सुप्रीम कोर्ट के फैसले दो, सवाल एक मीडिया बड़ा या न्याय पालिका !

भारतीय लोकतंत्र की अन्योन्याश्रित चार प्रमुख शक्तियां हैं- विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया। लेकिन कई एक ताजा प्रसंग अब ये संदेश देने लगे हैं कि अभी तक सिर्फ राजनेता, अफसर और अपराधी ही ऐसा करते रहे हैं, अब भारतीय मीडिया भी  डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक बनाने लगा है। मजीठिया वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान न देने पर अड़े मीडिया मालिकों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुपालन का फैसला दिय़ा तो उसे कत्तई अनसुना कर दिया गया। इस समय मीडिया कर्मी अपने हक के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं। इस पूरे मामले ने ये साफ कर दिया है कि भारतीय मीडिया को न्यायपालिका के आदेशों की परवाह नहीं है। इस तरह वह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुला मखौल उड़ा रहा है। इतना ही नहीं, लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक होने के नाते उसकी यह धृष्टता भारतीय न्याय-व्यवस्था के प्रति आम आदमी की अनास्था को प्रोत्साहित भी करती है। मीडिया कर्मियों को मजीठिया वेतनमान देने की बजाए कई बड़े मीडिया घराने तो पुलिस की मदद से मीडिया कर्मियों का गुंडों की तरह उत्पीड़न करने लगे हैं। इसी दुस्साहस में वह सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक और आदेश को ठेंगा दिखाते हुए सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटो छापने से भी बाज नहीं आ रहा है। भारतीय मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक दोनो) यह साबित करने की लगातार कुचेष्टा कर रहा है कि उसकी हैसियत देश के सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है।

पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में निर्देश दिया था कि सरकारी विज्ञापनों पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तस्वीरें लगेंगी – लेकिन ये भी एक खास कमेटी से मंजूरी मिलने के बाद। सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला उस कमेटी की सिफारिशों के आधार को सामने रखते हुए एक जनहित याचिका पर दिया, जिसे कोर्ट ने ही पिछले साल बनाया था। फैसले के पीछे एक बड़ा उद्देश्य था कि सरकार चला रही पार्टी जनता के टैक्स के पैसे से खुद का प्रचार बंद करे। साथ ही राष्ट्रपति, पीएम और चीफ जस्टिस भी खुद ये तय करेंगे की उनकी तस्वीर विज्ञापनों में लगनी चाहिए या नहीं। यानी इनकी भी तस्वीरें तभी लगेंगी, जब वे इसकी जवाबदेही लेंगे। फैसले के मुताबिक सरकारी विज्ञापनों में गवर्नर, मुख्यमंत्रियों, ब्यूरोक्रेट की तस्वीर भी नहीं लगेगी। अदालत ने ये भी निर्देश दिया कि केन्द्र और राज्य सरकार तीन सदस्य कमेटी बनाएंगी, जो ये तय करेगी कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन हो रहा है या नहीं। एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रह रही है। इसलिए जनता का पैसा सरकारी विज्ञापनों पर खर्च नहीं होना चाहिए। 

अब देखिए, 13 मई 2015 के सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर मीडिया का क्या रुख रहा? इस फैसले की खिल्ली उड़ाते हुए देश के एक बड़े अखबार ने उस फैसले के अगले ही दिन अपने यहां बेशर्म प्रतिप्रश्न प्रकाशित किया कि क्या कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका ज्यादा दखल दे रही है? क्या कोर्ट सरकारी कामकाज को ज्यादा माइक्रो मैनेज कर रही है? मीडिया तो मीडिया ठहरा, सरकार ने भी तर्क दे डाला कि न्यायपालिका को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए। ये न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र के बाहर का मामला है। चुनी हुई सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है, न कि अदालत के प्रति। यानी चुनी हुई सरकार जनता के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र है! एकदम इसी तरह का साझा रुख मजीठिया मामले पर भी सरकार और मीडिया मालिकों का रहा है। केवल दिल्ली सरकार को इसके अपवाद के रूप में लिया जा सकता है। केवल मीठिया वेतनमान और सचित्र विज्ञापन प्रकरण ही नहीं, और भी ऐसे अनगिनत मामले प्रकाश में आ रहे हैं, जिनमें सरकार और मीडिया आपसी तालमेल बनाकर न्याय व्यवस्था को ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। वैसे तो ये दोनो नियम-कानून पर खूब चिकनी-चुपड़ी हांकते रहते हैं, लेकिन जैसे ही किसी फैसले से इनके हितों पर चोट पड़े, अपनी औकात दिखाने पर उद्धत हो जाते हैं।

सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटो न लगाने के फैसले का सबसे पहले उल्लंघन किया है उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने। वैसे भी ये आम फहम सुर्खियों में है कि उत्तर प्रदेश सरकार लगातार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को चुनौती दे रही है। पिछले दिनो अखबारों ने अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के लिए यूपी क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए), लखनऊ क्रिकेट एसोसिएशन और इकाना स्पोर्टज सिटी के एमओयू संबंधी विज्ञापन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित कई मंत्रियों की भी फोटो छाप दी- ‘उम्मीदों का प्रदेश, उत्तर प्रदेश, खेलों के विकास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के उल्लेखनीय प्रयास’। वैसे विज्ञापन इकाना स्पोर्टज सिटी द्वारा दिया गया है लेकिन लखनऊ विकास प्राधिकरण और यूपीसीए का भी उसमें नाम है, जो ये इंगित करता है कि विज्ञापन गैरसरकारी नहीं है। 

