पीयूष पांडेय-
बात 16 जुलाई 2015 की है। ‘आज तक’ दोबारा ज्वाइन किए हुए तीन-चार महीने ही हुए थे। मैं ‘10 तक’ का प्रोड्यूसर था। दोपहर में एक स्टोरी पर काम कर रहा था कि अचानक बगल में बैठने वाले मित्र मुकुल मिश्रा ने नयी एंकर मीनाक्षी कंडवाल से मुलाकात कराई।
मैं किसी आँकड़े में उलझा था तो यूं बस सिर घुमाकर ‘हाय’ किया और काम में लग गया। अगले चंद दिनों में चार-छह बार हाय-हैलो हुई। फिर, अचानक बॉस सुप्रिय प्रसाद और आजतक के कई साथी सात-आठ दिन के लिए इटली की सैर पर चले गए। मुझसे कहा गया-“तुन्हें दोबारा ‘आज तक’ में आए अभी छह महीने भी नहीं हुए हैं, इसलिए तुम चैनल संभालो और हम लोग चले इटली घूमने।“
मैं एक हफ्ते तक चैनल प्रमुख जैसी भूमिका में रहा, लेकिन इस शानदार अनुभव से कहीं ज्यादा इस दौरान मिली मुझे एक खास दोस्त। दरअसल, एक दिन कैंटीन में कॉफी पीते हुए मीनाक्षी से इधर-उधर की बात शुरु हुई। उस वक्त मुझे अहसास हुआ ये एंकर कुछ अलग है। मुझे याद है कि मीनाक्षी ने उस दिन मुझसे ‘शिवानी’ की किसी कहानी पर बात की थी। फिर फिल्मों की बात शुरु हुई तो उसने पूछा, “आपने The Shawshank Redemption देखी है?”
उस वक्त तक मैंने वो फिल्म नहीं देखी थी। खैर, इसके बाद अगले सात दिन तक रोज़ाना कैंटीन में साहित्य, फिल्म, पत्रकारिता और उस वक्त के सामयिक मुद्दों चर्चा हुई और इन सात दिनों में ही मीनाक्षी से अलग दोस्ती हो गई।
मीनाक्षी की उम्र और अनुभव मुझसे कम है, लेकिन अपने उसूलों पर टिके रहने का जज़्बा मुझसे ज्यादा है। यही बात मेरे मन में उसे खास जगह दिलाती है। मीनाक्षी उन चुनिंदा पत्रकारों में है, जो सामाजिक सरोकारों से जुड़ी और मुद्दे की पत्रकारिता करना चाहती है। और आलतू-फालतू खबरें पढ़ते हुए एक एंकर को जो बैचेनी होनी चाहिए, उसे होती है। और इस बेचैनी में उसने दो बार बड़ी जॉब छोड़ने की हिम्मत जुटा ली। कुछ अच्छा करने की बेचैनी उसकी परेशानी बढ़ाती है तो मेरे मन में उसके लिए सम्मान।
क्योंकि आज का सच ये है कि आजकल ज्यादातर एंकर-एंकरानी पत्रकारिता को जीने से ज्यादा फिल्मी तौर तरीकों को जीने में ज्यादा दिलचस्पी रखते दिखते हैं। उनकी सोशल मीडिया रील्स इसकी तस्दीक करती हैं। कई युवाओं का हाल तो ये है कि उन्होंने पत्रकारिता में बिना कुछ हासिल किए यही मान लिया है कि सोशल मीडिया पर रील्स बनाना ही एंकर्स का काम है। खैर,मैंनूं की?
मीनाक्षी ने अपने सीमित दायरे और संसाधनों में जब भी अच्छा करने का मौका मिला तो करने की कोशिश की है। मुझे याद है कि 2021 में जब उत्तराखंड में सुरंग हादसा हुआ तो वहां बिना खाए पिए रिपोर्टिंग करने के बाद लौटते हुए रात भर कार में वो इंडिया टुडे के लिए रिपोर्ट लिख रही थी। उसने दो बार एंट्रो मुझे भेजा कि ठीक है या नहीं? ये कवायद इसलिए थी क्योंकि संपादक को एडिशन छोड़ना था। और ये उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं था बल्कि इंडिया टुडे में अपनी रिपोर्ट छपी देखने की खुशी का मामला था।
आज तक में काम करते हुए कई बार शो के बीच में उसने मैसेज किया कि फलां सवाल का काउंटर क्या हो सकता है? कई बार घर से स्टूडियो जाते वक्त किसी मुद्दे पर तमाम सवाल किए ताकि उसके अलग अलग आयाम समझ सके। उस वक्त ये एक युवा एंकर की काम को बेहतर करने की कोशिश थी।
मीनाक्षी अब अनुभवी हो चुकी है। अपने यूट्यूब चैनल के लिए अकेले जोशीमठ पहुंचकर जिस तरह रिपोर्टिंग की, उसकी चर्चा मुख्यधारा के मीडिया में भी हुई। मैं बीते दस साल में कई बार उसके साथ सख्त सीनियर की तरह पेश आया और उसे अकसर मेरी तारीफ के लिए जूझना पड़ा है। मुझे याद है कि जोधपुर में सलमान खान केस की रिपोर्टिंग करते हुए मीनाक्षी लाइव दे रही थी। मैंने उसकी रिपोर्टिंग और शब्दों के चयन की तारीफ करते हुए उसे एक व्हाट्सएप मैसेज किया। कई बार एक ही खबर पर कई रिपोर्टर स्क्रीन पर लाइव दिखते हैं, और जवाब कोई एक रिपोर्टर दे रहा होता है।
मीनाक्षी ने किसी दूसरे रिपोर्टर के चैट देने के दौरान ही वो मैसेज देख लिया। अचानक मैंने महसूस किया कि उसकी आँखें छलछला गईं है। लाइव खत्म होते ही उसने फोन किया और भरे गले से कहा-“यकीन नहीं हो रहा कि ये आपका मैसेज है।”
कल सुबह बातचीत में याद आया कि दोस्ती के 10 साल हो गए… तो मीनाक्षी ऑफिस आ गई..। हमने ‘आजतक’ और ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ में साथ काम किया है, लेकिन तस्वीरें ज्यादा नहीं लीं तो कल पहले तस्वीरें ली गईं और फिर खाया-पीया गया।
Meenakshi Kandwal ये खास पोस्ट तुम्हारे लिए। तुम्हारे सम्मान में लिखी इस खास पोस्ट के लिए अब बड़ी पार्टी अपेक्षित है। दोस्ती कायम रहे !!


