एमपी में जिन लोगों ने भूखंड प्राप्त किए उनमें नवभारत, दैनिक जागरण, नईदुनिया और दैनिक स्वदेश के मालिक भी हैं!

अनिल जैन

Anil Jain : मध्य प्रदेश यानी ‘व्यापमं प्रदेश’ की सरकार ने पत्रकारों के नाम पर करीब तीन सौ लोगों को भोपाल में अत्यंत सस्ती दरों पर आवासीय भूखंड आबंटित किए है। सार्वजनिक हुई लाभार्थियों की सूची में सुपात्र भी हैं और वे कुपात्र भी जो बेशर्मी के साथ पत्रकारिता के नाम पर सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं। बहरहाल, यह खबर कतई चौंकाती नहीं है बल्कि इस बात की तसदीक करती है मध्य प्रदेश में सत्ता और पत्रकारिता का आपराधिक गठजोड न सिर्फ कायम है बल्कि निरंतर फल-फूल रहा है।

जिन लोगों ने ये भूखंड प्राप्त किए हैं उनमें नवभारत के मालिक सुमित माहेश्वरी, दैनिक जागरण के मालिक राजीव मोहन गुप्त, दैनिक नईदुनिया के मालिक त्रय राजेंद्र तिवारी, सुरेंद्र तिवारी, विश्वास तिवारी और दैनिक स्वदेश के मालिक राजेंद्र शर्मा के साथ ही कुछ अन्य अखबार मालिक तथा उमेश त्रिवेदी, श्रवण गर्ग, अरुण पटेल, अभिलाष खांडेकर और इसी तरह के कुछ अन्य लोगों के नाम भी शामिल हैं जो पत्रकारिता से ज्यादा दूसरे कामों के लिए जाने-पहचाने जाते हैं। (हालांकि प्राप्त सूचना के मुताबिक अभिलाष खांडेकर और कुछ अन्य लोगों का दावा है कि वे न तो संबंधित गृह निर्माण समिति के सदस्य हैं और न ही उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार से कोई भूखंड प्राप्त किया है। फिलहाल इस सूचना पर भरोसा करते हुए उन्हें इस चर्चा से अलग रखा जा रहा है)।

बहरहाल ये कुछ नाम, दलाली से सनी मध्य प्रदेश की अखबारी मंडी और पत्रकारिता के प्रतिनिधि चेहरे हैं, जो भ्रष्ट राजनेताओं और नाकाबिल नौकरशाहों के इर्द-गिर्द अपनी कलम के काले अक्षरों से अक्सर चंवर डुलाते रहते हैं। हालांकि इस जमात में कुछ ऐसे भी हैं जो पढने-लिखने के मामले में अत्यंत प्रतिभाविहीन हैं लेकिन दलाली के काम में इतने प्रतिभाशाली हैं कि कुछ बडे अखबारों ने उनकी इसी काबिलियत का कायल होकर उन्हें अपने यहां ऊंचे पदनाम और मोटी तनख्वाह पर रखा हुआ है।

वैसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पत्रकारों के नाम पर इन दलालों को उपकृत कर कोई नया काम नहीं किया है। दरअसल अपने भ्रष्ट कारनामों पर परदा डालने के लिए जमीन के टुकडों और सरकारी मकानों से अखबार मालिकों और पत्रकारों का ईमान खरीदने के खेल की शुरुआत अस्सी के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने की थी। यही नहीं, उन्होंने तो मध्य प्रदेश में फर्जी पत्रकारों की एक नई जमात ही पैदा कर उसे सत्ता की दलाली में लगा दिया था। उस दौर में अर्जुनसिंह के दरबार में मुजरा करने वाली बेगैरत पत्रकारों की इस जमात ने अर्जुनसिंह को ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ का खिताब अता किया था। इस ‘संवेदनशील मुख्यमंत्री’ ने अपनी ‘संवेदना’ के छींटे सिर्फ मध्य प्रदेश के पत्रकारों पर ही नहीं, बल्कि दिल्ली में रहकर सत्ता की दलाली करने वाले कुछ दोयम दर्जे के साहित्यकारों और पत्रकारों पर भी डाले थे और उन्हें इंदौर व भोपाल जैसे शहरों में जमीन के टुकडे आबंटित किए थे।

