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मीडिया के इंटर्न : सबसे छोटी पोस्ट और बड़ा बोझ, खर्चा का चर्चा करना मना है!

ज जो सब न्यूज रूप में संपादक, मैनेजर, टीएल, एंकर, रिपोर्टर, उपसंपादक, कंटेंट राइटर, मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर्स, वीडियो क्रिएटर पता नहीं क्या-क्या बने हुए हैं…? वो सब कल एक इंटर्न थे. मीडिया संस्थानों में इंटर्न सबसे छोटी सीढ़ी है. लेकिन प्राय: सबसे ज्यादा बोझ इसी छोटी सीढ़ी पर लाद दिया जाता है. 

इंटर्न कि दुनिया क्लास रूम से बिल्कुल अलग होती है. क्लास में इंटर्न को जो बताया और पढ़ाया जाता है, वैसा न्यूज रूम में कुछ भी नहीं होता… अपने शुरुआती दौर में न्यूज रूम की एक अलग दुनिया देखकर इंटर्न जब तक कुछ समझ पाता है.. महीने और साल फुर से गुजर जाते हैं.

इस नई दुनिया में उसे कई नए अनुभव मिलते हैं. नए लोग मिलते हैं. और उस सच के झूठ से सामना होता है, जिसे वो सच समझकर मीडिया की पढ़ाई करके यहां तक आया था… इंटर्न जिसका जो मन हो उसे कह दो… जो काम देना हो उसे दे दो.. मजबूर है.. जरूरतमंद है. कुछ कहेगा नहीं… कौशल और हुनर के नाम पर उसे जितना घिसा जा सके घिस डालो… बढ़िया मुर्गा फंसा है. कंपनी को इसे दाम भी नहीं देना पड़ रहा और काम भी कर रहा है. यदि कुछ दिया भी जा रहा, तो उतना कि जितने में वो जिंदा रहे.

40 से 50 रुपये में एक बार का भोजन करके दूसरे दिन ऑटो रिक्शा का किराया देकर ऑफिस फिर से आ जाए… ये रकम इतनी रहती है कि यदि भागने के लिए भी सोचेगा तो कुछ महीने उसे अपना पेट काटकर मशक्कत करनी पड़ेगी. मैंने एक इंटर्न बनकर जीवन जिया है.

दिल्ली और भोपाल, पटना, लखनऊ, कोलकाता, जयपुर समेत ग्रेड थ्री के शहरों के इंटर्न में बहुत फर्क होता है. इन शहरों में इंटर्न तो सालों साल तक घिसता रहता है. दिल्ली में कम से कम इंटर्नों के लिए मीडिया के मालिक जिंदा रहने के लिए व्यवस्था कर देते हैं. यहां तो इंटर्न को सिर्फ काम और काम ही दिया जाता है… दाम पर तो कोई चर्चा नहीं की जाती है… क्यों? न कोई पूछता है न कोई बात करता है.. क्योंकि वो एक इंटर्न है.

न्यूज रूम में आकर इंटर्न इतना बुरा फंस जाता है कि घर में और दोस्तों के बीच में कुछ कह भी नहीं पाता. लोगों कि नजरों में बड़ी झूठी तारीफ होती है. अरे फलाने बड़े न्यूज चैनल में काम करता है.. लेकिन कभी-कभी इंटर्न की हालत ऐसी हो जाती है कि दस रुपये ऑटो वाले को देने के लिए भी जेब पर नहीं रहते. कई -कई दिनों तक एक इंटर्न पेटभर खाना नहीं खा पाता है… ऑफिस और रेहड़ी पटरी की चाय के सहारे दिन काट देता है…

यह दुख किससे कहे इंटर्न.. ऐसे बहुत से दर्द झेलते हुए एक इंटर्न कुछ सालों बाद पत्रकार बन जाता है… और भूल जाता है, अपने गुजरे हुए वो दिन कि कल वो भी एक इंटर्न था… मैं ग्रेड थ्री के शहर से हूं. जहां इंटर्नों की तरीके से छोटे-बड़े संस्थानों के द्वारा उसकी काम के नाम पर खूब घिसाई की जाती है. मुझे इंटर्नों के हर एक दर्द और मजबूरी का अहसास है… जब भी किसी परेशान इंटर्न को देखता हूं, तो मुझे उसके संघर्ष में अपनी कल की तस्वीर दिखने लगती है.. और याद आने लगता है कि मैं भी कभी इंटर्न था… 

मीडिया की इस सबसे छोटी पोस्ट पर बड़ा बोझ है… यदि आपके अगल-बगल कोई इंटर्न है. साथ में काम सीख रहा है… तो उसे हौसला देना ताकि वो लड़ सके… उसे मजबूती देना ताकि वो चुनौतियों से जीत सके.. और अपने पैर पर खड़ा हो सके…क्योंकि तुम भी तो कल एक इंटर्न ही थे न… आज जो न्यूज रूम में भगवान बने हुए हो… मीडिया के मालिक भी थोड़ा इंटर्नों पर कृपा बरसाएं… दया और रहम करें…

एक नौजवान मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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