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संजय गुप्‍ता प्रकरण : क्या मीडिया मालिकों का चुनावी कदाचार अपराध नहीं?

राजनैतिक पार्टियाें और अधिकारियों के खिलाफ कानून का डंडा फटकारने वाला चुनाव आयोग जब मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करने का समय आता है तो बंगले झांकने लगता है। पेड न्‍यूज के मामले में तो गजब तर्क का सहारा ले रहा है।

राजनैतिक पार्टियाें और अधिकारियों के खिलाफ कानून का डंडा फटकारने वाला चुनाव आयोग जब मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करने का समय आता है तो बंगले झांकने लगता है। पेड न्‍यूज के मामले में तो गजब तर्क का सहारा ले रहा है।

परिवर्तन दल की विमलेश यादव को तो दैनिक जागरण में करीब 22 सौ रुपये के पेड न्‍यूज छपवाने पर तो उसने तीन साल के लिए चुनाव लड़ने पर रो लगा दी थी। लेकिन अशोक च्‍वहाण और विजय दर्डा के मामले में अब तक फैसला ही नहीं कर पा रहा है। 

विमलेश यादव के मामले में आयेाग का फैसला, प्रेस काउंसिल की रिपोर्ट और दैनिक जागरण के सीईओ सह संपादक संजय गुप्‍ता की दलीलें आयोग की वेबसाइट पर देखीं जा सकती हैं। (http://eci.nic.in ) के निम्‍न पथ पर पीडीएफ फाइले देख सकते है।

पथ है (http://eci.nic.in/eci_main1current/PN21102011.pdf


सबसे मजेदार बात तो यह कि जिस कानून के तहत विमलेश यादव कोदोषी ठहराया गया उसी अपराध को करने पर संजय गुप्‍ता को सजा यह कह कर नहीं दी गई कि पेड न्‍यूज अपराध की श्रेणी में नहीं आता। लेकिन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में साफ- साफ कहा है कि ऐसा करके चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। मतदाताओं में भ्रम फैलाया गया । अब मतदाताओं से धोखाधड़ी और चुनाव को प्रभावित करना चुनाव आयोग की नजरों में कोई अपराध नहीं है।

यह तो इसी तरह हुआ न कि आप किसी के लिए सुपारी देते हैं। सुपारी लेने वाला आपका काम कर दिया और जब मामला दर्ज हेाता है तो आप तो पकड़ लिए जाते हैं लेकिन जिसने सुपारी लिया और अपराध को अंजाम दिया वह साफ बच जाता है। आयोग का इन मीडिया मालिकों द्वारा चुनाव में किया गया कदाचार अपराध नहीं लगता । इसके लिए उसे अलग से कानून की दरकार है।

(मजीठिया मंच के फेसबुक वॉल से)

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