अपने राजनीतिक हरम की इन्हीं बांदियों की मदद से अर्जुनसिंह चुरहट लाटरी और आसवनी कांड जैसे कुख्यात कारनामों को दफनाने में कामयाब रहे थे। इतना ही नहीं, दस हजार से ज्यादा लोगों का हत्यारा भोपाल गैस कांड भी अर्जुनसिंह का बाल बांका नहीं कर पाया था। अर्जुनसिंह अपने इन कृपापात्रों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों की छवि मलिन करने और उन्हें ठिकाने लगाने में भी किया करते थे।

अर्जुनसिंह के नक्श-ए-कदम पर चलते हुए शिवराज सिंह भी अखबार वालों को साधकर ‘व्यापमं’ जैसे खूंखार कांड तथा ऐसे ही कई अन्य मामलों को दफनाने में लगभग कामयाब रहे हैं। उनके द्वारा उपकृत किए गए पत्रकारों की सूची में कुछ नाम तो ऐसे भी हैं, जो निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज के परोक्ष-अपरोक्ष रुप से संचालक हैं और इस नाते खुद भी ‘व्यापमं’ में भागीदार रहे हैं। कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनका भूमि से अनुराग बहुत पुराना है। उन्होंने अपने इसी भूमि-प्रेम के चलते पिछले तीन-साढे तीन दशक के दौरान अपवाद स्वरुप एक-दो को छोडकर लगभग सभी मुख्यमंत्रियों से सरकारी मकान और जमीन के टुकडे ही नहीं बल्कि दूसरी तरह की और भी कई इनायतें हासिल की हैं।

अब चूंकि मीडिया संस्थानों में कारपोरेट संस्कृति के प्रवेश के बाद अहंकारी, मूर्ख, नाकारा, क्रूर और परपीडक संपादकों और संपादकनुमा दूसरे चापलूस कारकूनों के साथ किसी भी काबिल, ईमानदार और पेशेवर व्यक्ति का खुद्दारी के साथ काम करना आसान नहीं रह गया है, यानी नौकरी पर अनिश्चितता की तलवार हमेशा लटकी रहती है। लिहाजा मीडिया संस्थानों में साधारण वेतन पर ईमानदारी और प्रतिबध्दता के साथ काम रहे पत्रकारों को सरकार अगर रियायती दरों पर भूखंड देती है तो इस पर शायद ही किसी को ऐतराज होगा। होना भी नहीं चाहिए, लेकिन इन्हीं मीडिया संस्थानों में दो से तीन लाख तक की तनख्वाह पाने वालों, धंधेबाजों और प्रबंधन के आदेश पर घटिया से घटिया काम करने को तत्पर रहने वालों को सरकार से औने-पौने दामों पर भूखंड क्यों मिलना चाहिए?

मैं कुछ ऐसे भू-संपदा प्रेमी पत्रकारों को जानता हूं जिन्होंने अपने करिअर के दौरान मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में, जिस-जिस शहर में काम किया वहां-वहां पत्रकारिता से इतर अपनी दीगर प्रतिभा के दम पर अचल संपत्ति अर्जित की है और मध्य प्रदेश सरकार से भी लाखों की जमीन कौडियों के मोल लेने में कोई संकोच नहीं दिखाया है। ऐसे ‘महानुभाव’ जब किसी राजनीतिक व्यक्ति के घपले-घोटाले पर कुछ लिखते हुए या सार्वजनिक कार्यक्रम के मंच से नैतिकता और ईमानदारी की बात करते दिखते हैं तो सिर्फ और सिर्फ उस आसाराम बापू का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है जो इन दिनों जेल में रहते हुए भी ईश्वर से अपना साक्षात्कार होने का पाखंड भरा दावा करता है।

हालांकि पत्रकारिता के इस पतन को सिर्फ मध्य प्रदेश के संदर्भ में ही नहीं देखा जाना चाहिए, यह अखिल भारतीय परिघटना है। नवउदारीकरण यानी बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने हमारे सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर डाला है। पत्रकारिता भी उनमें से ऐसा ही एक क्षेत्र है। इसलिए ऐसी पतनशील प्रवृत्तियों को विकसित होते देखने के लिए हम अभिशप्त है। लेकिन इस अभिशाप के बावजूद पत्रकारिता अब भी एक संभावना है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन की एफबी वॉल से.

