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सियासत

ट्रंप को पटाने के लिए मोदी सरकार ने मोटी रकम देकर अमेरिका में दो-दो दलाल हायर किए हैं!

भारत में नेता चाहे जितनी स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की दुहाई दें, लेकिन हकीकत यह है कि जब अमेरिका जैसे देशों से काम निकलवाने की बारी आती है तो वही नेता सबसे पहले विदेशी दलालों यानी लॉबिस्ट फर्मों के दरवाज़े पर जाकर सिर झुकाते हैं। मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है—ट्रंप को मनाने के लिए दो-दो लॉबिस्ट फर्म्स को करोड़ों रुपये की मोटी फीस पर हायर किया गया है। सवाल यह है कि जो जनता के सामने ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ के नाम पर नारे उछालते हैं, वही अंतरराष्ट्रीय राजनीति में देश और देशवासियों के हितों की दलाली परोसने में क्यों लगे हुए हैं?


शीतल पी सिंह-

अमेरिका में दलाली को क़ानूनी मान्यता प्राप्त है। इनके लिए दूसरे शब्दयुग्म प्रचलित हैं। इन्हें वहाँ lobbyists कहते हैं। इनके बाक़ायदा दफ़्तर हैं, स्टाफ़ है, फिजिकल और डिजिटल पते ठिकाने हैं।

देश में मीडिया के ज़रिए मोदीजी चाहे जो प्रचारित प्रसारित करते रहें पर ट्रंप को मनाने के लिये दो-दो lobbyist फर्म्स को भारत ने मोटी रकम पर हायर कर रक्खा है।

करीब सोलह करोड़ रुपये सालाना पर Jason Miller को रक्खा गया है जिन्होंने पिछले दिनों ही ट्रंप से मुलाक़ात की थी और संलग्न चित्र पब्लिक किया था। दूसरी फर्म को करीब दस करोड़ रुपये सालाना दिये जा रहे हैं जिसे पिछले महीने ही नियुक्त किया गया है।

ट्रंप ने मोदीजी को अपना परम मित्र मुफ़्त में नहीं कहा था और न उसने मुफ़्त में ट्रंप से यह सवाल किया था जिसके जवाब में ट्रंप ने यह कहा था! दुनिया यूँ ही गोल नहीं है!

स्वदेशी का नारा नेताओं के लिए एक जुमले के सिवा कुछ नहीं और देशभक्ति की रट लगाने वाले ही सबसे पहले देश और देशवासियों को मंडी में नीलाम करते मिलते हैं!


अब मोदीजी अंतरराष्ट्रीय मंच पर नितीश कुमार के पलटूराम वाले रोल में नज़र आ रहे हैं! अमरीकी प्रशासनिक अधिकारी दावा कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी महीने भर में उनके आगे घुटने टेक देंगे।

जब मोदीजी SCO मीटिंग में चीन गए थे तो लगा था कि शायद वे कुछ हिम्मत दिखाएंगे। लेकिन उसके बाद खबरें आईं कि भारत ने दो दो लॉबिस्ट फर्मों को ट्रंप प्रशासन को मनाने के लिए मोटी फीस चुकाई है तो लोग चौंके। लेकिन अब तो अमरीकी प्रशासनिक अधिकारियों के दावे में दम दिखाई दे रहा है।

ख़बर आई है कि मोदीजी ब्रिक्स की वर्चुअल बैठक में शामिल नहीं होंगे। यह बहुत महत्वपूर्ण संकेत है। ब्रिक्स से ट्रंप सबसे ज़्यादा बिदकते हैं। ब्रिक्स की अर्थव्यवस्था ने यूरोप और अमेरिका की संयुक्त अर्थव्यवस्था को पछाड़ा हुआ है और यह अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।

ब्रिक्स में डालर को त्यागने का प्रस्ताव सिर्फ़ भारत की ना नुकुर से लटका हुआ है। ट्रंप तो डालर वाले सवाल पर क्रोध से लाल हो जाते हैं। मोदीजी को इस पर उनके मुंह पर डांट चुके हैं।


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