सुप्रीम कोर्ट जजों के बौद्धिक स्तर पर जस्टिस मार्कंडेय काटजू का सवालिया निशान!

I think the time has come to tell Indians about the intellectual level and background of most Indian Supreme Court judges.
 While some of them have high intellectual level and character, like Justice Chalameshwar and Justice Nariman, the vast majority of the present Supreme Court Judges are people of very low intellectual level.
 
I can say this because I myself was a Supreme Court Judge for about five and a half years, and I was constantly interacting with my colleagues ( the present Supreme Court judges were only High Court judges when I was a Supreme Court judge ). The level of their conversation was usually about cricket or the weather, never on any intellectual subject..
 
Not once did I hear any discussion by Supreme Court judges about the theories of jurisprudence, e.g. the historical jurisprudence of Savigny and Sir Henry Maine, natural law, the positivists like Bentham, Austin, Hart and Kelsen,  the sociological jurists like Jhering, Ehrlich, Durkheim, Geny, Roscoe Pound, Frank, Llewelyn , Gray, etc. Probably most Indian Supreme Court judges have not even heard of their names, nor of Justices Holmes, Brandeis, Frankfurter, Douglas or Hugo Black, or of their contributions.
 
To be a good judge one of course must know the law and important precedents. But that is not enough. One must also have some knowledge of history, philosophy, economics, political science, literature, etc. I doubt that the Supreme Court judges,( except the two I have mentioned ) have this. In fact I doubt they have even good knowledge of law.
 
The present Chief Justice of India, Justice Thakur, in the BCCI case chose to ignore binding precedents that there is broad separation of powers in the Indian Constitution, and it is for the legislature, not the judiciary, to legislate. By acting thus he displayed total lack of judicial discipline, seeking only popular adulation, and  throwing the Constitution and the law to the winds. The number 2 in seniority, Justice Anil Dave openly said that the Bhagavad Gita should be made compulsory in all schools in India, thus violating his oath to uphold the secular Constitution. Justice Gogoi, who is in line to become the Chief Justice of India on the basis of seniority, has shown that he does not know an elementary principle of law, namely that hearsay evidence is not admissible ( see paragraph 16 of his judgment in the Soumya murder case ). I can go on and on about most of the present Supreme Court judges to show how low is their intellectual level, but that is not necessary. Suffice it to say that they have reached their positions not because of merit but only by dint of seniority. Justice Deepak Mishra, in line to become CJI, was appointed a Judge in Orissa High Court at a very young age because of the influence of his relative Justice Ranganath Mishra, former CJI, who was one of the most corrupt judges in India. Justice Ramanna, who is also in line to become CJI, was appointed as  a High Court Judge in Andhra Pradesh at a very young age due to his political connections, and later became Supreme Court Judge not because of merit but purely due to seniority.
कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है!

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर ‘चौथी दुनिया’ में छपी प्रभात रंजन दीन की ये बेबाक रिपोर्ट पढ़ें

जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है. जज अपने बेटों और नाते रिश्तेदारों को जज बना रहे हैं। और सरकार को उपकृत करने के लिए सत्ता के चहेते सरकारी वकीलों को भी जज बनाने की संस्तुति कर रहे हैं. न्यायाधीश का पद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रभावशाली जजों का खानदानी आसन बनता जा रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अद्यतन सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बेटे से लेकर कई प्रमुख न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार शामिल हैं.

नेताओं को भी खूब उपकृत किया जा रहा है. वरिष्ठ कानूनविद्, उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई है.

जजों की नियुक्ति के लिए की गई संस्तुति की जो सूची सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उसमें 73 नाम जजों के रिश्तेदारों के हैं और 24 नाम नेताओं के रिश्तेदारों के हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का कार्यभार संभालने के पूर्व जो तकरीबन 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे उनमें भी अधिकांश लोग जजों के बेटे और रिश्तेदार हैं या सरकार के पैरवी-पुत्र सरकारी वकील हैं. अब जज बनने के लिए योग्यता ही हो गई है कि अभ्यर्थी जज या नेता का रिश्तेदार हो या सत्ता की नाक में घुसा हुआ सरकारी वकील. अन्य योग्य वकीलों ने तो जज बनने का सपना देखना भी बंद कर दिया है.

जब न्यायाधीश ही अपने नाते-रिश्तेदारों और सरकार के प्रतिनिधि-पुत्रों को जज नियुक्त करे तो संविधान का संरक्षण कैसे हो? यह कठोर तथ्य है जो सवाल बन कर संविधान पर चिपका हुआ है. यह पूरे देश में हो रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए विभिन्न हाईकोर्टों से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी जा रही हैं, उनमें अधिकांश लोग प्रभावशाली जजों के रिश्तेदार या सरकार के चहेते सरकारी अधिवक्ता हैं. वरिष्ठ वकीलों को जज बनाने के नाम पर न्यायपीठों में यह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी कृत्य निर्बाध गति से चल रहा है, इसके खिलाफ सार्वजनिक मंच पर बोलने वाला कोई नहीं.

सार्वजनिक मंच पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रो सकते हैं, लेकिन जजों की नियुक्तियों में जो धांधली मचा कर रखी गई है, उसके खिलाफ कोई नागरिक सार्वजनिक मंच पर रो भी नहीं सकता. इस रुदन और उस रुदन के मर्म अलग-अलग हैं. रिश्तेदारों और सरकारी वकीलों को जज बना कर आम आदमी के संवैधानिक अधिकार को कैसे संरक्षित-सुरक्षित रखा जा सकता है और ऐसे जज किसी आम आदमी को कैसा न्याय देते होंगे, लोग इसे समझ भी रहे हैं और भोग भी रहे हैं. देश की न्यायिक व्यवस्था की यही सड़ी हुई असलियत है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश कर फाइनल लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी, उनमें से अधिकांश नाम मौजूदा जजों या प्रभावशाली रिटायर्ड जजों के बेटे, भांजे, साले, भतीजे या नाते रिश्तेदारों के हैं. बाकी लोग सत्ता सामर्थ्यवान सरकारी वकील हैं. चंद्रचूड़ यह लिस्ट भेज कर खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज होकर चले गए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के समक्ष यह सवाल छोड़ गए कि क्या जजों की कुर्सियां न्याधीशों के नाते-रिश्तेदारों और सत्ता-संरक्षित सरकारी वकीलों के लिए आरक्षित हैं? क्या उन अधिवक्ताओं को जज बनने का पारंपरिक अधिकार नहीं रहा जो कर्मठता से वकालत करते हुए पूरा जीवन गुजार देते हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इलाहाबाद और लखनऊ पीठ के जिन वकीलों के नाम जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं उनमें मोहम्मद अल्ताफ मंसूर, संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, सोमेश खरे, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. ये कुछ नाम उदाहरण के तौर पर हैं. फेहरिस्त लंबी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से तकरीबन 50 वकीलों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे गए हैं, जिन्हें जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. इसमें 35 नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के और करीब 15 नाम हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हैं.

जो नाम भेजे गए हैं उनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का एक भी वकील शामिल नहीं है. ऐसे में, खबर के साथ-साथ यह भी जानते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्माण से अब तक के 65 साल में एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नहीं बना. इसी तरह वैश्य, यादव या मौर्य जाति का भी कोई वकील कम से कम लखनऊ पीठ में आज तक जज नियुक्त नहीं हुआ. बहरहाल, ताजा लिस्ट के मुताबिक जो लोग जज बनने जा रहे हैं, उनके विभिन्न जजों से रिश्ते और सरकारी पदों के सत्ताई-छत्र का तफसील भी देखते चलिए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर को जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. अल्ताफ मंसूर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को भी जज बनने योग्य पाया गया है. अब्दुल मोईन उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार का नाम भी जज बनने वालों की सूची में शामिल है. रजनीश कुमार उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे टीएस मिश्रा और केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है. उपेंद्र मिश्रा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सरकारी वकील हैं. पहले भी वे चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रह चुके हैं. उपेंद्र मिश्र की एक योग्यता यह भी है कि वे बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के भाई हैं. इसी तरह हाईकोर्ट के जज रहे एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी और जस्टिस एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा को भी जज बनने लायक पाया गया है. इनके भी नाम लिस्ट में शामिल हैं. लखनऊ बेंच से जिन लोगों के नाम जज के लिए चुने गए, उनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (2) श्रीमती संगीता चंद्रा और राजकीय निर्माण निगम व सेतु निगम के सरकारी वकील शिशिर जैन के नाम भी शामिल हैं.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे का नाम भी जज के लिए भेजा गया है. इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वनामधन्य जज रहे जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट और न्यायाधीश रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र का नाम भी जजों के लिए अग्रसारित सूची में शामिल है. अंधेरगर्दी की स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जज रहे पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता दोनों में ही जज बनने लायक योग्यता देखी गई और दोनों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेज दिए गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सिटिंग जज एपी शाही के साले बीके सिंह का नाम भी अनुशंसित सूची में शामिल है. सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिग काउंसिल सीडी सिंह का नाम भी जजों के लिए चयनित सूची में शामिल है.

यह मामला अत्यंत गंभीर इसलिए भी है कि जजों की नियुक्ति की यह लिस्ट खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने तैयार की और अपनी संस्तुति के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजी. चंद्रचूड़ अब खुद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं. उन्हें न्याय के साथ न्याय करने के लिए ही तरक्की देकर सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया होगा. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई संस्तुति ने उनकी न्यायिकता और उन्हें तरक्की देने के मापदंड की न्यायिकता दोनों को संदेह में डाला है. डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं.

वकीलों का यह सवाल वाजिब है कि क्या जजों की नियुक्ति के लिए किसी ताकतवर जज का रिश्तेदार होना या एडिशनल एडवोकेट जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल या गवर्नमेंट एडवोकेट होना अनिवार्य योग्यता है? क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है? भेजी गई लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी किसी आम नागरिक का मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट पहना और पहुंच के बूते सरकारी वकील हो गए, सरकार की नुमाइंदगी करते रहे और जज के लिए अपना नाम रिकमेंड करा लिया.

वर्ष 2000 में भी 13 जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था, जिसमें आठ नाम विभिन्न जजों के रिश्तेदारों के थे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से करीब 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी.

जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला बाद में जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने सदन को आधिकारिक तौर पर बताया था कि औपचारिक जांच पड़ताल के बाद लिस्ट खारिज कर दी गई. उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को जज बनाने के लिए संस्तुति सूची में शामिल कर लिया गया है.

इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही केंद्रीय कानून मंत्रालय ने देशभर से आई ऐसी सिफारिशों की जांच कराई थी और जांच में धांधली की आधिकारिक पुष्टि होने पर जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं.

अशोक पांडेय ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की और फिर हाईकोर्ट ने उस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई. अदालत ने एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश देते हुए कहा कि इसके बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी. पांडेय चिंता जताते हैं कि संविधान और कानून से जुड़े इतने संवेदनशील मामले को 25 हजार रुपये के लिए अदालत ने लंबित रख दिया है. धांधली की यह सूची प्रधानमंत्री और कानून मंत्री को भेजने के बारे में अशोक पांडेय विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा भेजी गई सूची पर ही तत्कालीन कानून मंत्रालय ने वर्ष 2000 में कार्रवाई की थी.

न्याय व्यवस्था को सत्ता-प्रभाव में लाने का चल रहा षडयंत्र

सरकारी वकीलों को जज बना कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को शासनोन्मुखी करने का षडयंत्र चल रहा है. सीधे तौर पर नागरिकों से जुड़े वकीलों को जज बनाने की परंपरा बड़े ही शातिराना तरीके से नष्ट की जा रही है. कुछ ही अर्सा पहले अधिवक्ता कोटे से जो 10 वकील जज बनाए गए थे, उनमें से भी सात लोग राजीव शर्मा, एसएस चौहान, एसएन शुक्ला, शबीहुल हसनैन, अश्वनी कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार अरोड़ा और देवेंद्र कुमार उपाध्याय उत्तर प्रदेश सरकार के वकील (स्टेट लॉ अफसर) थे. इनके अलावा रितुराज अवस्थी और अनिल कुमार केंद्र सरकार के लॉ अफसर थे.

वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देने में भी भीषण अनियमितता हो रही है. नागरिकों के मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को लंबा अनुभव हो जाने के बावजूद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता नहीं दी जाती, जबकि सरकारी वकीलों को बड़ी आसानी से वरिष्ठ वकील की मान्यता मिल जाती है. कुछ ही अर्सा पहले लखनऊ बेंच के चार वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी गई, जिनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल आईपी सिंह, एडिशनल एडवोकेट जनरल बुलबुल घोल्डियाल, केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल असित कुमार चतुर्वेदी और सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के वकील शशि प्रताप सिंह शामिल हैं. लखनऊ में अनुभवी और विद्वान वकीलों की अच्छी खासी तादाद के बावजूद हाईकोर्ट को उनमें कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनने लायक नहीं दिखता. ऐसे रवैये के कारण वकीलों में आम लोगों के मुकदमे छोड़ कर सरकारी वकील बनने की होड़ लगी हुई है. सब इसके जुगाड़ में लगे हैं और इससे न्याय की मूलभूत अवधारणा बुरी तरह खंडित हो रही है.

जजी भी अपनी, धंधा भी अपना…

जजों के रिश्तेदार जज बन रहे हैं और जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा भी चमका रहे हैं. न्याय परिसर में दोनों तरफ से जजों के रिश्तेदारों का ही आधिपत्य कायम होता जा रहा है. जजों के बेटे और रिश्तेदारों की आलीशान वकालत का धंधा जजों की नियुक्ति वाली लिस्ट की तरह कोई चोरी-छिपी बात नहीं रही. यह बिल्कुल सार्वजनिक मामला है. आम लोग भी जजों के रिश्तेदार वकीलों के पास ही जाते हैं, जिन्हें फीस देने से न्याय मिलने की गारंटी हो जाती है.