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इंडिया टीवी को तगड़ा झटका, एक्जिक्यूटिव एडिटर शुभाशीष मलिक का इस्तीफा

इंडिया टीवी को एक तगड़ा झटका लगा है। यहां कार्यरत बेहद प्रतिभाशाली और एक्जिक्यूटिव एडिटर के पद पर तैनात शुभाशीष मलिक ने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है ।

शुभाशीष यहां करीब एक साल से काम कर रहे थे और मैनेजमेंट में अपने काम को लेकर काफी लोकप्रिय भी थे । इस्तीफे का कारण पूछने पर उन्होंने इसे व्यक्तिगत बताया है और अपनी नयी पारी को लेकर कोई खुलासा नहीं किया है । इंडिया टीवी के साथ अपने अनुभव को उन्होंने शानदार बताया है ।

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जनरल साहब कारपोरेट मीडिया के मालिकों पर भी तो कुछ सचबयानी करिए !!

जनरल साहब आपने अगर मीडिया को #presstitude कहा तो अपने हिसाब से ठीक ही कहा होगा. हो सकता है इस बार खरीद बिक्री में कुछ कमी रह गयी होगी और सौदा नहीं पटा होगा जिसकी परिणति तल्खबयानी में हुई. 

लोग कहते हैं कि आप साहसी हैं, फिर इस साहस का प्रयोग आप कभी मीडिया मालिकों के मनमानेपन के विरोध में क्यों नहीं करते हैं? आप मुकेश भाई को कभी क्यों नहीं डांटते हैं, जो पूरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ही अपने जेब में रखते जा रहे हैं? आप ऐसा कोई प्रस्ताव क्यों नहीं देते हैं, जो किसी एक व्यक्ति को मीडिया के सभी माध्यमों पर एकाधिकार स्थापित करने से रोके? आप उन मीडिया मालिकों पर अपने तोप (जुबानी)  क्यों नहीं बरसाते, जो पत्रकारों को न्यूनतम वेज भी देना नहीं चाह रहे हैं और “संगठित अपराध ” जैसा कृत्य करने के लिए प्रयासरत हैं? आप उन मीडिया मालिकों का गिरेबां क्यों नहीं पकड़ते, जो पत्रकारों को आत्महत्या करने के लिए विवश कर रहे हैं? आप उन अमीरों का नाम सार्वजनिक क्यों नहीं करते हैं, जो सौदेबाज हैं और जिनसे सौदा न पटने के कारण आपको गुस्सा आ जाता है? 

मैं जानता हूँ कि  आप किसी से नहीं डरते होंगे जनरल साहब। अपने मुखिया और मुखिया के सुखिया से भी नहीं. तो कुछ कहिये सर, सुना है, आप तोप चलाते हैं तो फिर आतिशबाजी क्यों?  मुंह खोलिए सर जनता बहुत इज्ज़त करती है जवानों की तो जवान की तरह बोलिए “उनकी ” तरह नहीं. वैसे आपके इस दोमुहेपन के कारण को आसानी से समझा जा सकता है. जिस मुखिया के आप मातहत हैं, जनरल साहब उनकी ताजपोशी में इन मीडिया मालिकों का बहुत योगदान है तो हम उस जनरल से ये कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो अपने प्रमुख के चहेतों के विरोध में बोले, जो एक वर्ष और नौकरी में बने रहने के लिए तमाम प्रकार के तिकड़म कर चुका हो. 

लेकिन मैं आपको बहुत दोषी नहीं मानता हूं सिंह साहब, क्योंकि हम जिस समाज में रहते हैं वहां का यही दस्तूर है. अगर आपके काम आए तो ठीक, नहीं तो बाजारू और प्रेस्टीट्यूट. देखिए न जनता का एक वर्ग भी आपके इस बयान से खुश है, उसे इस बात का जरा भी इल्म नहीं है कि अभिव्यक्ति पर पाबंदी की ये राह एक दिन उनके मुंह तक भी जाएगी, फिर सिवाय वाल्टेयर का नाम लेकर रोने के और कोई चारा नहीं होगा. मैं इसलिए भी आपको दोष नहीं देना चाहता हूँ जनरल साहब, क्योंकि जो लोग रोज मीडिया के गिरते स्तर का रोना रोते हैं, उनके आंख से एक कतरा भी इस बात के लिए नहीं छलकता है कि चौबीसों घंटे काम करने वाला पत्रकार किन अमानवीय दशाओं में काम करने को मजबूर हैं? बिना पर्याप्त वेतन के कोई विशेषज्ञ कैसे मिलेगा? लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है तो आपका क्यों जाएगा जनरल साहब? इसलिए मैं कहता हूँ कि इसमें आपका कोई दोष नहीं है, ये उन शोषणपसंदों का समाज है, जहाँ लोग तब तक तमाशा देखते रहते हैं, जब तक उनके घर में न आग लग जाए!

