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सुख-दुख

राजकुमार, नाना पाटेकर यहां तक अमिताभ बच्चन तक को नचाने वाले फिल्ममेकर मेहुल कुमार को लेबर कोर्ट जाना पड़ा!

धर्मेंद्र प्रताप सिंह सोमवंशी-

कोर्ट रूम के यादगार दृश्य फिल्माने वाला फिल्मकार क्यों पहुंचा लेबर कोर्ट?

आज मैं मुंबई स्थित लेबर कोर्ट गया था, जहां मेरी तारीख थी। कोर्ट रूम के बाहर गलियारे की एक कुर्सी पर फाइलों के पन्ने पलट रहा वह शख्स मुझे काफी परेशान नज़र आ रहा रहा था… मेरी नज़रें बार-बार उसी पर जा टिकतीं, वह शख्स भी बीच-बीच में मुझ पर अपनी नज़र-ए-इनायत कर देता था… हालांकि जब हमारी नजरें आपस में टकरा जातीं, हम दोनों ही एक-दूसरे को नजरंदाज कर दूसरी ओर देखने लग जाते थे!

इस शख्स की सेवा में लगे दो युवकों को देख कर अहसास तो हो गया था कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है, पर दिमाग पर जोर देने के बावजूद मैं याद नहीं कर पा रहा था कि मैं उससे कहां और क्यों मिला हूं?

कुछ देर बाद में दो महिलाएं; जो पेशेवर वकील लग रही थीं, वहां आ कर उस शख्स के पास पड़ी कुर्सी और बेंच पर बैठ गईं… उन सब में कुछ बातें हुईं और वह शख्स फिर से फाइलों में खो गया। आखिर मैं रुक नहीं सका, मैं भी बेंच के एक किनारे और उस शख्स के बिल्कुल पास जा कर बैठ गया।

अब सीनियर महिला ने जैसे ही उससे कुछ पूछा; मेरे बगल बैठे शख्स ने जवाब दिया, आवाज पहचानते ही मेरे मुंह से निकल गया- ‘मेहुल जी… मेहुल कुमार?’ ‘जी’ कहते हुए उस शख्स ने मुझे पहचानने की कोशिश की। असल में यह कोई और नहीं, सुपर-डुपर हिट गुजराती फिल्म ‘मेरु मालन’ (जिसका बहुचर्चित गीत ‘के ओढ़नी ओढूं ओढूं ने उड़ी जाए…’ भारत की कई भाषाओं में बन चुका है) सहित ‘मरते दम तक’, ‘जंगबाज’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘मृत्युदाता’ जैसी सुपरहिट और चर्चित हिंदी फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक मेहुल कुमार थे।

मैंने कहा कि सर, मैं धर्मेन्द्र प्रताप सिंह… ‘दैनिक भास्कर’ के लिए बीसों बार मैंने आपका इंटरव्यू किया है! मेहुल जी मुस्कराने लगे- ‘हां हां, मैं भी आपको देखते हुए यही सोच रहा था कि आपसे कहां मुलाकात हुई है?’ बहरहाल, मैं सीधे मुद्दे पर आ गया- ‘आप यहां क्यों? मेहुल जी काफी दुखी लग रहे थे, ‘क्या बताऊं? मेरे ऑफिस में काम करने वाले एक व्यक्ति की मेहरबानी है यह!’

‘सर, क्या आपने कभी सोचा था कि राजकुमार, नाना पाटेकर… यहां तक कि अमिताभ बच्चन तक को नचाने वाले फिल्ममेकर को लेबर कोर्ट के चक्कर लगाने होंगे?’ वह हंसने लगे… अब मैंने विदा लेने में ही अपनी भलाई समझी, कारण कि मैंने भी तो अपने संस्थान के मालिकानों को लेबर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में ‘आरोपी’ बना रखा है!

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