इस पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना था कि अब सुप्रीम कोर्ट यह भी बता दे कि नेताओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिए और क्या-क्या करना चाहिए. उसे नेताओं का ड्रेस कोड भी तय कर देना चाहिए। गौरतलब होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौके-दर-मौके न्यायपालिका को आत्मालोचन का पाठ पढ़ाते रहते हैं। इस प्रकरण पर उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक आशुतोष निरंजन और प्रदेश के स्पोर्ट्ज डायरेक्टर आरपी सिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों की फोटो सहित विज्ञापन सरकार ने नहीं, निजी कंपनी ने दिए हैं। सरकार के विज्ञापन में फोटो का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यूपीसीए के मुख्य सचिव ललित खन्ना का कहना था कि यूपीसीए ने ये विज्ञापन नहीं दिया है। किसने दिया है, उन्हें पता नहीं। 

यह सिर्फ विज्ञापन छापने का मामला नहीं। यह उस आंतरिक टकराव की एक बानगी भर है, जो ये स्पष्ट करती है कि मीडिया और सरकार दोनो, देश की कानून व्यवस्था बनाए रखने के प्रति कत्तई गंभीर नहीं हैं। यह खिंचाव लंबे समय से है। याद होगा, वर्ष 2011 में तत्कालीन केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा था कि सरकार न्यायपालिका तथा मीडिया को लोकपाल विधेयक के दायरे से बाहर रखना चाहती है। उस टिप्पणी में भी उसी न्याय-व्यवस्था विरोधी जुगलबंदी का संदेश निहित था। वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता अपनी एक टिप्पणी में बताते हैं कि न्यायपालिका और मीडिया चादर से बाहर पैर पसारने के आदी हो गए हैं। कार्यपालिका की खाली जगह कब्जाने की तीनो में होड़-सी रहती है। देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रधानमंत्री की सराहना, सरकार द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति में हस्तक्षेप करना, ग्रीनपीस संस्था की वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रिया पिल्लै को लंदन यात्रा पर जाने से इमिग्रेशन में ही रोक लेना, फिल्मकार पंकज बुटालिया के कश्मीर पर बने वृत्तचित्र को प्रतिबंधित किया जाना, फिल्म स्टार सलमान खान की जमानत, तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमत्री जयललिता की आय से अधिक संपत्ति मामले में रिहाई, सिक्ख विरोधी दंगों के मामले में जगदीश टाइटलर व सज्जन कुमार को सजा न मिल पाना आदि इसी तरह के दोमुंहे मामले हैं। ऐसे भी ये भी गौरतलब होगा कि न्यायपालिका पर कार्यपालिका की सर्वोच्चता को बहाल करने वाला ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन दोनों सदनों में 24 घंटे के भीतर पास हो गया था।

मीडिया की जनहित की सूचनाओं में कम, प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी में ज्यादा रुचि रहती है। पार्टियों का हाल ये है कि उनके संगठन आए दिन ऐसी कारगुजारियां कर रहे हैं, जिससे कानून व्यवस्था के हालात बिगड़ें। ये भी अनायास नहीं, बल्कि सरकारों, पार्टियों, उनके संगठनों और मीडिया के स्वतःस्फूर्त तालमेल से हो रहा है। जो संगठन इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें सरकार और मीडिया दोनो देशद्रोही तक करार देने से नहीं चूकते हैं लेकिन खुद सत्ताधारियों और मीडिया को अब न्याय पालिका के जनहितकारी फैसले कुछ ज्यादा ही चुभने लगे हैं। यह उसी तरह का एक गंभीर संकेत है, जैसे बोफेर्स प्रकरण सामने आने पर दफ्तरों के बाबू बेशर्मी से कहने लगे थे कि देश का प्रधानमंत्री ऐसा कर सकता है तो वे घूस क्यों नहीं ले सकते हैं। 

जयप्रकाश त्रिपाठी 

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Comments on “सुप्रीम कोर्ट के फैसले दो, सवाल एक मीडिया बड़ा या न्याय पालिका !

  • KASHINATH MATALE says:

    11-11-11 KE JUDGMENT ME HONB’LE SUPREME COURT NE SAF KAR DIYA HAI KI, ALL THE WRIT PETTITIONS WERE DISMISSED.

    ISKA MATLAB SAF HAI MAJITHIA WAGE BOARD KI RECOMMENDATIONS PURI TARAH SE PROPERLY IMPLEMENTATION KARNA.
    FITMENT BASIC + DA + IR (AT ON 1ST JULY 2010)
    AFTER THAT NEW BASIC WILL BE ARRIVED.
    AND THEN
    NEW BASIC
    DA (BASE AT THE 167 POINTS)
    VARIABLE ALLOWANCE
    ADD IN BASIC FOR ALL ALLOWANCES.ETC
    IT IS A PROPER WAY.
    COURT KA FAISALA EK, DO, TEEN, CHAR BAR AAYEGA.

    GOVERNMENT KE MORAL RESPONSIBIALITY HAI KI PROPER DHANGSE WAGAE BAORD IMPLEMENT KARE.
    THANKS
    KASHINATH MATALE kgmmatale@gmail.com

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