सनी कुमार के फेसबुक वॉल से

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पत्रकार बन कर लूट रहे अखबार मालिक, फिर भी ‘उनका मुंह बंदर का नहीं, सिकंदर का’

कहते हैं न जब आदमी मर जाता है तब कुछ नहीं सोचता कुछ नहीं बोलता और जब कुछ नहीं सोचता कुछ नहीं बोलता तो मर जाता है आदमी। यकीनन अतृप्‍त इच्‍छाओं वाले शहर नोएडा में सोचने और बोलने की शुरुआत अच्‍छी लगी। लोकतंत्र के तीन स्‍तंभों के बड़े बड़े और जिम्‍मेदार लोग एक मंच पर एक साथ समाज की चिंता करते दिखे तो ऐसा लगा कि समष्टि भी कुछ सोच रही है, कुछ बोल रही है। 4 अप्रैल को नोएडा के सेक्‍टर छह स्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र की दर्शक दीर्घा में जमे लोग शायद यह संदेश दे रहे थे कि वे सूरज को भी तराशने के लिए तैयार हैं।

नोएडा के सेक्‍टर छह स्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र में ‘पुलिस और पत्रकार की समाज में भूमिका’ विषय पर गोष्‍ठी की एक झलक

शायद आप समझ गए होंगे कि मैं यूपी वर्किंग जर्नलिस्‍ट यूनियन के तत्‍वावधान में ”पुलिस और पत्रकार की समाज में भूमिका” विषयक गोष्‍ठी और सम्‍मान समारोह की बात कर रहा हूं। समारोह की भव्‍यता से मैं अवश्‍य ही अभिभूत हुआ, लेकिन दिव्‍यता कहीं नजर नहीं आई। वक्‍ताओं ने कई विंदुओं पर वाजिब चिंता जताई, लेकिन पत्रकारिता और पत्रकार के मिट रहे अस्तित्‍व पर एक दो को छोड़ न तो किसी ने चिंता जताई और न ही कोई चिंतन किया। वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता परमानंद पांडेय ने अवश्‍य यह साबित किया कि वह एक अच्‍छे अधिवक्‍ता ही नहीं बेबाक वक्‍ता भी हैं। उन्‍होंने कहा कि अब पत्रकार कहां रह गए हैं। जिन्‍हें पत्रकार होने का थोड़ा बहुत गुमान है, वे पत्रकार कहां हैं, वे तो लालाओं के नौकर भर हैं। असली पत्रकार होने का दावा तो अखबारों के मालिक करते हैं, जो पत्रकारिता की समस्‍त शक्तियों को समेट कर उन्‍हें अपनी मुनाफाखोरी का साधन बनाने में लगे हैं।

वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक डॉक्‍टर प्रीतेंद्र सिंह की एक स्‍वर से सराहना किए जाने से ऐसा लगा कि वह वास्‍तव में अपनी जिम्‍मेवारी को ठीक से निभा रहे हैं। ऐसे पुलिस अधिकारी की सराहना करना हमारा दायित्‍व ही नहीं कर्तव्‍य भी बनता है। गोष्‍ठी में एक न्‍यायाधीश की उपस्थिति उसकी गंभीरता को अवश्‍य बढ़ा गई। वरिष्‍ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम ने गोष्‍ठी के लिए अपने अमूल्‍य समय की शहादत दी। यह शायद एक शुभ संकेत है।

जिलाधिकारी महोदय ने पत्रकार की जो तात्विक विवेचना की, उससे पत्रकारों को सीख लेनी होगी। उन्‍होंने नारद को पहला पत्रकार बताया और कहा कि जब पत्रकार लक्ष्‍मी को पाने के लिए सक्रिय होता है तो उसका मुंह बंदर का हो जाता है। यह अलग बात है कि कई अखबार मालिक पत्रकार बन कर व्‍यवस्‍था से धन लूट रहे हैं और लक्ष्‍मी पर कब्‍जा जमाए बैठे हैं, लेकिन उनका मुंह बंदर का नहीं सिकंदर का बन गया है। उम्‍मीद है कि भविष्‍य में इस विषय पर अवश्‍य ही चिंतन मनन किया जाएगा।