जजों के रिश्तेदारों की उन्हीं के कोर्ट में वकालत करने की खबरें कई बार सुर्खियां बन चुकी हैं. हाईकोर्ट की दोनों पीठों के दर्जनों नामी-गिरामी जजों के बेटे और रिश्तेदार वहीं पर अपनी वकालत का धंधा चमकाते रहे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन के भाई अब्दुल मोईन, जस्टिस अभिनव उपाध्याय के बेटे रीतेश उपाध्याय, जस्टिस अनिल कुमार के पिता आरपी श्रीवास्तव, भाई अखिल श्रीवास्तव और बेटे अंकित श्रीवास्तव, जस्टिस बालकृष्ण नारायण के पिता ध्रुव नारायण और बेटा ए. नारायण, जस्टिस देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विशेष सिंह, जस्टिस देवी प्रसाद सिंह के बेटे रवि सिंह, जस्टिस दिलीप गुप्ता की साली सुनीता अग्रवाल, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा के भाई रिशाद मुर्तजा और नदीम, जस्टिस कृष्ण मुरारी के साले उदय करण सक्सेना और चाचा जीएन वर्मा, जस्टिस प्रकाश कृष्ण के बेटे आशीष अग्रवाल, जस्टिस प्रकाशचंद्र वर्मा के बेटे ज्योतिर्जय वर्मा, जस्टिस राजमणि चौहान के बेटे सौरभ चौहान, जस्टिस राकेश शर्मा के बेटे शिवम शर्मा, जस्टिस रवींद्र सिंह के भाई अखिलेश सिंह, जस्टिस संजय मिश्र के भाई अखिलेश मिश्र, जस्टिस सत्यपूत मेहरोत्रा के बेटे निषांत मेहरोत्रा और भाई अनिल मेहरोत्रा, जस्टिस शशिकांत गुप्ता के बेटे रोहन गुप्ता, जस्टिस शिवकुमार सिंह के बेटे महेश नारायण और भाई बीके सिंह, जस्टिस श्रीकांत त्रिपाठी के बेटे प्रवीण त्रिपाठी, जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान के बेटे राजीव चौहान, जस्टिस सुनील अम्बवानी की बिटिया मनीषा, जस्टिस सुरेंद्र सिंह के बेटे उमंग सिंह, जस्टिस वेद पाल के बेटे विवेक और अजय, जस्टिस विमलेश कुमार शुक्ला के भाई कमलेश शुक्ला, जस्टिस विनीत शरण के पिता एबी शरण और बेटे कार्तिक शरण, जस्टिस राकेश तिवारी के साले विनीत मिश्रा, जस्टिस वीरेंद्र कुमार दीक्षित के बेटे मनु दीक्षित, जस्टिस यतींद्र सिंह के पिता विकास चौधरी, भतीजा कुणाल और बहू मंजरी सिंह, जस्टिस सभाजीत यादव के बेटे पीपी यादव, जस्टिस अशोक कुमार रूपनवाल की बिटिया तनु, जस्टिस अमर शरण के भतीजे सिकंदर कोचर, जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही के ससुर आरएन सिंह और साले गोविंद शरण, जस्टिस अशोक भूषण के भाई अनिल और बेटे आदर्श व जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल के भाई भरत अग्रवाल अपनी वकालत का धंधा अपने रिश्तेदार जजों के बूते ही चमकते रहे हैं.

लेखक प्रभात रंजन दीन वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हैं. उनका यह लिखा चौथी दुनिया से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

SUPREME COURT DISMISSES SLP OF LOKMAT GROUP OF NEWSPAPERS

Inspiring story of non journalist employee who succeeds finally after a long battle of 17 years… Gets benefit of regularization and permanency as Teleprinter Operator, Planner with retrospective effect… Held entitled to all the benefits of Palekar, Bachawat Awards…

Mahesh Sakure, with M.Com. degree, has been working with Lokmat Group of Newspapers at Bhandara, near Nagpur, since 1.10.1996. Initially he joined as Teleprinter Operator but was later  doing the work of Planner. He was being paid monthly salary of Rs 1500/- which was raised to Rs 2000/-p.m. Mahesh filed Complaint before Industrial Court, Bhandara on claiming the benefit of regularization and permanencey as Teleprinter Operator and later as Planner and payment of wages and grant of all other allied benefits as per Palekar and Bachawat Awards from the date he had completed 240 days continuous service.   The management, inter alia, took the stand that he was not employee of the newspaper establishment but that of a charitable organization known as “Manav Sewa Trust”.

After recording evidence of both sides and hearing them, the Industrial Court, Bhandara, granted to Mahesh Sakure the benefit of regularization and permanency as Teleprinter Operator w.e.f. 315.1997 and regularization and permanency as Planner w.e.f. 1.4.1998 and also granted overtime wages at double the rate for the excess 12 hours a week he had put in as Planner, which post falls in the catregory of “Journalist” and as per Section 6 of the Working Journalists Act, requires him to work only for 36 hours a week as against which he was being asked to work for 48 hours a week.  The Court also rejected the contention of the management that he was the employees of “Manav Sewa Trust”and not of “Lokmat”.

The management challenged the said order of the Industrial in Bombay High Court, Bench at Nagpur, and sought stay of the said order.  The Learned Single Judge granted stay of the order on the condition that the management shall pay to the workman a sum of Rs 10 Lakhs and a monthly salary of Rs Ten Thousand as interim relief, pending final decision of the case.

This order of the Learned Single Judge was challenged by the management before the Division Bench of the High Court by filing a Letters Patent Appeal which was dismissed by the Division Bench.  The management preferred a Special Leave Petition in the Supreme Court which was disposed of by the Supreme Court with a slight modification of the order to the effect that out of the amount of Rs 10 Lakhs granted to the workman as interim relief only Rs Five Lakhs shall be paid to him and the remaining amount of Rs Five Lakhs shall be kept in deposit by the High Court  till the disposal of the Writ Petition by the Learned Single and the same will be disposed as per the orders of the Learned Single Judge to be passed on the merits of the case.   The other interim order that during the pendency of the Writ Petition the employer shall pay salary of Rs 10,000/- was however confirmed by the Supreme Court.

The Supreme Court also directed the Learned Single Judge to dispose of the Writ Petition filed by the management within a period of three months. Upon this direction of the Supreme Court, the Learned Single Judge heard the matter of merits and finally dismissed the Writ Petition of the management with a direction that the workman should be paid the remaining balance of Rs Five Lakhs with interest and also imposed the cost of Rs 10,000/- on the management.

This judgment and order of the Learned Single Judge was again challenged by the management in the Supreme Court which was dismissed by the Supreme Court in limini on 12.10.2015. Meanwhile, the employee Shri Sakure has been fixed on a monthly salary of about Rs 35,000/- p.m., which he has been receiving under protest as details thereof have not been provided by the management.

The aforesaid claim of the workman is now calculated to be in the region of about Rs Forty Nine Lakhs for payment of which he has already represented to the management failing which another round of litigation for the same is round the corner. That since the management has not acceded to his request a claim for the sum of Rs 49,37,720.13 has already been filed before the Labour Court at Bhandara.

UNION FREED FROM THE CLUCTCHES OF LOKMAT MANAGEMENT – BATTLES ROYAL GO ON !

The background :

As stated elsewhere in this newsletter, the Lokmat Shramik Sanghatana, Nagpur, which is functioning since 1996, which is an affiliate of AINEF and a composite union of journalists and non journalist employees, has been fighting for reclassification of Lokmat Newspapers on the basis of their gross revenue in respect of Palekar Award, Bachawat Award, Manisana Award and now Majithia Award.

That the Lokmat Shramik Sanghatana, Nagpur, has also been fighting a Reference before the Industrial Tribunal, Nagpur, in regard to regularization and permanency of 78 journalist and non journalist employees who are being engaged on contract basis for several years now. That besides these two major demands, the union has also succeeded in many other individual disputes details of which are being given separately.

The Victimisation :

Feeling aggrieved and angered with the aforesaid efforts of the union to cover a major ground remaining untouched by any union in the country and also the efforts of the union at its expansion throughout Maharashtra/India by opening a Branch of the Union at Akola and Goa, the management  dismissed on 12.11.2013   President of Goa Branch Shri Rajesh Inmulwar, who was working on contract basis,  for his refusal to resign from the union.

That from 13th November 2013 employees started “Non cooperation movement” as a result of which, it is alleged by the management, that newspapers’ printing was badly affected putting it to huge financial loss.

On 20.11.2013, 61 employees, including eight journalists,  from various centres in the State, bulk of them 25 in number from Nagpur, all principal office bearers, were dismissed without enquiry and as the References are pending management sought approval of its action in respect of the dismissal of these 61 employees before the Industrial Tribunal.  The management examined 120 witnesses and union examined 24 witnesses.  Management’s arguments are over and on 20.4.2016 Union has also concluded its arguments.  The decision of the Tribunal is expected in June 2016.     

Capturing of the union by Lokmat management :    

Immediately on 20.11.2013 itself, before actual dismissal of office bearers of the Union, the management and its lackeys, Lokmat in its office premises and during office hours itself “elected” new office bearers of the union and the first thing done by them was to send a registered ack due letter to Shri S.D. Thakur, Advocate, informing that he was no longer Legal Advisor of the Union and, therefore, he should not appear on behalf of the union in any case.

Letters of intimation were also sent to the Additional Commissioner of Labour, Registrar of Trade Unions and the management of Lokmat.

The Great betrayal :

Thereafter, the most important work these lackeys of the management (Editor of City Edition and one Executive in Printing Depatment posing as President and General Secretary) did was to sign an unconditional  “settlement” with the management (i) withdrawing References seeking claissification of newspaper establishment on the basis of its gross revenue in respect of Palekar, Bachawat, Manisana and now Majithia and (ii) withdrawing Reference seeking regularization and permanency of 78 journalists and non journalist employees who are working on contract basis without any condition or benefit to the employees concerned.

When the real office bearers of the Union initiated legal proceedings against these bogus office bearers, several objections were raised to prolong the matter and on initial points the matter was taken to the High Court also.  The High Court rejected the Writ Petition of these lackeys of the management.  That after hearing the parties, the Industrial Court by its order dated 29.3.2016 held that the earlier office bearers (the real office bearers) are the true office bearers of the Union and the management’s lackeys  posing as President and General and Working Committee members are not the office bearers and working committee members of the Union as alleged by them.

The employees are agog with joy and sense of pride for the glorious victory and celebrated the same on 1st May boisterously.

13 Pasters get the designation and Grade of Scanners in Lokmat

The 13 Pasters who have been performing the duties of Scanners for a long time were not being given the designation and grade of Scanner and hence they had filed complaints before the Industrial Court under the provisions of Maharashtra Recognition of trade Unions & Prevention of Unfair Labour Practices Act, 1971.  The Industrial Court, Nagpur allowed these complaints and granted them designation and grade of Scanners with retrospective effect viz., 13.12.2004.

The Industrial Court also held that the category of Scanner being a journalist category the employees were required to work for only 36 hours a week as per Section 6 of WJ Act whereas in fact they were being asked to work for 48 hours a week.  Therefore, all these employees should be given overtime wages at double the rate for all the years they have been working as Scanners for extra 12 hours a week they have worked.

The employees have filed recovery proceedings against the management of Lokmat for recovery of amounts ranging between Rupees 17 Lakhs and Rupees 38 Lakhs per employee.

With May Day Greetings,

SD Thakur, Adv
President, AINEF

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तीन करोड़ रुपये घूस लेने से इनकार करने वाले अधिकारी मोइन खान को सलाम

(स्व. मोइन खान)

नई दिल्ली की म्युनिसिपल कौंसिल के कानून अधिकारी मोइन खान की हत्या हो गई। कई अफसरों की हत्या की खबरें छपती रहती हैं। लेकिन इस खबर ने मुझे झकझोर दिया। इस अफसर की हत्या इसलिए करवाई गई कि इसने रिश्वत में 3 करोड़ रु. लेने से मना कर दिया था। मोइन खान को यह रिश्वत इसलिए दी जा रही थी कि वे दिल्ली के एक होटलवाले पर ‘कृपा’ नहीं कर रहे थे। कनाट प्लेस स्थित इस होटल के मालिक से म्युनिसिपाल्टी 150 करोड़ का शुल्क वसूल करना चाहती थी।

ऐसा वह अदालत के आदेश पर कर रही थी। होटल मालिक का कहना था कि मोइन खान तीन करोड़ रु. की घूस ले ले और डेढ़ सौ करोड़ के शुल्क को आया-गया कर दे। इस होटल के मालिक को 1981 में यह कीमती ज़मीन एक छात्रावास बनाने के लिए दी गई थी लेकिन पहले उसको एक टूरिस्ट लॉज बनाया गया और बाद में उसे चार-सितारा होटल में बदल दिया गया। 1995 में उसकी लीज़ रद्द हो गई लेकिन होटलवाले ने जमीन खाली नहीं की। अब अदालत ने उस पर पांच लाख जुर्माना किया और 142 करोड़ रु. का शुल्क भरने के आदेश दिए। इसी की वसूली के लिए कानून-अफसर को नियुक्त किया गया था।

मोइन खान जामिया नगर में रहते थे। उन्होंने राजनीतिशास्त्र में एम.ए. किया था और एलएलबी पास थे। वे अपनी कार से घर जा रहे थे। दो लोगों ने उनकी कार रोककर रास्ता पूछा। उन्होंने जैसे ही शीशा नीचे किया उन्हें गोली मार दी गई। दिल्ली की मुस्तैद पुलिस ने मोबाइल फोन और सीसीटीवी की मदद से हत्यारों को पकड़ लिया तो मालूम पड़ा कि उस होटल-मालिक ने इन हत्यारों को पांच लाख रु. दिए थे, मोइन को मारने के लिए! अखबारों में छपे ये तथ्य सही ही होंगे।

(सीसीटीवी फुटेज में कैद हुए हत्यारे)

जाहिर है कि हत्यारों को तो सजा मिलेगी ही लेकिन होटल मालिक तो छूट जाएगा। पैसे खाकर बड़े से बड़ा वकील उसे बचाने के लिए अदालत में खड़ा हो जाएगा और जजों का भी क्या भरोसा? लेकिन स्वर्गीय मोइन खान के लिए दिल्ली शहर और देश क्या कर रहा है? उनकी पत्नी और तीनों बेटियां अब किसके सहारे रहेंगी? हमारे नौटंकीबाज नेताओं के सिर पर जूं भी नहीं रेंगी? ऐसे ईमानदार और सेवाभावी अफसर भारत मां के सच्चे सपूत हैं। मोइन खान की बहादुरी देश के सारे अफसरों, वकीलों और जजों के लिए अनुकरणीय है। स्वर्गीय भाई मोइन खान को मेरा सलाम!

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दिल्ली हाईकोर्ट में जज गीता मित्तल की सीजेआई से शिकायत- ‘लेटलतीफ हैं और काम में रुचि नहीं लेती’

 

(खबर पढ़ने के लिए उपरोक्त न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें)

नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर से पीड़ित वादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के जज की शिकायत की है। इसमें कहा गया है कि जस्टिस गीता मित्तल मामलों की सुनवाई बहुत धीमी गति से कर रही हैं जिसकी वजह से उनके केस की सुनवाई में देरी हो रही है। पीड़ित वादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति गीता मित्तल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अप्रैल माह में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को एक पत्र पहुंचाया गया था जिसमें यह कहा गया था कि सैकड़ों लोगों के केस का न्यायमूर्ति गीता मित्तल की लेटलतीफी और उनके काम में रुचि न लेने की वजह से निस्तारण नहीं हो रहा है।

वादी राम प्रसाद ने आरोप लगाया है कि न्यायमूर्ति गीता मित्तल कोर्ट के काम में रूचि नहीं लेती हैं। वह कोर्ट को उतना समय भी नहीं देतीं, जितना देना चाहिए। कोर्ट में एक घंटे के लिए आती हैं और उसमें भी वह मामलों की सुनवाई न कर वकीलों और वादियों को सामाजिक व्याख्यान देने में गवां देती हैं। जब से वह जज बनी हैं उनके द्वारा निस्तारित मुकदमों की संख्या दिल्ली हाई कोर्ट के सभी जजों की अपेक्षा सबसे कम है। राम प्रसाद के अनुसार गीता मित्तल की काम में रूचि ने लेने की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश से दखल देने की गुजारिश की है।

मुख्य न्यायाधीश से मांग की गई है कि श्री ठाकुर, न्यायमूर्ति गीता मित्तल के लिए सुनिश्चित करें कि वह कोर्ट में कम से कम पांच घंटे बैठें और मुकदमों के निस्तारण में रूचि लें। पत्र में यह भी लिखा गया है कि जनवरी माह में न्यायमूर्ति गीता की अध्यक्षता में उनकी बेंच ने मात्र 9 मामलों का निस्तारण किया है, जिसमें दो मामले डिसमिस हो गए थे। दो साधारण मामले थे जिनकी सुनवाई की गई। न्यायमूर्ति गीता द्वारा जिन चार मामलों की सुनवाई की गई उनमें एक 10 पेज का, दूसरा 4 पेज का, तीसरा 11 पेज का और चौथा 33 पेज का था। जिन दो मामलों को आदेश देकर निस्तारित किए गए वह दो तीन पेज में ही सिमटे हैं।

