मजीठिया पर ताजे फैसले के बाद मीडियाकर्मियों के पक्ष में शुरू हुआ एक्शन, मालिकों और प्यादों के चेहरे सूखे

हाल में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया मामले को लेकर जो आदेश सुनाया, उसने अख़बार मालिकानों की जान हलक में अटका दी है। अब हर मालिकान अपने प्यादों को इस काम में लगा रखा है कि कहीं से भी राहत ढूंढ के लाओ। वैसे तो कमोवेश देश के सभी अखबार मालिकान इस बात को मान चुके हैं कि आये इस आदेश ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। मालिकों के पालतू, जो हर यूनिट में 4 या 5 होते हैं और पूरे ग्रुप में 1 या 2, ने कुछ साल पहले मालिकानों को जो आइडिया दिया था ठेके पर वर्कर रखने का, वह भी अब किसी काम का साबित नहीं हुआ।आये फैसले ने सभी को पैसा लेने का हकदार बना दिया और इन पालतुओं की सारी कवायद धरी रह गयी।

दैनिक जागरण की कुछ यूनिटों में काम करने वाले वर्कर अब संगठित हो रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि यहाँ भी अब आरसी यानी रिकवरी सर्टिफिकेट कटने वाली है। सूत्र कहते हैं, 3 दिन पहले की बात है। पंजाब के लुधियाना में दैनिक जागरण का एक प्यादा डीएलसी कार्यालय गया और वहां के बाबू से वर्कर की फाइल देने की बात की। जब वह नहीं माना, तो उसे साथ गए मैनेजर ने उससे होटल चलने की बात कही। वह तब भी नहीं माना, तो लालच भी दिया, लेकिन बाबू ने साफ कह दिया कि मुझे अपनी नौकरी प्यारी है। जब जागरण की दाल डीएलसी कार्यालय में नहीं गली, तो वह वर्कर के वकील के पास गया। प्यादा और मैनेजर ने वकील साहब से भी इस बारे में बात की और लोभ दिया, लेकिन मामला टाँय टाँय फिस्स साबित हुआ। जागरण के बेचारे दोनों प्यादे अपना सा मुंह लटकाए लौट आये। कहा जा रहा है कि यहाँ भी दैनिक भास्कर की तरह आरसी कटने वाली है इसीलिये मैनेजमेंट के हाथ पांव फूले हुए हैं और ऐसी स्थिति में प्यादों की नौकरी मालिक के जूते की नोंक पर ही होती है।

जागरण नोएडा की बात करें तो यहाँ कोई ऐसा प्यादा मालिक को नज़र नहीं आ रहा जो वर्करों से बात कर सके। उन्हें यह भी पता है कि नोएडा के लड़ाकू वर्करों से बात करने का मतलब है पूरे ग्रुप के वर्करों के लिए बात करना, इसीलिये जागरण प्रबंधन अलग-अलग यूनिटों में जाकर फ़िलहाल अपनी जुगत भिड़ा रहे हैं, ताकि जागरण पर देनदारी कम से कम आये। लेकिन वर्कर कहाँ मानने वाले हैं, वे तो कोर्ट के जरिये ही अपना हिसाब लेने के लिए दृढ हैं और अब इसमें इनके साथ जुड़ने वाले हैं काम करने वाले वर्कर भी। देखें तो ऐसा करना अंदर के वर्करों की मजबूरी भी है। अगर मैनेजमेंट ने नोएडा के रहने किसी वर्कर का तबादला रांची, इंदौर, जम्मू या सिलीगुड़ी कर दिया, तो ऐसी स्थिति में उन्हें केस वहीँ करना होगा और नोएडा के वर्कर के लिए यह संभव नहीं है कि वह बिना नौकरी के घर से दूर जाकर जागरण से लड़े। वर्कर के लिए यही बेहतर है कि वह जल्दी से एक अर्जी स्थानीय डी एल सी में मजीठिया मांगने का लगाये और साथ ही क्लेम लगाकर ठाठ से नौकरी करे। ऐसा करने से नौकरी भी सुरक्षित और पैसा भी निश्चित। फिर ट्रांसफर या किसी भी तरह की यातना मान्य नहीं होगी।