श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से

 

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मीडिया मालिकों ने बंधुआ मजदूर बना रखा है पत्रकारों को

देश में आज सबसे ज्यादा अगर शोषित है तो वह पत्रकार है। चाहे पत्रकार अखबार से जुड़ा हो या टेलिविजन से । पता नहीं कितने लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने खून पसीने से अखबारी संस्थानों को सींच कर बड़ा किया लेकिन मुसीबत में वे उसे कोई मदद नहीं देते। अखबार -न्यूज़ चैनल के मालिकन जब चाहें, किसी को काम पर रख लेते हैं , जब चाहें उन्हें काम से निकाल देते हैं । इनके यहाँ इन न्यूज़ चैनल या अखबारों को टीआरपी दिलाने वाले, संवाददाता, रिपोर्टर या स्ट्रिंगर की कोई औकात नहीं। पत्रकार इनके लिए मात्र बंधुआ मजदूर से अधिक की हैसियत नहीं रखते। 

अखबार या न्यूज़ चैनलों के मालिकान पत्रकारों को काम पर रखने के पहले जो एग्रीमेंट (अनुबंध) कराते हैं, उसमे वे क्लाज़ डालते हैं, जिससे कि वे अपने आपको अथवा संस्थान को स्वप्रायोजित नियमों की आड़ में सुरक्षित रख सकें। हमारी सुरक्षा या परिवार की सुरक्षा के साथ साथ हमारे सुरक्षित भविष्य की वे कोई गारंटी नहीं लेते हैं। क्यों, यह लोग अखबार के लिए प्रसार, विज्ञापन से लेकर खबर तक जिम्मेदारी उठाने वाले मीडिया कर्मियों को लेकर उदासीन रवैया अपनाये हुए हैं। वह बछावत बोर्ड रहा हो या फिर मजीठिया, सरकारों के पास भी इनके लिए कोई ठोस पॉलिसी नहीं ?

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि “समाज में यदि कोई मुसीबत में होता है या किसी का शोषण किया जाता है तो मिडिया द्वारा उक्त पीड़ित की आवाज को बुलंद कर उसे यथा संभव न्याय दिलाया जाता है और इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका होती है वहां के स्थानीय पत्रकारों की लेकिन खुद पत्रकारों की उलझन की तरफ किसी का कोई ध्यान नहीं। वह खुद आये दिन पता नहीं कितनी तरह की मुसीबतों का सामना कर रहे हैं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिन्हें देख-सुनकर मन विचलित हो जाता है।

सवाल उठता है आखिर न्यूज़ चैनल या अखबारों को टीआरपी दिलाने वाले संवाददाता, रिपोर्टर या स्ट्रिंगरों के हितों की जिम्मेदारी है तो किसकी ? क्या इन सब बातों को लेकर हमे आज विचार करने की जरूरत नहीं है।

 फेसबुक वॉल से 

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संजय गुप्‍ता प्रकरण : क्या मीडिया मालिकों का चुनावी कदाचार अपराध नहीं?

राजनैतिक पार्टियाें और अधिकारियों के खिलाफ कानून का डंडा फटकारने वाला चुनाव आयोग जब मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करने का समय आता है तो बंगले झांकने लगता है। पेड न्‍यूज के मामले में तो गजब तर्क का सहारा ले रहा है।

परिवर्तन दल की विमलेश यादव को तो दैनिक जागरण में करीब 22 सौ रुपये के पेड न्‍यूज छपवाने पर तो उसने तीन साल के लिए चुनाव लड़ने पर रो लगा दी थी। लेकिन अशोक च्‍वहाण और विजय दर्डा के मामले में अब तक फैसला ही नहीं कर पा रहा है। 

विमलेश यादव के मामले में आयेाग का फैसला, प्रेस काउंसिल की रिपोर्ट और दैनिक जागरण के सीईओ सह संपादक संजय गुप्‍ता की दलीलें आयोग की वेबसाइट पर देखीं जा सकती हैं। (http://eci.nic.in ) के निम्‍न पथ पर पीडीएफ फाइले देख सकते है।