कुल मिलाकर पूरे महीने में उन्होंने 63 पेज लिखवाया है। पत्र में यह भी लिखा गया है कि फरवरी माह में मात्र 7 मामलों की निस्तारण हुआ। न्यायमूर्ति गीता द्वारा दिए गए 5 जजमेंट और एक आर्डर का ब्योरा 48 पेज में है। पत्र में जो भी ब्योरा दिया गया है वह दिल्ली हाईकोर्ट की वेबसाइट पर है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं, वे नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें

केरल में निर्भया जैसी दरिंदगी से उबाल, घटनास्थल से लौटी महिलाओं की टीम ने किया की खुलासा

-संदीप ठाकुर-

नई दिल्ली। दुराचार और जघन्य हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली यह
वारदात दिल्ली के निर्भया कांड से भी कहीं ज्यादा वीभत्स और दिल दहला
देने वाली है। यह केवल एक गरीब मेहनती और महत्वाकांक्षी दलित लड़की की
कहानी नहीं है बल्कि समाज के दबे कुचले उन हजारों-लाखों लड़कियों के
अरमानों की भी दास्तान है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद न सिर्फ कुछ कर
गुजरने की चाह रखतीं हैं, परंतु चाहतों के असली जामा पहनाने का हौसला
लेकर दिन रात मेहनत करतीं हैं। लेकिन समाज के दबंगों को उनकी यह तरक्की
हजम नहीं होती।

तारीख 28 अप्रैल, 2016
समय: दोपहर 1.30 से 5 बजे के बीच
जगह: केरल के एर्नाकुलम जिले के पेरुमबावूर तालुक्का का गांव रायमंगलम्

सरकारी लॉ कॉलेज की छात्रा माशा (परिवर्तित नाम) अपने एक कमरे के घर में
अकेली थी। अचानक हथियारों से लैस कुछ अज्ञात लोग घर में घुस आए और
दलित वर्ग से संबंध रखने वाली 30 साल की माशा को दबोच लिया। उसके साथ
बलात्कार किया। दुराचारियों ने उसके जननांग में धारदार हथियार डाल कर
घुमाया जिससे उसका गर्भाशय और आंतें कट गईं। उसके शरीर पर धारदार हथियार
से 30 गहरे वार किए गए। इनमें से एक वार तो 13 सेंटीमीटर गहरा था। उसके
सिर पर किसी ठोस वस्तु से प्रहार भी किया गया था। इतना ही नहीं, खून में
सनी लाश का कपड़े से गला भी घोंटा गया था। यह खुलासा युवती के
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ है।

गरीब, दलित और वंचित परिवार की युवती से साथ हुई इस वारदात ने इलाके में
थोड़ी सी हलचल तो मचाई लेकिन पुलिस की कथित लापरवाहीपूर्ण भूमिका के
कारण मामला दब सा गया है। लेकिन इस मामले की गंभीरता के चर्चे जब दिल्ली
के राजनीतिक गलियारों तक पहुंचे तो यहां से मामले की सच्चाई जानने के
लिए नेताओं, समाजसेविका-सेविकाओं के दलों का जाना शुरू हुआ। इन्हीं में
महिलाओं का एक दल भी जांच के लिए गया था जिसका नाम है जिया (ग्रूप ऑफ
इंटेलेकचुअल एंड एकेडीमिशियन)। जीया की चेयरपर्सन मोनिका अरोड़ा, सदस्य
ललिता निझावन, सर्जना शर्मा और डॉ प्रेरणा मल्होत्रा ने घटनास्थल से
लौट कर मामले की जानकारी देते हुए इस वीभत्स हत्याकांड की जांच सीबीआई
को सौंपे जाने की मांग को लेकर गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने की
बात कही। उन्होंने बताया कि मीशा का एक कमरे का मकान नहर के किनारे है
जिसमें न तो शौचालय है और न ही बाथरुम। खाते पीते लोगों के बीच मीशा
अपनी परित्याक्ता मां राजेश्वरी के साथ रहती थी। राजेश्वरी दाई का काम
करती है। उसने मीशा को उंची शिक्षा दिलाई। मीशा ने कोट्टायम
विश्वविद्यालय से एम.ए किया था और सरकारी कॉलेज से लॉ कर रही थी। मीशा
की छोटी बहन 16 साल की उम्र में ही अपने प्रेमी से साथ भाग गई थी।

जांच दल के सदस्यों को आसपास के लोगों ने बताया कि जीवन की लड़ाई
अकेले लड़ते लड़ते राजेश्वरी कुछ तल्ख स्वभाव की हो गई थी। इसलिए उसके
जुबान की मिठास कहीं गुम हो गई थी। अक्सर वह छोटी छोटी बातों पर भी
लड़ झगड़ जाती थी। इतनी बड़ी घटना हो गई और किसी ने कुछ सुना ही नहीं?
सवाल के जवाब में स्थानीय लोगों ने बताया कि घटना वाले दिन दोपहर में
मीशा के घर से चीख चिल्लाहट की आवाजें आ तो रही थी लेकिन किसी ने उस पर
ध्यान नहीं दिया। इसका जवाब राजेश्वरी व दीपा ने दिया। उन्होंने बताया
कि हमलोग दलित हैं और हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं। वे
नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें। कई बार हमें धमकी भी मिल चुकी
है, इलाके से कहीं और जा कर रहने की। दीपा ने बताया कि करीब तीन माह
पूर्व मोटर सायकिल सवारों ने मेरी मां को टक्कर मारी थी जिसमें उसे
बहुत चोट आई थी। घटना की सूचना पुलिस को भी दी थी लेकिन कोई एक्शन
नहीं हुआ था। यह घटना केरल में चुनावी मुद्दा भी बना है। जिस इलाके में
मीशा रहती है, वहां विगत 25 बरस से लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का कब्जा है।
पंचायत स्तर से लेकर सांसद तक, सभी कम्युनिस्ट हैं। ये पार्टी अभी
विपक्ष में है। दल की सदस्या प्रेरणा के मुताबिक मृतका की छोटी बहन दीपा के
कहती है कि इस घटना में उसके पड़ोस में रहने वाला कार पेंटर व आटो चालक
शामिल हो सकते हैं। पुलिस मामले की जांच गंभीरता से करे तो अभियुक्त
पकड़े जा सकते हैं। लेकिन इनदिनों केरल में चुनावी मौसम है। पुलिस
प्रशासन उसी में व्यस्त हैं। नई सरकार बनने के बाद कुछ हो तो हो।
मोनिका अरोड़ा ने कहा कि हम इस मामले को छोड़ेंगे नहीं। यह कोई आम
आपराधिक वारदात नहीं है। यह पूरे स्त्री समाज की असिमता और सम्मान से
जीने के हक का प्रश्न है। स्थानीय पुलिस मामले की जांच कर रही है लेकिन
उससे कोई भी संतुष्ट नहीं है। इंतजार है पूरे परिदृश्य में सीबीआई के
आने का। देखना है कि जीया मामले को सीबीआई तक पहुंचाने में सरकार पर
दबाव बनाने में सफल होती है या नहीं।

पत्रकार संदीप ठाकुर की रिपोर्ट. संपर्क: sandyy.thakur32@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जिला जज ने हाई कोर्ट से मांगी जून की छुट्टियों में न्यायिक कार्य करने की अनुमति

भारत के मुख्य न्यायाधीश की भावुक अपील पर लिया ऐतिहासिक फैसला

भारत वर्ष में यह अपनी तरह का पहला मामला है जिसमें भदोही जिले के जनपद न्यायाधीश कमल किशोर शर्मा ने उच्च न्यायलय इलाहाबाद से जून की छुट्टियों में भी सिविल कोर्ट्स को खोलने और  काम करने की अनुमति मांगी है जिससे न्यायलय में लंबित पड़े मुकदमों को निपटाया जा सके। इस आशय का एक पत्र लिख कर लोक हित में न्यायिक कार्य करने की अनुमति इलाहाबाद हाई कोर्ट से मांगी है। रजिस्ट्रार जनरल इलाहाबाद हाई कोर्ट को पत्र लिखकर उन्होंने जून की पूरी छुटियों में न्यायिक कार्य करने की अनुमति मांगी है।

उल्लेखनीय है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भावुक होकर और लगभग रोते हुए न्यायालयों में लंबित केसों को निपटाने को जजों की नियुक्त करने  की अपील की थी। इसी से प्रभावित होकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों ने जून की आधी छुट्टियों में काम करने की घोषणा की थी। मुख्य न्यायाधीश की इसी मार्मिक अपील से प्रभावित होकर भदोही के जिला जज कमल किशोर शर्मा ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए ऐतिहासिक फैसला लिया है। इसके लिए उन्होंने खुद आदेश भी किया है परन्तु इसके लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट की अनुमति आवश्यक है। जिला जज ने बार एसोसिएशन ऑफ़ भदोही और भदोही के अन्य न्यायाधीशों से भी उनके इस काम में सहयोग करने की अपील की है।

भदोही के जनपद न्यायाधीश कमल किशोर शर्मा ने एटा जिले के जनपद न्यायाधीश पद से भदोही स्थानांतरित होकर पहले ही दिन आज 3 मई 2016 को ऐसा एतिहासिक निर्णय देकर भारतीय न्यायपालिका को भी गौरवान्वित किया है। भारत में न्यायालयों में करोड़ों केसों के लंबित होने के कारण केसों की पेंडेंसी बढ़ती ही जा रही है और ऐसे में केसों का निस्तारण कई कई दशकों तक नहीं हो पा रहा है। ऐसे में पीड़ित को न्याय पाने में दशकों लग जाते हैं और कभी कभी तो पीड़ित की जिंदगी में निर्णय न हो पाने से जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड की कहावत लागू हो जाती है। ऐसे में पूरे भारत में फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट्स संचालित कर के और स्पीडी जस्टिस अभियान चलाकर त्वरित न्याय दिलाने की मुहिम चल रही है।

राकेश भदौरिया
पत्रकार
एटा / कासगंज
मो. ९४५६०३७३४६

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नेशनल दुनिया ने नहीं किया बकाया वेतन का भुगतान

पीड़ित कर्मचारी करेंगे शैलेन्द्र भदौरिया और कुमार समीर के घर का घेराव, एनसीआर ब्यूरो के अलावा दूसरे विभागों के कर्मचारी भी आन्दोलन में करेंगे शिरकत, मकान मालिक भी बकाया किराये को लेकर घेराव के मूड में, पीएफ आयुक्त और आयकर विभाग में भी शिकायत

नोएडा : नेशनल दुनिया के प्रबंधकों ने 15 अप्रैल तक एनसीआर के तीनों ब्यूरो फरीदाबाद, गाजियाबाद व गुड़गांव के सभी निकाले गये स्टाफ व स्टिंगर्स के बकाया वेतन के भुगतान करने का वादा किया था। नोएडा में बैठे नेशनल दुनिया के संपादकीय प्रमुख कुमार समीर ने तीनों ब्यूरो के कर्मचारियों से 15 अप्रैल तक बकाया भुगतान आरटीजीएस द्वारा करने का भरोसा दिया था। अभी तक किसी के भी बैंक एकांउट में आरटीजीएस करने की बात तो दूर, कुमार समीर और एचआर का कोई भी अधिकारी बकायेदार कर्मचारियों का फोन तक नहीं उठा रहे हैं।

पीड़ित कर्मचारियों ने आगामी सप्ताह में नेशनल दुनिया के मालिक शैलेन्द्र भदौरिया और कुमार समीर के निवासों का घेराव करने का फैसला किया है। 31 मार्च को फरीदाबाद, गाजियाबाद और गुड़गांव ब्यूरो के सभी कर्मचारियों को एचआर विभाग ने मेल भेजकर बिना कोई कारण बताये कार्यमुक्त कर दिया था, जो गैर-कानूनी है। निकाले गये कर्मचारी वेतन का तकाजा न करें, इसलिए मालिकों के दलाल वापस काम पर लेने का लालच दे रहे हैं। कर्मचारियों के पीएफ और आयकर के रूप में काटा गया अंश अभी तक दोनों विभागों में जमा नहीं किया गया है। इस मामले की शिकायत भी दोनों विभागों से कर दी गई है। इसके अलावा एनसीआर के तीनों ब्यूरो के मकान मालिकों को नेशनल दुनिया ने साल भर से किराया नही दिया है। मकान मालिक भी बकाये किराये को लेकर पीडित कर्मचारियों के साथ मिल गये हैं। ये सभी लोग अब घेराव की तैयारी कर रहे हैं।

एक पीड़ित मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पोस्टपेड को प्रीपेड कराने जाएंगे तो एयरटेल वाले खून पी जाएंगे (सुनें टेप)

Dear Sir/Madam,

This is to inform you that I visited Airtel Store at Aditya Mall, Indirapuram, Ghaziabad today, that is, 7th April 2016 at around 7:15 PM. Following are some issues regarding the visit:

I visited your store to convert Post paid connection to prepaid. I visited same store on 30th March for same purpose. I was given a form and was told to come on 5-6 April so that bill would be generated and process will be easy to pay outstanding amount. Agreeing to same I returned and visited store today.

The visit to the store today is pathetic and embarrassing. After paying for about seven years to Airtel I heard abusive language from the representative (in hindi – “faltoo”)

However apart from these abusing words the technical issues are as follows:

1. The representative didn’t tell the process and insisted that first clear the payments and then I will tell you the process.

2. There was neither any supervisor/manager on the floor to talk nor any complaint or feedback form in the store.

3. The staff members present in the store denied to give contact details of grievance cell.

4. Last but not the least – Is it mandatory to purchase prepaid sim for same number costing INR 270/- for conversion from post paid to prepaid?

Attached here is the conversation with the representatives of Airtel Store.

