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“जालियांवाला बाग” से भयानक कांड है “महुआ डाबर” : 5000 निर्दोषों को घेरकर मारने के बाद एक पूरा गांव जला कर ख़त्म कर दिया!

शाह आलम-

1857 की क्रांति में जब पूरे देश में आज़ादी की चिंगारी धधक रही थी, तब अंग्रेजी हुकूमत ने एक ऐसा जनसंहार किया जिसे जानकर रूह कांप जाए। बस्ती ज़िले के बहादुरपुर ब्लॉक स्थित महुआ डाबर गांव में करीब 5000 निर्दोष भारतीयों को घेरकर मौत के घाट उतार दिया गया। गांव को पूरी तरह नष्ट कर उसके नाम तक को इतिहास से मिटा देने की साजिश रची गई।

3 जुलाई 1857, अंग्रेज कलेक्टर विलियम पेप्पे के नेतृत्व में घुड़सवार फौजों ने महुआ डाबर को चारों ओर से घेरकर हमला कर दिया। बच्चों, महिलाओं, बुज़ुर्गों को बेरहमी से मारकर जलती आग में फेंका गया। घर, दुकानें, करघे सब राख कर दिए गए। गांव को ‘ग़ैर चिरागी’ घोषित कर नक्शे से मिटा दिया गया।

यह गांव कभी छींट कपड़े की अंतर्राष्ट्रीय पहचान रखता था, जहाँ की पूरी आबादी बुनाई, रंगाई और छपाई में लगी थी। मनोरमा नदी के किनारे बसे इस समृद्ध गांव का इतिहास, अंग्रेजों की बर्बरता के नीचे दबा दिया गया।

महुआ डाबर के पास अंग्रेज अफसरों पर हुए गुरिल्ला हमले में कई ब्रिटिश अधिकारी मारे गए थे, जिससे बौखलाए अंग्रेजों ने पूरे गांव को मिटा देने का फैसला लिया। बाद में गुलाम खां, गुलज़ार खां, नेहाल खां, वज़ीर खां जैसे नायकों को फाँसी दे दी गई।

महुआ डाबर के असली स्थान को छिपाने के लिए 50 किलोमीटर दूर गौर के पास एक दूसरा गांव बसाया गया, जिसे ‘महुआ डाबर’ कहा गया, ताकि असली नरसंहार की जगह को भुला दिया जाए।

इतिहास से इसे मिटाने की भरपूर कोशिशें हुईं, लेकिन 2010 में हुई खुदाई ने सच को फिर ज़मीन से बाहर ला दिया—दीवारें, नालियाँ, जले हुए लकड़ी के टुकड़े, प्राचीन सिक्के, और राख… हर चीज़ इस त्रासदी की मूक गवाही दे रही थी।

डॉ. शाह आलम राना, जो क्रांतिकारियों के वंशज हैं, के प्रयासों से 1999 में महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना हुई। अब यह स्थल उत्तर प्रदेश की पर्यटन नीति 2022 के अंतर्गत ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ में शामिल है। 10 जून 2025 से यहाँ हर साल शहीदों को शस्त्र सलामी दी जाती है।

दुख की बात यह है कि जालियांवाला बाग जैसे कांडों को विश्वस्तर पर निंदा और श्रद्धांजलि मिली, लेकिन महुआ डाबर जैसी इससे भी बड़ी घटना पर आज भी गहरी चुप्पी है। न कोई राष्ट्रीय स्मारक, न कोई माफी, न कोई अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति।

महुआ डाबर की राख आज भी इंसाफ की मांग कर रही है। यह कोई इतिहास का पन्ना नहीं, बल्कि हमारी असलियत का वो हिस्सा है जिसे जानना और पहचानना आज हर भारतीय का कर्तव्य है।

करीब पांच हजार निर्दोष भारतीयों की हत्या कर गांव का नामोनिशान मिटा दिया था, महुआ डाबर की कहानी हैरान कर देगी