पथ है (http://eci.nic.in/eci_main1current/PN21102011.pdf


सबसे मजेदार बात तो यह कि जिस कानून के तहत विमलेश यादव कोदोषी ठहराया गया उसी अपराध को करने पर संजय गुप्‍ता को सजा यह कह कर नहीं दी गई कि पेड न्‍यूज अपराध की श्रेणी में नहीं आता। लेकिन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में साफ- साफ कहा है कि ऐसा करके चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया गया। मतदाताओं में भ्रम फैलाया गया । अब मतदाताओं से धोखाधड़ी और चुनाव को प्रभावित करना चुनाव आयोग की नजरों में कोई अपराध नहीं है।

यह तो इसी तरह हुआ न कि आप किसी के लिए सुपारी देते हैं। सुपारी लेने वाला आपका काम कर दिया और जब मामला दर्ज हेाता है तो आप तो पकड़ लिए जाते हैं लेकिन जिसने सुपारी लिया और अपराध को अंजाम दिया वह साफ बच जाता है। आयोग का इन मीडिया मालिकों द्वारा चुनाव में किया गया कदाचार अपराध नहीं लगता । इसके लिए उसे अलग से कानून की दरकार है।

(मजीठिया मंच के फेसबुक वॉल से)

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रजत शर्मा और सुभाष चंद्रा : पत्रकार का मालिक और मालिक का पत्रकार होना

अखबारों और केबल की दुनिया में यह बात आम है, लेकिन सेटेलाइट चैनलों की दुनिया में इसे अजूबा ही कहा जाएगा कि मालिक पत्रकार की तरह बनना चाहे और मालिक पत्रकार की तरह। रजत शर्मा का करियर पत्रकार के रूप में शुरू हुआ और आज वे इंडिया टीवी के सर्वेसर्वा है। दूसरी तरफ सुभाष चंद्रा है जिन्होंने बहुुत छोटे से स्तर पर कारोबार शुरू किया और पैकेजिंग की दुनिया से टीवी की दुनिया में आए। रजत शर्मा कभी इनके चैनल पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया करते थे। इतने बरसों में यह अंतर आया है कि रजत शर्मा सुभाष चंद्रा की तरह मालिक बन गए और सुभाष चंद्रा रजत शर्मा की तरह टीवी प्रेजेंटर बनने की कोशिश कर रहे है। चैनलों का मालिक होने का फायदा सुभाष चंद्रा को जरूर है, लेकिन इससे वे रजत शर्मा की बराबरी नहीं कर सकते।

दोनों ही शख्सियतें अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। कहा जा सकता है कि दोनों ‘सेल्फ मेड’ है। कहते है कि सुभाष चंद्रा ने अरबों रुपए के कारोबार वाले एस्सेल ग्रुप केवल १७ रुपए् की जमापूंजी से शुरू किया था। व्यापार में कामयाबी पाने वाली हर चतुराई वे आजमा चुके है। चावल के निर्यात से लेकर एस्सेल वर्ल्ड  जैसे थीम पार्क का निर्माण और मल्टीप्लेक्स का धंधा भी। अंग्रेजी अखबार भी उन्होंने शुरू किया और एक बाद एक सैकड़ों कम्पनियाँ  बनाकर अपने साम्राज्य को विश्वस्तर पर फैलाया।  अपने व्यवसाय चातुर्य से उन्होंने जी टेलीफिल्मस् लिमिटेड कंपनी  अक्टूबर १९९२ में शुरू की थी, जो भारत की पहली निजी सेटेलाटि चैनल चलाने वाले कंपनी   थी। टीवी के दर्शक दूरदर्शन के एक रस कार्यक्रमों में से हटकर जी टीवी की तरफ आकर्षित हुए।