Click on this audio link :

https://www.youtube.com/watch?v=0fywaLRiVCc

Regards,
Sanjeev Sharma
sharmasanjeev66@gmail.com
09650002395

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुंबई के एक पत्रकार को ‘हमारा महानगर’ अखबार के मालिक आरएन सिंह से जान का खतरा

‘हमारा महानगर’ के पत्रकार से उसके ही संस्थान की कहानी सुनिए…

अपराध एवं समाज पर पैनी नजर रखने वाले स्थायी संवाददाता का ‘भइयाजी’ अखबार द्वारा शोषण… जो ‘भइयाजी’ खुद राजनीतिक ‘वाचमैनी’ एवं सामाजिक ठेकेदारी करके ‘उत्तर भारतीय समाज हाल’ कब्जा किए एवं सामाजिक ठेकेदारी करते हुए उत्तर भारतीय समाज को ‘वाचमैन’ की दुकान में सजाकर शोषण किए, अब अखबार में नियुक्त पत्रकारों को भी ‘वाचमैन’ की तरह ‘वाचमैन’ समझने की गुस्ताखी करते हुए शोषण रहे हैं…. यदि स्वच्छ पत्रकारिता करते हुए उनकी ‘चापलूसी’ ना की जाय तो तबादले का पत्र पकड़ाकर परेशान करते हैं एवं वेतन रोक देते हैं ताकि पत्रकार परेशान होकर या तो उनके तलुए में बैठे या थकहार कर नौकरी छोड़ दे…. पढ़िए एक सशक्त पत्रकार का दर्द…


दोस्तों,

मैं नागमणि पाण्डेय वर्ष 2007 से ‘हमारा महानगर’ में बतौर रिपोर्टर के तौर पर कार्यरत हूँ.. इसी दौरान अक्तूबर 2015 में मेरा और एक सहयोगी का ट्रांसफर किया गया| हमने ट्रांसफर के समय वेतन बढ़ोत्तरी करने का निवेदन कंपनी से किया लेकिन कंपनी ने तानाशाहीपूर्वक इस निवेदन को मान्य नहीं किया पर ट्रांसफर को लेकर विरोध जताने के कारण अक्तूबर से लेकर अभी तक हमारा वेतन नहीं दिया गया। इसकी शिकायत लेबर कमिश्नर (बांद्रा) में किया गया है। मेरे साथ के सहयोगी ने भी शिकायत की है| वेतन देने के बजाय मालिक आरएन सिंह द्वारा मेरे घर पर बीआईएस के सिक्युरिटी के लोगों को भेजकर जासूसी कराने के साथ ही धमकाया जा रहा है| मेरे पास जासूसी किये जाने का बाकायदा वीडियो फुटेज मौजूद है।

सोमवार दोपहर 1 बजे के करीब बीआईएस के दो लोग मेरे घर आये| पहले अपने आप को पुलिस अधिकारी बताकर मेरे से पूछताछ की और मुझे धमकी दिया गया कि कार्यालय चलो और मामले को हल करो| लेकिन जब मुझे संदेह हुआ तब मैंने पहचान पत्र की मांग की तो बीआईएस (बाम्बे इंटेलिजेंस सिक्युरिटी) का पहचानपत्र दिखाए। तब मैंने उन दोनों को पकड़कर तुर्भे एमआईडीसी पुलिस स्टेशन ले गया| वहां जाने पर पुलिस ने उन दोनों से पूछताछ की| भविष्य में किसी भी तरह का नुकसान मेरे साथ होता है या अनहोनी होती है तो इसके लिए बीआईएस के मालिक आरएन सिंह और संबंधित लोग इसके जिम्मेदार होंगे| आप लोगों को बताना चाहता हूँ कि इससे पहले भी कई कर्मचारियों के साथ कार्यालय में बुलाकर मारपीट की गई| बीआईएस को ‘हमारा महानगर’ का ग्रुप और कंपनी बताकर गुंडागर्दी किया जाता है| भविष्य में किसी भी तरह की अनहोनी होने पर उसके लिए आर एन सिंह और उनकी कंपनियां जिम्मेदार होंगी| आप लोगों से सहयोग की उम्मीद है|

नागमणि पाण्डेय
पत्रकार, हमारा महानगर
मुंबई
मोबाइल 08655379123


पत्रकार संगठन ने की निन्दा

उपरोक्त मामले की जानकारी मिलने के बाद एवं पूर्ण जानकारी लेने के बाद ‘पत्रकार विकास संघ’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष आनंद मिश्र ने स्पष्ट किया है कि यदि स्थायी एवं स्वच्छ छवि के पत्रकारों के साथ ऐसा कृत्य कोई मीडिया समूह कर रहा है तो ‘पत्रकार विकास संघ’ तत्पर एवं सशक्त रूप से सिर्फ पत्रकारों के साथ धन-मन-तन के साथ खड़ा होगा। पत्रकारों का शोषण करने वाले मीडिया समूह को लोकतंत्र की रक्षा करते हुए सरकारी अनुदान भी बंद की जानी चाहिए। इसी के साथ विभिन्न शोषण के मामलों से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को भी शीघ्र ही अवगत कराया जाएगा।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इरा झा के मामले में अदालत ने कहा- टाइम्स समूह की जांच कार्यवाही अनुचित और अन्यायपूर्ण

वरिष्ठ पत्रकार इरा झा के मामले में बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड की जांच कार्यवाही को श्रम न्यायालय ने अनुचित और अन्यायपूर्ण करार दिया है. इरा झा ने 1985 ने बतौर सब एडीटर टाइम्स समूह के नवभारत टाइम्स अखबार में ज्वाइन किया था. वह 1996 में चीफ सब एडीटर बनीं थीं. हिंदी पत्रकारिता में न्यूज डेस्क की कमान संभालने वाली वह पहली महिला हैं. भारी ट्रैफिक जाम की वजह से वह दफ्तर देर से पहुंचीं. इस वजह से उनका अपने विभाग प्रमुख से विवाद हो गया.

मैनेजमेंट ने 15 मई 2000 को उन्हें चार्जशीट और सस्पेंशन लेटर जारी करके उन्हें सस्पेड कर दिया. उन पर पर इनसबॉर्डिनेशन और इनडिसिप्लेन के आरोप लगाए गए थे. मैनेजमेंट ने उनके मामले की विभागीय जांच कराई और 24 जनवरी 2001 को उसकी रिपोर्ट जमा कर दी. उन्हें 13 मार्च 2001 को कारण बताओ नोटिस भेजा गया. इसका जवाब देने के लिए 72 घंटे की मोहलत दी गई थी. उनका घर बंद था लिहाजा 28 मार्च 2001 को यह नोटिस टिप्पणी के साथ कंपनी के संबद्ध विभाग में लौट आया. कंपनी ने बगैर यह जांचे कि नोटिस इरा झा को पहुंचा या नहीं, उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया.

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने जांच कार्यवाही में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं किया है. संस्थान 24 फरवरी 2001 की रिपोर्ट दो महीने दबाए बैठा रहा और 23 मार्च को इरा झा को नोटिस भेजते वक्त सिर्फ 72 घंटे की मोहलत देकर जवाब तलब किया. यह भी नहीं देखा गया कि इरा झा को नोटिस मिला या नहीं. इन तथ्यों के आधार पर श्रम न्यायालय के न्यायाधीश श्री नरेंदर कुमार ने अपने फैसले में मैनेजमेंट की जांच को अनुचित अन्यायपूर्ण बताया है. फैसला वादी इरा झा के पक्ष में है. कानून के हिसाब से मैनेजमेंट को एक और मौका दिया जाएगा. इस दौरान वह अपने आरोप साबित करने के लिए अदालत में गवाह पेश करेंगे. इसके लिए अदालत ने 30 मार्च 2016 का दिन तय किया है. मैनेजमेंट की तरफ से सुश्री रावी बीरबल ने पैरवी की और इरा झा के वकील प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता श्री एनडी पंचोली हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

चोरी से न्यूड वीडियो बना इसे वायरल करने वाले होटल मालिक को महिला पत्रकार ने कोर्ट में दी शिकस्त, मिलेगा 350 करोड़ रुपये जुर्माना (देखें तस्वीरें)

कोर्ट में अपनी पीड़ा व्यक्त करतीं खेल पत्रकार एरिन फूट फूट कर रो पड़ीं…

इस महिला खेल पत्रकार को पूरे सात साल बाद इंसाफ मिला. और, जब इंसाफ मिल गया तो वह खुद को रोक न सकी. फफक कर रो पड़ी. खेल पत्रकार एरिन का होटल की दीवार में सुराख कर न्यूड वीडियो बनाया गया था. वीडियो बनाने वाले पर होटल मालिक पर अदालत ने 350 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है. मामला अमेरिका का है.

अमेरिका की एक अदालत ने स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट एरिन एंड्रयू का न्यूड वीडियो बनाने वाले होटल मालिक पर 350 करोड़ रुपए (55 मिलियन डॉलर) का जुर्माना लगाया है. पीड़िता एरिन एंड्रयू फॉक्स न्‍यूज में स्पोर्ट्स रिपोर्टर / एंकर है. उनका न्‍यूड वीडियो 2008 में वायरल हुआ था. उस वक्‍त वह ईएसपीएन के लिए काम किया करती थीं. ज्यूरी ने सोमवार को इस केस में फैसला सुनाया. अदालत में इस केस की सुनवाई के दौरान एरिन कई बार फूट-फूटकर रो पड़ीं और न्यूड वीडियो वायरल कराए जाने के बाद के अपने जीवन की पीड़ा के बारे में बताती रहीं.

अभियुक्त होटल मालिक माइकल बैरेट की तस्वीर ये है…

आगे की स्लाइड्स में संंबंधित खबर के अन्य डिटेल और बाकी तस्वीरें हैं…

आगे पढ़ें
एरिन के पापुलर होने के कारण वीडियो बनाया!
नीचे क्लिक करें :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मेरे गरीब चौकीदार पिता को इस जज ने नौकरी से निकाल दिया, अब घर कैसे चलेगा

Dear Sir,

I m pallvi from ambala city. I just want to say that My father Ramesh kumar was working in Haryana Court Ambala city as a chownkidar from 20 years under session judge (Mr.Jaiveer singh Hudda). Before 5 years, My father suspended by Mr. Jaivir Singh hUdda with wrong ellications. At that time my father was working in hudda’s Kothi. But in which document Mr. Hudda Said that everything wrong in court then he suspended my father. At that time 15 Employees suspended by Mr.Hudda. One person can make mistake. But 15 Peoples can’t do at same time.

My father is a very poor man. Then we caused in Chnadigarh high Court then My father won the cause from High court. But after Some time Mr. Hudda Said that u are Fail in your enquiry. Then we Caused again delhi Supreme court. Then Advocate Mr. Anand Mishra got 25,000/- from us for this cause. But Problem is not solved. After a long time Mr. Mishra said that your cause has been dismissed.

But in which Hudda’s Kothi My father was very harrsed by Mr. Hudda, and Mrs. Hudda. Even my father slapped by Mrs. Hudda. Mr. Hudda said that in his documents that broken the fans and glasses But its common sense when this was happening in the court, then Mr. HUdda also will complained in other department. But there are no any complaint regarding that. Everything prove that every elications are false against my father.

In which my family, There are 5 Members. My mother is a house wife. Now we want to again join this job. If its not possible then we want to retirement from this job. We will thankfull to you. Becoz I also want to higher study. If in which anything wrong, I m so sorry for that.

We have a great hope from you.

Thanking you

Pallvi Kashyap
pallvik3@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘दक्षिण मुंबई’ नामक अखबार की नीचता के खिलाफ युवा पत्रकार पहुंचा लेबर आफिस और पुलिस स्टेशन, पढ़ें शिकायती पत्र

मुंबई से एक अखबार निकलता है ‘दक्षिण मुंबई’ नाम से. इस अखबार में एक युवा पत्रकार ने पांच महीने तक काम किया. जब उसने सेलरी मांगी तो उसे बेइज्जत करके भगा दिया गया. इस अपमान से नाराज युवा पत्रकार ने लेबर आफिस में पूरे मामले की शिकायत की और भड़ास के पास पत्र भेजा. जब प्रबंधन को यह सब बात पता चली तो युवा पत्रकार को बुरी तरह धमकाया गया. इससे डरे युवा पत्रकार ने पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज कराई है.

युवा पत्रकार का नाम श्याम दांगी है. मुंबई का कोई वरिष्ठ पत्रकार साथी मदद करने और सेलरी दिलाने के लिए प्रबंधन पर दबाव बनाने हेतु श्याम दांगी से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 7506530401 या मेल shyamdangi22@gmail.com के जरिए कर सकता है.

नीचे लेबर आफिस और पुलिस स्टेशन में दी गई शिकायतों की कापी है…

मूल खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

पांच महीने बिना सेलरी काम कराया और बेइज्जत करके निकाल दिया

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक मंच पर आए जागरण व सहारा के मीडियाकर्मी, मिलकर लड़ेंगे लड़ाई

नई दिल्ली/ नोएडा। प्रिंट मीडिया समूहों में कार्यरत कर्मचारियों के शोषण और अत्याचारी अखबार प्रबंधनों के खिलाफ अब कर्मचारी एकजुट होकर लड़ाई लड़ेंगे। इस क्रम में दैनिक जागरण कर्मचारी यूनियन ने आंदोलित सहारा समूह के मीडियाकर्मियों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ाई लड़ने का निश्चय किया है।

बृहस्पतिवार को नोएडा में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में दैनिक जागरण कर्मचारी यूनियन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रदीप कुमार सिंह ने सहारा के मीडियाकर्मियों को विश्वास दिलाया कि अब दैनिक जागरण के कर्मचारी भी सहारा के कर्मचारियों की लड़ाई लड़ेंगे। दूसरी ओर सहारा के मीडियाकर्मियों ने भी जागरण कर्मचारियों के साथ पूरी ताकत से कर्मचारियों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने की बात कही।

श्री प्रदीप कुमार सिंह ने कहा कि अख़बारों के मालिकान कर्मचारियों को कतई उनका हक़ नहीं देना चाहते। ऐसे में जरुरत इस बात की है कि कर्मचारी एक मंच पर आएं और मिलकर लड़ाई लडें और अख़बारों के मालिकानों को मुंहतोड़ जवाब दें। बैठक में उपस्थित अन्य कर्मचारियों ने भी अखबारों में कर्मचारियों के बढ़ रहे शोषण के खिलाफ आंदोलन की मशाल को जलाये रखने का आह्वान किया। गौरतलब है कि दैनिक जागरण के कर्मचारी डेढ़ महीने से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की वाजिब मांग को लेकर दिल्ली, नोएडा, हिसार, धर्मशाला, लुधियाना और जालंधर में आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन अत्याचारी और तानाशाह जागरण प्रबंधन ने 350 से अधिक कर्मचारियों को अपना हक़ मांगने पर निलंबित कर दिया है।

इसी तरह सहारा मीडिया समूह के पत्रकार, गैर-पत्रकार 9 महीने से बिना वेतन के अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें मजीठिया मिलना तो दूर सहारा प्रबंधन उनका बकाया वेतन तक नहीं दे रहा है। सहारा के कर्मचारियों की कहानी दर्दनाक है। उनके बच्चों के स्कूल से नाम कट चुके हैं, भूख और बीमारी से सहारा के कुछ कर्मचारियों की मौत हो गयी लेकिन अत्याचारी सहारा का प्रबंधन कर्मचारियों को उनका हक़ देने को तैयार नहीं है। ऐसे में कर्मचारियों के पास आंदोलन को तेज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। माना जा रहा है कि जागरण और सहारा के कर्मचारियों के एक मंच पर आकर लड़ाई लड़ने से कर्मचारियों का शोषण बंद होगा और अत्याचारी प्रबंधन और उनके चमचों को झुकना पड़ेगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

के.न्यूज वाले बकाया पैसा नहीं दे रहे… इस दिवाली अपनी तीन माह की बिटिया को क्या दूंगा?

संपादक

भड़ास मीडिया

मैं प्रहलाद गुप्ता वाराणसी में के.न्यूज वैनल का रिर्पोटर हूं। मुझे एक साल हो गया के.न्यूज चैनल के लिए रिपोर्टिंग का काम करते। इस दौरान मुझे वेतन के नाम पर चैनल ने वालों ने बस दस हजार रूपये दिए हैं, जब कि मैने अब तक सैकड़ों खबरें चैनल वालों को भेजा है।

मैं जब भी वेतन संबंधित बात करने के लिए फोन करता हूं ये लोग बात तक नहीं करते। हां, जब भी इन्हें कोई खबर चाहिए होता है तो मेरे मोबाइल की घंटी बजाने लगते हैं। खाली पेट और जरूरतों की दोस्ती खबरों से नहीं होती। उन्हें पूरा करने के लिए पैसे चाहिए होते हैं। यहां तो चैनल वाले मेरे मेहनत के पैसे तक नहीं दे रहे हैं।

अजीब बात है।

खबर लाने वाले का दर्द कभी भी क्यों नहीं चैनलों पर खबरों का हिस्सा बन पाती है। मेरी तीन महीने की बेटी है। दिपावली आने में चंद रोज बाकी रह गए हैं। मैं अपनी बेटी जिसकी ये पहली दिपावली है, उसे क्या दूंगा? अपनी जरूरतों से तो मैं समझौता कर सकता हूं। पर अपनी छोटी सी बेटी की खुखियों और उसकी जरूरतों को कैसे मार दूं?