करीब 5000 लोगों को घेर कर मार दिया गया था और महुआ डाबर नाम के गांव की पहचान मिटा कर करीब 50 किलोमीटर दूर उसी नाम का नया गांव बसा कर असली जगह की पहचान छिपाने की बड़ी साजिश हुई। इतिहास छिप नहीं सकता, दशकों बाद खुदाई में जमीन में दबी गांव की सच्चाई सामने आई, लेकिन हैवानियत की इतनी बड़ी घटना पर गुनहगारों की तरफ से कभी अफसोस का एक लफ्ज तक नहीं कहा गया।
क्रूर अंग्रेजी हुकूमत ने आज से 168 साल पहले 3 जुलाई 1857 को बस्ती जनपद के बहादुरपुर ब्लॉक अंतर्गत महुआ डाबर गांव को अंग्रेजी छुड़सवार फौजों की मदद से तीन तरफ से घेरकर गोलियों से छलनी कर दिया था। बूढ़े-बच्चे, महिलाओं को टुकड़े-टुकड़े करने के बाद आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं महुआ डाबर के सभी मकानों, दुकानों, हरकरघा कारखानों को जमींदोज करके ‘गैर चिरागी’ बना दिया। इतिहास के पन्नों से इस गांव का नाम हमेशा के लिए मिटा दिया गया। महुआ डाबर से सटकर बहने वाली, इस घटना की एक मात्र साक्षी मनोरमा नदी आज भी उदास है।

दरअसल 1857 की क्रांति की चिंगारी जब मेरठ से उठी, तो उसने पूरे भारत को आग की लपटों में झुलसा दिया। गोरखपुर जनपद के बस्ती तहसील पर स्थित अफीम और ट्रेजरी की कोठी पर 17वीं नेटिव इनफेन्ट्री की एक बड़ी टुकड़ी सुरक्षा के लिए तैनात थी। इस यूनिट का मुख्यालय आजमगढ़ में था। 5 जून को आजमगढ़ में विद्रोह शुरू हो गया और 6 जून को सिपाहियों ने आदेश मानने से इंकार कर दिया. इसके बाद 7 जून को जेल से भागने की कोशिश में 20 कैदी मारे गए। गोरखपुर में सिपाहियों ने 8 जून को खजाना लूटने का प्रयास किया, कैप्टन स्टील की अश्वारोही फौजें भी बैकफुट पर आ गईं। फैजाबाद और गोंडा के सिपाहियों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 8 जून को फैजाबाद छावनी पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। 9 जून को ही, आजमगढ़ में तैनात 17वीं नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही अंग्रेजों को खत्म करने के लिए फैजाबाद पहुंचे, उन्होंने सेना का पीछा किया. अंग्रेजों ने उन्हें 1.30 बजे फैजाबाद से पूरब में बेगमगंज के पास घाघरा पर घेर लिया जो 18 मील दूर है, और घाघरा के दाहिने किनारे से उन पर गोलीबारी शुरू कर दी, लेकिन परिणाम यह रहा कि फैजाबाद के अधीक्षक कमिश्नर कर्नल गोल्डनी और मेजर मिल सहित आठ अधिकारी मारे गए या लापता हो गए। शेष अधिकारी भाग निकले और नदी के किनारे जंगल में छिप गए।

रात में 12 बजे इन अधिकारियों को स्थानीय जमींदार ने बस्ती के रास्ते अमोढ़ा की ओर पहुंचाया. उन्हें अमोढ़ा के तहसीलदार ने धन और सुरक्षाकर्मी दिये और लेफ्टिनेंट रिची और लेफ्टिनेंट कॉल्टी के लिए दो खच्चर भी दिए। वे सभी कप्तानगंज पहुँचे और वहाँ से वे बस्ती जाना चाहते थे। वहाँ के जमीदारों ने उन्हें बस्ती न जाने को कहा और गायघाट जाने की सलाह दी क्योंकि 17वीं नेटिव इन्फ़ेंट्री के सिपाही जो अपने साथ ख़ज़ाना लेकर बस्ती-फ़ैज़ाबाद रोड पर मार्च कर रहे थे, बस्ती में रुक गए थे।

10 जून 1857 को अंग्रेजी अधिकारियों का दल और सुरक्षा में तैनात टुकड़ी कप्तानगंज से गायघाट के लिए रवाना हुई, आठ मील की यात्रा के बाद दल महुआ डाबर के पास पहुंचा। जो 15 किलोमीटर दक्षिण में गोरखपुर जिले के तत्कालीन बस्ती तहसील के अंतर्गत थी। यह छींट कपड़ा उद्योग का एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय केंद्र था। लगभग 5,000 की पूरी आबादी कपड़े की बुनाई, रंगाई और छपाई में लगी हुई थी। यहां एक मंजिला और दो मंजिला मकान, पीतल, के बर्तनों का बाजार, अनाज मंडी, स्कूल, ऊँची मीनार वाली मस्जिदें थीं।

मनोरमा नदी पार कर रहे इन अंग्रेज अफसरों पर महुआ डाबर, अमिलहा, मुहम्मदपुर, नकहा आदि गांवों के वीरों ने जिन्होंने अंग्रेजों हुकूमत के खिलाफ जनयुद्ध छेड़ रखा था— गुलाब खां, अमीर खां, पिरई खां, वज़ीर खां, जफ़र अली और अन्य साथियों ने धावा बोल दिया। इस गुरिल्ला युद्ध में लेफ्टिनेंट इंग्लिश, लिंडसे, थॉमस, कॉटली, एन्साइन रिची, सार्जेंट एडवर्ड मारे गए। घायल सार्जेंट बुशर को कलवारी के जमींदार बाबू बल्ली सिंह ने बंधक बना लिया।
ब्रिटिश सरकार महुआ डाबर हमले से बौखला गई। लिहाजा गोरखपुर के जज डब्लू. विनार्ड और कलेक्टर डब्लू. पीटरसन ने वर्डपुर के जमींदार विलियम पेप्पे को बस्ती का डिप्टी मजिस्ट्रेट नियुक्त किया। पेप्पे को आदेश दिया गया कि वह लोगों के विद्रोह को किसी भी तरह से तुरंत कुचल दे।

जमींदार बाबू बल्ली सिंह की कैद से सार्जेंट बुशर 10 दिन बाद रिहा हो सका. 20 जून को बस्ती में मार्शल लॉ लगा दिया गया। 3 जुलाई को गोरखपुर के कलेक्टर पेप्पे विलियम्स ने घुड़सवार फौजों के साथ महुआ डाबर को चारों ओर से घेर कर जला दिया और ‘ग़ैरचिरागी’ घोषित कर दिया। गांव के बचे हुए लोगों के सिर कलम किए गए, संपत्ति जब्त कर राजकोष में जमा कराई गई। गुलाम खां, गुलजार खां, नेहाल खां, घीसा खां सहित कई क्रांतिकारियों को 18 फरवरी 1858 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। महिपत सिंह ने क्रांतिकारियों की मुखबिरी कर तीन हजार रुपये सालाना लगान वाली ज़मीन इनाम में प्राप्त की।

महुआ डाबर के खौफनाक दमन की खबर भारत के कोने-कोने में फैलाई गयी कि जिसने भी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ गर्दन उठाई उसको नेस्तानाबूद कर दिया जाएगा। महुआ डाबर को जमींदोज करने के लिए विलियम पेप्पे को ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुरस्कृत किया और बर्डपुर के आसपास जमीन दी जहां वह एक बड़ी यूरोपीय संपत्ति का मालिक बना।

21 मई 1858 को क्रांतिकारियों ने पेप्पे विलियम्स के ठिकाने पर हमला कर दिया, जिसमें 17 लोग मारे गए। 12 जून 1859 को पेपे पर अंतिम हमला हुआ जिसमें वह घायल हो गया और उसकी एक उंगली कट गई। 6 अक्टूबर 1860 को ‘महुआ डाबर प्रोसीडिंग’ में दर्ज अदालती कार्यवाहियों में विरोधाभास सामने आए, जिनमें गवाहियों और दस्तावेजों की कमी साफ झलकती है। मेहरबान खां को फांसी और दो कर्मचारियों को कालापानी की सजा हुई।

महुआ डाबर एक्शन के क्रांतिवीर जमींदार जफ़र अली मक्का चले गए, फिर लौटकर दोबारा संग्राम में शामिल हुए, बाद में टांडा घाट पर 12 वर्ष बाद पकड़े गए और बस्ती में मुकदमा चलाकर फांसी दे दी गई।

इसके बाद शुरू हुई महुआ डाबर की पहचान हमेशा के लिए मिटा देने की साजिश। महुआ डाबर को जलाने और नक्शे से मिटाने की बर्बरता के गवाह जो लोग बाहर थे, मौके से बच गए, उनकी मौत के बाद एक सोची समझी साजिश के तहत जमींदोज महुआ डाबर से 50 किमी दूर बस्ती-गोंडा सीमा पर गौर के पास दूसरा महुआ डाबर गांव बसाकर पुर्नवास का ढोंग किया गया। 1907 में बस्ती गजेटियर का संकलन करते हुए पृष्ठ संख्या 158 पर एच.आर. नेविल ने महुआ डाबर की पहचान उसी नाम के गांव से की, जो ध्वस्त महुआ डाबर से 50 किलोमीटर बसा है। सवाल उठता है कि गैर चिरागी महुआ डाबर में जब कोई बस नहीं सकता था तो ब्रिटिश सरकार के कारिंदो का झूठा लेखन कई सवाल खड़ा करता है।
आजाद भारत में इतिहासकारों ने गौर के पास बसे महुआ डाबर को तोड़ने-मरोड़ कर ही पेश किया। लिहाजा असली महुआ डाबर को न्याय दिलाने के बजाये इतिहासकारों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। महुआ डाबर जैसी विध्वंस की घटना इतिहास में जल्दी देखने को नहीं मिलेगी जहां इतनी बड़ी आबादी को जमीन में दफना दिया गया हो। देश के स्वतंत्र होने पर भारतीय सत्ता के लालची लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत को जैसे माफ कर दिया हो लेकिन महुआ डाबर की चीत्कारें आज भी हवां में गूंज रही हैं।

1999 में स्थापित ‘महुआ डाबर संग्रहालय’ में महुआ डाबर और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दस्तावेज, सिक्के, औजार, चित्र और समाचार पत्र संरक्षित किये गए हैं। ताकि नई पीढ़ीयां सही इतिहास जान सकें। महुआ डाबर में उत्खनन कार्य 11 जून 2010 से 1 जुलाई 2010 तक संपन्न हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर अनिल कुमार सहित तीन लोगों की निगरानी में हुआ था। खुदाई के दौरान लाखौरी ईंट से बनी दीवारें, कुआं, विभिन्न दिशाओं में निकली नालियां, छज्जा, लकड़ी के जले टुकड़े, राख, मिट्टी के बर्तन, कारीगरी के औजार, फूलदान, प्राचीन सिक्के, अभ्रक (माइका) आदि मिले थे। खुदाई से प्राप्त सभी साक्ष्यों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पास भेज दिया गया था।

महुआ डाबर संग्रहालय के महानिदेशक और क्रांतिकारी वंशज डॉ. शाह आलम राना के प्रयासों से इस क्रांति स्थल को उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति 2022 के ‘स्वतंत्रता संग्राम सर्किट’ में शामिल किया गया है। 10 जून 2025 से महुआ डाबर के क्रांतिनायकों को प्रशासन की तरफ से शस्त्र सलामी दी जाने लगी है। डॉ. राना ने जोर देते हुए कहा कि जालियांवाला बाग से बहुत पहले और कई गुना बड़ी इस घटना पर आज तक चुप्पी बनी हई है जबकि जालियांवाला बाग स्मारक पर 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी। 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आकर इसे ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना बताया। तो वहीं शताब्दी वर्ष 2019 में ब्रिटेन संसद में प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने अफसोस जाहिर करते हुए ब्रिट्रेन के इतिहास का काला धब्बा बताया था। असली महुआ डाबर की राख में दबा इतिहास आज भी एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में पुनर्जीवन की राह ताक रहा है।

From W. Wynyard, Officiating Commissioner, to Wm. Peppe Esquire, care of W. Cooke Esq., Bustee … Zillah Goruckpoor, 20th June 1857 (no. 61)

I have the honor to inform you that I shall send a further force of 20 Sowars with the usual native officers to aid your operations. The party will be at Bustee on the morning of the Tuesday 23rd June, when I request you will have orders to meet them. I was glad to see from your letter to Mr. Cooke that you were about to burn down Mhouea Dabur and shall be more glad to learn that it is an accomplished fact.

From W. Wynyard, Officiating Commissioner, to Wm. Peppe Esquire, Goruckpoor … Zillah Goruckpoor, 21st June 1857 (no. 69)

I have the honor to request that you will not attempt to burn down Mhouea Dabur, unless you feel quite strong enough to do it, with complete success, which from your letters to Mr. Patterson and Mr. Cooke, I imagine is not the case.

2nd. Twenty more Sowars leave this for you tonight. I am sorry to hear you have so many sick with you- until you are reinforced and the men with you have recovered, I would not work them too hard.

3rd. Mr. Patterson suggests that your presence at Gunneshpoor for one night with a force of Sowars would place Umanoolla Pindoora in a position of security. You will act in this matter as Mr. Patterson may direct, as I know nothing about that matter.

4th. I will send some footmen to strengthen you if I possibly can.

5th. Your presence with the Sowars has had the desired effect of releasing Col’l. and Mrs. Lennox and family and Sergeant Busher, and the Government will be most grateful to you for your exertions in this good cause.

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