आज सुभाष चंद्र गोयल डॉ. सुभाष चंद्रा बन गए है। जैसे सुब्रत राय सहाराश्री बन गए। वैसे वे चंद्रा बन गए। गोयल शब्द उन्होंने अपने नाम में से हटा लिया। अपने संयुक्त परिवार की मदद से साम्राज्य स्थापित करने के बाद उन्होंने उसे विभाजित कर लिया और अपने भाइयों को अलग तरह के व्यवसाय में स्थापित कर दिया। उनका बड़ा बेचा पुनीत ६ साल से मीडिया का साम्राज्य संभाल रहा है और उससे छोटा अमित इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम कर रहा है। इसके अलावा सुभाष चंद्रा आजकल अमेरिका में ‘वेलनेस बिजनेस’ संभाल रहे है। भारत में सुभाष चंद्रा ने ९ सेक्टर में कारोबार शुरू किया था, जिसमें से २ सेक्टर में वे विफल रहे। एक इंडियन क्रिकेट लीग और दूसरा सेटेलाइट प्रोजेक्ट। दुनिया के अनेक बड़े-बड़े मीडिया संस्थान भारत आ रहे है और भारत का जी मीडिया विदेश जा रहा है। जी टेलीविजन की स्थापना के बाद उन्होंने न्यूज, सिनेमा और अन्य चैनलों के साथ ही केबल और डीटीएच का कारोबार भी शुरू किया। फोब्र्स पत्रिका ने सुुभाष चंद्रा की तुलना धीरूभाई अंबानी से की है। आज जी टीवी का कारोबार ६८ चैनलों के जरिए १६९ देशों में पैâला हुआ है। उनका बनाया हुआ एस्सेलवर्ल्ड भारत का पहला प्रमुख एम्युजमेंट पार्क माना जाता है। सेटेलाइट कम्युनिकेशन, ऑनलाइन गेमिंग, एज्युकेशन, पैकेजिंग आदि के क्षेत्र में उन्होंने भारत को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

सुभाष चंद्रा का मानना है कि वे गीता में बताए गए कर्म में विश्वास करते है। अगर कामयाबी न मिले तो भी वे कभी निराश नहीं होते। अपने जीवन में उन्होंने बहुत बड़े-बड़े थपेड़े खाए। १२वीं के बाद उन्हें अपनी नियमित पढ़ाई छोड़नी पड़ी। परिवार की जिम्मेदारी उनके सिर पर थी और आजकल उनमें एक नया कीड़ा प्रवेश कर गया है और वह कीड़ा है टेलीविजन के कार्यक्रम पेश करने का। इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा बरसों तक उनके जी टीवी पर आपकी अदालत कार्यक्रम पेश करते रहे, उन्हें लगता है कि आज रजत शर्मा सत्ता के गलियारों में ज्यादा पहुंच रखते है क्योंकि वे टीवी पर कार्यक्रम पेश करते है जबकि इतने चैनलों के मालिक और खरबपति होने के बावजूद सुभाष चंद्रा की बातों का वो वजन नहीं है, इसलिए उन्होंने जी टीवी पर अपने नाम से ही एक शो शुरू कर दिया।

रजत शर्मा ने पिछले दिनों जब आपकी अदालत कार्यक्रम की 21वीं सालगिरह बनाई, तब उसमें देश की लगभग सभी प्रमुख हस्तियां मौजूद थी। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री उनके कार्यक्रम में आए। ऐसे मौके दुर्लभ ही होते है जब किसी गैर सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक साथ नजर आए। इसके अलावा इस कार्यक्रम में खेल, फिल्म, कारोबार, राजनीति, समाज सेवा आदि क्षेत्रों से भी लगभग सभी प्रमुख हस्तियां मौजूद थी। फिल्मी दुनिया के तीनों प्रमुख खान शाहरुख, आमिर और सलमान इस कार्यक्रम में नजर आए। इसके पहले यह तीनों धर्मेन्द्र के एक कार्यक्रम में भी नजर आए थे।

जी टीवी में कार्यक्रम पेश करते-करते रजत शर्मा को आपकी अदालत कार्यक्रम का महत्व समझ में आ गया था। यह महत्व तो सुभाष चंद्रा को भी मालूम था जब उन्होंने जी टीवी पर इसकी शुरुआत होने दी और कुछ ही साल बाद इस कार्यक्रम की सालगिरह के बहाने अनेक मुख्यमंत्रियों, नौकरशाहों और अनेक महत्वपूर्ण लोगों को बुलाकर उनसे निकटता कायम करने की कोशिश की। शायद वहीं घटना रही होगी कि 21  साल होने पर रजत शर्मा ने उससे कहीं बड़ा और ज्यादा भव्य कार्यक्रम अपने बूते पर किया। इस बार सुभाष चंद्रा उनके बॉस नहीं थे, बल्कि वे खुद अपनी वंâपनी के बॉस थे। उनके कार्यक्रम की खूबी यह है कि वे कार्यक्रम में चुटीलापन, हाजिरजवाबी और हल्के-फुल्के सवालों के साथ ही दर्शकों को भी उससे जोड़े रखते है।

