रहा है। धुप्प सियासी उथल-पुथल और उदारीकरण के दौर में भी जिन मीडिया प्रतिष्ठानों ने अपनी पत्रकारीय आत्मा को जीवंत बनाये रखा था अचानक ही उस आत्मा ने कारपोरेटाइजेशन के रनवे पर दौड़ लगा दी। दौड़ बदली तो लक्ष्य भी बदल गए। प्राथमिकताओं के चेहरे बिगड़ गए। जन-मन की जगह धन प्रमुख हो गया। पत्रकारीय कंटेट की जगह आइटम ने ले ली ताकि पाठकों के मन की बजाय उनकी आंखों पर ज्यादा असर करे। जितनी ज्यादा आंखें आइटम को देखेंगी उतने ही ज्यादा व्यवसायिक हित सधेंगे। इस आपाधापी में मीडिया की विश्वसनीयता पर संकट खड़ा हो गया है। हालांकि इस स्थिति से अखबार फिर भी क्ुछ हद तक अप्रभावित हैं लेकिन बढ़ उसी राह की ओर रहे हैं।
कंटेंट पर भारी आइटमः
समाचारीय कंटेट उन कला फिल्मों की तरह होता है जो भले ही आर्थिक लाभ न पहुंचायें लेकिन दर्शकों के मन में गहरे तक नक्श हो जाती हैं और उनका असर स्थाई होता है। वे विचारों को परिष्कृत और आंदोलित करती हैं। अब वह जगह आइटम ने ले ली है। अब सनसनी है, स्टिंग हैं, मीडिया ट्रायल हैं,व्यवसायिक हित हैं, सियासी पक्षधरिता हैं। मतलब भावनात्मक कथानक को पराजित करने वाली तकनीकी श्रेष्ठता से युक्त एक विशुद्ध कमर्शियल फिल्म है जिसे देखकर सिनेमा हाल के अंदर सीटियां मारने वाले दर्शक बाहर निकलते ही भूल जाते हैं कि फिल्म आखिर थी क्या? हालांकि उम्मीद छोड़ देने जैसे हालात नहीं हैं। खासकर अखबार अभी भी अतीक का मूत्रालय बनने से बचे हुए हैं। अखबार का पत्रकार बोरवेल में फंसे किसी प्रिंस की परेशानहाल मां से असंवेदनशील सवाल करने से बचता कि आपका बेटा नीचे फंसा है। ऐसे में आप क्या महसूस कर रही हैं? लेकिन पत्रकार अकेलेदम कब तक इस धाती को बचाये रखेगा? प्रबंधन की पक्षधरिता के साथ उसे भी दिशा बदलनी ही पड़ती है।
सियासी प्रतिष्ठानों से तारतम्य की चुनौतीः
पिछले कई सालों से मीडिया एक-दूसरे की धुर विरोधी सियासी विचारधाराओं से तारतम्य बनाने की चुनौती से जूझ रही है। मीडिया का संवेग कई सियासी किनारों के बीच से होकर गुजर रहा है। कोई भी नदी किनारों के बाहर बहे ऐसा ठीक नहीं। समुंदर को भी किनारे चाहिए होते हैं। किनारांे से बाहर निकल जाने का मतलब अनियंत्रित हो जाना है। बहरहाल हर सियासी किनारा चाहता यही है कि मीडिया की नदी उससे चिपककर बहे। प्रेस की प्रतिबद्धता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले यह नहीं सोचते कि किनारे दो ही होते हैं पक्ष और विपक्ष। दोनों में जो भी किनारा पीछे खिसककर थोड़ी जगह देता है नदी उस ओर बह निकलती है। हालांकि कहा जा सकता है कि इस नदी में वैचारिकी है तो किनारे का चुनाव करने में अपनी बौद्धिकता का प्रयोग करे। किसी किनारे के आमंत्रण से लोभान्वित न हो। लेकिन जब सियासी विचारधारा में ही गंभीरता, जिम्मेदारी, प्रतिबद्धता का लोप हो गया है तो प्रेस अपने साध्य को चुनेगी ही, चुनती रही है। नया कुछ नहीं है। तुम रहे न तुम तो हम भी रहे न हम।
मीडिया अब भी आग्रही है दुराग्रही नहींः
अगर मीडिया और समाज के बीच विश्वास का संकट खड़ा हो रहा है तो इसके लिए अकेले मीडिया जिम्मेदार नहीं है। हम जैसा समाज गढ़ने में लगे हैं उसका असर मीडिया पर न पड़े यह मुमकिन नहीं। समाज में खड़े और जमे रहने के लिए मीडिया के सामनेे समाज के चाल-चरित्र को अपनाने की मजबूरी है। हालांकि मीडिया इस चाल-चरित्र के खतरों को लेकर आगाह भी करती रहती है और बेहतर समाज की पुनर्स्थापना के लिए भागीदारी भी निभाने को तैयार है लेकिन छीनने/झपटने की प्रतियोगिता में लगा समाज मीडिया के उन आग्रहों को सुन ही नहीं रहा। बहरहाल निराशा के दौर में सिर्फ पत्रकारिता से उम्मीद बाकी है।


