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दिल्ली

मोदी सरकार के लिए मैंने सक्रिय तौर पर प्रचार किया लेकिन अब मैं निराशा में डूब गया हूं

Shahnawaz Malik : मुखर्जी नगर में भूख-हड़ताल से उठाए गए चारों स्टूडेंट्स के बयान इस प्रकार हैं…

1- मोदी सरकार के लिए मैंने सक्रिय तौर पर प्रचार किया लेकिन अब मैं निराशा में डूब गया हूं। हम पांच दिन से भूखे हैं। कोई मिलने तक नहीं आया। जो इमेज चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने बनाई थी, वह अब धूमिल हो रही है। मुकेश राय, मऊ यूपी।

Shahnawaz Malik : मुखर्जी नगर में भूख-हड़ताल से उठाए गए चारों स्टूडेंट्स के बयान इस प्रकार हैं…

1- मोदी सरकार के लिए मैंने सक्रिय तौर पर प्रचार किया लेकिन अब मैं निराशा में डूब गया हूं। हम पांच दिन से भूखे हैं। कोई मिलने तक नहीं आया। जो इमेज चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने बनाई थी, वह अब धूमिल हो रही है। मुकेश राय, मऊ यूपी।

2-मैंने संघ के स्कूल से शिक्षा ली है और मोदी के नाम पर वोट किया लेकिन उनका रवैया इमानदारी भरा नहीं है। वह ख़ुद ब्रिक्स में हिंदी बोलते हैं और हमें अंग्रेज़ी के प्रवक्ता के तौर पर देखना चाहते हैं। लोकपति त्रिपाठी, लखनऊ, यूपी।

3-पिताजी को मोदी पर भरोसा था लेकिन अब उनकी आंखेें खुल गई हैं। पिता ने कहा है कि तुम सत्य के लिए लड़ रहे हो और यह आंदोलन जारी रहे। ऊषापति त्रिपाठी, गोंडा, यूपी

4- सरकार हमारी बात क्यों नहीं सुन रही? अगर आज हमारी मांग मानी जाएगी तो कल हम भी इस देश के विकास में सहभागी बनेंगे। अजीत कुमार त्रिवेदी, जहानाबाद, बिहार।

नवभारत टाइम्स में कार्यरत पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.


Dilip C Mandal : नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है. हारने को इंदिरा गांधी भी हारी थीं और अटल बिहारी वाजपेयी भी. बंगाल में सीपीएम भी हारी. लेकिन मुखर्जी नगर में छात्रों की लड़ाई जिसके खिलाफ ठनी है वह किसी मोदी, गांधी या वाजपेयी या इनकी पार्टियों से बड़ी चीज है. ये छात्र भारतीय राज व्यवस्था से, पावर स्ट्रक्चर से जाने-अनजाने में टकरा गए हैं. भारतीय राज व्यवस्था ने अपने को बाकियों से अलग रखने के लिए इंग्लिश भाषा को एक टूल के तौर इस्तेमाल करने का कौशल अर्जित कर लिया है. इंग्लिश उनके लिए सीखने का माध्यम नहीं है.

इंग्लिश एक डिफरेंशिएटर है. यह एक जरिया है जिससे बताया जाता है कि दो लोग या दो वर्ग कैसे एक दूसरे से अलग हैं. छात्र उस डिफरेंशिएटर को चैलेंज कर रहे हैं. इसलिए पिट रहे हैं. किसी पार्टी के खिलाफ आंदोलन से बड़ा है यह आंदोलन. न्यायसंगत भी है. लेकिन मुकाबला जिनसे है, वे सूई की नोक बराबर जमीन भी आसानी से नहीं छोड़ने वाले. सवाल उनके अस्तित्व का भी है. सवाल भाषा का है ही नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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1 Comment

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  1. सिकंदर हयात

    July 31, 2014 at 4:38 pm

    ताज़्ज़ुब हे की पढ़े लिखे होने के बाद भी आपसे ऐसी गलती कैसे हो गयी ? मोदी सरकार कॉर्पोरेट ने भी बनायीं और हिन्दू साम्पदायिको ने भी एक की दिलचस्पी सिर्फ अंग्रेजी में हे दूसरे की देवभाषा संस्कृत में आपने कैसे सोच लिया की जनजन की भाषा में य लोग कोई दिलचस्पी लेंगे सवाल ही नहीं उठता हे

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