इससे पहले भी मुझसे संबधित खबर भड़ास मीडिया पर चल चुकी है। कल मैने अपने चैनल के संपादक और मालिक को मेल भेज कर अपने हालात का ज्रिक करते हुए बकाया वेतन देने की बात की है। लेकिन उस मेल का जवाब अब तक नहीं आया है, लगता है मेरी जरूरते मेरे मेहनत के पैसे उनके लिए कोई मायने नहीं रखते। मैं उस मेल की कापी आपको भी भेज रहा हूं।

उम्मीद करता हूं भड़ास मीडिया मेरे इस आवाज को उपर तक पहुंचायेगा। साथ ही यह भी सबको बतायेगा कि मीडिया के इस चकाचैध के पीछे कितना अंधेरा है, कितना शोषण है।

धन्यवाद

प्रहलाद गुप्ता

के.न्यूज चैनल

संवाददाता

वाराणसी।

मोबाइल न.09336953194, 09454654698


इसे भी पढ़ें>>

कानपुर से संचालित होने वाले के. न्यूज चैनल का सच : ”खुद कमाओ और हमे भी लाकर दो, तब हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो!”

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कानपुर से संचालित होने वाले के. न्यूज चैनल का सच : ”खुद कमाओ और हमे भी लाकर दो, तब हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो!”

: काम करवा कर वेतन नहीं देते है ‘के. न्यूज’ वाले : के. न्यूज की कहानी यहां नौ महीने तक काम करने वाले बनारस के मीडियाकर्मी प्रहलाद गुप्ता की जुबानी :

वाराणसी। चिल्ला-चिल्ला कर झूठ को बेनकाब करने का दावा करने वाले चैनलों का भीतरी सच क्या है? क्या है इनकी हकीकत? कैसे ये अपने यहां काम करने वालो का शोषण करते हैं? मेरा दावा है, चैनलों पर ऐसी कोई बेक्रिंग न्यूज कभी नहीं दिखेगी। कानपुर से संचालित होने वाले रीजनल चैनल ‘के.न्यूज’ के साथ काम कर के मुझे यही सबक मिला कि सच का दम भरने वाले इन चैनलों का भीतरी चेहरा कितना बदसूरत है।

इनकी हकीकत ये है दिन-रात पसीना बहाकर इनके लिए काम करने वालों के दुःख-दर्द से इनका कोई लेना-देना नहीं है। आप इनकी टी.आर.पी बढ़ाने के लिए भले ही कितने खतरे उठा लें, पर इन्हें इस बात की छटाक भर चिंता नहीं होती कि इनके लिए काम करने वालों के घर में चूल्हा कैसे जलता होगा? कैसे ये अपनी रोजर्मरा की जरूरतों को पूरा करते होंगे?

आज मुझे 9 महीने हो गए ‘के.न्यूज’ के साथ काम करते हुए। इस दौरान सैकड़ों खबरें मैंने इनके लिए भेजा। पर मुझे दिया गया 5 हजार के हिसाब से सिर्फ दो महीने का वेतन जबकि के.न्यूज ने मुझे 7 हजार रुपया हर महीने देने का वादा किया था। इस दौरान मैंने क्या-क्या दिन नहीं देखा। कभी किसी साथी से उधार लेकर तो कभी किसी से मांग कर मैं खबरों के पीछे दौड़ता रहा, खबरें भेजता रहा। पर जब भी कभी अपनी जेब में हाथ डाला तो वो खाली ही मिला।

वेतन के लिए जब कभी मैंने चैनल में बैठे जिम्मेदार लोगों से बातचीत कर अपनी मजबूरियों के बारे में बताया तो उधर से जवाब मिला- ”अरे यार कोई व्यवस्था क्यों नहीं खुद ही बना लेते, अपने भी कमाओं और हमे भी लाकर दो, तब न हम जानेंगे तुम रिपोर्टर हो।”

मैं इस चैनल के सम्पादक और मालिकों से पूछता हूं, आप ही बताईए कि खाली जेब से घर चलता है क्या? रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं क्या? मुझे पता है, इसका जवाब कभी नहीं मिलेगा। खबरों में दुनिया भर के लोगों की हक के लिए आवाज उठाने का दावा करने वाले इस चैनल के संपादक से लेकर मालिक तक अपने यहां काम करने वाले रिपोर्टरों का हक मार कर बैठे हुए हैं। 

प्रहलाद गुप्ता

रिपोर्टर

‘के.न्यूज’ रीजनल चैनल

वाराणसी

मोबाइल न. 09454654698

भड़ास के लिए उपरोक्त स्टोरी बनारस के युवा और जनपक्षधर पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी ने भेजी है. भास्कर से संपर्क bhaskarniyogi.786@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दहेज के लिए मारी गई पत्रकार किरन को न्याय मिलता दिख नहीं रहा

25 सितंबर 2015 को देहरादून निवासी पत्रकार किरन की दहेज के कारण हत्या कर दी गई थी। दबंग परिवार वालों तथा एक बड़े अधिकारी के सहयोग के कारण पुलिस किरन की दहेज हत्या को  आत्महत्या में बदल रही थी। शुरू में डालनवाला पुलिस का रवैया भी आरोपियों की मददगार का रहा। पुलिस की हीलाहवाली के कारण दहेज हत्या के आरोपी किरन का पति राबिन जोशी व मामले में संलिप्त उसके परिवार के सदस्य भागने में कामयाब रहे।

जब मामला मीडिया में उछला तो नाटकीय ढंग से पुलिस ने राबिन को गिरफ्तार कर लिया। जबकि अन्य संलिप्त अपराधी भागने में कामयाब रहे। अभी भी पुलिसिया रवैया ढीला है। इसको देखते हुए लगता है कि पत्रकार किरन को कभी भी न्याय नहीं मिल पाएगा। पत्रकार किरन की मौत को लेकर एक स्टोरी ‘पहल’ मैगजीन में प्रकाशित हुई है। इसके साथ ही उम्मीद करता हूं कि पत्रकारों को न्याय दिलाने वाला भारत का सबसे बड़ा मंच किरन को मामले को पूरे देश के पत्रकारों को पहुंचाएगा। हमारे इस प्रयास से शायद पत्रकार किरन को न्याय मिल सके। उम्मीद है कि आप पत्रकार किरन की घटना को पूरे देश के पत्रकारों से रू-ब-रू कराएंगे। हमारा ये प्रयास दहेज की शिकार हुई पत्रकार किरन को शायद न्याय दिला सके।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. पहल मैग्जीन में प्रकाशित किरन की पूरी कथा पढ़ने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक करें>>

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Outlook Hindi को पूरे सम्मान के साथ यह चेक एक पत्र के साथ वापिस कर रहा हूं

Siddhant Mohan : बीते अप्रैल में हुए ‘संकटमोचन संगीत समारोह’ के लिए मैंने आउटलुक पत्रिका के चन्द्र प्रकाश, फिर बाद में आकांक्षा पारे के कहने पर समारोह पर एक लेख लिखा था और ग़ुलाम अली खान साहब का इंटरव्यू भी किया था. बीच में कई दफा एकाउंट नंबर पूछने, नाम की स्पेलिंग कन्फर्म करने के लिए फोन आए. कुछेक बार एचआर डिपार्टमेंट से, कुछेक बार आकांक्षा जी से. कई बार एसएमएस से डीटेल भी मांगे गए. अप्रैल में किए इस काम के जवाब में मुझे कल यानी 20 मई को(छः महीने से भी ज्यादा वक़्त बाद) चेक मिला. 720 रूपए का. नाम की स्पेलिंग गलत.

Outlook Hindi को पूरे सम्मान के साथ यह चेक एक पत्र के साथ वापिस कर रहा हूं. हिंदी पत्रकारिता और पत्रकारों को एक खास ओछी नज़र के साथ देखने का चलन है. हिंदी की गरीबी में यह क्षम्य है, लेकिन Outlook जैसा बड़ा मीडिया हाउस – जिसके पास अंग्रेज़ी की बैकिंग है – यदि ऐसा करता है तो यह अपराध है. पाकिस्तान बात करने, बनारस जैसे शहर में ग़ुलाम अली खान को ट्रेस करने में लगने वाले श्रम, पेट्रोल, पैसे और वक़्त व लेखकीय श्रम का अपमान है. मुझे पैसे की फिक्र नहीं है, पैसे हैं मेरे पास. एक सम्मानजनक नौकरी भी है. लेकिन श्रम का अपमान मैं नहीं सहूंगा. भले ही कोई और सहकर इसे अपने खाते में लगा लेता हो.

कई हिंदी लेखकों को जानता हूं जो लिखते रहने के लिए फ्रीलांसिंग पत्रकारिता करते रहते हैं, कुछ तो घरवालों को यह भी दिखाते रहने के लिए कि ‘देखिए! इस काम से भी कमाया जा सकता है.’ यह उनका अपमान है साहब. अन्य फ्रीलांसर सहमत नहीं होंगे लेकिन यह मूलरूप में बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले कुछ संपादकों द्वारा पत्रकारिता की भौतिकता का बड़ा अपमान है. जब भी मैं किसी नए के लिए काम करता हूं तो बनारसी तरीकों से तस्दीक करता हूं कि वह काम करने लायक है भी या नहीं. Outlook Hindi, you failed in this assessment.

बीएचयू से पढ़े लिखे पत्रकार सिद्धांत मोहन, जो इन दिनों टू सर्किल्स डॉट नेट के संपादक हैं, के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘समाचार प्लस’ चैनल ने मुझ स्ट्रिंगर का छह महीने का पैसा मार लिया!

समाचार प्लस चैनल की रीयल्टी. पत्रकारों का शोषण करने वाला चैनल. न्यूनतम वेतन से भी कम देने वाला चैनल. छ माह की तनख्वाह खा जाने वाला चैनल. असभ्य और बदमिजाज एडिटर वाला चैनल. अपनी बात से बार बार पलटने वाले सम्पादक. स्ट्रिगरों का हक मारने वाले. खबर के लिए चौबीस घण्टे फोन करने वाले. वेतन के लिए फोन नहीं उठाने वाले. रोज शाम राजस्थान की जनता को ज्ञान बॉटने वाले सम्पादक महोदय. एक स्ट्रिगर के सवालों का जवाब नहीं दे पाते. राजस्थान के दर्जनों पत्रकारों के मेहनत के पैसे खा जाने वाले. पत्रकारो को आईडी कार्ड नहीं देने वाले. ऐसा चैनल जिसमे एकाउण्ट और एचआर डिपार्टमेन्ट नहीं हो. गेजुएट, पोस्ट गेजुएट और बीजेएमसी पास युवाओं को मजदूर से कम वेतन देने वाले, वह भी चार माह की देरी से. ये सब करता है समाचार प्लस चैनल.

एसाइनमेंट डेस्क से अनुरोध है कि नीचे लिखे गए मैसेज को साहनी सर तक पहुंचा दें…

साहनी सर

नमस्ते

मैं विमलेश कुमार शर्मा पूर्व स्ट्रिंगर समाचार प्लस राजस्थान, दौसा। मुझे मिस्टर अजय झा जी ने फोन पर निर्देश देकर चैनल के लिए काम करने से मना कर दिया और चैनल आईडी नव नियुक्त स्ट्रिंगर एचएन पाण्डे को देने के लिए कहा गया। मैंने अजय सर के निर्देश की पालना की। मुझे मेरे लगभग 80 दिनों के बकाया भुगतान के लिए इन्तजार करने के लिए कहा गया। अगस्त माह के शुरुआत में राजस्थान के सभी साथियों का भुगतान कर दिया गया पर मेरा भुगतान नहीं किया गया।

मैंने अजय सर से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि आपके खाते मे अमाउण्ट डाल दिया गया है। मैंने उन्हें बताया कि मुझे पेमेन्ट नहीं मिला है और मैने बैंक की पूरी डिटेल उन्हें मेल कर सारी स्थिति से साफ साफ अवगत करा दिया। अब बीते तीन चार सप्ताह से अजय सर मेरा फोन अटेण्ड नहीं कर रहे हैं। मैंने दर्जनों बार डेस्क पर फोन कर अजय जी सर से बात करनी चाही पर बात नहीं हो पा रही है। मैने हाशिम जी सर, अमरेश जी सर, दीपक जी सर, जयपुर में चन्द्रशेखर जी और आप से भी एक बार फोन करके पूरी स्थिति से अवगत करा चुका हूं। आपसे अनुरोध है कि मुझ  स्ट्रिंगर के बकाया भुगतान को दिलवाने की मेहरबानी करें।

आपका
विमलेश कुमार शर्मा
9414036436
vimleshdausa@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रतिमा भार्गव केस में प्रेस काउंसिल ने दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट को दोषी ठहराते हुए लताड़ा, …लेकिन बेशर्मों को शर्म कहां!

आगरा की रहने वाली प्रतिमा भार्गव ने मीडिया के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली है. लेकिन दुख इस बात का है कि बेशर्म मीडिया वाले इस खबर को कतई नहीं छापेंगे. अगर इनमें थोड़ी भी नैतिकता होती तो प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के इस फैसले को न सिर्फ प्रकाशित करते बल्कि खुद के पतने पर चिंता जताते, विमर्श करते. प्रतिमा भार्गव के खिलाफ एक फर्जी खबर दैनिक जागरण आगरा और आई-नेक्स्ट आगरा ने प्रमुखता से प्रकाशित किया. अनाप-शनाप आरोप लगाए.

प्रतिमा से कोई पक्ष नहीं लिया गया. खबर छपने के बाद जब प्रतिमा ने अपना पक्ष छपवाना चाहा तो दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों ने इनकार कर दिया. प्रतिमा ने लीगल नोटिस भेजा अखबार को तो इसकी भी परवाह नहीं की. अंत में थक हारकर प्रतिमा ने प्रेस काउंसिल आफ इंडिया में केस किया और वकीलों के साथ प्रजेंट हुई. अपनी पूरी बात बताई. प्रेस काउंसिल ने कई बार दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों को बुलाया लेकिन ये लोग नहीं आए.

अब जाकर प्रेस काउंसिल ने आदेश किया है कि दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट ने प्रतिमा भार्गव के मामले में पत्रकारिता के मानकों का उल्लंघन किया है. इस बाबत उचित कार्रवाई के लिए RNI एवं DAVP को आर्डर की पूरी कापी प्रेषित की है. साथ ही आदेश की कापी दैनिक जागरण और आई-नेक्स्ट के संपादकों-मालिकों को भी रवाना कर दिया है. क्या दैनिक जागरण का संपादक संजय गुप्ता और आई-नेक्स्ट का संपादक आलोक सांवल इस फैसले को अपने अखबार में छाप सकेंगे? क्या इनमें तनिक भी पत्रकारीय नैतिकता और सरोकार शेष है? क्या ये एक पीड़ित महिला ने सिस्टम के नियम-कानून को मानते हुए जो न्याय की लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसका सम्मान करते हुए माफीनामा प्रकाशित करेंगे व उसकी खराब हुई छवि को दुरुस्त करने के लिए प्रयास करेंगे?

