विकास मिश्रा-
बात करीब दो महीने पहले की है। दफ्तर में बैठा था। दोपहर में फोन की घंटी बजी। शलभ का फोन था। वही चिरपरिचित आवाज, वही अंदाज, वही संबोधन- भइया प्रणाम, कैसे हैं। मैंने हालचाल दिया, हालचाल लिया। पूछा कि क्या चल रहा है, कैसा चल रहा है। साथ ही बताया भी कि करियर की गाड़ी एकेडमिक की ओर बढ़ चली है। आईआईएमटी ग्रुप ऑफ कॉलेजेज में पत्रकारिता विभाग में डीन के पद पर काम कर रहा हूं।
शलभ ने कहा कि भइया यह तो बहुत अच्छी बात हो गई। मेरी भी पत्रकारिता में पीएचडी पूरी हो गई है। मैंने कहा- वाह मैं कभी बच्चों को पढ़ाने के लिए गेस्ट लेक्चरर के तौर पर बुलाऊंगा। शलभ बोले- भइया आपका जब आदेश होगा, आ जाऊंगा।
बात काफी देर तक चली। बहुत दिनों बाद बात हो रही थी, मेरे मन में एक सवाल तैर रहा था कि अचानक शलभ ने फोन क्यों किया। मेरे पास कई बार लोगों का फोन आता है तो उलाहना देते हैं कि आप तो याद ही नहीं करते। मैं उत्तर देता हूं कि याद बहुत करता हूं, बस फोन नहीं कर पाता, जब कोई बहाना आ जाता है तो फोन भी कर लेता हूं। तो शलभ से बात भी चल रही थी, मन में सोच भी चल रही थी कि इतने व्यस्त इंसान ने अचानक फोन क्यों किया।
इस बीच शलभ ने कहा- भइया आपका छोटा भाई विधायक है, कभी भी मेरे लायक कुछ हो तो संकोच मत कीजिएगा। आप तो कभी कुछ कहते ही नहीं। कोई भी बात हो तो सीधे मुझे आदेश दीजिए, मुझे अच्छा लगेगा।
शलभ की ये बात भावनात्मक रूप से मुझे छू गई। क्योंकि मैं जानता हूं कि सफलता इंसान को बहुत व्यस्त कर देती है, कामयाबी के कई नए रिश्तेदार पैदा हो जाते हैं। ऐसे में शलभ का समय निकालकर फोन करना और ये कहना मन को छू गया। बहरहाल करीब 15 मिनट की बातचीत के आखिर में शलभ ने मेरे उस प्रश्न का उत्तर भी दे दिया, जिसके जवाब के लिए मन में कौतूहल था। शलभ बोले- भइया ऐसे ही आपकी याद आ गई थी तो फोन मिला लिया।
शलभ मणि त्रिपाठी अपने दौर के धुरंधर पत्रकार रहे हैं। करीब दो दशक की पत्रकारिता की शानदार पारी खेलकर राजनीति में गए। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार बने। पार्टी के प्रवक्ता बने और 2022 में देवरिया से विधायक भी बने। एक संयोग बनते-बनते रह गया था। अगर समीकरण अचानक न पलटते तो शलभ मणि 2019 में देवरिया से बीजेपी के सांसद भी बनते। ऐन वक्त पर उनका टिकट कट गया था।
शलभ से मेरा परिचय दो दशक से ज्यादा पुराना है, हम दोनों दैनिक जागरण में थे। मैं मेरठ में तो शलभ गोरखपुर में। 2005 में चैनल-7 की शुरुआत हुई तो फिर हम साथ आ गए। 2 फरवरी 2005 को मानेसर के होटल में हमारी मुलाकात हुई थी, जहां चैनल-7 के साथियों की ट्रेनिंग चल रही थी। तबसे रिश्ता और रिश्ते की तासीर बिल्कुल वैसी ही है।