उल्लेखनीय है कि देनदारी से बचने के लिए लोकमत अखबार के प्रबंधन ने 186 परमानेंट वर्कर को निकाल दिया है ताकि आगे की देनदारी से बचा जाये। इनसे अलग लोकमत के मालिक ने मजीठिया के चक्कर में लगभग 2400 ठेका कर्मचारियों का 30 जून से कांट्रेक्ट रिन्यूअल नहीं किया है कि मजीठिया से कम वेतन देंगे तो अवमानना में अब जेल जाना होगा। माननीय सुप्रीमकोर्ट के 19 जून 2017 को आये नए आदेश के बाद सभी बड़े अख़बार समूह को तगड़ा झटका लगा है।सूत्रों के मुताबिक महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा लोकमत समूह में ठेका कर्मचारी हैं और सुप्रीमकोर्ट ने अपने 19 जून के आदेश में साफ कर दिया है कि ठेका कर्मचारियों को भी मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मिलेगा।

सूत्र कहते हैं कि लोकमत समूह में लगभग 3000 कर्मचारी काम करते हैं जिनमे सिर्फ 20 प्रतिशत परमानेंट हैं, बाकी 80 परसेंट कांट्रेक्ट वाले।इन कर्मचारियों का कांट्रेक्ट 30 जून को खत्म हो गया, मगर कंपनी ने अभी तक किसी का कांट्रेक्ट रिनुअल नहीं किया है। खबर यह भी आ रही है कि लोकमत ने कई कर्मचारियों की सुप्रीम कोर्ट से आए नए आदेश के बाद छुट्टी भी कर दी है। वे कर्मचारी अब मजीठिया की जंग में कूदने की तैयारी कर रहे हैं ताकि उनको उनका अधिकार मिले। यह बात तय है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के बाद सभी अखबार प्रबंधन की सांस गले में अटकी हुई है और सभी मजीठिया देनदारी से मुक्ति पाने के लिए फड़फड़ा रहे हैं।

फैसल का प्रभाव देश के डीएलसी कार्यालयों और निचली अदालतों में दिखना शुरू हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के आये आदेश के बाद महाराष्ट्र में जो आरसी कटी है, वह पुख्ता मानी जा रही है। अधिकारी ने आरसी काटने से पहले सारी कार्यवाही पूरी की है और मालिकान की बात भी इस तरह से रखी है, जिससे आरसी पर आगे रोक लगने की उम्मीद न के बराबर है। जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। पहले वर्कर को ये अधिकारी किसी बहाने से टाल देते थे। ये हमेशा मालिकानों की सुनते थे और उन्हीं के लिए काम करते थे। लेकिन आये सख्त आर्डर के बाद इन्हें समझ में आ गया है कि अब वर्करों के साथ गड़बड़ी नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए भी हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ साफ कह दिया है कि सही काम किया जाये और वर्कर को काम न होने पर ऊपर शिकायत करने के लिए कहा है।

आरसी में स्पष्ट लिखा है कि देश के नंबर 1 अख़बार दैनिक भास्कर के समूह डी बी कॉर्प लि. के माहिम और बीकेसी यानी बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स कार्यालय को नीलाम कर इन यहाँ तीन कर्मचारियों को देना होगा पैसा। देखा जाये तो 19 जून के बाद देश में यह पहली आरसी यानी रिकवरी सर्टिफिकेट कटी है। दैनिक भास्कर के ये तीनों वर्कर हैं मुंबई ब्यूरो में कार्यरत प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट (एंटरटेनमेंट) धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज शेख। इस आरसी को मुंबई शहर की सहायक श्रम आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 1 जुलाई, 2017 को जारी किया है।

तीनों वर्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अपने बकाए की मांग करते हुए स्थानीय श्रम विभाग में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17 (1) के तहत क्लेम किया था। इस रिकवरी सर्टिफिकेट में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की राशि 18 लाख 70 हजार 68 रुपए, लतिका आत्माराम चव्हाण का 14 लाख 25 हजार 988 रुपए और आलिया शेख का 7 लाख 60 हजार 922 रुपए की आरसी जारी हुयी है। इसमें 30% अंतरिम राहत की राशि को जोड़ना शेष है साथ ही ब्याज भी।

बहरहाल, दैनिक भास्कर के वर्करों की कटी इस आरसी ने देश के सभी अखबार मालिकों का अहंकार जरूर तोड़ा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे भी एक के बाद एक सारे मालिकानों का हौसला टूटेगा। इक्के दुक्के को छोड़ दें तो अब देश के अधिकारी भी मालिकानों का साथ खुलकर नहीं देंगे। गलत करने पर अब उन्हें भी कोर्ट में खड़ा होना होगा, यह तय है। इस हिसाब से अब मालिकानों को मान लेना चाहिए कि सही में वर्करों का वक़्त आ गया है। उन्हें वर्करों की  पाई पाई देनी ही होगी।

मजीठिया क्रान्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण के फेसबुक वॉल से.

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