रजत शर्मा ने पत्रकारिता में बहुत पापड़ बेले है। रिपोर्टिंग भी की है और संपादन भी। जब उन्होंने टीवी की दुनिया में प्रवेश किया तब कई लोगों को लगता था कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके सिर पर गिने-चुने बाल हो और नाक किसी केरिकेचर की तरह नुकीली वह टीवी की दुनिया में क्या प्रभाव जमाएगा, लेकिन सुभाष चंद्रा ने न केवल अपनी पत्रकारिता से बल्कि अपनी व्यवसाय बुद्धि से भी चमत्कार कर दिखाया और इंडिया टीवी जैसी टीआरपी बटोरु चैनल खड़ी कर ली। इंडिया टीवी कई बार विवादों में घिरा रहा। कभी उस पर पक्षपात के आरोप लगे कभी महिला कर्मचारी के व्यवहार को लेकर रजत शर्मा को ही कटघरे में खड़ा किया गया। कभी उनके निजी जीवन पर, उनके वैवाहिक संबंधों पर सवाल खड़े किए गए, लेकिन वे दृढ़ता से अपनी जगह बने रहे। ब्रेविंâग न्यूज नामक उनका दैनिक कार्यक्रम भी बरसों तक चला, लेकिन बाद में से बंद कर दिया गया।

रजत शर्मा का एक पत्रकार से मीडिया मुगल बनना किसी चमत्कार से कम नहीं। जिस चतुराई से वे इस साम्राज्य के सिंहासन पर बैठे, वह किसी के लिए भी ईष्र्या का विषय हो सकता है और शायद सुभाष चंद्रा के लिए है भी। वरना वे सुभाष चंद्रा शो लेकर अपने चैनल पर नहीं आते। इसमें कहीं न कहीं ईर्ष्यां की गंध जरूर है।

लेखक प्रकाश हिन्दुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लॉग Prakashhindustani.Blogspot.in से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. प्रकाश हिंदुस्तानी से संपर्क 09893051400 के जरिए किया जा सकता है.

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शेखर गुप्ता अब अपनी मीडिया कंपनी शुरू करेंगे, अखबार से लेकर टीवी तक लांच करेंगे

दूसरों की नौकरियां करते करते उब चुके शेखर गुप्ता अब खुद की नौकरी करेंगे. यानि अपनी मीडिया कंपनी बनाएंगे. इस कंपनी के बैनर तले वह अखबार, वेबसाइट, चैनल सब लांच करेंगे. पता चला है कि शेखर गुप्ता ने अपनी खुद की मीडिया कंपनी वर्ष 2000 में ही बना ली थी लेकिन उसे लेकर बहुत सक्रिय नहीं थे क्योंकि उनका पूरा वक्त इंडियन एक्सप्रेस समूह की सेवा में जाता था. अब जब वह इंडियन एक्सप्रेस से लगाकर इंडिया टुडे तक से हटाए जा चुके हैं तो उनके पास अपनी कंपनी को देने के लिए वक्त खूब है.

इसी कारण वह साल 2000 में पंजीकृत अपनी कंपनी ‘मीडियास्केप प्राइवेट लिमिटेड’ के तहत वे एक अखबार, टीवी शो और डिजिटल न्यूज़ प्रोडक्ट्स शुरू करने की प्रक्रिया में हैं. बताया जा रहा है कि शुरुआत के लिए शेखर गुप्ता एनडीटीवी के अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल के लिए दो टीवी शो लॉन्च करेंगे. फिलहाल गुप्ता एनडीटीवी 24×7 के लिए साक्षात्कार आधारित शो ‘वॉक द टॉक’ की मेजबानी करते हैं. शेखर गुप्ता का कहना है कि वह प्रिंट मीडिया में भी जाने की योजना बना रहे हैं.

शेखर गुप्ता ने अपनी मीडिया कंपनी के लिए भर्ती शुरू कर दी है. शेखर गुप्ता की इंडियन एक्सप्रेस में 9 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी. मुंबई में एक्सप्रेस टावरों के इस साल की शुरुआत में बेच दिए जाने से गुप्ता की हिस्सेदारी 1.2 प्रतिशत तक नीचे आ गई. पर उन्होंने उस ट्रांसेक्शन में पैसा बनाया है. वाइस चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ के रूप में इंडिया टुडे ग्रुप में शेखर गुप्ता का कार्यकाल इस साल सितंबर में अचानक खत्म हो गया. अटकलें लगाई गई थी कि उनके और संस्थापक-प्रमोटर और चेयरमैन अरुण पुरी के बीच मतभेद थे.

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