शायद नहीं. इसलिए क्योंकि इसी को कहते हैं कारपोरेट जर्नलिज्म, जहां सरोकार से ज्यादा बड़ा होता है पैसा. जहां पत्रकारिता के मूल्यों से ज्यादा बड़ा होता है धन का अहंकार. जहां आम जन की पीड़ा से ज्यादा बड़ी चीज होती है अपनी खोखली इज्जत. प्रतिमा ने जो लड़ाई लड़ी है और उसमें जीत हासिल की है, उसके लिए वह न सिर्फ सराहना की पात्र हैं बल्कि हम सबका उन्हें एक सैल्यूट भी देना बनता है. अब आप सब सजेस्ट करें कि आगे प्रतिमा को क्या करना चाहिए.

क्या उन्हें दिल्ली आकर पूरे मामले पर प्रेस कांफ्रेंस करना चाहिए? क्या उन्हें सुप्रीम कोर्ट में इस बात के लिए केस करना चाहिए कि अगर ये दोषी अखबार माफीनामा नहीं छापते हैं तो कोई पीड़ित क्या करे? आप सभी अपनी राय दें, सुझाव दें क्योंकि ये कोई एक प्रतिमा का मामला नहीं है. ऐसे केस हजारों की संख्या में हैं लेकिन लोग लड़ते नहीं, देर तक अड़े नहीं रह पाते, लड़ाई को हर स्टेज तक नहीं ले जा पाते. प्रतिमा ने ऐसा किया और इसमें उनका काफी समय व धन लगा, लेकिन उन्होंने अपने पक्ष में न्याय हासिल किया. अब उन्हें आगे भी लड़ाई इस मसले पर लड़नी चाहिए तो कैसे लड़ें, कहां लड़ें या अब घर बैठ जाएं?

कहने वाले ये भी कहते हैं कि संजय गुप्ता और आलोक सांवल दरअसल संपादक हैं ही नहीं, इसलिए इनकी चमड़ी पर कोई असर नहीं पड़ता. संजय गुप्ता चूंकि नरेंद्र मोहन के बेटे हैं इसलिए जन्मना मालिक होने के कारण उन्हें संपादक पद दे दिया गया, पारिवारिक गिफ्ट के रूप में. आलोक सांवल मार्केटिंग और ब्रांडिंग का आदमी रहा है, साथ ही गुप्ताज का प्रियपात्र भी, इसलिए उसे थमा दिया गया आई-नेक्स्ट का संपादक पद.

यही कारण है कि इनमें संपादकों वाली संवेदनशीलता और सरोकार कतई नहीं हैं. ये सिर्फ अपनी कंपनी का बिजनेस इंट्रेस्ट देखते हैं और अखबार का प्रसार अधिकतम बना रहे, इसकी चिंता करते हैं. इनके पहाड़ जैसे अवैध साम्राज्य के नीचे हजार दो हजार आम जन दम तोड़ दें तो इनको क्या फरक पड़ने वाला है. खैर, न्याय सबका होता है, सिस्टम नहीं करेगा तो प्रकृित करेगी. वक्त जरूर लग सकता है लेकिन प्राकृतिक न्याय का सामना तो करना ही पड़ेगा. जिस कदर ये महिला प्रतिमा भार्गव पेरशान हुई है, उससे कम परेशानियां ये दोनों शख्स न झेलेंगे, ये तय है, मसला चाहे जो रहे. जै जै. 

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


आर्डर में क्या-क्या लिखा है और पूरा केस क्या है, इसे पढ़ने के लिए नीचे लिखे Next पर क्लिक करें.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारों पर हो रहे हमले के विरोध में प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ कानपुर में पत्रकारों का हल्ला बोल

विगत एक वर्ष से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर बढ़ रहे अत्याचारों और उत्पीड़न ने तोड़ा पत्रकारों के सब्र का बांध। कानपुर में आज कई पत्रकार संगठनों ने मंच साझा कर सांकेतिक धरना प्रदर्शन करते हुए प्रदेश की सपा सरकार और बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व को जमकर कोसा। कानपुर में विभिन्‍न पत्रकार संगठनों द्वारा आज फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना प्रर्दशन कर पत्रकारों का उत्पीड़न न रुकने पर बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक दिया।

इस धरने में प्रदेश सरकार को आड़े हांथो लेते हुए चेतावनी दी गयी कि अगर प्रदेश में पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं रोक गया तो जल्द ही प्रदेश के पत्रकार मिलकर लखनऊ विधानसभा का घेराव करेंगे। इस धरने में मुख्य रूप से कानपुर, उन्‍नाव, लखनऊ, कन्‍नौज, वाराणसी और फतेहपुर आदि जिलों से पत्रकार संगठनो के प्रमुखों ने एक साथ शिरकत की।

शिरकत करने वाले पत्रकार संगठन

आल मीडिया एण्‍ड जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष आलोक कुमार।
आल इण्डिया रिर्पोटर्स एसोसिएशन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता तारिक आजमी।
कानपुर प्रेस क्‍लब के महामंत्री अवनीश दीक्षित।
आइरा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष एड. पुनीत निगम।
मीडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन के राष्ट्रिय महासचिव बलवन्त सिंह।
सहित कई पत्रकार संगठनो ने एक मत होकर प्रदेश की सरकार की आलोचना की।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की जमकर हुई निंदा

आपको बता दें हाल ही में भाजपा प्रदेश अध्‍यक्ष द्वारा नेशनल चैनल पर पत्रकार आलोक कुमार के खिलाफ दिये वक्‍तव्‍य को निन्‍दनीय बताते हुये उनसे तत्‍काल सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की। उन्‍होंने कहा कि माफी न मांगे जाने की सूरत में पत्रकार भाजपा से जुड़े सभी कार्यक्रमों का बहिष्‍कार करेंगे और अगले चरण में लखनऊ में भाजपा कार्यालय का घेराव किया जायेगा। कार्यक्रम में प्रमुख अवनीश दीक्षित, तारिक आजमी, पुनीत निगम, बलवन्त सिंह, आशीष त्रिपाठी आलोक कुमार, इब्ने हसन जैदी, श्रावण गुप्ता, दीपक मिश्रा अखलाख अहमद, नीरज लोहिया, उमेश कुमार सहित सभी पत्रकार उपस्थित रहे।

एस.आर.न्यूज़ के लिए जीतू वर्मा की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूपी : मीडिया सलीब पर और इंसाफ मुजरिमों की मुट्ठी में !

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि उनके मंत्रियों को फंसाया जा रहा है, साथ ही कहना है कि सरकार पर दबाव बनाये रखने के लिए विरोधी दलों के नेता आये दिन मंत्रियों के त्याग पत्र मांगते रहते हैं। आरोप यह भी है कि समाजवादी पार्टी पर मीडिया हमलावर रहता है। समाजवादी पार्टी के नेताओं की इस दलील का आशय यह है कि उनकी सरकार में सब कुछ ठीक है एवं सभी मंत्री संवैधानिक दायरे में रह कर ही कार्य कर रहे हैं, जिन्हें सिर्फ बदनाम किया जा रहा है, लेकिन यह स्पष्ट होना शेष है कि समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित संविधान के दायरे में रहने की बात करते हैं, या समाजवादी पार्टी का कोई और संविधान है?

खैर, उत्तर प्रदेश की कुछ बड़ी और कुछ ताजा घटनाओं की बात करते हैं। प्रतापगढ़ जिले में सीओ हत्या कांड हुआ, जिसमें कैबिनेट मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का नाम आया, तो इसमें विरोधियों और मीडिया का क्या षड्यंत्र था? घटना के बाद विरोधियों का हमला बोलना स्वाभाविक है और घटना के संबंध में मीडिया ने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। किसी का कोई षड्यंत्र नहीं था, इसी तरह गोंडा में सीएमओ अपहरण कांड हुआ, जिसका आरोप राज्यमंत्री विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह पर लगा, इस कांड में भी विरोधियों और मीडिया का क्या षड्यंत्र था?, इस घटना के बाद भी विरोधियों और मीडिया ने अपनी भूमिका का ही निर्वहन किया। जघन्य आरोपों से घिरे मुख्यमंत्री ने मंत्रियों को हटा दिया और जांच के बाद निर्दोष पाये जाने पर दोनों को पुनः मंत्री बना दिया, इस पर मीडिया ने कोई सवाल नहीं उठाया।

समाजवादी पार्टी के नेता बदायूं जिले के कटरा सआदतगंज में पेड़ पर लटकाई गईं चचेरी बहनों के प्रकरण में मीडिया को कोसना नहीं भूलते। इस जघन्यतम वारदात में मीडिया कहां गलत है? दो लड़कियाँ पेड़ पर लटकी मिलीं और उनके परिजनों ने तीन सगे भाइयों सहित दो सिपाहियों पर यौन शोषण और हत्या का आरोप लगाया, जिसे मीडिया ने अक्षरशः लिखा और दिखाया, इसके बाद मुकदमे की प्रगति, नेताओं का आना और उनके बयान प्रकाशित किये। लड़कियों को पेड़ पर टांगने, उन्हें मारने और गलत लोगों को नामजद करने में मीडिया का क्या हाथ है? मीडिया ने सिर्फ रिपोर्टिंग ही की, लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नहीं पता था कि उन्हें क्या करना है। गृह सचिव निलंबित किया, लेकिन जिले के अफसरों पर कार्रवाई नहीं की। मीडिया ने सवाल किया, तो प्रभारी डीएम का कार्यभार संभालने वाले सीडीओ को निलंबित कर दिया, लेकिन प्रभारी एसएसपी की जगह छुट्टी पर गये एसएसपी को निलंबित किया। बड़े-बड़े अफसरों पर कार्रवाई कर दी गई, लेकिन संबंधित थाने के एसओ को निलंबित तक नहीं किया।

जिन अफसरों के विरुद्ध कार्रवाई हुई, वे सब गैर यादव थे और एसओ यादव, इस पर सरकार स्वतः ही कठघरे में खड़ी हो गई। पूरे प्रकरण में शुरू से अंत तक प्रदेश सरकार ने दबाव में गलत निर्णय ही लिए। मीडिया और न्यायालय का दबाव न होता, तो सरकार सीबीआई जाँच के आदेश नहीं देती और इस प्रकरण में सीबीआई जाँच न हुई होती, तो गवाह और सुबूत के आधार पर नामजद आरोपियों को न्यायालय में निश्चित रूप से फांसी की सजा होती। सीबीआई जांच में सभी नामजद निर्दोष पाये गये हैं, उन्हें बचाने का श्रेय सिर्फ मीडिया और न्यायालय को ही जाता है।

अब ताजा घटनाओं की बात करते हैं। हाल ही में राज्यमंत्री विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह पर एक युवा को फोन पर गाली देने का आरोप लगा। राज्यसभा सदस्य डॉ. चन्द्रपाल सिंह यादव पर तहसीलदार को धमकाने का आरोप लगा, इन दोनों घटनाओं में विरोधी दलों का क्या षड्यंत्र हो सकता है और मीडिया को खबरें क्यूं नहीं प्रकाशित करनी चाहिए? अगर, मीडिया मंत्रियों, विधायकों और सपा नेताओं के दबंगई की घटनाओं को छाप रहा है, तो वह सरकार या सपा विरोधी नहीं हो जाता। सपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि विपक्ष में होने पर यही मीडिया उनकी ढाल अक्सर बनता रहा है।

समाजवादी पार्टी के नेता अपनी पार्टी के नेताओं और मंत्रियों के आचरण पर भी एक नजर डालें। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह ही नहीं, बल्कि मनोज पारस, गायत्री प्रजापति, महबूब अली, अंबिका चौधरी, शिवप्रताप यादव, आजम खां, कैलाश चौरसिया, तोताराम और राममूर्ति वर्मा आदि का आचरण ऐसा रहा है, जिसके चलते यह लोग विवादों में रहे हैं और सरकार की मुश्किलें बढ़ाते रहे हैं, इनमें से ऐसा कोई नहीं है, जिसे विरोधियों ने फंसाया हो और मीडिया ने बेवजह तूल दिया हो, यह लोग कुछ न कुछ ऐसा करते रहे हैं, जिससे यह लोग मीडिया की नजर में आये। सरकार में तमाम ऐसे मंत्री अभी भी हैं, जिन पर किसी तरह का कोई आरोप नहीं लगा है, उनकी छवि पर मीडिया कभी कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता।

शाहजहाँपुर निवासी पत्रकार जगेन्द्र हत्या कांड में पुलिस-प्रशासन और सरकार की भूमिका की बात करते हैं, तो शाहजहांपुर का स्थानीय प्रशासन शुरू से ही माफियाओं और सत्ताधारियों के दबाव में रहा है। जगेन्द्र ने एक तेल माफिया के विरुद्ध खबरें लिख दीं, तो तेल माफिया ने जगेन्द्र के विरुद्ध रंगदारी का मुकदमा दर्ज करा दिया। हालांकि बाद में पुलिस ने जगेन्द्र को निर्दोष करार दे दिया, लेकिन उसी माफिया ने जगेन्द्र के विरुद्ध शाहजहांपुर में पुलिस की ओर से बड़े-बड़े होर्डिंग लगवा दिए, जिस पर जगेन्द्र धरने पर बैठ गये, तो पुलिस-प्रशासन ने होर्डिंग हटवा दिए, पर होर्डिंग लगवाने वाले तेल माफिया के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की। इसके बाद जगेन्द्र ने राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के कारनामों का खुलासा किया, तो राममूर्ति वर्मा के कहने से ही एक व्यक्ति की तहरीर पर जगेन्द्र के विरुद्ध पुलिस ने फर्जी मुकदमा दर्ज कर लिया, इस मुकदमे की सही विवेचना कराने के लिए जगेन्द्र पुलिस विभाग के तमाम बड़े अफसरों के कार्यालयों में चक्कर लगा चुके थे, लेकिन राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के दखल के चलते जगेन्द्र को कहीं से मदद नहीं मिली, इस बीच एक आंगनवाड़ी कार्यकर्त्री ने राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा और उनके साथियों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा दिया, तो जगेन्द्र ने इस प्रकरण पर भी लिखना शुरू कर दिया और खुद को फर्जी फंसाने से व्यथित जगेन्द्र गवाह भी बन गये, इसके बाद राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के दबाव में ही पुलिस जगेन्द्र को भूखे भेड़िये की तरह खोजने लगी। पुलिस ताबड़तोड़ छापे मारने लगी, जिससे जगेन्द्र किसी तरह बचते रहे और इधर-उधर छिपते रहे। जगेन्द्र की स्थिति एक बड़े अपराधी जैसी बना दी, जो स्वयं को पुलिस से बचाता घूम रहा था। एक जून को जगेन्द्र अपने आवास विकास कालौनी में स्थित घर पर थे, तभी मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने छापा मार दिया, जिसके बाद जगेन्द्र के जलने की घटना हुई और 8 जून को लखनऊ में उपचार के दौरान जगेन्द्र ने दम तोड़ दिया। मृत्यु से पूर्व जगेन्द्र ने स्वयं बयान दिया कि उन्हें पुलिस ने पेट्रोल डाल कर जला दिया। पुलिस का कहना है कि जगेन्द्र ने स्वयं आग लगाई।

स्वतंत्र पत्रकार बी. पी. गौतम से संपर्क – 8979019871

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सुप्रीम कोर्ट के फैसले दो, सवाल एक मीडिया बड़ा या न्याय पालिका !