शलभ मणि पढ़े लिखे राजनेता हैं। तेज तर्रार हैं, अद्भुत रूप से सक्रिय हैं, दुर्व्यसनों से दूर हैं, काम भर के दबंग भी हैं। अपनी सीमा जानते हैं और यह भी कि यह सीमा कहां तक पार की जा सकती है। देवरिया-गोरखपुर के जितने लोग भी मिलते हैं, सब तारीफ करते हैं। अपने विधानसभा क्षेत्र में, मित्र मंडली में, नाते-रिश्तेदार के यहां चाहे विवाह हो, उपनयन संस्कार हो, जन्मदिन हो या फिर कोई और उत्सव। शलभ वहां जरूर पहुंचते हैं। किसी भी अपने के सुख और दुख दोनों में शामिल रहते हैं। उनकी सक्रियता की खबरें अक्सर सोशल मीडिया से मिलती रहती हैं।
शलभ की सबसे बड़ी विशेषता है उनका संस्कार। पत्रकारिता में भी बड़े पद पर रहे, राजनीति में भी अच्छी पोजीशन में रहे, अब तो विधायक भी हैं, लेकिन अपनों के लिए न तो शलभ बदले और न ही उनका व्यवहार बदला। वही विनम्रता, वही सौम्यता और वही मुस्कुराता हुआ चेहरा हमेशा मिला। मुझे शलभ में हमेशा छोटा भाई ही मिला। जब भी फोन पर बात हुई, हर बार मिलने का न्योता दिया, देवरिया आने की मनुहार की।
शलभ में कुछ बुनियादी गुण हैं। राजनीति में उनके लिए अभी पूरी उम्र पड़ी है, उनमें असीम संभावनाएं हैं। विजन साफ है, जमीन की समझ है। उस रोज बातचीत में ही बता रहे थे कि भइया ज्यादातर समय क्षेत्र में दे रहा हूं, क्योंकि लोगों की बहुत अपेक्षाएं हैं और मेरी कोशिश रहती है कि कोई मेरे पास आने के बाद निराश होकर न जाए। जो कुछ दिया है, यहां के लोगों ने ही दिया है तो उनकी सेवा तो पहले नंबर पर है। सेवा के इस भाव का उदाहरण कोरोना काल में भी मिला था, जहां शलभ का पूरा परिवार संक्रमित होकर अस्पताल में पड़ा था और शलभ लोगों की मदद के लिए सड़क पर थे। लोगों को अस्पताल पहुंचाने, उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया करवाने में जुटे थे। तब तो वे विधायक भी नहीं थे।
बीजेपी में शलभ को जो भी जिम्मेदारी मिली, उससे ज्यादा उन्होंने करके दिखाया। शलभ पार्टी के उत्तर प्रदेश प्रवक्ता हैं, लेकिन नेशनल न्यूज चैनल्स में जाकर अच्छे अच्छों की बोलती बंद कर देते हैं। बीजेपी से शलभ मणि आजतक समेत सभी बड़े न्यूज चैनल्स के पसंदीदा प्रवक्ता हैं। पार्टी भी इसे देख-समझ रही होगी। करीब तीन दशक के करियर में जितनी भी मेरी राजनीतिक समझ है, वह तो यही कहती है कि शलभ का राजनीतिक भविष्य बहुत उज्ज्वल है।
आज न तो शलभ का जन्मदिन है, न तो शादी की सालगिरह है और न ही आज उन्हें कोई पद या पुरस्कार मिला है। पोस्ट की शुरुआत में एक फोन कॉल का जिक्र आया था। जिस तरह से बिना किसी काम के, प्रेम वश उस रोज शलभ ने मुझे फोन किया था, उसी तरह बिना किसी प्रयोजन के प्रेम वश मैं भी यह पोस्ट लिख रहा हूं। सियासत के रण में शलभ के लिए बस एक ही बात कहना चाहूंगा- विजयी भव।


