विजय मनोहर तिवारी-
मीडिया के विद्यार्थियों को हमारे समय की “द सूत्र’/ दीया कुमारी जैसी कुछ चर्चित केस स्टडी के माध्यम से यह बताना भी जरूरी है कि उन्हें क्या नहीं करना है, क्या अवश्य ही करना है और उनके कुछ भी किए के राजनीति और समाज में क्या-क्या अर्थ लगते हैं!
गुरुदत्त तिवारी से मुझे ज्ञात हुआ था कि जयपुर से आई पुलिस अचानक भोपाल से आनंद पांडे और हरीश दिवेकर को अपने साथ ले गई है। सबको लगा था कि दिवाली के पहले उठाने का अर्थ ही है कि उन्हें चार-छह दिन बाद ही छूटने का अवसर मिलेगा और इतना समय किसी की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए काफी है। मगर जयपुर पहुँचकर केवल छह घंटे बाद ही एक उदार पूछताछ की रस्म के बाद उन्हें विदा कर दिया गया। जिसे सुतली बम समझा जा रहा था, वह मामूली सी बचकाना चिटपिटी निकली।
आनंद पांडे भोपाल के एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। मध्यप्रदेश में नईदुनिया और दैनिक भास्कर के अनेक प्रमुख संस्करणों में संपादक बनकर लौटने के पहले वे दिल्ली में थे। हरीश दिवेकर को दैनिक भास्कर लाने के प्रयास हुए थे मगर उनके आने का योग नहीं बना।
अखबारी दुनिया में यह एक कटु सत्य है कि एक उम्र के बाद अवसर बहुत सीमित हैं। अनेक राज्यों में अनेक संस्करणों की श्रृंखला वाले बड़े अखबार समूहों में कुछ गुंजाइश है मगर वहाँ भी प्रबंधन अपनी आवश्यकता और हर दिन की नई चुनौतियों से निपटने के लिहाज से ही बढ़ती उम्र और अनुभव वालों का सीमित उपयोग करना चाहते हैं। आर्थिक मोर्चे पर कठिनाई नहीं है लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर हर दो-तीन साल में एक राज्य से दूसरे राज्य और एक शहर से दूसरे शहर में काम करना हर किसी के बूते की बात नहीं है।
डिजिटल मीडिया ने नए दरवाजे खोले हैं और मीडिया की ऊर्ध्वगामी यात्रा के लिए अब दिल्ली एकमात्र केंद्र नहीं रह गई है। कोई लखनऊ या भोपाल या जयपुर में होकर भी डिजिटल खिड़की से विश्वव्यापी हो सकता है। केवल दो-तीन साल के भीतर अनेक यूट्यूब चैनलों की फॉलोइंग लाखों तक जा पहुँची है। इनके विषयों के विस्तार स्थानीय, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, साहित्यिक, सिनेमा, राजनीतिक, सामाजिक, न्यायिक, पर्यावर्णिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पर्यटन और खानपान तक फैले हुए हैं। हरेक का अपना दर्शक और श्रोतावर्ग है।
कंटेंट की विश्वसनीयता ही उन्हें हर दिन नई ऊंचाई दे रही है। अजित भारती को आप सुनिए तो लगेगा कि चीजों को इस एंगल से देखने की कितनी जरूरत थी। प्रवीण मोहन आपको पुरातत्व के ऐसे-ऐसे राज बताएंगे कि एएसआई समेत देश भर के पुरातत्व विभागों को आप चुल्लू भर पानी में डूब मरने का इशारा करेंगे। संजय दीक्षित ने अपना एक दर्शक विशाल वर्ग खड़ा किया है। प्रदीप सिंह का “आपका अखबार’ किसी तैश में आए बिना तात्कालिक राजनीतिक मसलों पर एक स्पष्ट विश्लेषण पेश करता है।
आनंद पांडे और हरीश दिवेकर ने मिलकर “द सूत्र’ की आकर्षक स्थापना भोपाल में की थी। दैनिक भास्कर के पड़ोस में ही एक समय के नंबर वन और अब पूरी तरह डूब चुके नवभारत नाम के अखबार की इमारत की एक फ्लोर पर विशेष रूप से डिजाइन ऑफिस और स्टुडियो में “द सूत्र’ ने अपना बीजारोपण किया था। यह घर बैठे एक यूट्यूब चैनल चलाने से अलग बिल्कुल प्रोफेशनल अंदाज में किया गया आगाज था। आनंद दैनिक भास्कर से निकले थे और अपने प्रोडक्ट को धूमधड़ाके और पूरी तैयारी के साथ कैसे पाठकों और दर्शकों के बीच प्रभावी ढँग से लाना है, इसकी अच्छी खासी ट्रेनिंग उन्हें थी।
राजनीति में मेरी बहुत रुचि नहीं है। मेरे राजनीतिक संपर्क भी लगभग शून्य ही हैं। इसलिए मुझे हमेशा लगता है कि भारतीय मीडिया में राजनीति को इतना अधिक महत्व दिया ही क्यों जाता है? मगर जो अपने राजनीतिक संपर्कों से राजनीति की अंदरुनी बारहखड़ी जानते हैं केवल वे ही समझते हैं कि राजनीति में रस किस मात्रा में कब और किस मौसम में कितना पाया जाता है?
मेरा मानना रहा है कि भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक देश में दूसरे विषय इतने अधिक हैं कि हम अपने दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों की अभिरुचियों को समृद्ध कर सकते हैं। समाज के लिए कुछ भी अच्छा करने का भाव अगर आपमें है तो राजनीति एक श्रेष्ठ विकल्प तो नहीं ही है। आप शानदार पत्रकारिता के जरिए भी समाज को बेहतर बनाने के प्रयास कर सकते हैं और वो भी राजनीति से परे रहकर।
मैंने अपने पूरे पत्रकारीय कॅरिअर में मिले एकमात्र राजनीतिक रिपोर्टिंग के अवसर को बेमन से ही पूरा किया और बाहर आ गया था। मुझे कोई रस नहीं आया कि पार्टी के दफ्तरों में टहलूं। नेताओं से नजदीकी बनाऊँ। उनके बकवास भाषणों की मुँह पर तारीफें करूँ। इधर-उधर की सूचनाएँ लेता-देता फिरूँ। मुझे यह समय और ऊर्जा नष्ट करने वाला काम अधिक लगा।
मुझे जमीनी रिपोर्टिंग में ही आनंद आया। वह मेरी रुचि की बात थी। मगर यह भी सच है कि सामंती पृष्ठभूमि से निकलकर स्वतंत्र हुए भारत में राजनीति ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो जीवन के हर क्षेत्र में दखल रखती है। इसलिए उसके प्रति संन्यासी भाव से नहीं रहा जा सकता।
जिन पत्रकारों ने भी प्रोफेशनल ढँग से अपने मीडिया प्लेटफॉर्म सफलतापूर्वक बनाए और चला पाए, यह सवाल सबके मन में रहा कि उनके रेवेन्यू मॉडल क्या हैं? अखबारों में विज्ञापन जुटाना एक कठिन काम है। साप्ताहिक या पाक्षिक प्रकाशन आर्थिक रूप से आत्मघाती जोखिम हैं। डिजिटल मीडिया में भी विज्ञापनों का गणित सब्सक्राइबर्स की बढ़ती तादाद और हर दिन मिलने वाले हिट्स पर निर्भर है। टीवी में वही टीआरपी है।
अपनी जमापूंजी लगाकर कुछ कर्जा वगैरह लेकर अनुभव संपन्न पत्रकारों ने नए-नए प्रयोग किए। कुछ सफल हुए। कुछ सफलता की आशा में लगे हुए हैं। कुछ लोग नुकसान उठाते हुए शस्त्र समर्पण कर बैठ गए। भोपाल में ही दीपक तिवारी ने जोश-खरोश से “जोश’ नाम के एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जोश पैदा करने की कोशिश की थी। मुझे नहीं पता कि आज वह किस हाल में है? जबकि उनका शुरुआती कंटेंट मुझे बहुत अच्छा लगा था।
अनेक नए न्यूज चैनलों ने अपनी असरदार उपस्थिति दर्ज कराई जिनमें नामचीन पत्रकार अपने बड़े ब्रांड छोड़कर जुड़े। इनके पीछे लगे धन और साधनों का स्त्रोत भी सबके संज्ञान में है। कुलमिलाकर करोड़ों रुपए के खर्चों वाले इस कठिन मैदान में अगर कोई डटा-टिका है तो वह यूं ही नहीं है। कंटेंट ही सर्वोपरि है। एक बार कंटेंट के बूते हिट हो गए तो कुमार विश्वास भी कविता से कई पायदान ऊपर कथा तक की रथयात्रा पूर्ण कर लेते हैं। कंटेंट महत्वपूर्ण है और उसके लिए धैर्य, सतत प्रयास और अथक परिश्रम आवश्यक हैं।
आनंद पांडे और हरीश दिवेकर जब जयपुर के रास्ते में होंगे तब मैंने “द सूत्र’ पर दीया कुमारी से संबंधित कुछ पोस्टर चमकते हुए देखे, जिन पर बड़े अक्षरों में लिखा था-दीया तले अंधेरा। इन्हीं से मुझे पता चला कि “द सूत्र’ ने राजस्थान में भी अपना परचम फहराया है। मध्यप्रदेश से निकलकर दूसरे राज्य में पहुंचना यह बताता है कि इस पत्रकार जोड़ी ने धैर्य और प्रयासपूर्वक अपनी यात्रा जारी रखी। एक राज्य से दूसरे राज्य में यह एक बड़ी छलांग ही थी।
चेहरे-मोहरे से अत्यंत सौम्य दीया कुमारी के बारे में मैंने पढ़ा था कि वे राज परिवार से आती हैं। किसी स्थापित पृष्ठभूमि और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले राजनेताओं की कार्यशैली में कुछ अंतर स्पष्ट होते हैं। जैसे मेरा मानना है कि राज परिवार की पृष्ठभूमि से आए नेता दूसरे नेताओं की तरह राजनीति नहीं करेंगे। वे अकूत संपत्तियों के जन्मजात पैतृक अधिकारी हैं। राजपाट समाप्त होने के बावजूद उनके पास बेहिसाब दौलत हैं। उनकी प्रतिष्ठा पारिवारिक हैं। वे दूसरे नेताओं की तरह केवल पद की मोहताज नहीं हैं। सच-झूठ जो भी हो, किंतु जो खबरें दीया कुमारी को लेकर “द सूत्र’ में आईं, वे मेरी इस धारणा के विपरीत थीं।
मैं आनंद पांडे और हरीश दिवेकर को एक साथ विश्वविद्यालय में सुनने को उत्सुक हूँ। डिजिटल मीडिया ने मीडिया में आने वाली नई पीढ़ी के लिए नई उम्मीदों से भरा है। अब वे केवल नौकरियों के भरोसे नहीं रह गए हैं। कुछ सालों के अनुभव के बाद वे भी अपने लिए अपने प्लेटफॉर्म खड़े कर सकते हैं, जिनके कई मॉडल हमारे आसपास एकल और सामूहिक प्रयासों से सफलतापूर्वक स्थापित हैं। मैं तो चाहूँगा कि दीया कुमारी को भी विश्वविद्यालय में आमंत्रित करूँ। वे भी मीडिया के बारे में अपनी राय रखें। अगर कोई खबर विवादों के रूप में सामने आ ही गई है तो सबके सच सबको पता होने चाहिए।
मीडिया के विद्यार्थियों को हमारे समय की ऐसी कुछ चर्चित केस स्टडी के माध्यम से यह बताना भी जरूरी है कि उन्हें क्या नहीं करना है, क्या अवश्य ही करना है और उनके कुछ भी किए के राजनीति और समाज में क्या-क्या अर्थ लगते हैं!
तो अगली मास्टर क्लास बड़ी रोचक होने वाली है…