भारतीय लोकतंत्र की अन्योन्याश्रित चार प्रमुख शक्तियां हैं- विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया। लेकिन कई एक ताजा प्रसंग अब ये संदेश देने लगे हैं कि अभी तक सिर्फ राजनेता, अफसर और अपराधी ही ऐसा करते रहे हैं, अब भारतीय मीडिया भी  डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक बनाने लगा है। मजीठिया वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान न देने पर अड़े मीडिया मालिकों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुपालन का फैसला दिय़ा तो उसे कत्तई अनसुना कर दिया गया। इस समय मीडिया कर्मी अपने हक के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं। इस पूरे मामले ने ये साफ कर दिया है कि भारतीय मीडिया को न्यायपालिका के आदेशों की परवाह नहीं है। इस तरह वह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुला मखौल उड़ा रहा है। इतना ही नहीं, लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक होने के नाते उसकी यह धृष्टता भारतीय न्याय-व्यवस्था के प्रति आम आदमी की अनास्था को प्रोत्साहित भी करती है। मीडिया कर्मियों को मजीठिया वेतनमान देने की बजाए कई बड़े मीडिया घराने तो पुलिस की मदद से मीडिया कर्मियों का गुंडों की तरह उत्पीड़न करने लगे हैं। इसी दुस्साहस में वह सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक और आदेश को ठेंगा दिखाते हुए सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटो छापने से भी बाज नहीं आ रहा है। भारतीय मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक दोनो) यह साबित करने की लगातार कुचेष्टा कर रहा है कि उसकी हैसियत देश के सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है।

पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में निर्देश दिया था कि सरकारी विज्ञापनों पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तस्वीरें लगेंगी – लेकिन ये भी एक खास कमेटी से मंजूरी मिलने के बाद। सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला उस कमेटी की सिफारिशों के आधार को सामने रखते हुए एक जनहित याचिका पर दिया, जिसे कोर्ट ने ही पिछले साल बनाया था। फैसले के पीछे एक बड़ा उद्देश्य था कि सरकार चला रही पार्टी जनता के टैक्स के पैसे से खुद का प्रचार बंद करे। साथ ही राष्ट्रपति, पीएम और चीफ जस्टिस भी खुद ये तय करेंगे की उनकी तस्वीर विज्ञापनों में लगनी चाहिए या नहीं। यानी इनकी भी तस्वीरें तभी लगेंगी, जब वे इसकी जवाबदेही लेंगे। फैसले के मुताबिक सरकारी विज्ञापनों में गवर्नर, मुख्यमंत्रियों, ब्यूरोक्रेट की तस्वीर भी नहीं लगेगी। अदालत ने ये भी निर्देश दिया कि केन्द्र और राज्य सरकार तीन सदस्य कमेटी बनाएंगी, जो ये तय करेगी कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन हो रहा है या नहीं। एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रह रही है। इसलिए जनता का पैसा सरकारी विज्ञापनों पर खर्च नहीं होना चाहिए। 

अब देखिए, 13 मई 2015 के सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर मीडिया का क्या रुख रहा? इस फैसले की खिल्ली उड़ाते हुए देश के एक बड़े अखबार ने उस फैसले के अगले ही दिन अपने यहां बेशर्म प्रतिप्रश्न प्रकाशित किया कि क्या कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका ज्यादा दखल दे रही है? क्या कोर्ट सरकारी कामकाज को ज्यादा माइक्रो मैनेज कर रही है? मीडिया तो मीडिया ठहरा, सरकार ने भी तर्क दे डाला कि न्यायपालिका को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए। ये न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र के बाहर का मामला है। चुनी हुई सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है, न कि अदालत के प्रति। यानी चुनी हुई सरकार जनता के पैसे का मनमाना इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र है! एकदम इसी तरह का साझा रुख मजीठिया मामले पर भी सरकार और मीडिया मालिकों का रहा है। केवल दिल्ली सरकार को इसके अपवाद के रूप में लिया जा सकता है। केवल मीठिया वेतनमान और सचित्र विज्ञापन प्रकरण ही नहीं, और भी ऐसे अनगिनत मामले प्रकाश में आ रहे हैं, जिनमें सरकार और मीडिया आपसी तालमेल बनाकर न्याय व्यवस्था को ध्वस्त करने में लगे हुए हैं। वैसे तो ये दोनो नियम-कानून पर खूब चिकनी-चुपड़ी हांकते रहते हैं, लेकिन जैसे ही किसी फैसले से इनके हितों पर चोट पड़े, अपनी औकात दिखाने पर उद्धत हो जाते हैं।

सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटो न लगाने के फैसले का सबसे पहले उल्लंघन किया है उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने। वैसे भी ये आम फहम सुर्खियों में है कि उत्तर प्रदेश सरकार लगातार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को चुनौती दे रही है। पिछले दिनो अखबारों ने अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के लिए यूपी क्रिकेट एसोसिएशन (यूपीसीए), लखनऊ क्रिकेट एसोसिएशन और इकाना स्पोर्टज सिटी के एमओयू संबंधी विज्ञापन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित कई मंत्रियों की भी फोटो छाप दी- ‘उम्मीदों का प्रदेश, उत्तर प्रदेश, खेलों के विकास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के उल्लेखनीय प्रयास’। वैसे विज्ञापन इकाना स्पोर्टज सिटी द्वारा दिया गया है लेकिन लखनऊ विकास प्राधिकरण और यूपीसीए का भी उसमें नाम है, जो ये इंगित करता है कि विज्ञापन गैरसरकारी नहीं है। 

इस पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना था कि अब सुप्रीम कोर्ट यह भी बता दे कि नेताओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिए और क्या-क्या करना चाहिए. उसे नेताओं का ड्रेस कोड भी तय कर देना चाहिए। गौरतलब होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौके-दर-मौके न्यायपालिका को आत्मालोचन का पाठ पढ़ाते रहते हैं। इस प्रकरण पर उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक आशुतोष निरंजन और प्रदेश के स्पोर्ट्ज डायरेक्टर आरपी सिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों की फोटो सहित विज्ञापन सरकार ने नहीं, निजी कंपनी ने दिए हैं। सरकार के विज्ञापन में फोटो का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यूपीसीए के मुख्य सचिव ललित खन्ना का कहना था कि यूपीसीए ने ये विज्ञापन नहीं दिया है। किसने दिया है, उन्हें पता नहीं। 

यह सिर्फ विज्ञापन छापने का मामला नहीं। यह उस आंतरिक टकराव की एक बानगी भर है, जो ये स्पष्ट करती है कि मीडिया और सरकार दोनो, देश की कानून व्यवस्था बनाए रखने के प्रति कत्तई गंभीर नहीं हैं। यह खिंचाव लंबे समय से है। याद होगा, वर्ष 2011 में तत्कालीन केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा था कि सरकार न्यायपालिका तथा मीडिया को लोकपाल विधेयक के दायरे से बाहर रखना चाहती है। उस टिप्पणी में भी उसी न्याय-व्यवस्था विरोधी जुगलबंदी का संदेश निहित था। वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता अपनी एक टिप्पणी में बताते हैं कि न्यायपालिका और मीडिया चादर से बाहर पैर पसारने के आदी हो गए हैं। कार्यपालिका की खाली जगह कब्जाने की तीनो में होड़-सी रहती है। देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रधानमंत्री की सराहना, सरकार द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति में हस्तक्षेप करना, ग्रीनपीस संस्था की वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रिया पिल्लै को लंदन यात्रा पर जाने से इमिग्रेशन में ही रोक लेना, फिल्मकार पंकज बुटालिया के कश्मीर पर बने वृत्तचित्र को प्रतिबंधित किया जाना, फिल्म स्टार सलमान खान की जमानत, तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमत्री जयललिता की आय से अधिक संपत्ति मामले में रिहाई, सिक्ख विरोधी दंगों के मामले में जगदीश टाइटलर व सज्जन कुमार को सजा न मिल पाना आदि इसी तरह के दोमुंहे मामले हैं। ऐसे भी ये भी गौरतलब होगा कि न्यायपालिका पर कार्यपालिका की सर्वोच्चता को बहाल करने वाला ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन दोनों सदनों में 24 घंटे के भीतर पास हो गया था।

मीडिया की जनहित की सूचनाओं में कम, प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी में ज्यादा रुचि रहती है। पार्टियों का हाल ये है कि उनके संगठन आए दिन ऐसी कारगुजारियां कर रहे हैं, जिससे कानून व्यवस्था के हालात बिगड़ें। ये भी अनायास नहीं, बल्कि सरकारों, पार्टियों, उनके संगठनों और मीडिया के स्वतःस्फूर्त तालमेल से हो रहा है। जो संगठन इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें सरकार और मीडिया दोनो देशद्रोही तक करार देने से नहीं चूकते हैं लेकिन खुद सत्ताधारियों और मीडिया को अब न्याय पालिका के जनहितकारी फैसले कुछ ज्यादा ही चुभने लगे हैं। यह उसी तरह का एक गंभीर संकेत है, जैसे बोफेर्स प्रकरण सामने आने पर दफ्तरों के बाबू बेशर्मी से कहने लगे थे कि देश का प्रधानमंत्री ऐसा कर सकता है तो वे घूस क्यों नहीं ले सकते हैं। 

जयप्रकाश त्रिपाठी 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal meets Justice Majithia

The Chief Minister of Delhi, Mr. Arvind Kejriwal, met Justice G.R.Majithia at the Delhi Secretariat. The two discussed the Majithia Wage Board recommendations. Justice Majithia also shared several experiences with the Chief Minister of the times when the wage board was working. “I assure you that I will get the Majithia Wage Board recommendations implemented in Delhi,” the Chief Minister told Justice Majithia. 

Mr. Kejriwal also told that it was a big honour for him that Justice Majithia came personally to meet him. Justice Majithia congratulated the Chief Minister and wished him the best for his future endeavors. Many journalists from different media houses met me complaining that their owners not paying them due wages as per SC order. Chief Minister assured them that Delhi govt will do everything possible to get them their legitimate rights.

Working in that direction, Delhi government on decided to appoint a special officer to supervise the implementation of Justice GR Majithia Wage Board for journalists and other employees of print news organizations. Chief Minister have directed the department of labor to submit a report on the status of implementation of the report, which would be beneficial to thousands of employees working in different news organisations.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हाय अरुणा, तुमको कैसे मिलेगा इंसाफ

अरुणा शानबाग इस दुनिया में नहीं है। हां वही अरुणा जो अपने सहकर्मी की यौन प्रताड़ना का शिकार होने से बचने के लिए उसके गुस्से का इस कदर शिकार हुई कि पूरे 42 साल हर रोज मरती रही, फिर भी जिन्दा रही। अब तक ज्ञात जानकारी के अनुसार महिला प्रताड़ना की शिकार शायद अरुणा ही वो अकेली ज़िन्दा लाश थी जो 23 नवंबर 1973 यानी लगातार 42 वर्षों से एक बिस्तर पर सिमटी रही। सचमुच किसी कहानी के जैसे है अरुणा की हकीकत लेकिन सच्चाई यही है कि यह कहानी नहीं हकीकत है। 

इस देश में न जाने कितनी अरुणा और कितनी निर्भया यूं ही क्रूर वहशियों के हवस का शिकार होती रहेंगी या बचने के लिए तिल- तिल कर मरती रहेंगी, इसका जवाब नित नई इंसानी सभ्यता से विकसित होने वाली दुनिया में किसी के पास नहीं है। अब जरूरत है ऐसे मामलों में कठोर कानून और त्वरित फैसले की।

कर्नाटक के शिमोगा जिले की हल्दीपुर की रहने वाली 18 साल की अरुणा एक सेवा भाव के साथ मुंबई के जाने माने केईएम अस्पताल में बतौर जूनियर नर्स का काम करने 1966 में आई थीं। जब वह 24 वर्ष की हुईिं तो उसकी शादी एक डॉक्टर से तय हो गई। समय की पाबंद, काम में ईमानदारए वफादार अरुणा को केईएम अस्पताल की डॉग रिसर्च लेबोरेटरी में काम करते हुए पता चला कि वार्ड ब्यॉय सोहनलाल बाल्मीक कुत्तों के लिए लाए जाने वाले मटन की चोरी करता है। इसे लेकर उसकी सोहन से काफी कहा सुनी हुई और अरुणा ने इसकी शिकायत अस्पताल प्रबंधन से कर दी। 

तभी से सोहन उससे  रंजिश रखने लगा और बदला लेने यौन हिंसा की फिराक में था। मौका लगते ही सोहन ने 27 नवंबर 1973 को उस पर हमला किया और कुत्तों को बांधे जाने वाली चेन से गलाघोंटकर मारने की कोशिश भी की। इससे अरुणा के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाई और पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। अरुणा को बेहोश देख वहशी सोहन ने बलात्कार की कोशिश भी की। इसकी जानकारी 28 नवंबर 1973 को लगी जब एक सफाई कर्मी ने उसे खून से लथपथ बेहोश पाया। इस घटना के बाद अरुणा जो नीम बेहोशी में गई वो 18 मई को उसकी मौत के बाद ही चिरनिद्रा बन टूटी। 

केईएम अस्पताल प्रबंधन ने इंसानियत की जो मिसाल कायम की वो जरूर काबिले तारीफ है। रिश्तेदारों ने भी उससे नाता तोड़ लिया और इन 42 वर्षों में न कोई मिलने आया न किसी ने कोई खोजए खबर ही ली। बस अस्पताल में नर्स और स्टाफ ही उसकी सेवाए परिवार के सदस्य की तरह करते थे। किसी के लिए वो ताई थी तो किसी के लिए मां तो किसी की बड़ी बहन ।  

अरुणा के लिए उसकी सहेली पत्रकार पिंकी वीरानी ने तकलीफों का ज़िक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट में 18 दिसंबर 2009 को एक अपील दाखिल की और प्रार्थना की कि उसे नीम बेहोशी की हालत में 36 साल हो गए हैं, अतः इच्छा मृत्यु दे दी जाए।  कोर्ट ने एक स्वास्थ दल गठित कियाए उसकी रिपोर्ट आई और 7 मार्च 2011 को अपील तो खारिज कर दी लेकिन पैसिव यूथेनेशिया के पक्ष में फैसला जरूर दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐक्टिव यूथेनेसिया गैरकानूनी है। असामान्य परिस्थितियों में पैसिव मर्सी यूथेनेसिया की इजाजत दी जा सकती है। ऐक्टिव यूथेनेसिया में गंभीर बीमार मरीज को मौत का इंजेक्शन दिया जाता जबकि पैसिव यूथेनेसिया में लाइफ सपोर्ट सिस्टम धीरे धीरे हटा लिए जाते हैं। साक्ष्य, हालात और चिकित्सा के मद्देनजर माना गया कि अरुणा को इच्छा मृत्यु की जरूरत नहीं है। यह भी कहा कि इच्छा मृत्यु से जुड़ा कोई कानून नहीं है, अतः असामान्य परिस्थियों में ही पैसिव यूथेनेसिया दिया जा सकता है। 

अरुणा मस्तिष्कीय रूप से मरकर भी जिन्दा रही। बाद में पिंकी वीरानी ने अरुणा पर एक किताब भी लिखी अरुणाज स्टोरी, इसमें उसकी पूरी कहानी को बयां किया। दत्त कुमार देसाई ने भी उस पर मराठी में एक नाटक कथा अरुणाची लिखा, जिसका जाने माने रंगकर्मी विनय आप्टे के निर्देशन में सन् 2002 में मंचन भी किया गया। अरुणा की करुणा समाज में चर्चा का विषय बनी लेकिन बस चर्चाओं तक ही।  

घटना के बाद अरुणा के आरोपी सोहन पर हत्या का प्रयास, बलात्कार और कान की बाली छीनने का मुकदमा चला, बलात्कार सिध्द नहीं हो पाया सो उसे सात साल की सजा हुई जिसे मजे से काटकर वो बाहर निकल आया। सबको पता था सोहन का अपराध क्या था, परिस्थितियां भी चीख चीखकर कह रही थीं, जब सोहन पर फैसला सुनाया जा रहा था, तब भी अरुणा बेसुध अस्पताल में पड़ी थी। यकीनन फैसला क़ानून के हद में आना था और आया भी। सोहन का गुनाह इतना ही साबित हो पाया कि मुज़रिम जरूर है लेकिन हत्या के प्रयास का, उसे चोट पहुंचाने का और बालियां छीनने का। 1974 में इन्हीं जुर्मों में 7 साल की सजा दी गई। 

विडंबना देखिए, फैसला सुनाते वक्त भी अरुणा बेहोश थी, सजा पूरी करके सोहन बाहर आया तब भी अरुणा बेहोश थी और अब जब 42 साल बाद अरुणा की मृत्यु हो गई है तो कानून फिर जागेगा, धाराएं बदल जाएंगी यानी अब सोहन हत्या का मुज़रिम होगा। नए सिरे से हत्या का मुक़दमा चलेगा। पता नहीं सोहन कहां है ज़िन्दा है भी या नहीं, अपराध घटित करते वक्त करीब करीब अरुणा का हम उम्र रहे सोहन की उम्र भी अब 65-70 साल की हो गई होगी। ऐसी ही एक दूसरी विडंबना भी निर्भया मामले में नाबालिग आरोपी को समान अपराध का दोषी होने के बावजूद विहित कानून के अनुसार नरमी बरतते हुए सजा दी गई।  

जनमानस का विश्वास तो न्याय की तुला पर है लेकिन सवाल फिर भी न्याय प्रणाली और विहित कानूनों पर है। 42 साल पहले यौन हिंसा और शारीरिक उत्पीड़न की शिकार अरुणा मौत के वक्त यानी 18 मई 2015 को करीब 67 साल की थी। अरुणा की कहानी में दामिनी ;निर्भयाद्ध से कम मार्मिक करुणा नहीं है।  सवाल एक ही, क्या दोनों को न्याय मिला, उत्तर है हां मिला कानून की दृष्टि से जरूर मिला। घटना के बाद की स्थितियां, अरुणा की नीम बेहोशी, हमेशा के लिए सुध बुध खो बिस्तर पर जि़न्दा लाश की माफिक सिमट जाना, न बोल पाना, न सुन पाना, न कुछ समझ पाना, चलना फिरना तो दूर की बात रही। कानून के तकाजे में इसका दण्ड भले ही कुछ भी हो लेकिन इंसानियत के तकाजे में इसे न्याय कहेंगे या अन्याय पता नहीं। 

क्या लगता नहीं है कि ऐसे कानूनों को बदलना, समय के साथ अपरिहार्य हो गया है। अपराध की जघन्यता, अपराधी की मंशा, प्रताड़ित की प्रताड़ना का हिसाब- किताब हो न कि धाराओं में सिमटा कानून 42 साल तक अरुणा को कोमा में पहुंचा चुके अपराधी को महज 7 साल की सजा दे और नाबालिग की बिना पर दामिनी का एक दोषी सजा में नरमी का हकदार हो जाए।

लेखक एवं पत्रकार ऋतुपर्ण दवे से संपर्क : rituparndve@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को संपादक ने काम से रोका, दोनो में मारपीट होते होते बची, माहौल तनावपूर्ण

भोपाल : मजीठिया वेतनमान की मांग को लेकर दैनिक जागरण के सीईओ संजय गुप्ता के खिलाफ नई दुनिया, भोपाल के कर्मचारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर होने के बाद जागरण अखबार प्रबंधन बौखला गया है। छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को काम से रोकने पर गत दिनो यहां नई दुनिया के संपादक से मारपीट होते होते रह गई। इसके बाद दफ्तर का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है।   

बताया गया है कि जागरण प्रबंधन नई दुनिया भोपाल के कर्मचारियों को प्रताड़ित करने लगा है, जिसको लेकर वहां माहौल तनावपूर्ण हो गया है। इसकी एक बानगी विगत दिनो उस समय देखने को मिली, जब नई दुनिया के सीनियर जर्नलिस्ट और क्राइम रिपोर्टर समर सिंह यदुवंशी छुट्टी से लौटकर कार्यालय ड्यूटी पर पहुंचे। 

यदुवंशी को ऑफिस में देखते ही संपादक सुनील शुक्ला ने सिटी चीफ को आदेश दे दिया कि समर से कोई काम न लिया जाए। इसके बाद शुक्ला ने समर को अपने चैंबर में बुलाकर उनसे छुट्टी से लौटने के बहाने आपत्तिजनक बातें कहीं। इस पर समर ने भी मुंहतोड़ जवाब देते हुए खरीखोटी सुना दी। दोनों के बीच लगभग बीस मिनट तक आपस में वाद-विवाद हुआ।

बताया जाता है कि मामला इतना बढ़ गया कि बीच बचाव के लिए स्टेट ब्यूरो और अन्य डेस्क के मीडियाकर्मियों को संपादक के चैंबर में घुसना पड़ा। संपादक हमला ही करने वाले थे कि उन्हें लोगों ने पकड़ कर रोक लिया। इस घटनाक्रम के बाद से यहां के संपादकीय स्टॉफ में काफी रोष है। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति ने अपने पूरे पत्रकारीय जीवन में केवल मेडिकल बीट की रिपोर्टिंग की है, उसको जागरण मैनेजमेंट ने यहां का संपादक बना दिया है। जब तक प्रबंधन चुप था तो हम भी चुप रहे। अब यदि हमे परेशान किया जाएगा तो संपादक समेत अन्य अधिकारियों को भी लेबर कोर्ट में घसीटा जाएगा। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अजमेर में ट्रेनिंग ले रहे हैं देश के प्रथम नेत्रबाधित न्यायाधीश

अजमेर : बहुत शीघ्र आप एक ऐसी अदालत देखेंगे, जिसके न्यायाधीश नेत्र बाधित होंगे। यहां इन दिनो ब्रम्हानंद शर्मा जज की ट्रेनिंग ले रहे हैं। वह देश के संभवतः पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश बनने जा रहे हैं। उनका चयन पिछले दिनों ही राजस्थान न्यायिक सेवा में हुआ है। ब्रम्हानंद उस आखिरी बैच के हैं, जिन्हें राजस्थान लोक सेवा आयोग ने चुना है। अब राजस्थान हाईकोर्ट मजिस्ट्रेटों की भर्ती करेगा।

भीलवाड़ा जिले के आसींद के रहने वाले ब्रम्हानंद शर्मा न्यायाधीश पद के लिए चयनित होने से पहले एक साल भीलवाड़ा कलेक्ट्रेट और उसके बाद करीब सालभर सार्वजनिक निर्माण विभाग में कनिष्ठ लिपिक रहे हैं। 7 अगस्त, 1973 को जन्मे ब्रम्हानंद शर्मा आयु की दृष्टि से अपने बैच में सबसे बड़े ही नहीं, जज्बा भी सबसे अधिक रखते हैं, वह अब ये साबित करने के मोहताज नहीं हैं। 

द्वितीय श्रेणी से सेवानिवृत्त शिक्षक रामस्वरूप शर्मा के बेटे ब्रम्हानंद की ज्यादातर पढ़ाई भीलवाड़ा में हुई। समाज शास्त्र में एमए के बाद उन्होंने भीलवाड़ा के राजकीय विधि महाविद्यालय से एलएलबी भी की। ब्रम्हानंद की पढ़ाई अभी छूटी नहीं है। वे वर्द्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट में एलएलएम भी कर रहे हैं।

ब्रम्हानंद बताते हैं कि उनके पास एक सॉफ्टवेयर है, जिसमें लिखी या टाइप की  हुई सामग्री को स्कैन कर कम्प्यूटर में अपलोड कर दिया जाता है। सॉफ्टवेयर उस सामग्री को आवाज में बदल देता है। इस तरह वह सुनकर मुकदमे की पूरी फाइल समझ लेंगे। पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी भी तो इसी तरह की है। उनका मानना है कि भविष्य में आने वाले ई-कोर्ट उनके लिए वरदान साबित होंगे। 

ये संयोग ही कहा जाएगा कि ब्रम्हानंद शर्मा के रूप में पहले नेत्रबाधित न्यायाधीश अजमेर की उसी अदालत परिसर में हैं, जहां आजादी के पहले देश के पहले नेत्रहीन वकील मुकुट बिहारी लाल भार्गव वकालत किया करते थे। भार्गव देश की संविधान निर्मात्री सभा के एक मात्र नेत्रहीन सदस्य थे और पहली भारतीय संसद के पहले नेत्रहीन सदस्य थे। वे अजमेर के पहले लोकसभा सदस्य चुने गए थे। भार्गव ब्रिटिशकाल में हाईकोर्ट का दर्जा रखने वाली अजमेर-मेरवाड़ा यूनियन प्रोविन्स के ज्यूडिशियल कमिश्नर की अदालत, लंदन की प्रिवी कौंसिल और आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत किए थे।  

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमरे के जाने-माने वकील और पत्रकार हैं. उनसे संपर्क ”राजेंद्र हाड़ा, 860/8, भगवान गंज, अजमेर- 305 001” या 09829270160 व 09549155160 या rajendara_hada@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

WE WANT JUSTICE : दुराचारी मनोज के खिलाफ एम्स पर जोरदार प्रदर्शन

नई दिल्ली : बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं एवं युवाओं ने गत दिनो एम्स पर जोरदार विरोध प्रदर्शन करते हुए रजिस्ट्रार (एम्स प्रशासन, दिल्ली) डॉ. संजीव लालवानी से एक छात्रा के साथ दुराचार के आरोपी मनोज कुमार के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की मांग की। छात्र छात्राओं ने पूरे एम्स दिल्ली परिसर में शांति मार्च किया और ‘WE WANT JUSTICE’ के नारे के साथ न्याय की मांग की। इस शांति प्रदर्शन में मुख्य रूप से सामाजिक कार्यकर्ता विजय बाबा, फिल्म डायरेक्टर मयंक मधुर, 16 दिसम्बर क्रांति के कार्यकर्ताओं, भारतीय स्वराज मंच, यंग इंडिया यूथ की आवाज़ के कार्यकर्ताओं समेत सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष (एफआईआर संख्या 947/14) यह मामला हौजखास पुलिस थाने में दर्ज हुआ था, जिसमें नार्थ ईस्ट की आईसीएमआर की छात्रा को हवस का शिकार बनाने वाले मुख्य आरोपी मनोज कुमार को गिरफ्तार करने की मांग की गई थी। आरोपी मनोज कुमार श्यामपुर, आदापुर, मोतिहारी बिहार का रहने वाला है और वह एम्स दिल्ली में पीएचडी स्कॉलर है। अपराध करने के इतने दिन बाद भी एम्स प्रशासन आरोपी को अपने होस्टल और लैब में रहने से भी नहीं रोक सका है। 

सूत्रों से पता चला है कि एम्स प्रशासन मनोज कुमार को तत्काल प्रभाव से डिग्री अवार्ड करने की पूरी तैयारी कर रहा है। छात्र और युवाओं ने तुरंत आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एक ज्ञापन भी एम्स प्रशासन को दिया। ज्ञापन में विशाखा गाइड लाइन के तहत आरोपी को तुरंत संस्थान से बर्खास्त करने, संस्थान खाली करने और संस्थान में उसके प्रवेश पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई है। ज्ञापन लेते हुए एम्स दिल्ली के रजिस्ट्रार ने प्रदर्शनकारी छात्र-छात्राओं एवं युवाओं को दस अप्रैल 2015 से पहले आरोपी के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिया। 

पीड़ित छात्रा घटना के दिन से अब तक न्याय की उम्मीद में हर उस दरवाज़े पर दस्तक देती रही, जहाँ से उसे इंसाफ पाने का भरोसा था लेकिन छह महीने के संघर्ष और न्याय की गुहार के बावजूद उसकी आज तक कहीं सुनवाई नहीं हो सकी है। पीड़िता अब तक प्रधानमंत्री कार्यालय, केन्द्रीय स्वाथ्य मंत्री जे.पी नड्डा, महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्री मेनका गाँधी, केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान, मधेपुरा सांसद पप्पू यादव, डिप्टी डायरेक्टर एम्स दिल्ली श्रीनिवासन, तत्कालीन एम्स सीवीओ संजीव चतुर्वेदी तक गुहार लगाकर थक जाने के बाद अब छात्र-छात्राओं और युवाओं की मदद से सड़क पर उतरने को मजबूर हुई है।

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

New Delhi : Students and youth in a group protested in AIIMS, New Delhi, demanding action against rape accused Manoj Kumar. PhD student of Dept. of Lab Medicine, Dept. of Microbiology, AIIMS. The protesters met the Registrar, Dr Sanjeev Lalwani, AIIMS, New Delhi.

Last year, on 27th of August 2014, FIR was registered in Hauz Khaz Police Station belonging to FIR no. 947/14. The accused Manoj Kumar has raped a student of ICMR, New Delhi, belonging to North East state. The accused belongs to Shyampur, Adapur, Motihari, Bihar.

Even after committing such a heinous crime and also been found guilty of sexual harassment in full public view at victims institute. The rapist has been allowed to stay AIIMS campus and he is still pursuing his PhD.

The protesters has given a memorandum asking for necessary action to be taken by the authorities till 10 April 2015. The memorandum includes demands for immediate suspension of the accused as per Vishakha guidelines debarring the accused from entering the AIIMS campus and evacuate his hostel room. These 3 demands has been put before the AIIMS authorities.

The victim has been knocking every door for the past 7 months for justice but not a single assurance has been given though PMO, health minister J.P. Nadda, WCD minister Maneka Gandhi, Central minister Ram Vilas Paswan, HRD minister for state Upender Khushwaha, MP Pappu Yadav, Deputy Director of AIIMS, then AIIMS CVO Sanjeev Chaturvedi, all assured help but no proper action has been taken till yet.

When will this brutality stop in India? If such heinous crimes can happen in a premier institute like AIIMS, which is shielding a rapists than how come people living in far remote places ensure safety and security.

The protesters march across AIIMS campus Delhi, shouting slogans, “We want Justice”. Among the protesters there were social activists Vijay Baba, film director Mayank Madhur, 16 December Kranti activists, Bhartiya Swaraj Manch and “Young India Youth ki Awaaz”, were present.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Is India not a racist society ?

Consider the following: (1) Do we not prefer white coloured skin to dark coloured skin among men and women ? (2) Do fair complexioned girls not have a better prospect for marriage ? iIn matrimonial ads why is it often mentioned that the girl is fair complexioned ?

(3) When a baby is born, why do grandmothers become happy if the baby’s complexion is ‘saaf’ i.e. fair ? (4) When I was in Tamilnadu ( as Chief Justice ) I saw that almost all roadside hoarding ads showed girls with fair complexion, not dark complexion (5) Why are there creams ( e.g. ‘Fair and Lovely’ cream ) to make one’s skin colour fairer ? Why not creams which make it darker ?

(6) The word ‘varna’ in the expression ‘varna vyavastha’ ( i.e. caste system ) literally means ( in Sanskrit ) colour (7) Even today, ‘upper castes’ are proportionately fairer in complexion than scheduled castes ( though it is true that there are also several dark coloured.upper caste people, and several fair coloured SCs )

 This supports the theory that at one time in our history a white coloured race entered India and conquered a dark coloured race. It is well known that the conquerors impose their values, and since the conqueror was white coloured, white skin was regarded superior to dark skin. Colour is really relative. If a dark coloured race had conquered a fair coloured race, then dark skin would have been regarded as superior.

from Justice Katju Blog’s

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: